संभाजी भिंडे पर कायम मुकदमा वापस

संभाजी भिंडे पर कायम मुकदमा वापस

महाराष्ट्र की बीजेपी सरकार की नाइंसाफी और खुली हठधर्मी से दलितों व पिछड़ों में जबरदस्त गुस्से की लहर दलित मुखालिफ हिंसा कराने वाले

मो. सैफुल इस्लाम

मुंबई इस साल पहली से तीन जनवरी तक महाराष्ट्र के पुणे, मुंबई, भीमाकोरेगांव और दीगर मकामात पर हुई दलित मुखालिफ हिंसा के मामले में महाराष्ट्र पुलिस ने दलितों के खिलाफ ही यकतरफा कार्रवाई की कोरेगांव में पहली जनवरी से इकट्ठा होने वाले दलितों के बहाने पुलिस ने यह भी कहानी गढ ली कि दलितों और इंसानी हुकूक (मानवाधिकारों) के लिए आवाज उठाने वाले देश के आधा दर्जन से ज्यादा नामवर वकील, अखबार नवीस और कालमनिगारों के माओवादियों के साथ गहरे रिश्ते हैं यह लोग शहरी माओवादी हैं इन सबने करोड़ों रूपयों के खतरनाक असलहे इकट्ठा करके वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी को भी राजीव गांधी के तर्ज पर कत्ल करने और देश की सरकार का तख्ता पलटने की साजिश कर रहे थे। पुलिस ने दलितों और उनके हामियों के खिलाफ इतनी खतरनाक कहानी तो गढ ली लेकिन दलितों पर हिंसा कराने के जिम्मेदार शिव प्रतिष्ठान हिन्दुस्तान के सवर्ण लीडर संभाजी भिंडे के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। दलितों की जानिब से पहली जनवरी को ही भिंडे के खिलाफ पुणे में नामजद रिपोर्ट दर्ज करा दी गई थी। अब एक आरटीआई के जवाब के जरिए पता चला कि महाराष्ट्र सरकार ने भिंडे के खिलाफ दर्ज मुकदमा ही वापस ले लिया है। सरकार की इस खतरनाक और इंतेहा दर्जे की नाइंसाफी की कार्रवाई की खबर लगते ही महाराष्ट्र ही नहीं पूरे मुल्क के दलितों और पिछड़ों में जबरदस्त गुस्से का माहौल पैदा हो गया है। महाराष्ट्र के तो कई दलित लीडरों ने यहां तक कह दिया है कि अगर इस सरकारी कार्रवाई की वजह से महाराष्ट्र में कहीं कोई दंगा फसाद हो गया तो उसकी पूरी जिम्मेदारी महाराष्ट्र की देवेन्द्र फण्डनवीस की बीजेपी सरकार की ही होगी।

याद रहे कि महाराष्ट्र में दलित समाज ने 1818 में हुये ईस्ट इंडिया कंपनी की पेशवाओं पर जीत के 100 साल पूरा होने पर एक खुसूसी जलसा किया था। इस जंग में दलितों ने ईस्ट इंडिया कंपनी की जानिब से लडते हुए पेशवाओं पर फतह हासिल की थी। तभी से हर साल भीमा कोरेगांव में पहली जनवरी को इकट्ठा होकर दलित लोग जीत का जश्न मनाते हैं। दलित समाज इस जंग को गैरबराबरी और नाइंसाफी पर जीत की शक्ल में मनाता है। पुणे के पास भीमा कोरेगांव में पहली जनवरी 2018 को जब दलित समाज जयस्तंभ पर फूल चढाकर जश्न मनाने आये तो उन पर संभाजी भिडे के जरिए उकसावे पर सवर्ण लोगों ने पथराव कर दिया और उनके साथ हिंसा की। उनकी गाडियों को भी तोडा और जलाया गया। इस हिंसा का इल्जाम संभाजी भिंडे पर लगा क्योंकि कुछ दिन पहले ही उन्होने मकामी सवर्णों को दलितों के खिलाफ भड़काते हुए तकरीर की थी।

प्रकाश आम्बेडकर ने इस हिंसा के खिलाफ 3 जनवरी 2018 को ‘महाराष्ट्र बंद’ का नारा दिया था जिसे बड़े पैमाने पर हिमायत मिली और उस बंद में भिडे की गिरफ्तारी का मतालबा किया गया। इसके बाद महाराष्ट्र सरकार ने कोरेगांव हिंसा की जांच के लिए एक स्पेशल इनवेस्टीगेशन टीम बना दी थी। इस टीम  ने संभाजी भिडे को कोरेगाव हिंसा का अस्ल मुल्जिम करार दिया था। इसके बावजूद महाराष्ट्र पुलिस और सरकार ने संभाजी भिंडे के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। वजह यह है कि वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी उन्हें अपना आदर्श और गुरू मानते हैं।

अब एक आरटीआई से पता चला कि महाराष्ट्र की बीजेपी सरकार ने पिछले एक साल के अंदर ही शिव प्रतिष्ठान हिंदुस्तान के बानी (संस्थापक) संभाजी भिड़े पर दर्ज 6 मामलों को वापस ले लिया है।  इसके अलावा आरटीआई से यह भी पता चला है कि बीजेपी-शिवसेना के दर्जनों लीडरान और उनके सैकड़ों वर्कर्स पर दर्ज मामलो को भी वापस ले लिया। जिन मामलों को वापस लिया गया है उनमें दंगा फैलाने और तोड़फोड़ करने जैसे संगीन मामलात भी शामिल हैं।

आरटीआई एक्टिविस्ट और ‘अधिकार फाउंडेशन’ के सदर शकील अहमद शेख को होम मिनिस्ट्री के जरिए यह इत्तेला दी गई तो सभी हैरत में पड़ गए। दरअसल, शकील अहमद ने आरटीआई दाखिल की थी कि साल 2008 से कितने सियासतदानों या उनके वर्कर्स के खिलाफ दर्ज मामलात सरकार के जरिए वापस लिए गए हैं। इस आरटीआई के जवाब में होम डिपार्टमेंट की जानिब से बताया गया है कि जून 2017 में संभाजी भिडे और उनके साथियों के खिलाफ दर्ज 3 मामले वापस ले लिए गए हैं। इसके अलावा भिडे और उनके साथियों के खिलाफ दर्ज तीन दूसरे मामले भी सरकार ने वापस ले लिए है। यह मालूमात होम डिपार्टमेट की इनफारमेशन अफसर प्रज्ञा घाटे ने दी है।

इडियन पीनल कोड की दफा 321 के मुताबिक रियासती सरकारें मामूली किस्म के जरायम में दर्ज मामले वापस ले सकती हैं। जबकि संभाजी पर मामूली नहीं भीमा कोरेगांव में हिंसा फैलाने के संगीन इल्जाम हैं।

याद रहे कि चन्द दिन पहले ही महाराष्ट्र के चीफ मिनिस्टर देवेंद्र फडणवीस ने कोरेगांव केस में मुल्जिम संभाजी भिडे को क्लीन चिट दी थी। फडणवीस सरकार ने जितने भी इक्तालीस मामलात को वापस लिए हैं, सभी केस दंगे फैलाने, सरकारी इमलाक को नुकसान पहुंचाने, सरकारी काम में रूकावट डालने और सरकारी मुलाजमीन पर हमला करने जैसे संगीन किस्म के जरायम हैं।

आरटीआई एक्टिविस्ट शकील अहमद शेख के मुताबिक फडणवीस सरकार ने पिछले चार सालों में एक भी आम इंसान का केस वापस नहीं लिया है। जितने भी केस वापस लिए गए हैं उनमें सभी बीजेपी और शिवसेना के लीडरान और वर्कर्स  के ही हैं। शेख ने वजीर-ए-आला देवेंद्र फडणवीस से मतालबा किया है कि मुकदमात वापस लिए जाने की सरकारी कार्रवाई को फौरन रद्द किए जाए। सरकार  के इस फैसले से दलित और पिछड़े समाज मे बीजेपी सरकार के लिए जबरदस्त गुस्सा पैदा हो गया है।