एनपीए के बहाने दोहरा बैंक घोटाला

एनपीए के बहाने दोहरा बैंक घोटाला

नुमाइंदा खुसूसी

मुम्बई! बैकों में एनपीए के बहाने हजारों करोड रूपए बट्टे खाते में डालने का सिलसिला तो एक अर्से से चल रहा है और सरकारें बैकों को दीवालिया होने से बचाने के लिए अक्सर हजारों करोड के पैकेज का एलान करती रहती हैं। इसी सिलसिले में पिछले साल मोदी सरकार ने करीब दो लाख करोड रूपए बैंकों की हालत सुधारने के लिए दिए थे। लेकिन दूसरी तरफ नीरव मोदी, मेहुल चौकसी जैसे लुटेरे बैंकों को हजारों करोड का चूना लगाकर निकल जाते हैं और उनका बाल भी बीका नहीं होता इससे यह तास्सुर जाता है कि  बैक जालसाजों के शिकार बने लेकिन बैकां के बढते एनपीए और उनकी माफी के जो खुलासे हो रहे हैं वह इस तरफ इशारा कर रहे हैं कि बैकां में एक घपला तो एनपीए के जरिए हो रहा है और बगैर सोचे समझे किसी को भी करोडों रूपए के कर्ज दे देते हैं या फिर वह दबाव में आकर ऐसा करने को मजबूर होते हैं या फिर पूरे खेल में वह बराबर के हिस्सेदार हैं और दूसरा एनपीए को माफ करने का, फिर कर्जदार से जो वसूल हो जाए उसे बैंक के मुनाफे मे शामिल करने का खेल बडी सफाई से खेला जा रहा है। मोदी और उनकी सरकार का हर कारिंदा बडे़ फख्र से कहता है कि पिछले चार साल मे मोदी सरकार पर कोई घपले का इल्जाम नहीं लग सका। मगर असलियत यह है कि नोटबंदी से लेकर एनपीए और उसकी माफी तक सभी मामलों में घपलों ही घपलां की बू आ रही है। मोदी सरकार में बैंकों का एनपीए दस लाख करोड तक पहुच गया। नोटबंदी में हजारों करोड का काला धन सफेद हो गया और अब  जो खुलासा हुआ उससे बैंकों की साख को मजीद बट्टा लगा है।

लोगों के जेहनों में शायद अब भी महफूज हो कि जब मनमोहन सिंह सरकार ने किसानों के 70 हजार करोड के कर्ज माफ करने का फैसला लिया था तो बैंक किसी तरह किसानों का कर्ज माफ करने को तैयार नहीं थे जब सरकार की तरफ से यह यकीनदहानी कराई गई कि सरकार उनके कर्जों की अदाएगी करेगी तब बैंक अपनी कर्ज की किताबों से किसानों के कर्ज के इंदराज हटाने को राजी हुए थे। लेकिन बैंकों का यह आलम हो गया है कि बड़े-बडे़ धन्ना सेठों, कारोबारियों, ताजिरों और सनअतकारों के हजारों करोड के कर्ज को ‘राइट आफ’ करने में कोई हिचक ही नहीं होती। बैकां ने जिन में अवामी और निजी जुमरा दोनों शामिल हैं 2017-18 में न जमा देने वालां का एक लाख 44 हजार करोड रूपए के कर्ज को अपने तौर पर ही माफ करने का फैसला कर लिया जो पिछले साल के 89 हजार 48 करोड के मुकाबले तकरीबन 62 फीसद ज्यादा है।

रेटिंग एजेसी आईसीआरए ने बैंकों के जरिए एनपीए को ‘राइट आफ’ करने के जो आकडे इडियन एक्सप्रेस के लिए इकटठा किए हैं वह घपले को उजागर करते है। एजेसी के आकडों के मुताबिक बैंकों ने पिछले दस सालों में सैकडों हजारों करोड के कर्ज लेने वाले न अदा करने वालों के 4 लाख पांच सौ चौरासी करोड सरकारी बैकां ने और 79 हजार चार सौ नव्वे करोड प्राइवेट बैकों ने कर्ज माफ किए। इन कर्ज माफी का कहीं कोई चर्चा नहीं कहीं कोई जिक्र नहीं और यह भी नही इतनी बडी रकम की माफी से मुल्क की तरक्की पर कोई मनफी असर पडेगा लेकिल जब किसानों का 70 हजार करोड का कर्ज माफ किया गया था तो बडे जोरशोर से यह उछाला जा रहा था कि ऐसा करने से मुल्क की तरक्की की रफ्तार ही ठहर जाएगी। बीजेपी और दूसरी अपोजीशन पार्टियों ने तो कांग्रेस की कयादत वाली यूपीए सरकार पर हमला करने के एक हथियार के तौर पर इस कर्ज माफी का इस्तेमाल किया था लेकिन 2009 से 2018 तक इकटठा किए गए आंकडे साफ बताते हैं कि जहां 2009 से 2014 तक छः साल में एक लाख बाइस हजार सात सौ तिरपन करोड के एनपीए को बैंकों ने राइट आफ किया वहीं 2015 से 2018 की मोदी सरकार के दौरान बैंकों ने तीन लाख सत्तावन हजार तीन सौ चालीस करोड माफ किए।

कारपोरेशन बैंक के साबिक चेयरमैन और एम़डी प्रदीप रामनाथ के मुताबिक वह कर्ज जिन्हें मुश्तबा वसूली (रिक्वरी) जुमरे में रखा गया हो बैंक आम तौर से ऐेसे लोन को राइटआफ कर देती है। यह एक तकनीकी नौइयत का मामला है। यह किताबी हल है जब एक ‘बैड लोन’ राइट आफ किया जाता है कि इसे बैंक की किताबों से हटा दिया जाता है बैंक ऐसा करके टैक्स का फायदा भी लेते हैं लेकिन बैंक कर्ज वसूली करने के इकदामात जारी रखते हैं बैंकरों का कहना है कि राइटआफ किए गए कर्ज की वसूली बहुत खराब है इस पूरे अमल में कोई शफ्फाफियत नहीं है। बैक आम तौर पर वह कर्ज राइट आफ करते हैं जो वसूली के लायक नहीं होते लेकिन बैंक कर्जदारों को बैक यह भी नहीं बताते कि उनका कर्ज राइट आफ कर दिया गया है। एक बार जब कर्ज राइट आफ कर दिया जाता है तो उसे एनपीए में शामिल नहीं किया जाता। लेकिन जब ऐसे कर्जदारों से कुछ वसूली होती है तो बैंक उसे मुनाफे में शामिल कर लेते हैं यह बातें पब्लिक सेक्टर बैंक के सीईओ ने अपना नाम न जाहिर करने की शर्त पर बताई।

रिजर्व बैंक आफ इडिया के साबिक डिप्टी गवर्नर के सी चक्रवर्ती के मुताबिक यह सीधा सादा घपला है राइट आफ करने का अमल तंकीद का हिस्सा बनता रहा है। यह तकनीकी राइट आफ जैसा नहीं है इसमें कोई शफ्फाफियत नहीं है और कोई पालीसी के बगैर है आम तौरपर एनपीए के राइटआफ का छोटा होता है मगर जब बोहरान होता है तो और एहतियात से काम लिया जाता है। एक तकनीकी राइट आफ में अदम शफ्फाफियत होती है और क्रेडिट रिस्क मैनेजमेट सिस्टम तबाह हो जाता है और सिस्टम में तमाम गलतकारियां आ जाती है  आपको यह जरूर बताना होगा कि कितना कर्ज राइट आफ किया गया है आप अवाम के पैसे को राइट आफ कर रहे है यह एक घपला है।