मुसलमानों और ईसाइयों को जज नहीं बनाना चाहती मोदी सरकार

मुसलमानों और ईसाइयों को जज नहीं बनाना चाहती मोदी सरकार

मोहम्मद मशहूद
नई दिल्ली! नरेन्द्र मोदी सरकार ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो सीनियर वकीलों को हाई कोर्ट का जज बनाने की सुप्रीम कोलजियम की सिफारिश को दूसरी बार वापस करके अपनी मंशा जाहिर कर दी कि यह सरकार मुसलमानों और ईसाइयों को मुल्क की ज्यूडीशियरी में पहुचने नहीं देना चाहती। यह दो नाम हैं मोहम्मद मंसूर और बशारत अली खान। यह दोनों एक लम्बी मुद्दत से इलाहाबाद हाई कोर्ट में उत्तर प्रदेश सरकार के मामलात की पैरवी करते हैं इस से पहले जस्टिस के एम जोजफ को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने के लिए कोलजियम की सिफारिश मोदी सरकार ठुकरा चुकी है। जवाबित (नियमों) के मुताबिक कोलजियम अगर किसी वकील को जज बनाने की सिफारिश करे तो मरकजी सरकार उससे इंकार नहीं कर सकती। इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट कोलजियम ने जम्मू कश्मीर हाई कोर्ट के लिए जिन तीन वकीलों और एक जिला जज के नाम की सिफारिश की थी मोदी सरकार ने उन में से वकील नजीर अहमद बेग का नाम वापस कर दिया बाकी तीन वसीम सादिक नरगल, सिंधू शर्मा और जिला जज राशिद अली डार के नामों पर फैसला करने के बजाए उन्हें ठंडे बस्ते में डाल दिया। मतलब यह तीन कश्मीरी मुसलमानों को रोकने के चक्कर में सिंधू शर्मा एडवोकेट भी फंस गईं और वह जज की हैसियत से हाई कोर्ट नहीं पहुच सकीं।
सुप्रीम कोर्ट कोलजियम ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के जिन दो सीनियर वकीलों के नामों की सिफारिश जज बनाने के लिए की थी उनको मोदी सरकार ने यह कहकर वापस किया कि उनके खिलाफ कुछ शिकायतें हैं। कोलजियम ने यह कहते हुए अपनी सिफारिश दोहराई कि सरकार जिन शिकायतों का जिक्र कर रही है वह संगीन नौइयत (गंभीर) नहीं हैं। बशरत अली खान और मोहम्मद मंसूर में से एक मोहम्मद मंसूर कई रियासतों के चीफ जस्टिस और सुप्रीम कोर्ट के जज रहे, इंतहाई ईमानदार जस्टिस सगीर अहमद के बेटे हैं। चूंकि मनमोहन सिंह सरकार के दौरान कश्मीर मसले पर बने खुसूसी वर्किग ग्रुप की कयादत कर चुके थे इसलिए मोदी सरकार ने उन्हें यूपीए सरकार और कांग्रेस का नजदीकी मान लिया। अगर यही फार्मूला चलता रहा तो क्या मोदी सरकार के जरिए बनाए गए तमाम जज आरएसएस के स्वयं सेवक समझे जाएंगे?
मोदी सरकार के जरिए इलाहाबाद हाई कोर्ट के लिए दो जजों की तकर्रूरी की सुप्रीम कोर्ट की कोलजियम की सिफारिश दोबारा खारिज कर देने से एक नया बोहरान पैदा हो गया है। कोलजियम के जरिए जजों की तकर्रूरी की सिफारिश के ताल्लुक से अभी तक जिन रिवायात पर अमल किया जा रहा था वह यह थीं कि कोलजियम की सिफारिश मरकजी सरकार एक बार ही वापस कर सकती है लेकिन वही सिफारिश अगर दूसरी बार आती है तो सरकार का रोल उसपर महज अपनी मुहर लगाने का होगा। मरकजी सरकार उसे खारिज नहीं कर सकती। लेकिन दूसरी बार भी वह उसे नामंजूर कर दे तो? वाजेह हो कि इससे पहले कभी भी ऐसी नौबात नहीं आई इसलिए रिवायत और जाब्ता इसपर खामोश हैं। कोलजियम ने जब पहली बार मरकजी सरकार से बशारत अली खान और मोहम्मद मंसूर को इलाहाबाद हाई कोर्ट का जज बनाने की सिफारिश की थी तो उन्हें जज बनाने की सिफारिश इस दलील के साथ खारिज कर दी थी कि इन दोनां के खिलाफ कुछ इल्जामात मिले हैं। कोलजियम ने जब दोबारा सिफारिश भेजी और यह कहा कि इनके खिलाफ जो इल्जाम हैं वह फुजूल हैं लेकिन मरकजी सरकार उससे मुत्तफिक नहीं है इसी लिए यह सिफारिश एक बार फिर वापस कर दी गई। मरकजी सरकार की तरफ से कोलजियम की सिफारिश को वापस करना कोई नई बात नहीं है पिछले दिनों उत्तराखण्ड हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस के एम जोजफ को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने की सुप्रीम कोर्ट कोलजियम ने सिफारिश की थी। यह सिफारिश सरकार ने इस दलील के साथ खारिज कर दी थी कि कई हाई कोर्टों में इनसे भी सीनियर चीफ जस्टिस हैं इसलिए इन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने से अच्छी रिवायत नहीं कायम होगी।
सरकार के इस फैसले के पीछे एक सोच यह मानी जा रही है कि सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस चल्मेश्वर के रिटायर होने के बाद कोलजियम की एक तरह से तश्कील नव होगी। ऐसे में कोलजियम को नए सिरे से सिफारिश करना होगी। अगर नई सिफारिश भी यही हुई तब क्या होगा? जस्टिस चेल्मेश्वर के रिटायर होने के बाद सीनियर जज जस्टिस अर्जुन सेकरी कोलजियम में शामिल हुए हैं। नई कोलजियम की मीटिंग में जस्टिस के एम जोजफ का नाम दोबारा सरकार को भेजने पर गौर होगा क्योंकि अप्रैल मे सरकार ने जस्टिस जोजफ के नाम दोबार गौर करने के लिए कोलजियम को वापस भेज दिया था। इससे पहले दोबार कोलजियम की मीटिंग हुई और जोजफ के नाम पर गौर किया गया मगर उनका नाम सरकार को भेजने पर फैसला नहीं हो पाया। इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो जजों की तकर्रूरी की सिफारिश दोबार वापस किए जाने का मसला भी कोलजियम के जेरे गौर होगा या नहीं अभी यह मालूम नहीं हो पाया है क्योंकि दोबार सिफारिश वापस करने का यह पहला मामला है।