पाकिस्तान में इमरान खान

पाकिस्तान में इमरान खान

बाइस साल की जद्दोजेहद के बाद आखिर मशहूर क्रिकेटर इमरान खान कट्टरपंथियों के चंगुल में जकड़े इस्लामी जम्हूरिया पाकिस्तान की सत्ता तक पहुच ही गए। इल्जामात के मुताबिक भले ही उन्हें यह सियासी सफर तय करने में फौज और पाकिस्तान की खतरनाक खुफिया एजेसी आईएसआई का भरपूर तआवुन (सहयोग) हासिल रहा हो उनका इस ओहदे तक पहुचना पाकिस्तान जैसे मुल्क में एक बड़ा इंकलाबी वाक्या है। आर्मी की चाहे जितनी हिमायत और मदद रही हो अवामी हिमायत के बगैर यह मुमकिन नहीं था। अगर आर्मी किसी को भी मैदान में उतार कर इस तरह जितवाने की हैसियत में होती तो इमरान खान ही क्यों किसी को भी मैदान में उतार कर जितवा देती। अगर आर्मी और आईएसआई इतनी ही अहल होती कि इमरान क्या किसी को भी मैदान में उतार कर जितवा सकती तो दसियों साल से हिन्दुस्तान में दहशतगर्द भेजने के लिए आईएसआई ने इंसान की शक्ल में शैतान सिफत जिस हाफिज सईद को इस्तेमाल किया और आज भी कर रही है उसकी पार्टी के उम्मीदवारों को जरूर जितवा देती। हाफिज सईद ने रातों-रात अल्लाह ओ अकबर नाम की पार्टी बनाकर पूरे पाकिस्तान में 265 उम्मीदवार उतारे थे उनमें से एक भी जीत नहीं पाया। वह पंजाबी हैं, पंजाबियों के जज्बात भड़काने के लिए वह दिन-रात कश्मीर के बहाने तो कभी इस्लाम का नाम लेकर जहरीली तकरीरें करता रहता है। इसके बावजूद पंजाब में वह अपने बेटे हाफिज तलहा और दामाद खालिद वलीद को भी जितवा नहीं पाया। हाफिज सईद की तरह के ही एक और हिन्दुस्तान मुखालिफ कट्टरपंथी जमाते इस्लामी पाकिस्तान के सदर सिराज उल हक तो खुद ही मैदान में उतरे थे उन्हें भी शर्मनाक शिकस्त का सामना करना पड़ा। इतना ही नहीं पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी, मुस्लिम लीग (एन) और खुद इमरान खान की तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी समेत जितनी भी पार्टियां मैदान में थी सभी ने अपने इंतखाबी मंशूर (मेनिफेस्टो) में लिखा था कि अगर उनकी पार्टी जीत कर सत्ता में आती है तो सरकार हिन्दुस्तान के साथ पुरअम्न और बेहतर ताल्लुकात कायम करने की कोशिश करेगी। मेनिफेस्टो में ऐसा क्यों लिखा गया सिर्फ और सिर्फ इसलिए पाकिस्तान के आम लोग हिन्दुस्तान के साथ नफरत भरे कशीदा (तनावपूर्ण) ताल्लुकात के बजाए दोस्ताना ताल्लुकात चाहते हैं। क्या हमारे मुल्क में कोई सियासी पार्टी अपने इंतखाबी मंशूर में यह लिखने की हिम्मत कर सकती है कि अगर हम जीत कर सत्ता में आए तो पाकिस्तान के साथ दोस्ताना ताल्लुकात कायम करेंगे। यहां तो एलक्शन के दौरान पाकिस्तान मुखालिफ नारों का मुकाबला होता है। लफ्फाजी और झूट के सहारे एलक्शन जीतने वाले नरेन्द्र मोदी तो एलक्शन मुहिम के दौरान बार-बार पाकिस्तान को सबक सिखाने की नारेबाजी की करते रहे थे। यह दीगर बात है कि चार साल की सरकार में पाकिस्तान को उसी की जबान (भाषा) में जवाब देने के बजाए पाकिस्तान को मिला ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ का दर्जा तक खत्म नहीं करा पाए।
इन बातों का जिक्र यहां करना हमने इसलिए जरूरी समझा कि बदकिस्मती से हमारे सियासतदां या टीवी चैनलों में बैठे एंकर्स आज तक यह तस्लीम नहीं कर पा रहे हैं कि पाकिस्तानी अवाम भारत के साथ टकराव नहीं चाहते। दुनिया की सियासत, पड़ोसियों के साथ पेश आने के तौर-तरीकों और पड़ोसी मुल्कों की दुश्मनी की दुनिया की तारीख (इतिहास) से नावाकिफ जाहिल किस्म के कई एकर्स तो इस गलतफहमी में रहते हैं कि वह एयर कंडीशन्ड टीवी स्टूडियोज में बैठे-बैठे चीख-पुकार करके ही पाकिस्तान फतह कर लेंगे। इमरान खान की पार्टी को अक्सरियत नहीं मिली थी पूरे नतायज भी नहीं आए थे वजीर-ए-आजम का हलफ लेना तो दूर अभी इमरान खान को हुकूमत साजी के लिए दावतनामा भी नहीं मिला था कि हमारे मुल्क के चन्द को छोड़कर तकरीबन तमाम टीवी चैनलों ने चीख-चीख कर कहना शुरू कर दिया था कि आईएसआई और आर्मी की मदद से जीतने वाले इमरान खान भारत के साथ दोस्ती के ताल्लुकात कैसे कायम कर सकेगें? अपनी पहली ही प्रेस कांफ्रेंस में इमरान खान ने कहा था कि हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के दरम्यान टकराव का कोर इश्यू (अस्ल मसला) कश्मीर ही है लेकिन बातचीत के जरिए कोई भी मसला हल किया जा सकता है। हमारे मुल्क के फर्जी राष्ट्रभक्त टीवी एंकर्स ने चीखना शुरू कर दिया कि इमरान ने कश्मीर राग छेड़ा है। अब इन बेवकूफों से कौन पूछे कि तुम्ही बता दो दोनों मुल्कों के दरम्यान टकराव का बुनियादी मसला अगर कश्मीर नहीं तो और क्या है? हिन्दुस्तान हो या पाकिस्तान दोनों मुल्कों का कौन हुक्मरां आज इस हकीकत पर पर्दा डालने की हिम्मत कर सकता है कि इन दोनों मुल्कां के दरम्यान टकराव का अस्ल मसला कश्मीर नहीं है। दोनां मुल्कों के किस वजीर-ए-आजम की हिम्मत है जो यह कह सके कि हम कश्मीर पर अपना दावा छोड़ देंगे। पाकिस्तानी टीवी चैनलों में भी इस किस्म के एंकर्स की भरमार है जो समझते हैं कि वह स्टूडियो में बैठ कर चीख-चीख कर पूरे कश्मीर पर कब्जा कर लेगे और अगर जंग हुई तो चुटकी बजाते हिन्दुस्तान को शिकस्त दे देगे। अब तो ऐसा लगता है कि दोनों मुल्कों के दरम्यान टकराव में कश्मीर से कहीं ज्यादा बड़ी वजह दोनां मुल्कों का गैर जिम्मेदार मीडिया भी है।
इमरान खान के बयान पर भारत सरकार की जानिब से कोई रद्देअमल (प्रतिक्रिया) नहीं आया था मरकजी वजीर राजवर्धन सिंह राठौर ने भी सिर्फ इतना कहा था कि अभी तो पाकिस्तान नेशनल असम्बली के पूरे नतायज भी नहीं आए हैं अभी हम क्या कह सकते हैं। मुल्क के मुमताज (लोकप्रिय) क्रिकेटर कप्तान रहे कपिल देव ने भी कहा था कि इमरान खान के बडी तादाद में हिन्दुस्तानियों के साथ जाती ताल्लुकात है। वह शायद पाकिस्तान के अकेले सियासतदां हैं जिन्होने क्रिकेट से रिटायरमेंट के बाद भारत के सबसे ज्यादा दौरे किए हैं। हमें उनसे उम्मीद रखनी चाहिए। इसके बावजूद बेवकूफ और अनपढ किस्म के टीवी एंकर्स यही गाते रहे कि इमरान ने कश्मीर राग क्यों छेड़ा, वह तो आईएसआई और आर्मी की कठपुतली ही हैं। मीडिया की गैर जिम्मेदारी का रवैया सिर्फ पाकिस्तान के मामले में नहीं है चीन के खिलाफ भी कुछ एंकर्स ने इतनी घटिया बाते कही हैं कि गुजिश्ता दिनों चीन बाकायदा भारत सरकार से कह चुका है कि आप अपने मीडिया को काबू में रखिए मुल्क के अंदर कशीदगी फैलाने का काम तो यह लोग करते ही रहते है। टीवी एंकर्स इतने बेवकूफ हैं कि वह यह समझते हैं कि जिस तरह वह बगैर सर-पैर के रोजाना हिन्दू मुस्लिम बहस कराते रहते है उसी तरह भारत-पाकिस्तान या भारत-चीन ताल्लुकात पर भी बहस करानी चाहिए।
हम समझते हैं कि इमरान खान ने दोनों मुल्कों के दरम्यान तिजारत में इजाफा करके ताल्लुकात ठीक करने और बातचीत की मेज पर बैठ कर कश्मीर मसला हल करने की बात कही है। उन्हें कम से छः महीनों का वक्त तो दिया ही जाना चाहिए। छः महीनों में ही तस्वीर पूरी तरह साफ हो जाएगी कि वह आर्मी और आईएसआई की कठपुतली की तरह काम करेंगे या खुद की रीढ में दम होना साबित करेगे। सीधी सी बात है कि अगर हम पाकिस्तान को सबक सिखाने के नरेन्द्र मोदी के वादे को पूरा होता देखने में चार साल का वक्त गुजार सकते हैं तो पहली बार सत्ता में आने वाले इमरान खान को छः महीने या एक साल का वक्त क्यों नहीं दे सकते। बर्लिन की दीवार तोड़ कर दोनों जर्मनी के एक होने का वाक्या तो कई साल पुराना हो चुका है। नार्थ और साउथ कोरिया-नार्थ कोरिया और अमरीका के दरम्यान बातचीत शुरू होने का सिलसिला तो चन्द रोज का ही है अगर नार्थ कोरिया और साउथ कोरिया, नार्थ कोरिया और अमरीका बातचीत करके आपसी टकराव खत्म कर सकते हैं तो हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के दुश्मनों जैसे हालात बातचीत के जरिए ठीक क्यों नहीं हो सकते?
मुल्क में राष्ट्रभक्ति और वतन परस्ती के ढोगियों की तादाद इतनी ज्यादा हो चुकी है कि अब पाकिस्तान के साथ किसी भी किस्म की बातचीत कोई करने लगे तो यह ढोगी फौरन शोर मचाना शुरू कर देते हैं वर्ना दोनों के दरम्यान कश्मीर मसले का वाहिद (एकमात्र) हल वही है जिसपर पंडित अटल बिहारी वाजपेयी ने मजबूती के साथ कदम बढाया था। डाक्टर फारूक अब्दुल्लाह, लाल कृष्ण आडवानी यशवंत सिंन्हा और उधर नवाज शरीफ को अच्छी तरह याद होगा कि वाजपेयी दोनां मुल्कां के दरम्यान लाइन आफ कण्ट्रोल को बार्डर तस्लीम करने पर काफी आगे बढ चुके थे मतलब यह कि दोनां मुल्कों के दरम्यान झगड़ा खत्म करने का एक ही रास्ता है कि कश्मीर का जो हिस्सा जिस मुल्क में है वही रहे उसी के हिसाब से इण्टरनेशनल बार्डर तय हो जाए मुल्क के मकबूल (लोकप्रिय) अदाकार ऋषिकपूर तक ने गुजिश्ता दिनों यही बात नेशनल प्रेस क्लब दिल्ली में कही है। हकीकत भी यही है कि जब कभी भी दोनों मुल्कों के दरम्यान कोई समझौता होगा इसी बुनियाद पर होगा। वर्ना जंग दहशतगर्दी और तबाही के सिवा दोनों को कुछ मिलने वाला नहीं है। क्या इमरान खान और नरेन्द्र मोदी भी यह फार्मूला तस्लीम कर सकेगें?