पेट्रोलियम कीमतों के जरिए सरकारी लूट

पेट्रोलियम कीमतों के जरिए सरकारी लूट

मुल्क पर महंगाई की मार से हर शख्स परेशान, नरेन्द्र, मुल्क और रूपए की साख में मुसलसल गिरावट

“गैस, डीजल और पेट्रोल की कीमतों में लूट की हद तक इजाफा करके एक अंदाजे के मुताबिक मोदी सरकार अब तक तकरीबन 12 लाख करोड़ रूपए कमा चुकी है। इसके बावजूद मोदी सरकार का पेट नहीं भरा, साल के आखिर तक पेट्रोल सौ रूपए, डीजल 95 रूपए लीटर और कुकिंग गैस सिलेंडर की कीमत 1700 रूपए तक बढ जाने का खतरा।”

“2014 के एलक्शन से पहले मोदी की पैरवी में देश से सबसे बड़ा झूट बोलते हुए जालसाज योग व्यापारी रामदेव टीवी चैनलों पर नाच-नाच कर कह रहे थे कि मोदी को जिताइए, हम पेट्रोल 40 रूपए लीटर के अंदर और गैस तीन-साढे तीन सौ रूपए में दिलवाएंगे। अब वह मुंह छुपाकर गायब हो गए, बस पतंजलि की आमदनी में दिन दुनी रात चौगुनी तरक्की हो रही है।”

“रूपए की कीमत डालर के मुकाबले रोज गिरती जा रही है। अमरीका का सबसे बड़ा हमला टर्की की करेंसी पर हुआ था। टर्की ने अपनी करेंसी संभाल ली मोदी और अरूण जेटली रूपया नहीं संभाल पा रहे हैं। इसलिए कि यह लोग इस लायक ही नहीं हैं। चीन की करेंसी में 31 अगस्त तक सवा पांच, मलेशिया में पौने तीन, थाईलैण्ड में आधा लेकिन भारत में साढे ग्यारह (11.50) फीसद गिरावट आई।”
हिसाम सिद्दीकी
नई दिल्ली! मोदी हुकूमत ने गैस, डीजल और पेट्रोल के जरिए मुल्क में लूट मचा रखी है, तकरीबन बारह लाख करोड़ की कमाई करने के बावजूद मुनाफाखोर सरकार का पेट भरने का नाम नहीं ले रहा है। खबर लिखे जाने तक मुल्क के कई हिस्सों में पेट्रोल की कीमत 87 रूपए फी लीटर, डीजल 76 रूपए फी लीटर और कुकिंग गैस 980 रूपए फी सिलेंडर हो चुकी थी। कीमतों में आग लगने की वजह मोदी हुकूमत के जरिए बार-बार एक्साइज ड्यूटी में इजाफा किया जाना है। पूरा देश इन कीमतों से पनाह मांग रहा है। लेकिन मोदी खामोश हैं। मोदी से भी ज्यादा झूट बोलने वाले शातिर जालसाज जेहन के योग व्यापारी रामदेव भी किसी बिल में घुस गए हैं। अब वह मुल्क को अपनी शक्ल दिखाने लायक नहीं हैं, क्योंकि 2014 के लोक सभा एलक्शन से पहले रामदेव ने ही मुख्तलिफ टीवी चैनलों के जरिए अवाम से वादा किया था कि आप लोग मोदी को वोट देकर उनकी सरकार बनवाइए, हम देश में 35 से 40 रूपए फी लीटर पेट्रोल और कुकिंग गैस तीन से साढे तीन सौ रूपए फी सिलेंडर फराहम कराएंगे। मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार के दौरान जब इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतें 104 से 110 डालर फी बैरल हुआ करती थी उस वक्त मुल्क में पेट्रोल की कीमत 58 से 60 रूपए फी लीटर हो गई थी तो इन्ही नरेन्द्र मोदी ने हाथ फेंक-फेंक कर तकरीरें की थीं कि वह भी सरकार चलाना चाहते हैं। पेट्रोल की इतनी कीमतें नहीं होनी चाहिए। पूरी बीजेपी सड़कों पर थी लेकिन अब सबको सांप सूघ गया है। खबर है कि इस साल दिसम्बर के आखिर तक मोदी हुकूमत पेट्रोल की कीमत सौ रूपए लीटर और डीजल 93 रूपए फी लीटर कर देगी। क्यांकि सरकार को तो अवाम की जेबों पर डाका डालकर अपनी तिजोरियां भरनी हैं। पेट्रोलियम मिनिस्टर धमेन्द्र प्रधान ने यह कहकर पेट्रोल की कीमतों को जायज ठहराया कि डालर के मुकाबले रूपए की कीमत काफी गिरी है और कच्चा तेल विदेशों से इम्पोर्ट किया जाता है जिसका भुगतान डालर में होता है। इसलिए पेट्रोलियम अशिया (पदार्थों) की कीमतों में इजाफा हो रहा है। सवाल यह है कि रूपए की कीमत तो अब गिर रही है पेट्रोल, डीजल और कुकिंग गैस की कीमतों में सरकार शुरू से ही इजाफा कर रही है।
गैस, डीजल और पेट्रोल की कीमतें बढने की अस्ल वजहे यह हैं कि मोदी हुकूमत ने 2014 से अब तक एक दर्जन वार एक्साइज ड्यूटी में इजाफा किया है। एक्साइज ड्यूटी के जरिए इस वक्त भारत सरकार तकरीबन 4 लाख करोड़ तो रियासती हुकूमते 2 लाख नौ हजार करोड़ रूपए की कमाई कर रही है। मरकजी और रियासती सरकारों के जरिए वसूली जा रही एक्साइज ड्यूटी और दूसरे टैक्सों को मिला दिया जाए तो पेट्रोल की कीमतों के मुकाबले तकरीबन डेढ गुना ज्यादा टैक्स ही वसूले जा रहे हैं। हर तरफ से मतालबा होने के बावजूद पेट्रोलियम अशिया (पदार्थों) को मोदी सरकार जीएसटी के दायरे में नहीं ला रही है। जीएसटी एडवाइजरी कमेटी के सदर और बिहार के डिप्टी चीफ मिनिस्टर सुशील मोदी ने साफ कह दिया है कि अगर सरकार एक लाख करोड़ की भरपाई करें तभी पेट्रोलियम अशिया को जीएसटी के दायरे में लाया जा सकता है। मतलब साफ है कि पेट्रोलियम को जीएसटी में नहीं लाया जाएगा। मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार के दौरान एक बार जब पेट्रोल की कीमत साठ रूपए से ज्यादा हो गई थी तो उस वक्त जिन प्रदेशों में बीजेपी सरकारें थीं उनमें एक सियासी ड्रामा दिखाते हुए टैक्स मे कमी करके पेट्रोल कुछ सस्ता किया गया था। अब तीन-चौथाई हिन्दुस्तान में बीजेपी सरकारें हैं तो यह प्रदेश सरकारें भी मोदी सरकार की तरह टैक्स कम करने के लिए तैयार नहीं हैं। इसका क्या मतलब है? खबर लिखे जाने तक सबसे महंगा पेट्रोल मुंबई और महाराष्ट्र के दीगर कई हिस्सों में तकरीबन 87 रूपए लीटर तो दिल्ली और उत्तर प्रदेश में 80 रूपए लीटर बिक रहा था। इसे काबू करने का मोदी हुकूमत का कोई इरादा नहीं था।
रूपए की कीमत भी वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी की साख की तरह रोज बरोज गिरती जा रही है। मनमोहन सिंह हुकूमत के दौरान यह बात गुजरात के वजीर-ए-आला की हैसियत से नरेन्द्र मोदी ने ही कही थी कि मुल्क में दो ही चीजें गिर रही हैं एक रूपए की कीमत और दूसरी वजीर-ए-आजम व मुल्क की साख (सम्मान)। उस वक्त मोदी ने हाथ फेंक-फेंक कर लफ्फाजी करते हुए कहा था कि दोनों गिर ही नहीं रही हैं बल्कि गिरावट में एक दूसरे का मुकाबला कर रही हैं कि कौन ज्यादा गिरता है। अब रूपए के मुकाबले एक डालर की कीमत 72 रूपए हो चुकी है तो मोदी और उनकी मंडली ने यह राग अलापना शुरू कर दिया है कि टर्की और चीन की करेंसी का भाव गिरने की वजह से रूपए की कीमत भी गिर रही है। यह आलमी सतह का मसला (वैश्विक समस्या) है। सवाल यह है कि सबसे पहले अमरीका ने टर्की की करेंसी पर हमला किया था फिर चीन पर किया था। टर्की के सदर ने तो एक महीने के अंदर अपनी करेंसी की कीमत ठीक कर ली, चीनी करेंसी ‘येन’ में भी सुधार आ गया तो रूपए में सुधार आने के बजाए गिरावट क्यों जारी है। इस साल पहली जनवरी से 31 अगस्त तक चीन की करेंसी में सवा पांच फीसद, इंडोनेशिया की करेंसी में नौ फीसद, मलेशिया की करेंसी में पौने तीन फीसद और थाईलैण्ड की करेसी में तकरीबन आधा फीसद की ही गिरावट दर्ज की गई है लेकिन हिन्दुस्तान की करेंसी में 11.50 फीसद की गिरावट आई। आखिर मोदी और अरूण जेटली का यह कौन सा फाइनेंशियल मैनेजमेट है। जब रूपए की कीमत हर रोज गिर रही है। मतलब साफ है कि मोदी और उनकी टीम में मुल्क और मुल्क की मईशत (अर्थव्यवस्था) चलाने की सलाहियतें ही नहीं हैं। यह तो अच्छा है कि लोक सभा एलक्शन और मोदी के जाने में बहुत कम वक्त रह गया है वर्ना यह लोग मुल्क को दिवालिया बना देते।
अगस्त के आखिरी हफ्ते में मोदी हुकूमत ने एक शगूफा छोड़ा कि मुल्क की जीडीपी में जबरदस्त इजाफा हुआ है। जब यह सवाल उठा कि जीडीपी में इजाफा हर सामान की कीमतों में लगी आग की वजह से हुआ है तो सरकार का प्रोपगण्डा करने वालों ने मुजरिमाना खामोशी अख्तियार कर ली। सरकार की जानिब से जीडीपी का ढिढोरा पीटने वालों के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि जीडीपी बढने की वजह बेपनाह महंगाई है, डीजल, पेट्रोल और गैस की कीमतों में इजाफा है या सनअती और जरई शोबों (आौद्योगिक व कृषि क्षेत्रों) में तरक्की है। सनअती तरक्की तो मुल्क में बंद पड़ी हैं। लाखों छोटी सनअतें और कंस्ट्रक्शन का कारोबार तबाही के कगार पर पहुच चुका है। कोई नई फसल अभी आई नहीं है तो फिर जीडीपी बढने की असल वजह तो महंगाई ही है। सरकार की तिजोरिया भले ही भर रही हों अवाम की कमर तो टूट ही रही है।