सुधा भारद्वाज से क्यों डरते हैं छत्तीसगढ़ के कंपनी मालिक?

सुधा भारद्वाज से क्यों डरते हैं छत्तीसगढ़ के कंपनी मालिक?

अनिल जनविजय
मामूली सूती साड़ी और हवाई चप्पल पहनने वाली सुधा भारद्वाज के सिलसिले में अगर कोई नहीं जानता तो पहली मुलाकात में उन्हें कोई घरेलू खातून मान लेने की भूल कर सकता है। सुधा अमरीका में इंतेहाई खुशहाल जिंदगी गुजार रही थीं वह एक बार अट्ठारह साल की उम्र में आदिवासियों के हालात पर स्टडी करने के लिए बस्तर आई फिर वहीं की उस तरह हो कर रह गई कि तीस सालों तक जंगलों में ही घूमती रही। उसके बाद से वह अदालतों में आदिवासियों और पुलिस से परेशान किए गए लोगां की कानूनी लड़ रही हैं।
उनकी सादगी उनके घर से दफ्तर तक हर जगह नजर आती है। लेकिन इस सादगी से परेशान लोगों की फेहरिस्त लंबी है।
अभी कुछ ही महीने पहले की बात है। छत्तीसगढ़ में एक मल्टी नेशनल सीमेंट कंपनी के मैनेजर ने बातों ही बातों में धीरे से कहा- ‘‘नाम मत लीजिए सुधा भारद्वाज का। उनकी वजह से हमारे यहां काम करने वाले मजदूर हमारे सिर पर चढ़ गए हैं।“
बस्तर में काम करने वाले समाजी कारकुनों की एक टीम को पुलिस के आला अफसरान ने वार्निंग दी, ‘‘अगर आप सुधा भारद्वाज को जानते हैं तो तय मानिए कि आप हमारे नहीं हो सकते।“
लेकिन ऐसी राय रखने वालों से अलग, छत्तीसगढ़ में कोंटा से रामानुजगंज तक ऐसे हजारों लोग मिल जाएँगे जिनके लिए वह ‘सुधा दीदी’ हैं। टीचर सुधा दीदी, वकील सुधा दीदी, सीमेंट मजदूरों वाली सुधा दीदी, छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा वाली सुधा दीदी।
माहिरे मआशियात (अर्थशास्त्री) रंगनाथ भारद्वाज और क्ष्णा भारद्वाज की बेटी सुधा की पैदाइश अमरीका में 1961 में हुई थी। 1971 में सुधा अपनी मां के साथ भारत लौट आईं। जेएनयू में एकानामिक्स शोबे की बानी कृष्णा भारद्वाज चाहती थीं कि बेटी वह सब करे, जो वह करना चाहती है। सुधा कहती हैं, ‘बालिग होते ही मैंने अपनी अमरीकी शहरियत छोड़ दी। पांच साल तक आईआईटी कानपुर से पढ़ाई के दौरान ही दिल्ली में अपने साथियों के साथ झुग्गी और मजदूर बस्तियों में बच्चों को पढ़ाना और तलबा की सियासत में मजदूरों के सवाल की पड़ताल की कोशिश शुरू की। शायद यही वजह है कि आईआईटी टापर होने के बावजूद भी किसी नौकरी के बजाय 1984-85 में वह छत्तीसगढ़ में शंकर गुहा नियोगी के मजदूर आंदोलन से जुड़ गईं। कुछ दिनों तक छत्तीसगढ़ आना-जाना लगा रहा लेकिन जल्दी ही बोरिया-बिस्तर समेटकर वह मुस्तकिल तौर से छत्तीसगढ़ आ गईं।
दिल्ली राजहरा के शहीद अस्पताल में एक मरीज को लेकर पहुंचे कोमल देवांगन बताते हैं, ‘‘सुधा और उनके साथियों ने मजदूरो के बच्चों को पढ़ाने से लेकर उनके कपड़े सिलने तक का काम किया। नियोगी जी ने जद्दोजेहद और तामीर (संघर्ष और निर्माण) का जो नारा दिया था, सुधा भारद्वाज जैसे लोग उसे जमीन पर लाने वालों में से हैं।’
जुझारू मजदूर नेता शंकर गुहा नियोगी को 1991 में गोली मारकर कत्ल कर दिया गया था। शंकर गुहा नियोगी की सेक्रेटरी रही हैं सुधा भारद्वाज। छत्तीसगढ़ में मजदूरों के हक की लड़ाई में सुधा भारद्वाज उतरीं तो फिर पलट कर नहीं देखा। शंकर गुहा नियोगी के ‘छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा’ को जब एक सियासी पार्टी की शक्ल दी गई, तब सुधा भारद्वाज उसकी सेक्रेटरी थीं। लेकिन उसके बाद सुधा भारद्वाज अलग-अलग किसान और मजदूर तंजीमों (संगठनों) में काम करते हुए भी ओहदा संभालने से बचती रहीं। वह आज भी अपने को एक मामूली समाजी कारकुन ही मानती हैं। छत्तीसगढ़ में समाजी तंजीमों के ग्रुप ‘छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन’ के कनवीनर आलोक शुक्ला कहते हैं, ‘‘सुधा दीदी, हमारे जैसे लोगों की आयडियल हैं। वह खामोशी से अपना काम करती चली जाती हैं।“
भिलाई में मजदूरों की लड़ाई हो या एसीसी, लाफार्ज-होलसिम कंपनी के विदेशी मैनेजरों से लड़ाई और बातचीत का दौर, सुधा भारद्वाज का कहना है कि ‘‘बेश्तर मौकों पर सत्ता की पहली कोशिश हर तरह के आंदोलन को कुचलने की ही होती है। इसके लिए सारी तरकीबें अपनाई जाती हैं। पूरे छत्तीसगढ़ में मजदूर आंदोलन के दौरान सबसे बड़ा खर्चा मुकदमों पर होता था। मजदूरों के लिए मुकदमों की तैयारी में पैसा भी जाता था और मेहनत भी।“
40 साल की उम्र में अपने मजदूर साथियों के मश्विरे पर वकालत की पढ़ाई कर डिग्री ली और फिर आदिवासियों, मजदूरों का मुकदमा खुद ही लड़ना शुरु किया। मजदूरों से जुड़े मामलों में फैसले भी मजदूरों के हक में आने लगे क्योंकि मजदूर तंजीमों के अंदर काम करने की वजह से उसके सारे दाँव पेंच जाने-समझे हुए थे। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में ऐसे कई मुकदमे लड़े गए।
आईजी से मदद मांगी, ‘जवाब मिला-‘फक यू’। कुछ सालों बाद ‘जनहित’ नाम से वकीलों का एक ट्रस्ट बनाया और तय किया कि समाज के बेसहारा अलग-अलग ग्रुंपों के मुकदमे मुफ्त में लड़ेंगे। बिलासपुर के अपने दफ्तर में फाइलों के बीच उलझी सुधा भारद्वाज का अंदाजा है कि उनके ट्रस्ट ने पिछले कुछ सालों में कोई 300 से ज्यादा मुकदमे लड़े हैं, जिला अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक। इंसानी हुकूक की तंजीमें (मानवाधिकार संगठन) पीयूसीएल की छत्तीसगढ़ इकाई की जनरल सेक्रेटरी होने के नाते इंसानी हुकूक की पामाली के अलग-अलग मोर्चे पर सुधा भारद्वाज ने कई लड़ाइयां लड़ी। बस्तर के फर्जी इनकाउण्टरों की तहकीकात और फिर उसके मुकदमों ने प्रदेश सरकार को कई मौकों पर मुश्किल में डाला। नाजायज (अवैध) कोल ब्लाक, पंचायत कानून की खिलाफवर्जी, जंगल के हक का कानून, सनअतकारी (औद्योगिकरण) के मसले पर भी सुधा भारद्वाज की जमीनी लड़ाई की अपनी शिनाख्त है। अपनी पूरी जायदाद मजदूर आंदोलन में लगा देने वाली सुधा भारद्वाज के पास जायदाद के नाम पर दिल्ली में मां के हिस्से का एक मकान है, जिसका किराया मजदूर यूनियन को जाता है।
सुधा भारद्वाज कहती हैं, ‘‘तंजीम में माली तंगी तो बनी रही लेकिन हमने बच्चों की पढ़ाई का बंदोबस्त किया, अपना मजदूरों का अस्पताल खोला।“
मजदूरों के मुकदमें लड़ने वाली पीआईएल भी यकसां नजरियात (समान विचारधारा) वाले साथियों के चंदे से चलती है। मुकदमों की शोहरत ऐसी कि मुंबई हाईकोर्ट ने भी हाल ही में छः लाख रुपये अवामी मफाद में दे दिए। सुधा भारद्वाज कहती हैं, ‘‘पीछे मुड़ कर देखती हूं तो मैं खुश होती हूं कि मैंने मजदूरों और आदिवासियों की लड़ाई में उनका थोड़ा-सा साथ दिया। ऐसे लोग, जिनकी जिंदगी में तमाम दुखों-तकलीफों के बाद भी इंसान होने को बनाए और बचाए रखना पहली तरजीह (प्राथमिकता) थी। फिर से ऐसे ही जन्म लेना चाहूंगी, इन्हीं के बीच।“ (बशुक्रिया अनिल जनविजय बीबीसी)