उम्मीद और खौफ

 

मौलाना मुफ्ती मोहम्मद अफ्फान

इंसान को किसी काम पर आमादा करने वाली या किसी काम से बाज रहने पर मजबूर करने वाली दो चीजें हैं एक इनाम की उम्मीद और दूसरे किसी ताकत का खौफ। या तो किसी काम को करने में इंसान को यह लालच होता है कि उस काम को करूगां तो उन इनाम का मुस्तहक बन जाऊंगा जिनके वादे किए जाते हैं। या फिर यह सोचता है कि अगर मैं फलां काम करूंगा तो लाठी-डंडों का सामना करना पड़ेगा। कानून की गिरफ्त में आ जाऊंगा पकड़ लिया जाऊंगा जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया जाएगा तो उस काम को करते हुए इंसान खौफ महसूस करता है और डरता है।

इमाम बुखारी ने एक उनवान कायम फरमाया है और उसके बारे में यह हदीस जिक्र फरमाई है- ‘हजरत अबू हुरैरा (रजि0) फरमाते हैं कि नबी करीम (सल0) ने इरशाद फरमाया कि अल्लाह तआला ने तखलीक के वक्त अपनी रहमत के सौ हिस्से बनाए जिस में से निनान्वे अपने पास रोक लिए और सिर्फ एक हिस्सा अपनी तमाम मखलूकात को इनाअत फरमाया। तो अगर काफिर अल्लाह के पास मौजूद रहमत के हिस्सो को जान ले तो जन्नत से नाउम्मीद न रहे और अगर मुसलमान अल्लाह की जानिब से होने वाली गिरफ्त के बारे में मुकम्मल तौर पर जान ले तो अपने को जहन्नुम की आग से महफूज न समझे।’ (बुखारी)

हाफिज इब्ने हजर फतहुल बारी लिखते हैं- हदीस का मकसद यह है कि इंसान को अपनी जिंदगी उम्मीद और खौफ के दरम्यान गुजारनी चाहिए सिर्फ उम्मीद ही न हो जैसा कि फिरका-ए-मरजिया कहता है कि ईमान के बाद कोई चीज इंसान के लिए मुजिर नहीं है इसी तरह सिर्फ डर ही न हो जैसा कि खवारिज और मोतजिला कहते हैं कि गुनाह कबीरा का मुरतकिब हमेशा हमेश जहन्नुम में रहेगा अगर बगैर तौबा के दुनिया से चला जाए बल्कि उम्मदी और खौफ दोनों की आमेजिश होनी चाहिए जैसा कि अल्लाह तआला ने फरमाया-‘अल्लाह की रहमत के उम्मीदवार रहो और उसके अजाब से डरते रहो।’

मालूम हुआ कि ईमान उम्मीद और डर के दरम्यान में है यानी बहुत से ईमानी तकाजे ऐसे हैं कि जिन को इंसान पूरा कर रहा है अल्लाह तआला की जानिब से एलान किए गए वादों को हासिल करने के लिए और बहुत से अल्लाह की ममनूअ कर्दा चीजें ऐसी हैं जिनसे इंसान अपने आप को बचाता है। सिर्फ इस अंदेशे और डर से कि अगर मैंने इस गुनाह का इर्तिकाब कर लिया तो अल्लाह के सामने जवाबदेही होगी और इस गुनाह की पादाश में मुझे जहन्नुम की आग में जलना पड़ेगा या मुख्तलिफ किस्म के अजाब का सामना करना पडे़गा।

नबी करीम (सल0) ने अहले ईमान को यह हुकम् दिया कि तुम्हारे ईमान के अंदर खौफ और उम्मीद दोनों पहले होने चाहिए अल्लाह की जात से सिर्फ डरना ही नहीं है बल्कि साथ-साथ उम्मीद भी रखनी है कि वह नेक अमल करने वालों को वह अज्र अता फरमाता है कि जिस का वसव्वुर भी एक मोमिन नहीं कर सकता। अल्लाअ तआला की रहमतों से नाउम्मीद होने को कुफ्र करार दिया गया है और इरशाद फरमाया गया है-‘ अल्लाह की रहमतों से मायूस और नाउम्मीद तो सिर्फ वही लोग होते हैं जिन के दिल में अल्लाह की जात व सिफात पर कामिल ईमान नहीं होता वह काफिर व मुशरिक होते हैं।’(यूसुफ-87) एक मोमिन और मुसलमान चाहे गुनाहों का सुदूर उसकी जात से कितना ही हो रहा हो अल्लाह की रहमतों के सिलसिले में उसको पुरउम्मीद होना चाहिए क्योंकि अल्लाह तआला गफूर भी है और रहमीम भी गुनाहों को माफ फरमा देगे और रहमतों के सिलसिलों को मजीद दराज फरमा देंगे। इसके साथ-साथ अल्लाह तआला की जात से खौफ व डर भी एक मोमिन के ईमान का तकाजा होना चाहिए। सिर्फ अल्लाह की रहमतों का उम्मीदवार बन कर जिंदगी गुजारना और अल्लाह तआला के खौफ और डर के जज्बात से अपने दिल को खाली रखना मोमिन को जेब देने वाली चीज नहीं है। अबू उस्मान जेजी फरमाते हैं- ‘सआदत व नेेक बख्ती की निशानी यह है कि तुम अल्लाह की इताअत करो और इस बात से डरते रहो कि कहीं तुम्हारी ताआत रद्द न कर दी जाएं और बदबख्ती की अलामत यह है कि तुम नाफरमानी करते रहो और उम्मीद रखो कि निजात पा जाओगे।’ (फतहुल बारी)

हजरत आयशा (रजि0) फरमाती हैं कि मैंने यह आयते करीमा ‘जिन लोगों के दिल अल्लाह की राह में देने और खर्च करने बावजूद खौफजदा रहते हैं कि उनको अपने रब के पास लौट कर जाना है’ का मतलब नबी करीम (सल0) से दरयाफ्त किया कि यह काम करके डरने वाले वह लोग हैं जो शराब पीते या चोरी करते हैं। आप करीम (सल0) ने फरमाया- नहीं बल्कि यह वह लोग हैं जो रोजे रखते हैं, नमाज पढते हैं सदकात देते हैं इसके बावजूद डरते रहते हैं कि शायद हमारे यह अमल अल्लाह के नजदीक (हमारी किसी कोताही के सबब) कुबूल न हों ऐसे ही लोग नेक कामों में मुसाबिकत किया करते हैं। हजरत हसन बसरी फरमाते हैं कि हमने ऐसे लोग देखे हैं जो नेक अमल करके इतना डरते हैं कि तुम बुरे अमल करके भी उतना नहीं डरते।

अल्लाह की जात से खौफ यह एक ऐसी सिफत है कि जिस इंसान के दिल में यह सिफत पैदा हो जाए जिस को अल्लाह से डरना आ जाए जिसकी आंखें अल्लाह के खौफ से तर हो जाएं तो गुनाह और नाफरमानी का सुदूर उसकी जात से नहीं होगा। नबी करीम करीम (सल0) की अहादीस, सहाबा के वाक्यात, अकाबरीने उम्मत के तजुर्बात इसपर शाहिद हैं कि गुनाहों से रोकने वाली सबसे बुनियादी चीज खौफे खुदा और अल्लाह का डर है। गुनाह से रोकने वाला कोई कानून असरदार और कारगर नहीं हो पाएग। पुलिस के डर से अगर आदमी जरायम से रूकता है तो वह आरजी रूकता है। ताकत के डर से अगर रूकना होता है तो आरजी रूकना होता है। अस्ल रूकना तो इंसान का जरायम से उस वक्त होगा जब उसके दिल में अल्लाह का डर और खौफ पाया जा रहा होगा। एक तारीक कमरे के अंदर भी अगर बुराई का ख्याल आएगा तो अल्लाह के डर से वह उस जुर्म को अमली जामा नहीं पहनाएगा कोई उस कमरे में उसे देखने वाला नहीं किसी के सामने उसके गुनाह का इजहार नहीं होगा लेकिन इसके बावजूद अल्लाह का वली उस गुनाह को नहीं करेगा इसलिए कि दुनिया की आंखों से चाहे वह गुनाह छूपा हुआ हो मगर अल्लाह तआला की निगाहों से कोई अमल रूपोश नहीं हो सकता। नबी करीम करीम (सल0) अहले ईमान के दिलों में खौफ के यही जज्बात पैदा करना चाहते हैं और दुनिया में बसने वाले इंसानों को इसी तरह की सिफत से संवारना चाहते है। आप करीम (सल0) ने सहाबा की तर्बियत इसी अंदाज में फरमाई थी।

नबी करीम करीम (सल0) फरमाया करते थे कि अगर अल्लाह की जानिब से अहले जन्नत की फेहरिस्त सुना दी जाए और यह कहा जाए कि इसमें सब जन्नती हैं सिवाए एक आदमी के तो उमर को इसका डर रहता है कि उस एक आदमी का मिस्दाक कहीं मैं ही न हूं। यह है खौफे खुदा का आलम। अल्लाह के रसूल करीम (सल0) के इतने मुकर्रिब और मोतमिद होने के बावजूद लाखों लाख जन्नतियो ंकी फेहरिस्त में एक जहन्नुमी का नाम मजकूर तो उमर फारूक (रजि0) कांप रहे हैं कि कहीं उसमें मेरा ही नाम न लिखा हो। इसी तरह फरमाते थे कि अगर यह हुक्म हो जाए कि सिवाए एक के कोई जन्नत में न जाएगा तो मुझे यह एहतमाल हो जाएगा कि शायद वह एक आमदी मैं ही हूं। यह है उम्मीद और यही मतलूब है कि बंदे रगबत और रहबत दोनों को जमा करने वाले हों।

हजरत सिद्दीक अकबर (रजि0) नबी करीम करीम (सल0) के खलीफा अव्वल हैं। आप (सल0) के जानिसार हैं, सिद्दीक हैं लेकिन खौफे खुदा का यह आलम था कि इरशाद फरमाया करते थे कि काश मैं किसी घास का तिनका होता काश किसी दरख्त का पत्ता होता राह में चलते हुए ऊंट उस पत्ते को अपने दांत के नीचे दबा कर चले जाते और मैं भूला-बिसरा हो जाता। लोग मुझे भूल जाते।

यह क्या चीज है जो सिद्दीक अकबर (रजि0) की जबान से यह कलमात कहलवा रही है। यह अल्लाह का खौफ और डर है जो हर मोमिन के दिल के अंदर होना चाहिए। कुरआने पाक में इरशाद फरमाया गया-‘जो शख्स अपने परवरदिगार के सामने खड़ा होने से डरेगा खौफ उसके दिल के अंदर होगा और ख्वाहिशाते नफ्सानिया पर अमल करने से अपने आप को बाज रखेगा तो जन्नत उसका ठिकाना और मकान होगा और वह जन्नत का मकीन होगा आज दुनिया का जो माहौल है जरायम, गुनाह, फहाशी और बेराहरवी का जो दौर दौरा है उसपर लगाम लगाने और उसके खात्मे के लिए दुनियावी कानून कभी असरदार नहीं होते हैं और न कभी असरदार हो सकते हैं समाज को बदलना होगा, माहौल को इस्लामी रंग में रंगना होगा और लोगों के दिलों में खालिक व मालिक का डर पैदा करना होगो। इसके बगैर समाज के अंदर ॅफैलने वाले जरायम और इन बुराइयों के खात्मे का तसव्वुर भी नहीं किया जा सकता।

हमारे अकाबिर को अल्लाह ने इस सिलसिले में सहाबा का नमूना बनाया था। हजरत शेखुल हिन्द अगर एक तरफ वह दारूल उलूम की मसनदे हदीस को जीनत बख्शते हैं तो दूसरी तरफ अल्लाह के कलमे को बुलंद करने के लिए मैदाने जेहाद में भी मसरूफ अमल हैं इन तमाम अजमतों के बावजूद खौफे खुदा का यह आलम है कि जिसका तसव्वुर नहीं किया जा सकता। अंग्रेजों के खिलाफ महाजआराई के जुर्म में हजरत शेखुल हिन्द को उनके साथियो ंके साथ माल्टा के ईजाखाने में नजरबंद कर दिया गया जहां सख्ततरीन सर्दी होती है कैद बामशक्कत में अंग्रेजी साम्राज ने उन अकाबिरीन को मुब्तला किया तकरीबन साढे तीन साल की लम्बी सजा काटने के बाद हजरत हिन्दुस्तान वापस तशरीफ लाए सजा के दौरान एक बार कुछ इस तरह की बातें सुनने को मिलीं कि उन लोगों को फांसी के फंदे पर चढा दिया जाए। जब यह खबर सुनने को मिली तो सबको तशवीश हुई हजरत शेखुल हिन्द खामोश खामोश रहने लगे। जब कई रोज इस तरह गुजर गए तो हजरत शेखुल इस्लाम ने अपने साथियों से कहा कि हजरत से पूछा जाए कि क्या वजह है? अगर फांसी की खबर सुन कर खामोश रहने लगे हैं तो कुछ तसल्ली दी जाए। इसलिए हिम्मत करके उन हजरात ने बात की और फरमाया कि हजरत खबरें तो सुनने को मिल रही हैं लेकिन हमारा तो दिल मुतमइन है कि मोमिन के लिए दोनों सूरतों में सआदत है हम अल्लाह की रजा के लिए मैदान में निकले हैं दो-चार साल के बाद कैद से रिहाई मिल जाएगी। तब भी हमारे लिए सआदत है और अगर इस राह में अल्लाह को प्यारे हो जाएगें तो भी सआदत है हमारी समझ से बाहर है कि आप इस खबर को सुन कर इतने फिक्रमंद और परेशान क्यों हैं। हजरत शेखुल हिन्द जो जवाब देते हैं वह सुनने के लायक है और हम जैसे गुनाहगारों के लिए इबरत है कि कहां अल्लाह का वह वली जिसका दिल खौफे खुदा से मामूर हो और हम जैसे गुनाहगार जो सुबह से शाम तक गुनाहों में गर्क रहते है। हजरत शेखुल हिन्द न इरशाद फरमाया कि हुसैन अहमद! तुम यह समझते हो कि मेरी फिक्रमंदी और मेरी परेशानी की वजह फांसी की खबर को सुनना है अगर यह गुमान है तो इसको अपने जेहन से निकाल दो इसलिए कि एक मोमिन तो आता ही है दुनिया में जाने के लिए और अगर अल्लाह के लिए यह अजीजतरीन जान कुबूल हो जाए तो इससे बढकर सआदत और क्या हो सकती है। मुझे फिक्र इस बात की नहीं है। शहादत का मकाम व मर्तबा हासिल करना होगा तो खुशी के साथ यह मर्तबा हासिल किया जाएगा लेकिन जो फिक्र मेरे चेहरे से झलक रही है वह यह है कि जब मैं यह सोचता हूं कि मेरा खालिक व मालिक बड़ा बेनियाज है वह बड़ा मुस्तगनी है उसको न हमारी इबादतो की जरूरत है और न हमारे मुजाहिदात की जरूरत है न हमारी कुर्बानियों की जरूरत है कभी ऐसा होता है कि वह अपने बंदे की जान ले लेता है लेकिन उसको कुबूल नहीं करता, अगर मेरी किस्मत में शहादत होगी और फांसी के फंदे को चूमना होगा तो खुशी के साथ इस राह में अपनी जान को पेश करूंगा। लेकिन इस की क्या जमानत कि अल्लाह की बारगाह में मेरा यह नजराना कुबूल भी हो या न हो। यह है खौफे खुदा का आलम कि तन, मन, धन सबकी बाजी लगाने के बाद भी अल्लाह तआला की बारगाह में कुबूलियत की भीक मांगी जा रही है। अल्लाह के खौफ से दिल कांप रहा है यही जज्बा हर मोमिन और मुसलमान के दिल में होना चाहिए। खौफे खुदा के बगैर माहौल से समाज से इलाके से बस्ती से जरायम का न खात्मा हुआ है और न हो सकता है। इसके लिए मुहिम चलानी पड़ेगी और खौफे खुदा को दिलों में पैदा करना होगा। अल्लाह हम सबके दिलों में अपना खौफ पैदा फरमाए-आमीन।