यौमे आशूरा और उसके फजायल

मौलाना असरार उल हक कासमी
इस्लामी नुक्ता-ए-नजर से यौमे आशूरा की बड़ी फजीलत बयान की गई है। यूं तो मोहर्रमुल हराम का पूरा ही महीना अहमियत व अजमत का हामिल है लेकिन खास तौर से यौमे आशूरा की और ज्यादा फजीलत है। यौमे आशूरा मोहर्रम की दसवीं तारीख को कहते हैं। यह इस्लाम का बहुत ही अहम और जामेअ निजाम है कि इसने अपने पैरोकारों के लिए ऐसे माह, दिन और रातें मुतअय्यन कीं जिनमें वह इबादत करके अपने लिए बड़ा जखीरा आखिरत जमा कर सकते हैं। महीनों में रजमान के महीने को सबसे ज्यादा फजीलत व अजमत बख्शी गई हफ्ते के दिनों में जुमा के दिन को बड़ी अजमत दी गई रातों में शबे बरात और शबे कद्र की बड़ी अहमियत बयान की गई। रमजान महीना, मजकूरा दिन और रातें उम्मते मोहम्मदिया के लिए ऐसे मौके होती हैं कि वह इन में अपने लिए बहुत सी नेकियां जमा कर सकते हैं। इन में मुसलमान ज्यादा से ज्यादा अच्छे आमाल करके अल्लाह के एहकामात को बजा लाकर अपने रब की इबादत करके बड़े अज्र के मुस्तहक बन सकते हैं और उनकी रजा हासिल कर सकते हैं। अगरचे नेक आमाल जब भी किए जाएं उनपर सवाब मिलता है। लेकिन इसके बावजूद कुछ वक्त उम्मते मोहम्मदिया के लिए ऐेसे मुतअय्यन किए गए जिनमें नेक आमाल पर आम अवकात के मुकाबले में कई गुना अज्र मिलता है। उलेमा बयान करते हैं कि नबी करीम (सल0) के मानने वालों की उम्रे साबिका उम्मतों के मुकाबले निस्बतन कम हैं लम्बे वक्त तक इबादते खुदावंदी में मशगूल रहना और उनके लिए मुमकिन नहीं जबकि फजीलत के लिहाज से उम्मते मोहम्मदिया को बड़ा मकाम हासिल है। इसलिए अल्लाह तआला ने नबी करीम (सल0) की उम्मत को ऐसे अवकात अता कर दिए जिनमें वह नेक आमाल का कई गुना अज्र पा सकें। मोहर्रम के महीने को भी इस्लाम में अफजलियत आत की गई है। इसीलिए इस महीने के रोजों का बड़ा अज्र बयान किया गया है। नबी करीम (सल0) ने इरशाद फरमाया-‘रमजान के बाद सबसे अफजल रोजे अल्लाह तआला के महीना मोहर्रम के रोजे हैं और फर्ज नमाज के बाद सबसे अफजल नमाज रात की नमाज (तहज्जुद) है।’ (मुस्लिम) इस हदीस से एक बात और मालूम होती है कि मोहर्रम के महीने की निस्बत अल्लाह की जानिब की गई। जिससे इस बात की तरफ साफ इशारा मिलता है कि यह महीना इंतेहाई अहम है और अल्लाह से तकर्रूब का जरिया है। गोया कि अगर इस महीना कोई बंदा अल्लह की इबादत का खुसूसी एहतमाम करता है रोजे रखता है तो वह अल्लाह का तकर्रूब हासिल कर सकता है। यह मोहर्रम का महीना चल रहा है इसलिए मुसलमानों को चाहिए कि वह इसको यूं ही जाया न करें बल्कि इसमें खूब इबादत करें और रोजे रखें।
मोहर्रम की दसवीं तारीख में तारीखी एतबार से बडे़-बडे़ वाक्यात पेश आए हैं। जैसा कि तारीख नवीस बयान करते हैं कि मोहर्रम की दसवीं तारीख को बनी इस्राईल को उनके दुश्मन फिरऔन से निजात दिलाई गई इसी दिन अपने आपको खुदा समझने वाला और खल्के खुदा पर जुल्म करने वाला फिरऔन भी हलाक हुआ यही वह दिन है जिस में हजरत हुसैन (रजि0) की शहादत का वाक्या पेश आया। मोहर्रम की दसवीं तारीख के बारे में हजरब इब्ने अब्बास (रजि0) से रिवायत किया गया है कि जब नबी करीम (सल0) मदीना तशरीफ लाए तो देखा कि यहूद आशूरा का रोजा रखते हैं तो फरमाया कि यह क्या मामला है? तूम लोग इस दिन रोजा क्यों रखते हो? तो उन्होने बताया कि यह एक अच्छा दिन है इसी दिन अल्लाह तआला ने बनी इस्राईल को उनके दुश्मन फिरऔन से निजात दिलाई और फिरऔन और उसकी कौम को गर्कआब कर दिया तो मूसा (अलै0) ने बतौर शुक्रिया इस दिन रोजा रखा था और हम भी उसी खुशी में रोजा रखते हैं। तो आप (सल0) ने फरमाया-‘हम मूसा के तुम से ज्यादा मुस्तहक हैं फिर नबी करीम (सल0) ने इस दिन का रोजा रखना शुरू किया और सहाबा को भी इस दिन का रोजा रखने को हुक्म दिया।’(बुखारी, मुस्लिम)
हजरत आयशा (रजि0) से भी नकल किया गया है, फरमाती हैं -‘कुरैश जमाना जाहिलियत में यौमे आशूरा का रोजा रखते थे और नबी करीम (सल0) भी जाहिलियत के जमाने में आशूरा का रोजा रखते थे फिर जब आप (सल0) मदीना तशरीफ लाए तो भी आपने आशूरा का रोजा रखा और सहाबा को भी हुक्म दिया मगर जब रमजान के रोजे फर्ज किए गए तो आप (सल0) ने इसका एहतमाम तर्क कर दिया और फरमाया अब तो चाहे आशूरा का रोजा रखे और जो चाहे न रखे।’(बुखारी, मुस्लिम) इन अहादीस से एक बात यह मालूम होती है कि यौमे आशूरा तारीखी लिहाज से इंतेहाई अहम दिन है इस दिन बड़े-बडे़ वाक्यात पेश आए। दूसरी बात यह मालूम होती है कि इस दिन रोजा रखना चाहिए। इस दिन के रोजे की अहमियत का अंदाजा इस हदीस से भी लगाया जा सकता है कि हजरत अबू कतादा (रजि0) से मरवी है कि नबी करीम (सल0) से आशूरा के दिन के रोजे के मुताल्लिक पूछा गया तो आप (सल0) ने फरमाया-‘गुजिश्ता साल के गुनाहों का कफ्फारा बन जाता है।’ (मुस्लिम) यौमे आशूरा के साथ मोहर्रमुल हराम की नैवीं तारीख के रोजे को भी अफजलियत का हामिल बताया गया है। लिहाजा जो हजरात यौमे आशूरा का रोजा रखते हैं उन्हें चाहिए कि वह नैवीं तारीख के रोजे का भी एहतमाम करें। हजरत इब्ने अब्बास (रजि0) से मरवी है, फरमाते हैं-‘नबी करीम (सल0) ने इरशाद फरमाया- अगर मैं आइंदा साल तक जिंदा रहा तो नौ तारीख का रोजा रखूंगा।’ (मुस्लिम) जब यह बात मालूम हो गई कि यौमे आशूरा इस दर्जे अहमियत का हामिल है तो मोमिनीन को चाहिए कि वह इस दिन रोजा रखें और इस दिन को जिक्रे खुदावंदी में गुजारें। रोजा रखने के कई फायदे हैं।
यौमे आशूरा के इतने मुबारक मौके पर उम्मते मुस्लेमा के लिए यह किसी भी एतबार से मुनासिब नहीं कि वह इस अजीम दिन को लापरवाई में गुजारें या इस दिन गैरमुनासिब काम करें मगर अफसोस देखा जाता है कि बहुत से लोग मोहर्रम की नौवीं दसवीं तारीख में भी अपने मामूलात में मसरूफ रहते हैं। बहुत से लोग न रोजा रखते हैं और न अल्लाह के जिक्र में खुसूसियत से मशगूल रहते हैं। हालांकि इस दिन को अल्लाह की रजा के हुसूल के लिए बेहतरीन मौका समझना चाहिए। गुनाहों के इर्तिकाब की न आम दिनों में इजाजत है और न इस दिन इजाजत है। बाज लोग इस दिन ऐसे काम करते हैं जो इस्लाम में नहीं हैं और इस्लाम के मनाफी हैं। गरज कि यह दिन बडी़ फजीलत वाला है इसलिए इस दिन अल्लाह की खुशनूदी हासिल करने के लिए इबादत करें नेकी का जखीरा जमा करें और लायानी कामों से परहेज करें।