मुखालिफ आवाज दबाने में बुरी फंसी मोदी सरकार

मुखालिफ आवाज दबाने में बुरी फंसी मोदी सरकार

मुल्क के दलितों, आदिवासियों और उनके पैरोकारों को जेलों में डालने का नापाक मंसूबा

”मोदी सरकार पर सुप्रीम कोर्ट का अब तक का सबसे करारा तमांचा, एख्तेलाफ (असहमति) की आवाज दबाने जैसा रिमार्क। सबसे बड़ी अदालत ने कहा नाइत्तेफाकी या इख्तलाफ जम्हूरियत का सेफ्टी वाल्व अगर दबाया गया तो प्रेशर कुकर की तरह फट जाएगा। निचली अदालतें दबाव में कुछ सोचे-समझे बगैर फैसले करती हैं। तमाम मुखालिफीन पर देशद्रोह और साजिशें करने के इल्जामात लगाना गलत।“

”वजीर-ए-आजम मोदी के साए तक को छू पाना नामुमकिन लेकिन पुणे और महाराष्ट्र पुलिस ने कलमकारों और वकालत करने वालां को मोदी को कत्ल करने की साजिश में मुलव्विस होने की कहानी गढ दी। मोदी के साथ राजनाथ सिंह और अमित शाह को भी निशाने पर बता दिया। 2002 में गुजरात में इंसानियत के कत्लेआम के बाद से हर एलक्शन से पहले मोदी के कत्ल की मुबय्यना (कथित) साजिश सामने आती रहती है। अब ऐसी फर्जी साजिशें अवाम में मजाक का मौजूअ बनने लगी हैं।“

”भीमा कोरेगांव हिंसा के अस्ल मुल्जिमान संभाजी भिंडे और मिलिन्द एकवोटे को सरकार व पुलिस की हिमायत। भिंडे को नरेन्द्र मोदी अपना आदर्श करार दे चुके है। दलितों की रिपोर्ट पर दलितों के खिलाफ ही कार्रवाई। वजीर-ए-आजम मोदी को कत्ल करने की साजिश की कहानी गढ कर पुलिस ने दलित आदिवासी और इंसानी हुकूक की लड़ाई लड़ने वालों को ही मुल्जिम बनाने का गुनाह किया। पुलिस और सरकार के खिलाफ मुल्क भर में गुस्से की लहर।“
हिसाम सिद्दीकी
नई दिल्ली! अमरीकी सदर और इस्राईली वजीर-ए-आजम की सतह की सिक्योरिटी में रहने वाले हिन्दुस्तानी वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी को मारने की साजिश के बहाने बीजेपी सरकार वाले महाराष्ट्र की पुणे पुलिस को मुल्क के पांच मुमताज और मशहूर इंसानी हुकूक (मानवाधिकार) एक्टिविस्ट को गिरफ्तार करना बहुत मंहगा पड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने पांचों को उनके घरों में ही रखने का आर्डर देते हुए जो कुछ कहा उससे मोदी सरकार के लिए डूब मरने जैसी सूरतेहाल पैदा हो गई है। इस साल पहली जनवरी को महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में दलितों की तंजीम एलगार परिषद के जलसे के दौरान हुई हिसा की तहकीकात करने वाली पुणे पुलिस ने अस्ल मुल्जिमान संभाजी भिंडे और मिलिंद एकबोटे के खिलाफ कोई कार्रवाई करने के बजाए वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी को राजीव गांधी की तरह कत्ल करने की साजिश का जिन पैदा कर दिया और 28 अगस्त को दलितों, आदिवासियों और इंसानी हुकूक के लिए लड़ने वाले पांच लोगों हैदराबाद से सत्तर साल के बुजुर्ग काके वरवरा राव, फरीदाबाद हरियाणा की मशहूर वकील और सोशल वर्कर सुधा भारद्वाज, ठाणे महाराष्ट्र से सोशल वर्कर और वकील अरूण परेरा मुंबई से वी गोन्जालविस और दिल्ली से गौतम नौलखा को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी के फौरन बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने गौतम नौलखा को दिल्ली से पुणे ले जाने पर रोक लगाते हुए आर्डर कर दिया कि अगले आर्डर तक उन्हे उन्हीं के घर में नजरबंद रखा जाए। अगले दिन हरियाणा पंजाब हाई कोर्ट ने सुधा भारद्वाज के लिए भी इसी किस्म का आर्डर कर दिया। उन्तीस अगस्त को ही छः जानी मानी शख्सियतों ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में एक पीआईएल दायर की तो तीन जजों की सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने सभी पांचों लोगों को उनके अपने-अपने घरों में ही नजरबंद रखने का आर्डर दे दिया। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इन गिरफ्तारियों को सरकार के साथ एख्तेलाफ (असहमति) की आवाज दबाने का मामला करार दिया। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की कयादत में जस्टिस ए एम खानविलकर और जस्टिस डी वाई चन्द्रचूण की बेंच ने भीमा कोरेगांव वाक्ए के नौ महीने बाद इंसानी हुकूक के लिए लड़ने वाले इन पांचों मशहूर लोगों की गिरफ्तारी पर सवाल करते हुए पुणे और महाराष्ट्र पुलिस को डांट लगाई। बेंच ने कहा कि इन पांचों लोगों को उनके अपने घरों पर ही रखा जाए। जस्टिस चन्द्रचूर्ण ने तो यहां तक कह दिया कि एखतलाफ (असहमति) जम्हूरियत का सेफ्टी वाल्व होता है अगर ज्यादा दबाया तो प्रेशर कुकर की तरह फट जाएगा। सवा चार साल की मोदी सरकार के मुंह पर सुप्रीम कोर्ट का यह सबसे बड़ा और करारा तमांचा है। इसके बावजूद बीजेपी के तर्जुमान (प्रवक्ता) आरएसएस के कई लीडर और मोदी के गुलाम कई टीवी चैनलों के ऐंकर्स पूरी बेशर्मी के साथ इन सभी की गिरफ्तारियों को जायज ठहराने में मसरूफ दिखे। मोदी के बड़बोले वजीर कानून रविशंकर प्रसाद समेत सरकार के तमाम वजीरों ने अपना मुंह बंद रखने मे ही खैरियत समझी। मामले को डायवर्ट करने की गरज से फाइनेंस मिनिस्टर अरूण जेटली रफेल सौदा लेकर मीडिया से रूबरू हुए और राहुल गांधी पर भोथरे हथियार से हमले किए।
दलितों, आदिवासियों और इंसानी हुकूक के लिए हमेशा आगे रहनेवाली इन पांचों नामवर शख्सियतों की गिरफ्तारी से दुखी मशहूर तारीखदां (इतिहासकार) रोमिला थापर, इकोनामिस्ट प्रभात पटनायक, देविका जैन, सतीश देशपाण्डेय और मजा दारूवाला जैसे अपने-अपने मैदान के बड़े लोगों ने सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे पर दस्तक दी थी। मुल्क की अदलिया (न्यायपालिका) की तारीख में इंतेहाई अहम और अपने किस्म का अनोखा कदम उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में न सिर्फ तीसरे फरीक की दरख्वास्त को सुना बल्कि इंतेहा दर्जे का मुंसिफाना फैसला भी सुनाया। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने मुल्क के सवा सौ करोड़ लोगों के दिलों में मुल्क की अदलिया के लिए एहतराम (सम्मान) का करेण्ट सा तो दौड़ा ही दिया उन लोगों की हौसला अफजाई भी हुई जो मोदी सरकार में परेशान किए जाने की वजह से खौफजदा रहने को मजबूर थे मुल्क के दबे कुचले और परेशान हाल लोगों का यकीन एक बार फिर पुख्ता हो गया। मोदी की हो या किसी और की जब तक मुल्क में मजबूत अदलिया है उस वक्त तक कोई भी सरकार किसी के साथ नाइंसाफी और जुल्म नहीं कर सकेगी। दिल्ली की नरेन्द्र मोदी और महाराष्ट्र की फण्डनवीस सरकारों का अपोजीशन को दबाने का यह कदम उल्टा पड़ गया। अब तो ऐसा लगता है कि दोनों ही सरकारों को अगले साल अपने लिए चलचलाव का दिख रहा है। इसलिए उतावलेपन में इस किस्म के कदम उठाए जा रहे हैं। इस कार्रवाई से तो पूरी तरह साबित हो गया कि मोदी सरकार संविधान के बजाए मनुस्मृति के मुताबिक चलकर मुसलमानों के बाद दलितों को भी हर सतह पर दबाकर रखना चाहती है।
दुनिया जानती है कि आला सतही और सख्त सिक्योरिटी में रहने वाले हिन्दुस्तान के वजीर-ए-आजम को मार पाना तो दूर उनके साए तक को कोई छू नहीं सकता इसके बावजूद अक्सर कोई न कोई रिपोर्ट आ जाती है कि वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी को मारने की फलां-फलां लोग या फलां-फलां तंजीमें (संगठन) साजिश कर रही थी। मोदी के लिए यह कोई नई बात नहीं है। वह गुजरात के चीफ मिनिस्टर थे, फरवरी-मार्च 2002 में गुजरात में हुए इंसानियत के कत्लेआम के हर साल-छः महीने बाद गुजरात पुलिस और खुफिया एजेसियां उनपर हमले की मुबय्यना (कथित) साजिशों को बेनकाब करने का दावा करती रही हैं कई बार तो कुछ लोगों को इनकाउण्टर में मारने के बाद कहा गया कि वह लश्करे तैयबा और जैशे मोहम्मद जैसी दहशतगर्द तंजीमों के एजेण्ट थे जो गांधीनगर में नरेन्द्र मोदी को मारने के मकसद से आए थे। अब पुणे पुलिस ने अचानक यह बता दिया कि भीमा कोरेगांव में पिछली 31 दिसम्बर को दलितों की एलगार परिषद के जलसे के दौरान हुई हिंसा की तहकीकात के दौरान उन्हें दो ऐसे खत रोना जैकब बिल्सन के कम्प्यूटर पर मिले जिससे पता चलता है कि वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी को राजीव गांधी की तरह मारने की साजिश हो रही है। इस साजिश के इल्जाम में पुलिस ने अचानक 28 अगस्त को मुल्क के अलग-अलग मकामात से इंसानी हुकूक के लिए काम करने वाले पांच लोगों को शहरी माओवादी बताकर गिरफ्तार कर लिया। इससे पहले जून में भी इसी मामले में लेफ्टिस्ट ख्यालात वाले पांच इंसानी हुकूक एक्टिविस्ट को गिरफ्तार किया जा चुका था। उनमें दिल्ली से रोना जैकब विल्सन, सुधीर ठावले को मुंबई से सुरेन्द्र गाडलिंग, महेश राउत और शोभा सेन को पुणे से उठाया गया था।
याद रहे कि भीमा कोरेगांव में दलितों के हाथों पेशवाओं की शिकस्त के दो सौ साल पूरे होने के मौके पर हर साल की तरह इस साल भी पहली जनवरी को दलितों की तंजीम एलगार परिषद ने बडे़ पैमाने पर जलसा करने का एलान किया था। महाराष्ट्र और गुजरात के अलावा कई प्रदेशों के दलित इस जलसे में शामिल होने के लिए दो दिन पहले से मार्च करते हुए आना शुरू हो गए थे। इकत्तीस दिसम्बर को पुणे में समस्थ हिन्दू एकता अघाड़ी के संभाजी भिंडे और समस्थ शिव प्रतिष्ठान हिन्दुस्तान के मिलिन्द एकेबोटे ने सवर्णों को भड़काने वाली बयानबाजी करके दलितों के मार्च पर हमला कराया था। इस हमले में एक शख्स की मौत हो गई थी। पहली जनवरी को भीमा कोरेगांव में जमा लाखों दलित जब वापस होने लगे तो रास्ते में एक बार फिर हिंसा हुई। एलगार परिषद की जानिब से संभाजी भिंडे और मिलिंद एकवोटे के खिलाफ नामजद रिपोर्ट दर्ज कराई थी। मिलिंद एकवोटे को पुणे पुलिस ने मामूली दफाओं में गिरफ्तार करके जमानत पर रिहा करा दिया। संभाजी भिंडे पर हाथ डालने की हिम्मत कोई नहीं कर सका। क्योंकि वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी उन्हें अपना आदर्श बता चुके हैं। बगैर कोई तहकीकात कराए वजीर-ए-आला देवेन्द्र फण्डनवीस ने महाराष्ट्र असम्बली में उन्हें क्लीन चिट देते हुए कह दिया कि उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं मिले हैं। उसी मामले की तहकीकात के बहाने महाराष्ट्र पुलिस ने मुल्क भर के दलित एक्टिविस्टों और उनके हामियों को फंसाने की साजिश रच दी। कम्प्यूटर से दो खत भी तैयार हो गए जिनमें लिखा है कि वजीर-ए-आजम मोदी को राजीव गांधी की तरह रोडशो के दौरान कत्ल कर दिया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा एखतलाफ (असहमति) जम्हूरियत (लोकतन्त्र) का सेफ्टी वाल्व है अगर आप इन सेफ्टी वाल्व की इजाजत नहीं देंगे तो यह फट जाएगा। आला अदालत ने इसके साथ ही इन गिरफ्तारियों के खिलाफ तारीखदां (इतिहासकार) रोमिला थापर और दीगर चार लोगों की अपील पर महराष्ट्र सरकार और पुलिस को नोटिस जारी किए। अपील करने वालों में प्रभात पटनायक और देविका जैन भी शामिल हैं। महाराष्ट्र सरकार के वकील ने इस अपील को सुने जाने पर सवाल उठाते हुए कहा कि मामले से सरोकार नहीं रखने वाले उन लोगों के लिए राहत नहीं मांग सकते जो पहले ही हाई कोर्ट्स में अपील दायर कर चुके है। इस दौरान हाई कोर्ट में महाराष्ट्र सरकार ने भी हाउस अरेस्ट की बात कबूल कर ली है। अदालत ने सरकार से पांच सितम्बर तक जवाब दाखिल करने को भी कहा है। सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले में छः सितम्बर को अगली सुनवाई करेगा पुणे पुलिस ने दावा किया था कि एक मुल्जिम के घर से ऐसा खत मिला था जिसमें राजीव गांधी के कत्ल जैसी प्लानिंग का ही जिक्र किया गया था। इस खत में वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी को निशाना बनाने की बात भी कही गई थी। भीमा कोरेगांव मामले में 28 अगस्त को मुल्क के कई शहरों मुंबई, हैदराबाद, फरीदाबाद, दिल्ली और ठाणे में छापामारी की गई थी। महाराष्ट्र की बीजेपी सरकार और उसकी पुलिस का कहना है कि भीमा कोरेगांव में दलितों और उनके हामियों की जानिब से की गई भड़कीली तकरीरों की वजह से हिंसा फैली थी।
भीमा कोरेगांव हिंसा से जुड़े मामले में पुणे पुलिस और सिक्योरिटी एजेंसियों के जरिए समाजी और इंसानी हुकूक वर्कर गौतम नवलखा, वरवरा राव, सुधा भारद्वाज, अरूण फरेरिया और वरनोन गोंजालवेस के घरों पर छापेमारी के बाद गिरफ्तार किया गया था। भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में हुई लेफ्टिस्ट दानिशवरों की गिरफ्तारियों पर रोक लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने कहा है कि एखतलाफ जम्हूरियत का सेफ्टी वाल्व है। अगर प्रेशर कुकर में सेफ्टी वाल्व नहीं होगा तो वह फट सकता है। भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में हुई गिरफ्तारियों के खिलाफ तारीखदां रोमिला थापर, देवकी जैन, एकनामिस्ट प्रभात पटनायक, सतीश देशपांडे और मजा दारूवाला ने सुप्रीम कोर्ट में एक अपील दायर की थी। जिस पर चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस डीवाई चन्द्रचूण और जस्टिस ए एम खानविलकर की बेंच के सामने उनकी तरफ से सीनियर वकील अभिषेक मनु सिंघवी, दुष्यंत दवे, राजू रामचन्द्रन, प्रशांत भूषण और वृदा ग्रोवर वहीं सरकार की तरफ से एडिशनल सालिसिटर जनरल तुषार मेहता मौजूद थे।
सुप्रीम कोर्ट में तीन जजों की बेंच के सामने पटीशनर्स की तरफ से मौकुफ रखते हुए सीनियर वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि पुलिस की एफआईआर में गिरफ्तार लोगों का कोई जिक्र नहीं है और न ही उन पर किसी तरह की मीटिंग करने का इल्जाम है। सिंघवी ने कहा कि गिरफ्तार लोगों में से एक (सुधा भाद्वाज) ने अपनी अमरीकी शहरियत छोडते हुए भारत में वकालत करने को अपने पेशे के तौर पर चुना। वह दिल्ली की नेशनल ला युनिवर्सिटी में पढाती भी हैं। लेकिन बड़ा मामला सरकार से एखतलाफ (असहमति) का है। वहीं सिंघवी की मुखालिफत करते हुए एडिशनल सालिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि जिन लोगों का इस केस से कोई लेना देना नहीं है वह सुप्रीम कोर्ट के सामने हैं जिस पर सिंघवी ने कहा कि यह मामला संविधान की दफा 21 के जरिए अख्तियार की गांरटी और आजादी के हक से जुडा है। लिहाजा इन गिरफ्तारियों पर रोक लगाई जाए। वकील दुष्यंत दवे ने कहा कि यह गिरफ्तारियां बगैर सोचे-समझे की गई हैं। जिसका इस मामले से कोई लेना देना नहीं है। सभी फरीकैन को सुनने के बाद जस्टिस चन्द्रचूण ने महाराष्ट्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए कहा कि नाइत्तेफाकी हमारे लोकतन्त्र का सेफ्टी वाल्व है अगर आप प्रेशर कुकर में सेफ्टी वाल्व नहीं लगाएंगे तो वह फट सकता है । लिहाजा अदालत मुल्जिमान को उबूरी (अंतरिम)राहत देते हुए अगली सुनवाई तक गिरफ्तारी पर रोक लगाती है तब तक सभी मुल्जिमान हाउस अरेस्ट में रहेगे। सुप्रीम कोर्ट में मामले की अगली सुनवाई छः सितम्बर को होगी।
महाराष्ट्र और पुणे पुलिस के मुताबिक नक्सलियों की यह एक ऐसी साजिश जिसने सन्न कर दिया एक सूबे की पुलिस और सरकार को क्योंकि एक हिंसा से कत्ल तक के नापाक इरादों के जिस नेटवर्क का खुलासा हुआ उसमें निशाने पर हैं देश के वजीर-ए-आजम नरेंद्र मोदी, देश के होम मिनिस्टर राजनाथ सिंह और बीजेपी सदर अमित शाह। इन शकूक (आशंकाओं) ने 28 अगस्त को एक दो नहीं देश के कई शहरों में हड़कंप मचा दिया। भीमा कोरेगांव हिंसा के मामले में पुणे की पुलिस ताबड़तोड़ छापेमारी कर गिरफ्तारियां कर रही हैं और इसी लिस्ट में कुछ नाम और जुड़ गए हैं। खुद पुलिस यह भी कहती है कि इन सब के नक्सलियों के साथ जुड़े होने का शक है अभी कोई सबूत नहीं है अगर सिर्फ शक है तो गिरफ्तारी क्यों?
ठाणे से गिरफ्तार अरुण परेरा का नाम इसलिए आया क्योंकि जून में गिरफ्तार किए गए मुल्जिमान के पास से नक्सलियों का एक ईमेल मिला था जिसमें अरुण परेरा का जिक्र था। अरुण परेरा पर हिंसा भड़काने के लिए फंड जुटाने का इल्जाम मढा गया है। दिल्ली से गिरफ्तार गौतम नवलखा को जून में गिरफ्तार किए गए वकील सुरेंद्र गडलिंग ने एक खत लिखा था। यह खत भीमा कोरेगांव हिंसा से ठीक पहले लिखा गया था। इसमें गौतम नवलखा को एल्गार परिषद की मीटिंग में हाजिर रहने को कहा गया था। पुलिस के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था कि एलगार परिषद की मीटिंग में हाजिर रहना गुनाह कैसे हो गया क्या उस मीटिंग में कोई मुल्क मुखालिफ फैसले हुए थे? फरीदाबाद से गिरफ्तार सुधा भारद्वाज के बारे में पुलिस ने गढा कि जेएनयू में भीमा कोरेगांव को लेकर एक मीटिंग हुई थी। उस मीठिंग का इंतजाम सुधा भारद्वाज ने ही किया था। सुधा भारद्वाज पर अलग अलग तंजीमों और धर्मों के बीच दुश्मनी फैलाने के लिए दफा 153ए लगाई गई है। साथ ही हिंसक बयान देने के लिए आईपीसी की दफा 505, 117 ओर 120 लगाई गई है। वहीं गिरफ्तारी के बाद सुधा भारद्वाज को भी पुणे नहीं ले जाया गया क्योंकि पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट ने उनकी ट्रांजिट रिमांड पर दो दिन की रोक लगा दी थी। लेकिन इससे पहले देर रात तक फरीदाबाद की अदालत में सुनवाई होती रही। दरअसल 28 अगस्त को सुबह फरीदाबाद के चार्मवुड विलेज सोसाइटी से भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में एडवोकेट सुधा भारद्वाज को पुणे पुलिस ने हिरासत में लिया था। हिरासत में लेने के बाद सुधा को फरीदाबाद कोर्ट में पेश कर ट्रांजिट रिमांड मांगा गया था जिसे सीजीएम कोर्ट ने आंख बंद करके पुलिस के दबाव में मंजूर कर लिया। इसी बीच सुधा भारद्वाज के वकील ने हाईकोर्ट में स्टे की मांग की और फिर हाईकोर्ट ने उन्हें 30 तारीख तक स्टे दे दिया लेकिन जब तक स्टे का यह फैसला आया तब तक सीजेएम कोर्ट सुधा भारद्वाज को पुणे पुलिस को ट्रांजिट रिमांड पर सौंप चुकी थी।
बाद में देर रात हाईकोर्ट से आर्डर आने के बाद पुणे पुलिस ने सुधा को वापस फरीदाबाद में जज अशोक शर्मा के सामने पेश किया जहां उन्होंने आधी रात के बाद तकरीबन सवा (1ः15) बजे सुधा को 30 अगस्त तक फरीदाबाद पुलिस की निगरानी में उनके ही घर पर रखने के आर्डर दिए। सुधा भारद्वाज की वकील के मुताबिक अब अगली सुनवाई फिर से हाईकोर्ट में ही होगी। हैदराबाद से पकड़े गए वरवरा राव, इस मामले में गिरफ्तार हो चुके कबीर कला मंच के सुधीर धावले के करीबी हैं और पुलिस के मुताबिक वरवरा राव नौजवानों को रिक्रूट करते। वरवरा राव का नेटवर्क दस प्रदेशों में फैला है और नक्सली उन्हे आदर्श भी मानते हैं। जबकि मुंबई से पकड़े गए वर्नन गोंसाल्विस के पास से कई ऐसे डाक्यूमेंट्स मिले जिससे उनके नक्सलियों से जुड़े होने का शक है। पहले जिन मुल्जिमान को पकड़ा गया था उनसे भी वर्नन गोंसाल्विस के करीबी रिश्ते हैं। सरकार का दावा है कि यह कार्रवाई पुख्ता सबूतों के साथ की गई है लेकिन मामला सिर्फ भीमा कोरेगांव हिंसा तक महदूद नहीं है। पांच प्रदेशों में रेड और गिरफ्तारियां इसलिए भी अहम हैं कि इस हिंसा के तार उस साजिश से जोड़ दिए गए जहां निशाने पर हैं देश के पीएम नरेंद्र मोदी को बताया गया। पुलिस का दावा है कि इसका खुलासा तब हुआ था जब जून 2018 में भीमा कोरेगांव की हिंसा की जांच के दौरान दिल्ली से गिरफ्तार किए गए रोना विल्सन नाम के शख्स के लैपटाप से पुलिस को एक खत मिला। इस खत में लिखा था, ‘मोदी 15 प्रदेशों में बीजेपी को मजबूत करने में कामयाब हुए हैं। ऐसा ही रहा तो सभी मोर्चों पर पार्टी के लिए बड़ी दिक्कत हो जाएगी। कामरेड किसन और कुछ दीगर सीनियर कैडर ने मोदी राज को खत्म करने के लिए मजबूत कदम सुझाए हैं। हम सभी राजीव गांधी जैसे कत्ल पर गौर कर रहे हैं। यह खुदकुश लगता है और यह भी तवक्को है कि हम नाकाम हो जाएं, लेकिन हमें लगता है कि उन्हें रोड शो में टारगेट करना अच्छी हिकमते अमली (रणनीति) हो सकती है।“