दलितों की ताकत के सामने झुके मोदी

दलितों की ताकत के सामने झुके मोदी

हिसाम सिद्दीकी
नई दिल्ली! 1989 में उस वक्त के वजीर-ए-आजम राजीव गांधी के जरिए बनाए गए एससी/एसटी मजालिम रोकथाम एक्ट को हल्का करने से मुताल्लिक एक पीआईएल पर फैसला देने से पहले जब सुप्रीम कोर्ट ने नरेन्द्र मोदी सरकार से जवाब मांगा तो मोदी हुकूमत ने साफ कह दिया कि वह पीआईएल के खिलाफ नहीं है। पीआईएल सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट में शामिल कई सख्त प्रोवीजन हटाने का फैसला बीस मार्च 2018 को कर दिया था। यह फैसला सुनाने वाले सुप्रीम कोर्ट के जज आदर्श कुमार गोयल के रिटायर होने के अगले ही दिन मोदी हुकूमत ने उन्हें नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) का चेयरमैन बना दिया। सरकार के इस फैसले से मोदी सरकार शक के दायरे में आ गई है और देश के दलितों में जबरदस्त नाराजगी पैदा हो गई। हालांकि दलित समाज की जानिब से बीस मार्च को यह फैसला आने के बाद से ही बेचैनी का इजहार किया जा रहा था। तमाम दलित तंजीमों (संगठनों) ने मोदी हुकूमत से इस फैसले के खिलाफ एक्ट या आर्डीनेस लाने का मतालबा किया लेकिन सरकार ने दलितों की बात नहीं सुनी।
मोदी सरकार ने चार महीने तक दलित तंजीमों (संगठनों) के मतालबे पर गौर नहीं किया तो दलितों ने नौ अगस्त को भारत बंद का एलान कर दिया। इसी बीच लोक जनशक्ति पार्टी के लीडर राम विलास पासवान के लोक सभा मेम्बर बेटे चिराग पासवान ने मतालबा कर दिया कि जस्टिस ए के गोयल को एनजीटी के चेयरमैन के ओहदे से हटाया जाए। बीजेपी के भी दलित मेम्बरान पार्लियामेंट लामबंद होने लगे तो नरेन्द्र मोदी और उनकी हुकूमत ने दलित ताकत के खिलाफ घुटने टेकना ही मुनासिब समझा। आनन-फानन में पहली अगस्त को कैबिनेट में फैसला हो गया कि दस अगस्त तक चलने वाले पार्लियामेट के इसी एजलास में संविधान में तरमीम का बिल लाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को रद्द किया जाएगा। खबर लिखे जाने तक पार्लियामेट में बिल नहीं आया था । याद रहे कि गुजिश्ता दो अप्रैल को बगैर किसी कयादत (नेतृत्व) के देश में दलितों ने एक दिन के बंद का एलान किया था तो बीजेपी की तमाम सरकारें परेशानी में आ गई थी।
दलितों और आदिवासियों में 20 मार्च के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बेचैनी बढ गई थी क्योकि जस्टिस यू यू ललित और जस्टिस ए के गोयल की दो रूक्नी बेच ने पीआईएल पर सुनवाई करते हुए अपने फैसले में यह भी कहा था कि एससी/एसटी एक्ट का इस्तेमाल सरकारी मुलाजमीन और मुल्क के शहरियों को ब्लैक मेल करने का औजार बन गया है। मरकजी सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद कोई रद्देअमल नहीं आया जब दलित मेम्बरान पार्लियामेट और दलित तंजीमों ने इस मसले पर सरकार पर दबाव बनाया और यह दबाव इस तरह से बनाया था कि दलितों ने दो अप्रैल को भारत बंद का नारा दिया जो पूरी तरह से कामयाब रहा तब जाकर अगले ही दिन फैसला आने के पन्द्रह दिन बाद तीन अप्रैल को मोदी सरकार ने रिवीव पटीशन दायर की और उसी बेंच ने रिवीव पटीशन की सुनवाई करते हुए कहा कि बीस मार्च का फैसला बेकुसूर लोगों को मनमानी गिरफ्तारी से तहफ्फुज देता है। दलितों की बेइज्जती नहीं करता है। तीन मई को सुप्रीम कोर्ट ने वजाहत की पुलिस को गिरफ्तारी से पहले यह जांच कर लेना चाहिए कि दलित मजालिम के सिलसिले में की गई शिकायत बेहूदा और झूटी तो नहीं है। मरकजी सरकार के रिवीव पटीशन पर दलितों को कोई राहत नहीं मिल पाई। फिर छः जुलाई को अपने रिटायरमेट के मौके पर उन्होने अपने फैसले को हक बजानिब बताया था इसके बावजूद सरकार ने उन्हें अगले दिन एनजीटी का चेयरमैन बना दिया तब दलित लीडरों और दलित तंजीमों की समझ में आया कि मेदी सरकार दलितों के तयीं कैसी सोच रखती है। उसी के बाद दलितों की नाराजगी मंजरेआम पर आने लगी खुसूसन एनडीए पार्टियों के दलित लीडरो और खुद बीजेपी के लीडरों में और 9अगस्त के दलितों के भारत बंद के एलान के बाद जिसमें राम विलास पासवान की पार्टी ने शामिल होने का एलान कर दिया था। दलितों के गुस्से पर काबू पाने के लिए एक अगस्त को कैबिनेट ने एससी/ एसटी एक्ट के तरमीमी बिल को मंजूरी दे दी।
दलित मजालिम रोकथाम एक्ट को अपनी अस्ल रूह में वापस लाना दरअस्ल एक सियासी मजबूरी है लेकिन फिर भी मोदी सरकार ने एससी/ एसटी एक्ट पर कोई फौरी कार्रवाई करने से परहेज किया मगर जब उसे यह लगा कि राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी, रामदास अठावले की रिपब्लिकन पार्टी तो इस मसले पर सरकार से नाराज है यहां तक कि बीजेपी के दलित लीडरान भी अपनी नाराजगी दर्ज करा रहे हैं तो उसने एक्ट को अपनी असल रूह में बहाल करने के लिए आईनी तरमीमी बिल लाने का फैसला लिया। इसकी एक वजह यह भी थी कि इस साल के आखिर में तीन रियासतों राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ मे असम्बली एलक्शन और अगले साल लोक सभा एलक्शन में दलितों की नाराजगी सियासी तौर पर खसारे का सौदा होगा क्योकि दलितों को असम्बलियों और पार्लियामेट मे नुमाइंदगी के लिए रिजर्वेशन हासिल है। हिन्दुस्तान मे दलितों की आबादी 25 फीसद के करीब है। इनमें एससी करीब 17 करोड़ और एसटी साढे आठ करोड के करीब है। मुल्क के 148 जिलों में दलित करीब 50 फीसद है तो 271 जिलों में बीस फीसद के करीब। असम्बली और लोक सभा की रिजर्व सीटों के एतबार से देखे तो 543 में 84 सीटें एससी और 47 एसटी की सीटें है। जबकि मुल्क में असम्बलियों में 607 एससी और 554 एसटी सीटें रिजर्व है। कोई भी पार्टी एससी और एसटी की नाराजगी की मुतहम्मिल नहीं हो सकती।
कैबिनेट का फैसला आने के बाद सबसे ज्यादा खुश लोक जनशक्ति पार्टी के लीडर दिखे कल तक जो नाराज नजर आ रहे थे और 9 अगस्त को हडताल में शरीक होने वाले थे मोदी के कसीदे गाने लगे और यहां तक कह दिया कि जो लोग मोदी को दलित मुखालिफ बता रहे थे कैबिनेट का फैसला उनके मुंह पर तमांचा है।