नहीं चलेगा फिरकापरस्त भीड़ का कानून-सुप्रीम कोर्ट

नहीं चलेगा फिरकापरस्त भीड़ का कानून-सुप्रीम कोर्ट

हिसाम सिद्दीकी
नई दिल्ली! सुप्रीम कोर्ट ने मोदी की मरकजी सरकार और तमाम रियासती सरकारों को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा है कि किसी भी फिरकापरस्त भीड़ की मर्जी मुल्क में नहीं चलने दी जाएगी। गाय के नाम पर होने वाले लिंचिंग के वाक्यात हर सूरत में रोकने होगें। सरकारों को कई गाइड लाइन्स देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चार हफ्ते के अंदर अदालत की तमाम हिदायात पर अमल करके अदालत में रिपोर्ट पेश की जाए। मुल्क की बदकिस्मती ही कही जाएगी कि 17 जुलाई को जिस वक्त सुप्रीम कोर्ट सरकारों को सख्त हिदायत दे रहा था उसी वक्त झारखण्ड के पाकुड़ में वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी की ‘युवा विंग’ के गुण्डे मशहूर समाजी खिदमतगार स्वामी अग्निवेश को सड़क पर पीट-पीट कर मार डालने की कोशिश कर रहे थे। अगर मौके पर मौजूद लोगों ने उन्हें बचाया न होता तो उनकी मौत यकीनी थी। उन्हें गौकुशी के लिए नहीं इसलिए मारा गया कि वह वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी के अंधे भक्त बनने के बजाए उनकी मुखालिफत क्यों करते हैं।
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस ए एम खानविल्कर और जस्टिस डी वाई चन्द्रचूर्ण की बेंच ने लिंचिंग रोकने के लिए रियासती हुकूमतों को हिदायत दी थी कि हर जिले मे इसके लिए पुलिस कप्तान सतह के अफसर को नोडल अफसर बनाया जाए उसकी मदद के लिए एक डिप्टी पुलिस कप्तान हो जिसकी कयादत में एक स्पेशल टास्क फोर्स बनाई जाए। पिछले पांच सालों मे जिन-जिन जिलों में इस किस्म के वाक्यात पेश आए उनकी दुबारा जांच की जाए और यह देखा जाए कि उन मामलात में क्या कार्रवाई हुई। सोशल मीडिया के जरिए भड़काऊ मैसेज फैलाने वाले लोगों के खिलाफ न सिर्फ फौरन सख्त कार्रवाई की जाए बल्कि उन्हें गिरफ्तार किया जाए। अगर लिंचिंग का कोई वाक्या पेश आ जाए तो स्पेशल ट्रायल अदालतों में छः महीने के अंदर मामले की सुनवाई मुकम्मल की जाए और ट्रायल अदालतें ऐसे मामलात में ज्यादा से ज्यादा सजा दें और लिंचिंग का शिकार हुए लोगों के घर वालों को तीन दिन के अंदर सरकारें माली मदद करें। अदालत ने कहा इनके अलावा मरकजी और रियासती सरकारें रेडियो, टीवी, सोशल मीडिया समेत तमाम जराए अबलाग (संचार माध्यमों) के जरिए आम लोगों तक यह खबर पहुचाए कि लिंचिंग करने वालों और उसमें शामिल लोगों को सख्त से सख्त नतायज भुगतने होगे। गौरक्षा के नाम पर लिंंचंग संगीन क्राइम है। यह बात प्रदेश सरकार को सभी को बताना चाहिए।
अदालत ने महात्मा गांधी के पोते तुषार गांधी और कांग्रेस लीडर तहसीन पूनावाला की पीआईएल पर सुनवाई करते हुए मॉब लिंचिंग रोकने के लिए गाइड लाइन्स जारी की। अदालत ने सीधे तौर पर यह तो नहीं कहा कि गाय के बहाने होने वाली लिंचिंग के लिए मरकज की नरेन्द्र मोदी और बीजेपी हुकूमत वाली रियासतें ही जिम्मेदार हैं मगर जो कहा वह इनडायरेक्ट तौर से यही बताता है कि लिंचिंग को रोकने के लिए बीजेपी की प्रदेश सरकारें संजीदा नहीं हैं बल्कि वह ऐसे लोगों के तहफ्फुज कर रही हैं। अदालत ने कहा कि कानून के राज में किसी जुर्म के लिए सड़क पर जांच और सुनवाई नहीं हो सकती न ही सजा दी जा सकती है। अदालत ने कहा कि लगता है कि मुल्क में रवादारी (सहिष्णुता) की कद्र ओ कीमत कम होती जा रही है। तभी लोग सोशल मीडिया पर फैली झूटी खबरों के जरिए भड़क जाते हैं। बढती हुई अदम रवादारी (असहिष्णुता) और पोलराइजेशन की वजह से मॉब लिंचिंग के वाक्यात बढते जा रहे हैं। उन्होने कहा कि इसे जिंदगी का हिस्सा नहीं बनने दिया जा सकता। अगर इसे रोका नहीं गया तो वह हरकतें शैतानी शक्ल अख्तियार कर लेंगी। अदालत ने कहा कि प्रदेश में नज्म व नस्क (कानून व्यवस्था) बनाए रखना और भीड़ के जरिए हिंसा को रोकना और अवाम की हिफाजत करना रियासतों की जिम्मेदारी है। सुप्रीम कोर्ट ने पार्लियामेंट से अपील की है कि वह मॉब लिंचिंग के लिए अलग से कानून बनाने पर गौर करे। अदालत ने बड़े साफ लफ्जों में कहा कि कोई शख्स खुद में काननू नहीं है और कानून को हाथ में लेने का हक किसी को नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने रियासती सरकारों से सख्ती से कहा कि वह संविधान के मुताबिक काम करें। रियासती सरकारें मॉब लिंचिंग के बढते वाक्यात पर बहरी नहीं हो सकती।
अपने पैतालीस (45) पेज के फैसले में अदालत ने कहा कि रियासतों के होम डिपार्टमेट के सेक्रेटरी मुताल्लिका जिलों के नोडल अफसरान के लिए हिदायतें जारी करके यह यकीनी बनाए कि निशानजद किए गए इलाकां के थानों के इंचार्ज मॉब लिंचिंग की खबर मिलने पर ज्यादा मुस्तैदी बरतें। नोडल अफसर को सभी थाना इंचार्जों के साथ महीने में कम से कम एक बार जिले की मकामी खुफिया यूनिट के साथ मीटिंग करना चाहिए। अदालत ने कहा कि गौरक्षा के नाम पर किसी को पीट रही भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस सीआरपीसी की दफा 129 में दिए गए अख्तियारात का इस्तेमाल करे। अदालत ने कहा कि अगर कोई पुलिस अफसर या जिला एडमिनिस्ट्रेशन का अफसर इन हिदायात पर अमल करने में नाकाम रहता या जानबूझ कर लापरवाई बरतता है तो उसके खिलाफ भी मुनासिब कार्रवाई की जाएगी।
अदालत ने मॉब लिंचिंग रोकने के लिए प्रदेश सकारों और पुलिस पर ज्यादा जिम्मेदारी इसीलिए डाली है कि कानून का राज कायम करना उनका फर्ज होता है। इसके बावजूद यह लोग मॉब लिंचिंग के मामले में लापरवाई बरतते और मुल्जिमान को बचाने की कोशिश करते हैं। राजस्थान के अलवर में पहलू खान को पीट-पीट कर मार डाला गया नतीजा यह कि पहलू खान अपने पीटने वाले गुण्डों के नाम बताते-बताते मर गया मगर पुलिस ने पहलू खान और उसके बेटे के खिलाफ ही गायों की स्मगलिंग का मुकदमा दर्ज कर लिया। इसी तरह पिछले दिनों हापुड़ के पिलखुवा के कासिम नाम के शख्स को गांव वालें ने गौकुशी करने के लिए जानवर ले जाने का झूटा इल्जाम लगाकर जानवरों की तरह पीटा। इस दौरान पुलिस भी मौजूद रही मगर कातिलों को बचाने के लिए, कासिम को बचाने के लिए नहीं थी। अब सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन्स के बाद उम्मीद बंधी है कि शायद गौगुण्डों को बचाने वालों सियासतदानां और पुलिस वालों के खिलाफ कार्रवाई हो सके। अगर ऐसा होगा तो फिर मॉब लिंचिंग के वाक्यात पुलिस वाले अपनी वर्दी बचाने के लिए रोकने पर मजबूर होंगे।
सुनवाई के दौरान एडिशनल सालिसिटर जनरल पीएस नरसिम्हा ने कहा था कि मरकजी सरकार इस मामले में मुस्तैद और बेदार है, लेकिन अस्ल मसअला नज्म व नस्क (कानून व्यवस्था) की है। नज्म व नस्क पर कंट्रोल रखना रियासतों की जिम्मेदारी है। मरकज इसमें तब तक दखल नहीं दे सकता जब तक कि प्रदेश खुद अपील न करे। सुनवाई के दौरान एक और पटीशनर की तरफ से वकील इंदिरा जय सिंह ने दलील दी कि माब लिंचिंग (भीड़ के जरिए हिंसा) के मुतास्सिरीन को मुआवजे के लिए मजहब व जात वगैरह को ध्यान में रखा जाए। इसके लिए आर्टिकल-15 का भी हवाला दिया गया। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विक्टिम (पीड़ित) सिर्फ विक्टिम होता है और उसे अलग कैटेगरी में नहीं रखा जाना चाहिए।
पिछले साल 21 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने गौरक्षा के नाम पर हिंसा के वाक्यात को अंजाम देने के मामले में मरकज और रियासती सरकारों से कहा था कि वह किसी ऐसे गौरक्षकों को तहफ्फुज न दें। मरकजी सरकार और रियासती सरकारों से सुप्रीम कोर्ट ने गौरक्षा के नाम पर होने वाली हिंसा को लेकर जवाब दाखिल करने को कहा था।
सुप्रीम कोर्ट ने गौरक्षा करने वालों पर बैन की मांग करने वाली पटीशन पर सुनवाई के दौरान छः प्रदेशों को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने को कहा था। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में यूपी, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, झारखंड व कर्नाटक को नोटिस जारी किया था।
अदालत ने गौरक्षा के नाम पर हिंसक सामान हटाने को लेकर मरकज और प्रदेश सरकार को तआवुन करने के लिए कहा था। सुप्रीम कोर्ट ने मरकज और प्रदेशों से गौरक्षा के नाम पर हिंसा के वाक्यात के मामले में रिपोर्ट पेश करने को कहा था।
सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल 6 सितंबर फिर इस साल तीन जुलाई को प्रदेशों से कहा था कि वह हिंसा की रोकथाम के लिए सख्त कदम उठाएं। सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल कर कहा गया था कि अदालत के आर्डर पर प्रदेश सरकार अमल नहीं कर रही है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने यूपी, राजस्थान और हरियाणा सरकार के खिलाफ दाखिल कटेम्प्ट पटीशन पर जवाब दाखिल करने को कहा था। अब देखना यह है कि अदालत की गाइड लाइन्स पर प्रदेश सरकारें कितना अमल करती हैं और बीजेपी सरकारों में हो रही लिंचिंग को रोकने और गौगुण्डों को कहां तक रोकने में प्रदेश सरकारें कामयाब होती हैं।