मोदी हुकूमत को चाहिए इशारों पर नाचने वाला सुप्रीम कोर्ट

मोदी हुकूमत को चाहिए इशारों पर नाचने वाला सुप्रीम कोर्ट

नुमाइंदा खुसूसी

नई दिल्ली! नरेन्द्र मोदी हुकूमत ने आखिर अपनी यह मंशा उस वक्त जाहिर कर दी कि उसे सुप्रीम कोर्ट की ऐसी बेंच चाहिए जो सरकार के इशारों पर नाचते हुए फैसला सुनाए। जब मणिपुर में पुलिस और फौजियों के जरिए इनकाउण्टर के बहाने मारे गए एक हजार पांच सौ अट्ठाइस (1528) शहरियो ंकी तहकीकात करने वाली सीबीआई की एक स्पेशल इन्वेस्टीगेशन टीम की रिपोर्ट पर सुनवाई करने वाली जस्टिस मदन बी लूकर और जस्टिस यू यू ललित की बेंच से सरकार की तरफ से कह दिया गया कि वह इस मामले की सुनवाई न करे।

गुजिश्ता दिनों इस मामले पर सुनवाई के दौरान एटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने अदालत से कह दिया कि भारत सरकार की जानिब से उन्हें यह हिदायत मिली है कि वह इस बेंच की इस मामले की सुनवाई करने से मना करें। भारत सरकार को इस बात पर सख्त एतराज है कि अदालत ने सुनवाई के दौरान मणिपुर पुलिस को कातिल क्यों कहा?

याद रहे कि 14 जुलाई 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की एक स्पेशल इन्वेस्टीगेशन टीम (एसआईटी) बनाकर इनकाउण्टर के बहाने मारे गए सभी एक हजार पांच सौ अट्ठाइस (1528) मामलात की तहकीकात करने का आर्डर दिया था। अभी एसआईटी की आखिरी रिपोर्ट आई भी नहीं थी कि मणिपुर में तैनात साढे तीन सौ फौजियों की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में एक पटीशन आ गई जिसमें कहा गया कि दहशतगर्दी की सरगर्मियों के खिलाफ पुलिस और फौज की जो कार्रवाइयां हुई उनकी तहकीकात के दौरान एसआईटी ने फौजियों और पुलिस की बात संजीगदी से नहीं सुनी।

मणिपुर में इनकाउण्टर में मारे गए लोगों के पसमांदगान की जानिब से दायर की गई मफाद आम्मा की एक रिट पटीशन की सुनवाई करते हुए जस्टिस मदन बी लूकर और जस्टिस यू यू ललित की बेंच ने अदालत के जरिए तश्कील कर्दा सीबीआई की एसआईटी के हवाले से सीबीआई के डायरेक्टर से सवाल जवाब के दौरान जांच की धीमी रफ्तार पर तब्सिरा किया था कि ‘कातिल’ इम्फाल की सड़कों पर घूम रहे हैं। मुल्जिमान के सिलसिले में बेंच का यह तब्सिरा भारत सरकार को अच्छा नहीं लगा। सरकार की तरफ से अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने कहा कि इस तरह के रिमार्क के लिए बेंच को इस मामले से अपने को अलग कर लेना चाहिए। ऐसे तब्सिरे से गुमान होता है कि अदालत जानिबदारी बरतेगी लिहाजा बेंच को मामला किसी दूसरी बेंच को भेज देना चाहिए। अटार्नी जनरल ने यह भी कहा कि मुसलेह फोर्स के जवान नामुवाफिक हालात में काम करते बागियों से ज्यादा मारे जाते हैं। अदालत के तब्सिरे से फौजी अफसरों को फांसी का फंदा सामने नजर आ रहा है। सुप्रीम कोर्ट के ऐसे रिमार्क के बाद क्या कोई निचली अदालत अलग तरीके से देख सकती है।

पीआईएल दाखिल करने वालों के वकील कोलिन गोंजाल्विस और मामले की एमिकस क्यूरी एडवोकेट मेनका गुरूस्वामी ने कहा कि बेंच के मामले से अलग होने की कोई वजह नहीं है जबकि अदालत की जानिब से इस सिलसिले में कहा गया कि रिमार्क खास रिफ्रेंस में किया गया था। अपील करने वाले चाहें तो हम वजाहत कर सकते हैं। इस पर वेणुगोपाल ने कहा कि मुल्जिमान फौजी अफसरों में बेंच की तरफ से जानिबदारी के अंदेशे का डर पैदा हो गया है लिहाजा बेंच को मामले की सुनवाई नहीं करनी चाहिए।

मणिपुर में पिछली कई दहाइयो ंसे आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट (अफसपा) नाफिज है और फर्जी इनकाउण्टर के मामले दो दहाई तक फैले हुए हैं। शोरिश जदा इलाका करार देने और अफसपा के नाफिज होने से फोर्स के जवानों को ड्यूटी पर रहते हुए कुछ भी करने की आजादी मिली हुई है। अदालत की तरफ से कहा गया कि जिन्होने लोगों के साथ ज्यादती की है उसे इस कानून के पीछे छिपाया नहीं जा सकता।

मोदी सरकार की तरफ से अटार्नी जनरल के तवस्सुत से अदालत से फर्जी इनकाउण्टर के मामलों के मुल्जिमान की तरफ से जो पैगाम पहुचवाया गया है वह साफ इशारा है कि जो कुछ मौजूदा सरकार को पसंद नहीं है उससे अदालतें भी एतराज करे। हालांकि जजों ने इस मामले में इतना तो वाजेह कर ही दिया है कि बेच ने सीबीआई को गिरफ्तारी का हुक्म नहीं दिया बल्कि यह कहा कि जब उन्हें चार्जशीटेड किया गया है उन्हें गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया लेकिन मुल्जिमान फौजी जवानों और पुलिस की तरफ से पेश हुए साबिक अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी का यह इसरार था कि बेंच को इस मामले से अलग हो जाना चाहिए। कोई दूसरी बेंच सीबीआई जांच की निगरानी करे। कोर्ट ने इस मामले में अपने फैसले को महफूज कर लिया है।