सुप्रीम कोर्ट के अजीब व गरीब फैसले

सुप्रीम कोर्ट के अजीब व गरीब फैसले

आजाद हिन्दुस्तान की तारीख में मुल्क के साबिक चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ऐसे चीफ जस्टिस साबित हुए जिनके दौर में सुप्रीम कोर्ट का वकार व एहतराम (प्रतिष्ठा एवं सम्मान) इंतेहा दर्जे तक गिरा। हर तरफ से उनपर उंगलियां उठीं। देश की सबसे बड़ी अदालत का वकार तो आने वाले दिनों में दुबारा बहाल हो जाएगा, लेकिन अपने आखिरी दिनों के कुछ फैसलों से वह देश और भारतीय समाज में एखलाकी और सफाकती (नैतिक व सांस्कृतिक) जहर बो गए हैं उससे देश की हजारों साल की सकाफत (संस्कृति) और समाज का तानाबाना बर्बाद ही होने वाला है। उसे कैसे रोका जाए अब यह एक बड़ा मसला पैदा हो गया है। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के दौर में हमजिन्सी (समलैंगिकता) और बदचलनी (व्याभिचार) को कानूनी हैसियत मिल गई है। दो बड़े मसले ऐसे भी उनके आखिरी दिनों में आए जिन पर सुप्रीम कोर्ट की राय वाजेह (स्पष्ट) होनी चाहिए थी लेकिन उन्हें टाल दिया गया। एक यह कि जरायम पेशा और दागी लोगों को पार्लियामेट और असम्बली के एलक्शन लड़ने की इजाजत होनी चाहिए या नहीं और दूसरा मसला था मुबय्यना (कथित) शहरी माओवादियों की देशद्रोह और वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी को कत्ल करने की साजिश के इल्जाम में गिरफ्तारी। दागी सियासतदानों का मामला सुप्रीम कोर्ट ने पार्लियामेंट और एलक्शन कमीशन पर टाल दिया। इसी तरह शहरी माओवादी कह कर गिरफ्तार किए गए आधा दर्जन इंसानी हुकूक (मानवाधिकार) एक्टिविस्ट की गिरफ्तारी का मामला सुप्रीम कोर्ट ने मकामी निचली अदालतों पर ही टाल दिया। हालांकि यही सुप्रीम कोर्ट है जिसने लालू यादव के मामले में अपने दायरा-ए-अख्तियार (अधिकार क्षेत्र) से बाहर जाते हुए पीपुल्स रिप्रेजेंटेटिव कानून की दफा आठ को खत्म कर दिया था। उस फैसलों का असर सिर्फ लालू यादव और साबिक मरकजी वजीर रशीद मसूद पर ही पड़ा। उन दोनों को अलग-अलग मामलात में तीन साल की सजा हो गई थी तो दोनों को न सिर्फ जेल जाना पड़ा बल्कि दोनों का सियासी कैरियर ही तबाह हो गया। एक और अहम मामला था कि नमाज के लिए मस्जिद जरूरी नहीं है। 1994 में जस्टिस वर्मा के फैसले को बड़ी संवैधानिक बेंच को दुबारा सुनवाई के लिए भेजने का था उसे भी सुप्रीम कोर्ट ने नहीं माना और जस्टिस वर्मा के फैसले को ही आखिरी फैसला करार दे दिया।

अदालत हो या पार्लियामेंट मुल्क और समाज में कोई बड़ी तब्दीली लाने के लिए कोई फैसला तभी कर सकती है जब मुल्क के लोगों की अक्सरियत वह तब्दीली पसंद और मंजूर करे हमजिन्सी और बदचलनी (समलैंगिकता और व्याभिचार) को कानूनी करार देते वक्त सुप्रीम कोर्ट ने यह जानने की कोई कोशिश नहीं की कि देश के आम लोग ऐसा चाहते भी हैं या नहीं चाहते हैं? दो-तीन एनजीओ के दो-तीन सौ लोगों ने दिल्ली समेत मुल्क के कुछ शहरों में मजाहिरे कर दिए धरने दे दिए बस सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस और कुछ जज साहबान ने तस्लीम कर लिया कि पूरा मुल्क हमजिन्सी (समलैंगिकता) चाहता है। यानी अब मुल्क के कुछ बदअक्ल और बहके हुए मर्द-मर्दों के साथ तो ख्वातीन-ख्वातीन के साथ न सिर्फ जिंदगी बसर कर सकेगे बल्कि पूरी आजादी के साथ एक-दूसरे के साथ घिनौनी सेक्स में भी मुलव्विस हो सकेगे। अगर सुप्रीम कोर्ट ने माहिर डाक्टरों के किसी पैनल से ही मश्विरा कर लिया होता तो कि हमजिन्सी (समलैंगिकता) सेहत के लिए कितनी खतरनाक साबित हो सकती है और इससे समाज कितनी खतरनाक बीमारियों में मुब्तला हो जाएगा तो शायद ऐसा फैसला कभी न होता। सुप्रीम कोर्ट के जज साहबान ने न तो इस सिलसिले में सरकार से कोई सर्वे कराने के लिए कहा और न ही डाक्टरों से मश्विरा किया बस फैसला कर दिया। यह भी नहीं देखा कि दुनिया के चौबीस छोटे मुल्कों में ही इसकी इजाजत है।

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने अपने टर्म के आखिरी दिनों में बदचलनी (व्याभिचार) के खिलाफ नाफिज एक सौ अट्ठावन बरस पुराने कानून की दफा 497 और सीआरपीसी की दफा 198 को खत्म करते हुए शादी शुदा मर्द और औरतों को अपनी पसंद की औरत और मर्द के साथ सेक्स करने की खुली छूट दे दी। हमें यकीन है कि अगर चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की कयादत वाली पांच जजों की बेंच में शामिल सभी जज साहबान किसी और से नहीं अपनी-अपनी बीवियों से ही घर में पूछ लेते कि उन्हें अपने पसंद के किसी भी मर्द के साथ सेक्स करने की छूट चाहिए तो उनके जवाब सुनने के बाद ऐसा फैसला हरगिज न करते। फैसले में चीफ जस्टिस की कयादत वाली पांच जज साहबान की बेंच ने बड़े फख्र के साथ यह कहा है कि शादी के बाद कोई बीवी अपने शौहर की मिलकियत यानी बीवी शौहर की जागीर नहीं हो जाती उसे भी सेक्स के लिए अपनी पसंद के मर्द का इंतखाब करने की आजादी होनी चाहिए। क्योंकि अपने जिस्म की मालकिन वह खुद है उसका शौहर उसका मालिक नहीं है। सवाल यह है कि देश में वह कौन मर्द है जो अपनी बीवी को अपनी जागीर समझते हैं और अगर है भी, उनकी तादाद कितनी है? हमारे देश में तो हजारों सालों से बीवी को उसके शौहर का आधा जिस्म (अद्धांगीनी) माना गया है। आम इंसान तो क्या देवताओं तक को उस वक्त तक अधूरा समझा गया है जब तक उनके साथ उनकी बीवियां न आई हों। शौहर बीवी का यह रिश्ता देश के किसी एक मजहब को मानने वालों तक ही महदूद (सीमित) नहीं रहा है। यहां रहने वाले हिन्दू हों, मुसलमान हों, सिख हों, ईसाई हों या कोई और हर समाज में बीवी और शौहर को एक दूसरे का लाजिम व मलजूम (पूरक) ही समझा गया है। इसमें मिलकियत का सवाल कहां से आ गया?

जिस दिन से सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आया है पूरे मुल्क के हर समाज में एक अजीब सी नाराजगी और बेयकीनी (अविश्वास) का माहौल पैदा हो गया है। सोशल मीडिया इसकी बहस से भरा पड़ा है। लोगों का कहना है कि मर्द औरत तो दूर हमारे देश में तो जानवरों की कई नस्लें ऐसी हैं जिनकी मादा हर नर या पसंद के नर के साथ सेक्स करना पसंद नहीं करते हैं। फिर इंसानों को इस किस्म की छूट देने का क्या जवाज (औचित्य) है।

शायद ही कोई ऐसा मर्द या औरत मुल्क में हो जो सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से मुत्तफिक (सहमत) हो। आखिर वह कौन सी ख्वातीन हैं जो शादी के बाद अपने शौहर के अलावा ‘सेक्सुअली मुतमइन’ होने के लिए किसी दूसरे मर्द के पास जाना पसंद करेंगी। शायद ही कोई मर्द हो जो इसे पसंद करे कि उसकी बीवी उसके अलावा किसी दूसरे मर्द के साथ सेक्स करे। यह भी एक हकीकत है हिन्दुस्तान और दुनिया के दूसरे मुल्कों में एडल्ट्री यानी शादी शुदा मर्द औरतें दूसरों के साथ सेक्स करते हैं, लेकिन चन्द मुल्कों के अलावा बाकी पूरी दुनिया में ऐसा करने वालों को सजा देने के कानून हैं। अब हिन्दुस्तान में एडल्ट्री की छूट दे दी गई है तो समाज के टूटने और क्राइम में इजाफा हो जाएगा। इस बात का पूरा खतरा है कि कोई मर्द या औरत अपनी बीवी या शौहर की बदचलनी (एडल्ट्री) से नाराज होकर उनपर हमला कर दे हद तक कि कत्ल तक कर दे। इससे कुन्बे टूटेंगे आने वाली नस्लों पर भी बुरा असर पड़ने वाला है। आने वाली नस्लें तो शायद जिंदगी भर इसी कन्फ्यूजन में फंसी रहेगी आखिर उनका बाप कौन है? यह भी सच है कि आजकल डीएनए टेस्ट के जरिए इस बात का आसानी से पता लगाया जा सकता है कि कौन किस की औलाद है लेकिन इसका पता लगा कर कौन अपनी जिंदगी जहन्नुम बनाना चाहेगा। साबिक चीफ जस्टिस और उनकी बेंच में शामिल जज साहबान को मुबारकबाद कि उन्होने हजारों सालों की सकाफत और रिवाज को खत्म कर दिया।

एक और अहम बल्कि यूं कहें कि खतरनाक फैसला यह हुआ है कि 1994 के जस्टिस वर्मा के उस फैसले को बड़ी संवैधानिक बेंच को सौंपने से भी जस्टिस दीपक मिश्रा की कयादत वाली बेंच ने इंकार कर दिया जिस फैसले में जस्टिस वर्मा ने कहा था कि नमाज अदा करने के लिए मस्जिद जरूरी नहीं है। सवाल यह है कि अगर नमाज के लिए मस्जिद जरूरी नहीं है तो क्या नमाज सड़कों पर होगी। जस्टिस मिश्रा की बेंंच में जस्टिस अब्दुल नजीर भी शामिल थे उन्होने अपने दोनों साथी जजों को मस्जिद की अहमियत और जरूरत से वाकिफ भी कराया उन्होंने जजमेंट में अपनी राय लिखी भी लेकिन चूंकि तीन में से दो जज साहबान की राय अलग थी इसलिए जस्टिस नजीर की राय को तस्लीम नहीं किया गया और फैसला मस्जिद के खिलाफ हो गया। जस्टिस वर्मा रहे हों या चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और अशोक भूषण हों यह फितरी (स्वाभाविक) बात है कि मस्जिद और नमाज के दरम्यान जो रिश्ता होता है उसकी मालूमात जितनी जस्टिस नजीर को है उतनी बाकी जज साहबान को नहीं हो सकती। नमाज इस्लाम का अहमतरीन फरीजा है इज्तेमाइयत (सामूहिक) नमाज का अहम रूक्न है। जमात के साथ नमाज अदा करने की सबसे ज्यादा फजीलत है। अब अगर नमाज के लिए मस्जिद जरूरी नहीं है तो क्या जरूरी है। इस मसले को बड़ी संवैधानिक बेंच में न भेजकर जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस अशोक भूषण ने देश के उन ताकतों को हंगामा करने और नमाज में रूकावट डालने का भरपूर मौका दे दिया है। अगर मुसलमानों की जानिब से यह दरख्वास्त गुजारी गई कि मामले को बड़ी संवैधानिक बेंच के सुपुर्द कर दिया जाए ताकि जस्टिस वर्मा के 1994 के जजमेंट पर नजरसानी हो सके। बड़ी संवैधानिक बेंच में मुसलमान ही तो नहीं बैठे होते उसमें भी कोई जस्टिस मिश्रा, जस्टिस भूषण और जस्टिस चन्द्रचूड़ ही होते हां एक आध जस्टिस नजीर भी होते लेकिन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा साहब ने तो इतना मौका देना भी मुनासिब नहीं समझा कि मुसलमान अपनी फरियाद तफसील से सुना सके। जस्टिस मिश्रा इस हकीकत से बखूबी वाकिफ हैं कि मोदी सरकार आने के बाद से दिल्ली से मिले हुए हरियाणा में बीजेपी सरकार अपने गुण्डों के जरिए नमाज और मसाजिद के खिलाफ किस शर्मनाक हद तक हंगामा करा रही है। मुसलमानों ने मस्जिद के नाम जमीन खरीद कर बाकायदा रजिस्ट्री कराकर दो सालों में एक मस्जिद तामीर की दो सालों से उसमें नमाज भी हो रही थी उसे सिर्फ इसलिए सील करा दिया गया कि जिस शीतला कालोनी में वह मस्जिद बनी है उसमें रहने वाले आरएसएस के दो गुण्डों प्रमोद गुप्ता और बीपी सिंह ने डीएम के सामने मीटिंग में बैठकर कह दिया कि मोहल्ले में मस्जिद उन्हें खटकती है। हम अदालत और सुप्रीम कोर्ट का इंतेहा दर्जे तक एहतराम (सम्मान) करते हैं। इसी के साथ बड़ी सफाई से यह भी कहना चाहते हैं कि चीफ जस्टिस रहे दीपक मिश्रा का यह फैसला उनकी जेहनियत (मानसिकता) की अक्कासी करता है। वह तो फैसला करके रिटायर हो गए। लम्बी-चौड़ी पेंशन और तरह-तरह की सहूलतों के साथ बेहतरीन सिक्योरिटी में आराम से रहेंगे, जलसों में तकरीरें करने भी जाएगें हो सकता है किताब या कई किताबें लिख कर मोटी कमाई भी कर लें लेकिन नमाजियों के लिए वह जो मुसीबत खड़ी कर गए मुल्क के कई हिस्सों के नमाजी उस नासूर के दर्द में फंसे रहेंगे।