मोहन भागवत की गलतबयानी

मोहन भागवत की गलतबयानी

आरएसएस के तीन रोजा जलसे में इस तंजीम को एक बेहतरीन तंजीम साबित करने की कोशिशें

“दुनिया को दिखाने के लिए तो मोहन भागवत ने कहा कि आरएसएस को मुसलमानों से कोई परहेज नहीं है जो लोग कहते हैं कि उन्हें मुसलमान नहीं चाहिए वह हिन्दुत्व को कमजोर करने का काम करते हैं। लेकिन उन्होने बीजेपी सरकारों में मुसलमानों पर हो रहे मजालिम के खिलाफ एक लफ्ज भी नहीं कहा। वह लिंचिंग पर नहीं बाले दिल्ली से मिले हुए गुड़गांव में आरएसएस सरकार और स्वयं सेवकों ने मुसलमानों का जीना दूभर कर रखा है वह इसपर नहीं बोले।”

“आरएसएस चीफ ने कहा कि आजादी की जंग में कांग्रेस का ही बड़ा रोल रहा है। इस आंदोलन के दौरान कांग्रेस ने मुल्क को कई बड़ी शसियतें (महापुरूष) दी। आज भी बड़ी तादाद में लोग उनकी कुर्बानियों से सबक सीखते हैं। लेकिन उन्होने महात्मा गांधी, नेहरू और पटेल व सुभाष बोस समेत किसी का नाम लेना मुनासिब नहीं समझा।”

“मोहन भागवत ने देश और दुनिया को यह यकीन भी दिलाया कि आरएसएस मुल्क के संविधान का पूरा एहतराम करता है। उन्होने कहा शुरू से ही हमारा काम लोगों को जोड़ने का ही रहा है। हम समाज को तोड़ने का काम नहीं करते कोई यकीन करे या न करे लेकिन उन्होने सेक्युलर होने की भी बात करते हुए यहां तक कह दिया कि सरकार चलाने या सरकारों के काम में आरएसएस कभी दखल अंदाजी नहीं करता है।”
हिसाम सिद्दीकी
नई दिल्ली! आरएसएस चीफ मोहन भागवत ने एक बार फिर वही किया जिसके लिए आरएसएस को जाना जाता है यानी ‘मुंह में राम बगल में छुरी’। दिल्ली में ‘भविष्य का भारत-आरएसएस का दृष्टिकोण’ (भारत का मुस्तकबिल और आरएसएस का नजरिया) के उनवान से तीन दिनों के इजलास में मोहन भागवत ने सिर्फ यकतरफा बाते करते हुए यह साबित करने की कोशिश की कि जैसे आरएसएस से अच्छी कोई तंजीम (संगठन) पूरी दुनिया में दूसरी है ही नहीं। उन्होने कहा कि आरएसएस न सिर्फ यह कि मुल्क के संविधान में पूरा यकीन रखता है, संविधान का एहतराम करता है बल्कि हमारा यह भी मानना है कि संविधान की बुनियादी रूह में किसी किस्म की तबदीली नहीं की जा सकती। उन्होंने यह तो कहा कि जो लोग कहते हैं कि उन्हें मुसलमान नहीं चाहिए वह दरअस्ल हिन्दुत्व के मुखालिफ हैं और हिन्दूत्व को नुक्सान पहुचाने वाली बातें करते हैं। भागवत की पूरी तकरीर चालाकी भरी रही क्योंकि उन्होने गाय के नाम पर मुसलमानों को पीट-पीट कर मार डालने यानी मॉब लिंचिंग के वाक्यात का जिक्र तक नहीं किया। जब उनकी तकरीर पर सवाल उठने लगे तो इस एजलास के आखिरी दिन उन्होंने यह कह कर खुद को लिंचिंग का मुखालिफ करार देते हुए कहा कि गाय के नाम पर लिंचिंग करना जुर्म है साथ उन्होंने कहा कि लिंचिंग करने वालों का गौरक्षकों से ताल्लुक नहीं है। दिल्ली से मिले हुए हरियाणा, राजस्थान जेसे प्रदेशों में मुसलमानों का जिंदा रहना मुश्किल किया जा चुका है। मुसलमानों का जीना दूभर करने वाले कोई और नहीं आरएसएस के लोग ही हैं उन्हें गौरक्षकों के नाम के शिनाख्ती कार्ड तक जारी हैं उन्हें हर महीने बाकायदा मोटी रकम दी जाती है। भागवत इस मसले पर भी खामोश हैं। जिस वक्त मोहन भागवत दिल्ली के आलीशान विज्ञान भवन में लम्बी-चौड़ी बातें करते हुए आरएसएस को एक बेहतरीन तंजीम करार दे रहे थे उस वक्त दिल्ली से मिले हुए हरियाणा के शहर गुड़गांव में आरएसएस की मनोहर लाल खट्टर सराकर के जरिए गैर कानूनी तरीके से सील की गई एक मस्जिद को खुलवाने के लिए गुड़गांव के मुसलमान तकरीबन एक हफ्ते से धरने पर बैठे हुए थे, मोहन भागवत इस मसले पर भी खामोश रहे। 2014 में मुल्क में नरेन्द्र मोदी सरकार आने के बाद से हिन्दू, गाय, हिन्दू लड़कियों और हिन्दुत्व की हिफाजत करने के नाम पर हिन्दू तंजीमों का सैलाब सा आ चुका है। यह हिन्दू सेनाएं दिन-रात मुसलमानों को खौफजदा करने का काम करती रहती हैं। आरएसएस की बच्चा तंजीम कही जाने वाली विश्व हिन्दू परिषद की जानिब से इन सेनाआें को लाखों तलवारें फराहम कराए जाने की खबरें भी आम रही हैं। गुजिश्ता चार सालों में मुसलमानों के नाम पर हिन्दुओं में जिस पैमाने पर खौफ पैदा किया गया ऐसा तो मुगलों के दौर में भी कभी नहीं हुआ था। मोहन भागवत मुल्क के इन तमाम मसायल पर खामोश ही रहे। वह कुछ बोल भी नहीं सकते क्योंकि यह तमाम हरकतें उनके अपने लोगों के जरिए ही तो की जा रही हैं। आरएसएस चीफ ने कहा कि उनकी तंजीम (संगठन) को मुल्क के संविधान पर पूरा भरोसा है और हम संविधान का एहतराम (सम्मान) करते हैं। अगर उनकी यह बात सच होती तो वह बताएं कि इतनी बड़ी फौज और पुलिस मौजूद होने के बावजूद आरएसएस के लोगों को हिन्दू सेना, हिन्दू रक्षक दल, राम सेने, हिन्दू क्रांति दल जैसी मुतवाजी (समानान्तर) फौजें बनाने की क्या जरूरत पड़ गई। हद तो यह है कि देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश के वजीर-ए-आला आदित्यनाथ भी हिन्दू युवा वाहिनी के नाम पर अपनी प्राइवेट फौज बनाए हुए हैं। उनके वजीर-ए-आला बनने के बाद से हिन्दू युवा वाहिनी को शायद प्रदेश की पुलिस से भी ज्यादा मजबूत बनाया गया है।
इस मौके पर मोहन भागवत ने आरएसएस को तमाम जिम्मेदारियों से बचाने की भी कोशिश की। उन्होने कहा कि सरकार चलाने में आरएसएस किसी किस्म की दखल अंदाजी नहीं करता। उन्होने कहा कि कई लोग समझते हैं कि सरकार चलाने के लिए नागपुर से रोज फोन किए जाते हैं। यह बात बिल्कुल गलत है। आरएसएस ने कभी भी सरकार चलाने में कोई दखल नहीं दिया है। उन्होंने कहा कि आज सरकार में वजीर-ए-आजम समेत जितने भी लोग हैं वह सभी सीनियर है। उनमें कुछ हमारी उम्र के हैं तो कुछ हमसे बड़े भी हैं। तकरीबन सभी आरएसएस से निकले हुए हैं। उन्होने कहा कि अगर उन्हें कभी हमारे मश्विरों की जरूरत होती है तो हम मश्विरा भी देते हैं। उन्होने कहा कि आरएसएस हमेशा मुल्क की तामीर (राष्ट्र निर्माण) का काम करता है और मुल्क की तामीर के काम में हम सरकार को मश्विरा जरूर देते हैं। मोहन भागवत का यह बयान भी गलत है। जितने प्रदेशों में भारतीय जनता पार्टी की सरकार होती है हर प्रदेश सरकार पर बाकायदा नजर रखने के लिए आरएसएस की जानिब से एक ‘संगठन मंत्री’ तैनात किया जाता है। वह संगठन मंत्री ही सरकार पर हर तरह से नजर रखता है। उत्तर प्रदेश में आजकल संगठन मत्री की हैसियत से जो शख्स तैनात है वह वजीर-ए-आला आदित्यनाथ से भी ऊपर बताए जाते हैं। वह बाकायदा अफसरान और वजीरों की हाजिरी लगवाते हैं उनकी मर्जी के बगैर सरकार में पत्ता तक नहीं हिलता। मतलब यह कि सरकार पर पूरा कण्ट्रोल तो आरएसएस का रहता है लेकिन जवाब देही कुछ भी नहीं है। यानी बगैर किसी जवाबदेही के आरएसएस सरकार चलाना चाहता है। यही सूरतेहाल मरकजी हुकूमत की है। खुद नरेन्द्र मोदी की सरकार का एक साल मुकम्मल होने पर मोदी खुद आरएसएस के दफ्तर में साल भर के कामकाज का हिसाब-किताब देने पहुंचे थे। न सिर्फ पहुंचे थे बल्कि इस बात का प्रोपगण्डा भी खूब किया गया था कि मोदी साल भर की रिपोर्ट लेकर आरएसएस चीफ के पास पहुंचे।
मोहन भागवत ने मुल्क के साथ एक और बड़ा मजाक करते हुए कहा कि आरएसएस चूंकि हिन्दुत्व में यकीन करता है इसलिए हम वाजेह (स्पष्ट) कर देना चाहते हैं कि हम सेक्युलरिज्म में यकीन करते हैं लेकिन हम सेक्युलरिज्म का ढिढोरा नहीं पीटते। अब अगर मोहन भागवत भी यह कहें कि वह और उनकी तंजीम (संगठन) खुद को सेक्युलर करार दे तो इससे बड़ा मजाक क्या हो सकता है? एक तरफ तो आरएसएस की बनाई हुई तरह-तरह की तंजीमें हिंसा करती फिरती हैं दूसरी तरफ मोहन भागवत दावा करते हैं कि आरएसएस तो समाज को जोड़ने का काम करता है। वह कहते हैं कि आरएसएस तो अपनी पैदाइश के वक्त से ही समाज को जोड़ने का काम करता रहा है। अब भी हम अपने उसी काम पर लगे हुए हैं। भागवत उस आरएसएस को समाज को जोड़ने वाला बता रहे हैं जिस आरएसएस की बुनियाद समाज को तोड़ने पर टिकी है।
आरएसएस की तारीख में शायद पहली बार इसके चीफ ने अवामी तौर पर यह तस्लीम कर लिया कि मुल्क की आजादी की जंग में कांग्रेस का अहम रोल रहा है। 1885 से ही कांग्रेस ने आजादी का जो आंदोलन चलाया उसी की वजह से हमें आजादी भी मिली। इस दौरान कांग्रेस ने बड़ा रोल अदा किया। इसी आंदोलन के जरिए कांग्रेस ने मुल्क को कई अजीम शख्सियतें (महापुरूष) भी दीं। उन्होने कहा कि कांग्रेस ने जो बड़ी शख्सियते मुल्क को दीं उनमें कई ऐसे भी रहे जिन्होने अपना सबकुछ कुर्बान करके देश को आजाद कराने का काम किया था। आज भी उन बड़े लोगों के कामों और उनकी जद्दोजेहद भरी जिंदगी ने देश की बड़ी तादाद में लोगों को मुतास्सिर (प्रभावित) किया है। इस तकरीर के बावजूद मोहन भागवत ने कांग्रेस के एक भी लीडर का नाम लेना मुनासिब नहीं समझा। न गांधी का नाम लिया न सुभाष चन्द्र बोस का न जवाहर लाल नेहरू का न सरदार पटेल का और न लाल बहादुर शास्त्री का। सरदार पटेल को तो नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस से छीन कर उनपर पूरी तरह कब्जा ही कर लिया है। लाल बहादुर शास्त्री के लिए कहा जाता था कि वह थे ईमानदार लेकिन नेहरू के यहां सारी जिंदगी आरएसएस का ही काम करते रहे। शास्त्री के बाद उनके कुन्बे के लोग जिस तरह बीजेपी में रहकर कांग्रेस को गालियां बक रहे हैं उन्हें देख कर तो इस बात पर यकीन होता है कि शास्त्री आरएसएस के मफाद में काम करते रहे और जवाहर लाल नेहरू जैसा लीडर उन्हें कभी समझ नहीं पाया।