मोहर्रमुल हराम की फजीलत

मोहर्रमुल हराम की फजीलत

डाक्टर फरहत हाशमी
मोहर्रम के लुगवी मायनी हैं ममनूअ, मुकद्दस, हराम किया गया, अजमत वाला और लायके एहतराम। यह उन चार महीनों में से है जिनके बारे मेंं अल्लाह तआला ने इरशाद फरमाया-‘बेशक महीनों की तादाद अल्लाह के नजदीक जिस दिन से उसने आसमान और जमीन को पैदा किया अल्लाह की किताब में बारह महीने हैं उनमें से चार हुरमत वाले हैं।’ यह चार महीने जीकादा, जिलहिज्जा, मोहर्रम और रजब हैं। जो इस्लाम से कब्ल भी हुरमत वाले थे। अहले मक्का पहले तीन महीनों में हज और चौथे में उमरा करते इसलिए महीनों में जंग व जिदाल बंद कर दी जाती थी और अम्न की जमानत होती थी। मोहर्रम हिजरी कलैण्डर का वह महीना है जिस से इस्लामी साल का आगाज होता है। 17 हिजरी में हजरत अबू मूसा अशअरी के तवज्जो दिलाने पर हजरत उमर (रजि0) ने सहाबा से मश्विरा किया और हजरत अली (रजि0) के मश्विरे से नबी करीम (सल0) के वाक्ए हिजरत को इसलामी सन् की इब्तदा करार दिया और चूंकि मदीना मुनव्वरा की तरफ हिजरत का आगाज माहे जवाअल हज के आखिर में हुआ था और इसके बाद जो चांद निलका वह मोहर्रम का था। इसलिए हजरत उस्मान (रजि0) के मश्विरे से मोहर्रम को इस्लामी साल का पहला महीना करार दिया गया।
वक्त अल्लाह की वह बेश बहा नेमत है जो अपने मखसूस अंदाज और मुकर्ररा रफ्तार के साथ गुजरता चला जा रहा है। हर आने वाला साल गुजिश्ता साल को माजी बना देता है। साल तो अल्लाह के हुक्म के मुताबिक आते और गुजरते रहेगे मगर इस वक्त को इंसान ने किस तरह और किन हालात में गुजारा वह बाकी रह जाएगा। इसलिए आने वाला मोहर्रम हमें पैगाम दे रहा है कि अपनी जिंदगी को मुफीद, बामकसद और सही कामों में इस्तेमाल किया जाए और अच्छे आमाल के जरिए इन घड़ियों को अपने हक में हुज्जत बनाया जाए ताकि कल आने वाले वक्त में कामयाबी नसीब हो और इंसान मायूसी और महरूमी से बच सके।
हजरत जुनैद बगदादी ने फरमाया-‘तुम लम्हा यह देखते रहो कि अल्लाह से कितने करीब हुए शैतान से कितने दूर हुए जन्नत से कितने करीब हुए और दोजख से कितने दूर हुए।’ नए साल का आगाज एक नए अज्म और जज्बे से किया जाए और इसके लिए जेहनी और अमली तौर पर तैयारी की जाए। मसलन अल्लाह तआला के साथ अपने ताल्लुक को मजबूत करना, इबादात को शौक और रगबत से अदा करना अहले खाना और बच्चों की तरबियत की तरफ ध्यान देना, नफामंद इल्म हासिल करने और जाती इस्लाह की मंसूबाबंदी करना, मआशरे के पसमांदा तबकात की फलाह व बहबूद के लिए कोशिश करना।
मोहर्रम को बाज तारीखी वाक्यात के पेशे नजर एक खास अहमियत हासिल है। फिरऔन गर्क हुआ और हजतर मूसा (अलै0) और उनकी कौम को फिरऔन की गुलामी से निजात मिली। (सही बुखारी) आमुल फील का मशहूर वाक्या इसी महीने में पेश आया जिसमें अबरहा हाथियों के लेश्कर के साथ खाना-ए-काबा को तबाह करने आया था। हजरत उमर (रजि0) कातिलान हमले के बाद जख्मों की ताब न लाते हुए एक मोहर्रम सन् 23 हिजरी को मैदाने करबला में शहीद हुए। मोहर्रम और रोजा मोहर्रम के रोजे की अहमित को बयान करते हुए आप (सल0) ने फरमाया-‘रमजान के बाद अफजलतरीन रोजा अल्लाह तआला के महने मोहर्रम का है। (सही मुस्लिम) मोहर्रम की दसवीं तारीख को आशूरा कहा जाता है। यह दिन अल्लाह तआला की खुसूसी रहमत और बरकत का हामिल है। हजरत आयशा (रजि0) से रिवायत है कि-‘जाहिलियत के दिनों में कुरैश आशूरा के दिन का रोजा रखते थे और नबी करीम (सल0) भी। फिर हिजरत मदीना के बाद भी आप (सल0) ने यह रोजा रखा और (सहाबा को भी) रोजा रखने का हुक्म दिया। अलबत्ता जब माहे रमजान के रोजे फर्ज हुए तो आप (सल0) ने फरमाया कि जो चाहे अब इसका रोजा रखे और जो चाहे छोड़ दे।’(सही मुस्लिम)
हजरत अबू कतादा (रजि0) कहते हैं कि रसूल (सल0) ने फरमाया-‘मैं समझता हूं कि अल्लाह तआला आशूरास के दिन के रोजे के बदले गुजिश्ता एक साल के गुनाह माफ कर देगा।’ हजरत अबू कतादा (रजि0) ही से रिवायत है कि आशूरा के दिन रोजे के बारे में पूछा गया तो आप (सल0) ने फरमाया-‘यह पिछले एक साल के गुनाहों का कफ्फारा है।’
हजरत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रजि0) से रिवायत है-‘जब नबी करीम (सल0) मदीना तशरीफ लाए तो यहूद को यौमे आशूरा का रोजा रखते देखा तो पूछा तुम इस दिन रोजा क्यों रखते हो? उन्होने जवाब दिया कि यह अजमत वाला दिन है इस दिन अल्लाह तआला ने हजरत मूसा (अलै0) और उनकी कौम को निजात दी और फिरऔन और उसकी कौम को गर्क कर दिया तो हजरत मूसा (अलै0) ने बतौर शुक्र इस दिन का रोजा रखा। इसलिए हम भी यह रोजा रखते हैं। आप (सल0) ने फरमाया-‘मूसा (अलै0) से तुम्हारी निस्बत से हम ज्यादा करीब हैं इसलिए नबी (सल0) ने खुद भी रोजा रखा और सहाबा को भी इसका हुक्म दिया।’ (सही मुस्लिम)
यहूद की मुशाबहत से बचने के लिए आप (सल0) ने दस के साथ नौ मोहर्रम के रोजे को मिलाने की ख्वाहिश का इजहार फरमाया। हजरत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रजि0) से रिवायत है कि नबी करीम (सल0) ने आशूरा का रोजा रखा और लोगों को भी इसके रखने का हुक्म दिया तो लोगों ने कहा ऐ अल्लाह के रसूल (सल0)! यह वह दिन है जिसकी यहूद और नसारा इज्जत करते है। आप (सल0) ने फरमाया-‘ जब अगला मोहर्रम आएगा अगर अल्लाह ने चाहा तो हम नौ तारीख का रोजा (भी) रखेंगे।’ (सही मुस्लिम) लेकिन अगला मोहर्रम आने से कब्ल ही आप (सल0) की वफात हो गई इसलिए दस मोहर्रम के साथ नौ मोहर्रम का रोजा रखना अफजल है। किसी वजह से नौ मोहर्रम का रोजा न रखा जा सके तो ग्यारह मोहर्रम का रोजा साथ रखना चाहिए। (यानी नौ दस या दस ग्यारह)।
इससे मालूम हुआ कि गैर मुस्लिम कौमा के साथ अदना मुशाबहत से भी बचना चाहिए चाहे वह इबादात में हो या अकायद में आदात व इतवार में हो या रस्म व रिवाज में। हजरत अब्दुल्लाह बिन उमर से रिवायत है कि नबी करीम (सल0) ने फरमाया-‘जिसने किसी कौम की मुशाबहत अख्तियार की वह उन्हीं में से है।’
कुरआने मजीद में अल्लाह तआला ने जहां हुरमत वाले महीनों का जिक्र फरमाया है वहां साथ फरमाया-‘पस इन महीनों में अपने ऊपर जुल्म न करो।’ (तौबा-36) यानी कोई ऐसा काम न करो जो अल्लाह तआला की नाराजगी और उसकी नाफरमानी का हो या गुनाह बिदआत और मुंकरात में से हो। मोहर्रम हुरमत वाले महीनों में से एक है इसलिए जरूरी है कि हम इसकी हुरमत का लिहाज रखें और इस महीने में हर ऐसा काम करने से बचें जो किसी भी तरह से इसकी हुरमत को पामाल करता हो। हर किस्म के झगड़े फितना व फसाद से अपने आप को दूर रखें। अपने भाइयों की जान माल और इज्जत की हुरमत का ख्याल रखें।
इब्ने अब्बास (रजि0) से रिवायत है कि नबी करीम (सल0) ने हज्जतुल विदा के मौके पर फरमाया-‘तुम्हारा खून तुम्हारा माल और तुम्हारी इज्जत एक दूसरे पर उसी तरह हराम है जिस तरह तुम्हारे आज के दिन की इस शहर की और इस महीने की हुरमत है।’ (सही बुखारी) क्या आप का यह पैगाम हमारे लिए काफी नहीं? जबान और अमल दोनों से हर ऐसे काम से बचेंं जो दूसरे की अजीयत और तकलीफ का बाइस बने या जिससे किसी की दिलआजारी हो। सहाबा जैसी बेमिसाल शख्सियात के लिए कोई नाजेबा कलमात अदा न करें जिन से उनकी बेअदबी और तौहीन हो। कोई रंजिश और नाचाकी हो भी तो वह खत्म कर दें और सुलह और अम्न का पैगाम कौल व अमल के जरिए आम करे। अल्लाह तआला हम सबको सिराते मुस्तकीम पर चलने की तौफीक अता फरमाए-आमीन।