लिंचिंग के वाक्यात पर सरकारों की बेशर्मी

लिंचिंग के वाक्यात पर सरकारों की बेशर्मी

छः सितम्बर 2017 से अब तक मुल्क की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने तीन बार और वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी ने एक बार सख्ती से कहा कि सड़कों पर गाय के बहाने मुसलमानों को और बच्चा चोरी की अफवाहों पर हिन्दू, मुसलमानों दोनों को पीट-पीट कर मार डालने की घिनौनी हरकतें बंद होनी चाहिए। खुद नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि गाय के नाम पर किसी की जान लेने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती। इन बयानात और सख्त हिदायात के बावजूद प्रदेश सरकारों की बेशर्मी, मुजरिमाना लापरवाई बल्कि मिली भगत का नतीजा है कि लिंचिंग के वाक्यात पर काबू नहीं पाया जा सका है। अब तो इंतेहा हो गई जब मोदी सरकार के खिलाफ बीस जुलाई को लोक सभा में अदम एतमाद की तहरीक (अविश्वास प्रस्ताव) की बहस में हिस्सा लेते हुए राजनाथ सिंह जैसे संजीदा और जिम्मेदार होम मिनिस्टर राजनाथ सिंह ने लिंचिंग के वाक्यात पर अफसोस जाहिर करने के बजाए लिंचिंग के वाक्यात को एक तरह से जस्टीफाई करते हुए कह दिया कि लिंचिंग के सबसे बड़े वाक्यात तो 1984 में हुए थे। जब हजारों सिखों को पीट-पीट कर मार डाला गया था। उन्होंने राजीव गांधी का नाम लिए बगैर उनके उस जुमले को भी दोहराया जिसमें राजीव गांधी ने उस वक्त कह दिया था कि जब कोई बड़ा दरख्त गिरता है तो धरती हिलती है। राजनाथ सिंह यह साबित कर रहे थे कि राजीव गांधी के इसी बयान की वजह से सिखों का बडे़ पैमाने पर कत्लेआम हुआ था। राजनाथ सिंह ने कभी भी इतनी गैर जिम्मेदारी की बात नहीं की। उनके इस जवाब को सुनकर लगा कि शायद किसी मजबूरी में वह नरेन्द्र मोदी के जेहन की अक्कासी करते हुए मोदी की जुबान बोल गए। राजनाथ सिंह के इस जवाब का असर यह हुआ कि उनके जवाब के चार घंटों के अंदर ही राजस्थान के अलवर में गाय के बहाने दहशतगर्दी करने वालों ने राजस्थान पुलिस और सरकार की मिलीभगत से चालीस साल के अकबर नाम के एक शख्स को पीट-पीट कर मार डाला। अकबर हरियाणा का रहने वाला था वह गाय-भैंसें पाल कर दूध का कारोबार करता था। खुद राजस्थान के सीनियर पुलिस अफसरान ने तस्लीम किया कि अकबर की लिंचिंग मामले में अलवर पुलिस की लापरवाई शामिल थी। अगर पुलिस ने जिम्मेदारी निभाई होती तो अकबर की जान बच सकती थी।
राजनाथ सिंह की इस बात से किसी को इंकार नहीं है कि बड़े पैमाने पर सिखों की लिंचिंग हुई थी तो क्या राजनाथ सिंह यह कहना चाहते हैं कि चूंकि 1984 में मुल्क में सिखों की लिंचिंग की गई थी इस लिए उनके आरएसएस कुन्बे को मुसलमानों की लिंचिंग का लाइसेंस मिल गया है। सिखों को सड़कों पर मारे जाने के मुल्क भर में जितने भी वाक्यात पेश आए थे किसी एक में भी कोई मुसलमान शामिल नहीं था। पुलिस रिपोर्ट हो, इनक्वायरी कमीशनों की रिपोर्टें हों या फिर दीगर सरकारी रिकार्ड किसी में भी किसी एक मुसलमान पर यह इल्जाम नहीं लगा कि उसने किसी सिख पर हाथ भी उठाया हो। चौतींस बरस गुजर गए आज तक किसी सिख ने भी यह नहीं कहा कि उनकी बिरादरी का कत्लेआम करने उनके घरों और दुकानों को लूटने में किसी मुसलमान का हाथ था। इसके बावजूद 2002 में नरेन्द्र मोदी के गुजरात में हजारों लोगों के कत्लेआम का सवाल उठता है तो फौरन ही बीजेपी और आरएसएस कुन्बे के लोग गला फाड़-फाड़ कर कहने लगते हैं कि 1984 में हुए सिखों के कत्लेआम की बात क्यों नहीं करते। यह कौन सी दलील है? यह तो वैसी ही बात है कि फलां शख्स चोरी करता है इसलिए मैं भी चोरी करूंगा। अच्छा बहाना है पहले आपके कुछ कट्टर पंथी हिन्दुओं ने ही सिखों को मारा अब उन सिखों के बहाने मुसलमानों को मारने लगे इन तमाम मौकों पर अब आप खुद ही वजह बनते हैं फिर उन वजहों के बहाने दूसरों को कत्ल करने लगते हैं।
अब राजनाथ सिंह जैसे जिम्मेदार वजीर ने यह मसला छेड़ा है और राजनाथ सिंह बीजेपी के कोई गैर जिम्मेदार सड़क छाप गुण्डे या गाय के नाम पर दहशतगर्दी करने वालों में शामिल नहीं हैं। उन्हें भी बहुत अच्छी तरह मालूम है कि इंदिरा गांधी के कत्ल पर सबसे ज्यादा गुस्सा आरएसएस ने ही दिखाया था। सिखों को मारने में आरएसएस का पूरे का पूरा काडर कांग्रेस वर्कर्स के साथ सड़कों पर था क्योंकि उस वक्त आरएसएस मुल्क में आज की ही तरह अकलियतों को पूरी तरह कुचलने के मकसद से काम कर रहा था। इंदिरा गांधी के कत्ल के बाद आरएसएस ने सिर्फ सिखों को मारने में ही मसरूफ रहने का काम नहीं किया था उसके बाद हुए लोक सभा एलक्शन में आरएसएस का एक-एक वोट राजीव गांधी की कांग्रेस को ही मिला था। इस हद तक कि बीजेपी के सबसे बडे़ लीडर अटल बिहारी वाजपेयी को उनके बेटे जैसे कहे जाने वाले माधव राव सिंधिया के हाथों धूल चटवा दी थी। लोक सभा में राजीव गांधी की पार्टी के चार सौ चौदह मेम्बरान जीत कर आए थे। बीजेपी सिर्फ दो सीटां पर सिमट गई थी। क्या आरएसएस की मुकम्मल हिमायत के बगैर लोक सभा एलक्शन के ऐसे नतीजे मुमकिन थे? इसलिए राजनाथ सिंह हों या आरएसएस से मुताल्लिक कोई दूसरा मुसलमानों की लिंचिंग को सिखों के कत्लेआम और सिखों की लाशों के नीचे मुसलमानों की लाशें और खून छिपाने का काम न करे, अपनी जिम्मेदारियों से फरार (पलायन) हासिल करने की कोशिश न करे तो ही बेहतर है वर्ना इसे बेशर्मी और बेहिसी ही कहा जाएगा।
मुल्क के उन प्रदेशों में ज्यादा लिंचिंग की हरकतें ज्यादा हो रही हैं जहां-जहां भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं और आरएसएस का कोई न कोई पुराना स्वयं सेवक चीफ मिनिस्टर है। झारखण्ड, राजस्थान और हरियाणा इनमें सबसे आगे हैं। झारखण्ड में गुजिश्ता चंद महीनों में ही जिन तेरह लोगों को लिंचिंग में मार डाला है उन तेरह में दस मुसलमान थे। इसका क्या मतलब है? होम मिनिस्टर राजनाथ सिंह एक दिन पहले लोक सभा में कहते हैं कि यह नज्म व नस्क (कानून व्यवस्था) का मामला है। जिसकी जिम्मेदारी रियासती सरकारों पर है। अगले दिन कहते हैं कि लिंचिंग सबसे ज्यादा 1984 में हुई थी। जाहिर है कि वह सिखों के कत्लेआम की बात कर रहे थे। लगता है कि राजनाथ सिंह को भी होम मिनिस्टर की हैसियत से बोलने की आजादी नहीं है। उन्हें भी अब वही बोलना पड़ता है जो उनके वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी उनसे बोलवाना चाहते हैं। यह सच है कि हमारे मुल्क में नज्म व नस्क (कानून व्यवस्था) ठीक रखने की जिम्मेदारी प्रदेश सरकारों की है लेकिन इसी के साथ क्या हमारे मुल्क के फेडरल सिस्टम में यह बात शामिल नहीं है कि अगर कोई प्रदेश सरकार नज्म व नस्क बरकरार रखने में नाकाम हो जाए तो मरकजी सरकार को दखल देना चाहिए। एक नहीं तीन-तीन बार सुप्रीम कोर्ट ने सख्त हिदायतें दी खुद वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी ने प्रदेश सरकारों से सख्ती से कह दिया कि लिंचिंग रोकी जाए इसके बावजूद जो रियासतें लिंचिंग रोकने में नाकाम रहीं या खुद पर्दे के पीछे से लिंचिंग कराने में शामिल रही हैं उनको अपनी जिम्मेदारी पूरी करने में नाकाम नहीं समझा जाना चाहिए और क्या ऐसी सूरत में मरकजी (केन्द्रीय) सरकार सिर्फ खामोश तमाशाई बनी रहेगी?
लिंचिंग की हरकतों पर वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी के रवैय्ये और भारतीय जनता पार्टी व आरएसएस कुन्बे के दूसरे लोगों के उनमें मुलव्विस होना अब वाजेह (स्पष्ट) इशारे करता है कि यह सब कुछ मोदी की मरकजी और रियासतों में बिठाए गए उनके हाथों की कठपुतली चीफ मिनिस्टर्स की मिली भगत से हो रहा है। ताजा मिसाल झारखण्ड के पाकुड़ में स्वामी अग्निवेश पर बीजेपी युवा मोर्चा का हमला है। अगर मौके पर मीडिया नुमाइंदों की मौजूदगी न होती तो स्वामी अग्निवेश की लिंचिंग भी यकीनी थी। उस वाक्ए पर वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी और झारखण्ड के वजीर-ए-आला रघुवर दास ने अफसोस तक जाहिर नहीं किया। स्वामी अग्निवेश तो आर्या समाजी हैं सनातन धर्म में उनकी मुकम्मल ‘आस्था’ है। वह गौकुशी करने वालों में तो शामिल नहीं हो सकते उनका गुनाह सिर्फ इतना है कि वह मोदी के मुखालिफीन में शामिल हैं। तो क्या मोदी की मुखालिफत करने वालों को इस तरह सड़कों पर पीटा जाएगा? पूरा देश जानता है कि आज बीजेपी में किसी की औकात नहीं है कि वह नरेन्द्र मोदी की ख्वाहिश, हिदायत और मर्जी के मुखालिफ काम कर सके। फिर जब मोदी ने तमाम प्रदेश सरकारों से साफ कहा कि गाय के नाम पर किसी को कत्ल करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। प्रदेश सरकारें बताएं कि इस तरह की हरकतें रोकने के लिए उन्होने क्या कार्रवाई की उसके बावजूद उन्हीं के बनाए हुए चीफ मिनिस्टर्स ने कुछ नहीं किया। ऐसा कैसे मुमकिन है? इससे तो यही लगता है कि पब्लिक में मोदी कुछ कहते हैं और अंदर खाने अपने लोगों की पीठ ठोकते हुए शायद उन्हें शाबाशी ही देते रहते हैं कि ठीक है लिंचिंग जारी रहनी चाहिए। इन मलिच्छ मुसलमानों को इसी तरह सबक सिखाया जाना चाहिए। पार्लियामेट में अपने जवाब में भी वह इस मसले पर एक लफ्ज नहीं बोले इसका क्या मतलब है?
ऐसी सूरते हाल में मुसलमानों और लिंचिंग का शिकार बनने वाले दूसरे कमजोर लोगों को क्या करना चाहिए क्या अपनी जान बचाने के लिए उन्हें भी हथियार उठा लेना चाहिए? जो लोग इस तरह पीट-पीट कर मारे गए हैं क्या उनके भाइयों या बेटों को सरकार यह अख्तियार देगी कि लिंचिंग की वीडियो देखकर वह असल कातिलों की शिनाख्त करें और कानूनी कार्रवाई का इंतजार किए बगैर उंन्हें खुद ही इंतकाम ले लेना चाहिए? मोदी के वजीर जयंत सिन्हा झारखण्ड में अलीमउद्दीन अंसारी की लिंचिंग करने वालों को अपने घर बुलाकर उन्हें शाबाशा देते हैं उन्हें हार पहना कर उनकी हौसला अफजाई करते हैं ओर मोदी खामोश रहते हैं इसका क्या मतलब है। राहुल गांधी ने अपने घर के अंदर क्या कहा और कांग्रेस मुसलमानों की पार्टी है मोदी को यह तो दिख जाता है और वह अवामी रैलियों में इसपर लम्बी-चौड़ी तकरीर भी करते हैं लेकिन उनके वजीर जो घिनौना जुर्म करते हैं वह उन्हें नहीं दिखता। अगर दिखता है तो वह भी उसे जायज ठहराने के लिए खामोशी अख्तियार कर लेते हैं। आखिर मोदी देश और लिंचिंग में मुलव्विस दहशतगर्दों को क्या मैसेज देने की कोशिश कर रहे हैं? क्या लिंचिंग की हरकतों को मरकजी और रियासती सरकारों की बेशर्मी नहीं कहा जाना चाहिए।