महाराष्ट्र पुलिस के शर्मनाक दावे

महाराष्ट्र पुलिस के शर्मनाक दावे

मो. सैफुल इस्लाम
नई दिल्ली! हिन्दुस्तान की जम्हूरियत और सरकार इतनी कमजोर हो गई है कि चार-पांच लोग कुछ माओवादियों के साथ मिलकर न सिर्फ इसे गिरा सकते हैं बल्कि खुद सरकार पर कब्जा कर सकते हैं। यह ख्याल किसी और का नहीं महाराष्ट्र पुलिस का है जिसका बयान पुलिस ने पहले मीडिया के जरिए किया उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर करके यही दावा दोहराया। सरकारों में बैठे कुछ फिरकापरस्तों के इशारे पर मुस्लिम नौजवानों को दहशतगर्द करार देने की कहानियां गढते-गढते कुछ पुलिस अफसर इतने गैर जिम्मेदार और बेहिस हो गए हैं कि किसी कोभी फंसाने के लिए वह कोई भी कहानी गढ सकते हैं। भीमा-कोरेगांव में इस साल के पहले दिन दलितों के खिलाफ हुई हिंसा की तहकीकात करने वाली पुणे पुलिस ने असल मुल्जिमान के खिलाफ तो कुछ किया ही नहीं बल्कि इंसानी हुकूक (मानवाधिकारों) और दलितों व कमजोरों की लड़ाई लडने वाले लेफ्टिस्ट जेहन के नौ लोगों पर सरकार के खिलाफ बगावत करने, बडी तादाद में असलहा खरीद कर अफरा-तफरी फैलाने का इल्जाम मढ कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया। जून में जिन चार लोगों को गिरफ्तार किया गया था उनपर ज्यादा शोरशराबा नहीं हुआ था क्योंकि उस वक्त तक लोग यह नहीं समझ सके थे कि इन गिरफ्तारियों के पीछे असल मकसद क्या है।
28 अगस्त को महाराष्ट्र पुलिस ने अचानक हैदराबाद, दिल्ली और महाराष्ट्र के कई ठिकानों पर छापे मार कर पुणे पुलिस ने मशहूर अवामी कवि वरवरा राव को हैदराबाद से आदिवासियों और दलितों की लडाई लडने वाली मशहूर वकील सुधा भाद्वाज को हरियाणा के फरीदाबाद से, गौतम नवलखा को दिल्ली से, वेयरनन गोजाल्विस को मुंबई से और अरूण फरेरा एडवोकेट को मुबई से मिले हुए ठाणे से गिरफ्तार कर लिया। इन गिरफ्तारियों पर पूरे देश में हंगामा मच गया मशहूर तारीखदां (इतिहासकार) रोमिला थापर इकोनामिस्ट प्रभात पटनायक, देविका जैन, सतीश देश पाण्डेय और मजा दारूवाला वगैरह सुप्रीम कोर्ट पहुच गए तो चीफ जस्टिस की कयादत वाली तीन जजों की बेच ने इन पाचांं को पुलिस हिरासत में रखने के बजाए उनके अपने-अपने घरों में ही नजरबंद रखने का हुक्म दे दिया। पांच सितम्बर को पुणे पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल किया तो उसमें भी उसी तरह की लफ्फाजी की गई जैसी लफ्फाजी पहले महाराष्ट्र के एडीशनल डीजी परमवीर सिंह मीडिया नुमाइंदों के सामने कर चुके थे। पुलिस का दावा है कि गिरफ्तार यह पांचों लोग माओवादियों के साथ मिलकर चीन और रूस से बडे पैमाने पर असलहा हासिल करके देश की सरकार गिराने की साजिश कर रहे थे। महाराष्ट्र पुलिस ने हलफनामे में कहा कि इन सभी के माओवादियों के साथ गहरे ताल्लुकात थे इसके पुख्ता सुबूत उनके पास हैं। इन लोगों को सरकार के खिलाफ आवाज उठाने की वजह से गिरफ्तार नहीं किया गया है। हलफनामे में पुलिस ने दावा किया कि यह लोग सिर्फ माओवादियों के दोस्त ही नहीं हैं बल्कि खुद माओवादी है जो मुल्क में बहुत बड़े पैमाने पर हिंसा और अफरा-तफरी फैलाने की तैयारी कर रहे थे। सुबूतों के मुताबिक यह लोग काडर तैयार करने के साथ उनके लिए फण्ड और हथियार इकट्ठा करते थे और हथियार काडर में तकसीम करते थे। महाराष्ट्र पुलिस ने अपने हलफनामे के जरिए मुल्क की चीफ जस्टिस समेत कई जजों को उर्दू जबान (भाषा) सिखाने की कोशिश ही नहीं बल्कि गुस्ताखी की, महाराष्ट्र में दलितों की मशहूर तंजीम ‘एलगार परिषद’ को भी बदनाम करते हुए लिखा कि एलगार की असल मंशा ‘यलगार’ है जिसका मतलब होता है हमला। सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले में बारह सितम्बर को सुनवाई करेगा।
महाराष्ट्र पुलिस के सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किए गए हलफनामे से इतना तो जाहिर ही हो गया कि आरएसएस के अलावा मुल्क में दलितों मुसलमानों या किसी भी दूसरे तबके को कोई भी तंजीम बनाने का हक नहीं है और जो भी कोई तंजीम बनाएगा उसे गैर कानूनी या मुल्क मुखालिफ करार दे दिया जाएगा। अब एलगार परिषद को भी हमला करने वाली तंजीम बता दिया गया है। उसी महाराष्ट्र में सनातन संस्था जैसी दहशतगर्द तंजीम मौजूद है। चंद दिन पहले ही सनातन सस्था से जुडे हुए आधा दर्जन से ज्यादा लोगों को बमों और दीगर मोहलिक (घातक) हथियारों के साथ महाराष्ट्र एटीएस गिरफ्तार कर चुकी है। लेकिन संस्था के चीफ पर पुलिस ने अब तक हाथ नहीं डाला। संस्था के खिलाफ ऐसा हलफनामा भी किसी अदालत में नहीं दिया। नरेन्द्र मोदी सरकार आने के बाद महाराष्ट्र समेत पूरे मुल्क में सैकडों हिन्दुत्ववादी तंजीमें बन चुकी है उनपर भी कभी शक नहीं किया जाता लेकिन उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में चन्द्रशेखर आजाद उर्फ रावण नाम के एक शख्स ने भीम आर्मी बनाई तो उसपर एनएसए लगा दिया गया और तकरीबन सवा साल से जेल में है। एलगार परिषद को हमलावर तंजीम बताया जा रहा है। मुसलमानों की कोई तंजीम बनती है तो वह दहशतगर्दों की तंजीम करार दे दी जाती है।
बारह सितम्बर को सुप्रीम कोर्ट इस मामले की सुनवाई करने वाला है ऐसे पुलिस अफसरान के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए जो यह समझते हैं कि हिन्दुस्तान जैसी मजबूत जम्हूरियत में कोई शख्स या कोई तंजीम (संगठन) कुछ लोगों के साथ मिलकर मुल्क की सरकार को गिरा कर इस पर कब्जा कर सकते है। इतने बदअक्ल पुलिस वालों को नौकरी करने का कोई हक नहीं होना चाहिए। इससे पहले महाराष्ट्र के एडीजी लॉ एण्ड आर्डर ने जब प्रेस कांफ्रेंस करके मामले को पब्लिसिटी देने की कोशिश की थी तो मुबई हाई कोर्ट के दो जजों जस्टिस एसएस शिंदे और जस्टिस मृदला भाटकर ने उन्हें डाट लगाते हुए कहा था कि जो सुबूत अदालत में दाखिल किए जाने बाकी हो और मामला अदालत में हो उनको प्रेस कांफ्रेंस में कैसे बयान किया जा सकता है।