आमाल पर भरोसा न कीजिए!

आमाल पर भरोसा न कीजिए!

मौलाना सैयद अशहद रशीदी
उम्मुल मोमिनीन हजरत आयशा सिद्दीका (रजि0) फरमाती हैं कि मैने नबी करीम (सल0) से इस आयत के बारे में पूछा कि जिसमें अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है कि वह लोग जो देते हैं जो कुछ देते हैं (राहे खुदा में) इस हाल में कि उनके दिल डरते रहते हैं क्या इसके मिस्दाक वह लोग हैं जो शराब पीते हैं और चोरी करते हैं। आप ने फरमाया कि ऐ सिद्दीक की बेटी! ऐसा नहीं है बल्कि इस आयत के मिस्दाक वह लोग हैं जो रोजा भी रखते हैं नमाजें भी पढते हैं और सदका खैरात भी करते हैं लेकिन फिर भी इस बात से खौफजदा रहते हैं कि कहीं उनके आमाल कुबूल करने के बजाए रद्द न कर दिए जाएं यही वह लोग हैं जो नेकियों को अंजाम देने में तेजी दिखाते हैं। (तिरमिजी, मिश्कात)
तशरीहः- नबी करीम (सल0) अगर एक तरफ मोहसिने इंसानियत, शाफे महशर, नबी बरहक, साहबे कौसर और महबूबे रब्बुल आलमीन हैं तो दूसरी तरफ अल्लाह की आखिरी किताब के मुफस्सिर और शारेह होने का एजाज भी आपको हासिल है। आप का काम सिर्फ कुरआन के अल्फाज ही उम्मत के सामने पेश कर देने का नहीं था बल्कि उसकी तौजीह व तशरीह भी आप ही की जिम्मेदारी थी। इसलिए सहाबा जब भी कुरआने करीम के मफहूम व मायनी को समझने में परेशानी से दोचार होते तो आपकी खिदमत में हाजिर होकर दरयाफ्त करते और हकीकी मफहूम तक पहुचने में कामयाबी हाासल करते।
ऊपर लिखी रिवायत भी इसी सिलसिले की एक कड़ी है जिसमें हजरत आयशा सिद्दीका (रजि0) एक आयत का मतलब दरयाफ्त फरमा रही हैं अपने जेहन में आने वाला मफहूम भी बयान करती हैं और सही मफहूम तक रसाई भी हासिल करना चाहती हैं।
हजरत आयशा सिद्दीका (रजि0) फरमाती हैं कि मैंने नबी करीम (सल0) से मालूम किया कि इस आयत का मिस्दाक कौन लोग हैं कि जिसमें अल्लाह तआला इरशाद फरमाते हैं कि वह खुदा की राह में खर्च भी करते हैं मगर फिर भी उनके दिल खौफ व दहशत से कांपते रहते हैं क्या यह शराबी लोग हैं यह चोर हैं जो अपने घिनौने जरायम की वजह से सदका व खैरात करने के बावजूद अजाबे इलाही से खौफजदा रहते हैं। हजरत आयशा की बात इस मायनी में दुरूस्त है कि सदका व खैरात से गुनाह मिटा दिए जाते हैं और गजबे खुदावंदी ठंडा हो जाता है। तो फिर डर व खौफ का क्या मतलब? यकीनन उन लोगों से कुछ ऐसे गुनाहे कबीरा सरजद हुए होंगे जिनकी माफी उनको मुश्किल नजर आ रही होगी। मसलन शराब नोशी कि जो तमाम बुराइयों की जड़ है। इसी तरह चोरी कि जो माल हराम का जरिया है यह ऐसी बुराइयां हैं कि इनमें मुलव्विस अफराद के दिलों में सदका व खैरात करने के बावजूद खौफ व दहशत का होना समझ में आता है इसलिए क्या आयत का मिस्दाक वाकई शराबी और चोर-उचक्के हैं?
नबी करीम (सल0) ने हजरत आयशा (रजि0) की पूरी बात सुनकर आयत का सही मफहूम बयान करते हुए इरशाद फरमाया कि ऐ सिद्दीक की बेटी! आयत में जिक्र गुनाहगारों का नहीं है और इससे मुराद वह लोग नहीं हैं जो राहे खुदा में खर्च करने के बाद अपने घिनौने जरायम की वजह से डर व खौफ में मुब्तला रहते हों बल्कि इसके मिस्दाक वह लोग हैं जो रोजा व नमाज और सदका व खैरात करते हैं और फिर भी हर वक्त उनपर यह खौफ सवार रहता है कि कहीं उनके आमाल अल्लाह की बारगाह में मकबूल होने के बजाए रद्द न हो जाएं। उनका किया धरा कहीं बर्बादी के घाट न उतर जाए और उनकी नेकियां कहीं अकारत न हो जाएं। यही वह सोच है जो हमेशा उनको खौफ व बेचैनी में मुब्तला रखती है। गोया वह नमाज, सदका व खैरात करते हैं मगर इतराते नहीं हैं नेकियों को अंजाम देते हैं मगर निजात से बेफिक्र नहीं होते और अपने किए पर भरोसा करके खुदा के सामने रोने और गिड़गिड़ाने से बाज नहीं आते।
आजकल हमारे समाज में ऐसे लोग बकसरत पाए जाते हैं कि जो दीन के कामां से जुड़ने की वजह से अपनी तर फ से बेफिक्र हो जाते हैं। उनको अपनी निजात के यकीनी होने का वहम हो जाता है जो किसी भी शख्स की हलाकत और आखिरत की बर्बादी के लिए काफी है आम तौर पर नेकियों को अंजाम देने वाले और किसी दीनी खिदमत से वाबस्ता अफराद अपनी निजात से मुत्मइन होकर सिर्फ दूसरों की फिक्र में खुलने लगते हैं और पूरा वक्त दूसरों की नज्र कर देते हैं न तौबा व इस्तिगफार का एहतमाम करते हैं न अकायद की इस्लाह की तरफ तवज्जो देते हैं और न ही मामलात को सुधारने पर ध्यान देते हैं। बस सुबह व शाम उम्मत की इस्लाह की फिक्र उनको परेशान किए रहती है गोया वह पूरी तरह अपने बारे में मुत्मइन रहते हैं और अपनी निजात का उनको पूरा यकीन होता है। इसीलिए तो ऐसे लोग न दीनदारों से अपने ताल्लुकात बढाते हैं न अल्लाह वालों के पास आते जाते हैं और न ही किसी आलिम बाअमल के हाथ में हाथ देकर उससे फैज हासिल करने की कोशिश करते हैं। आखिर कार ऐसे लोग नेकियां को अंजाम देने में पीछे रह जाते हैं और खुद फरामोशी के आदी बन जाते हैं जिसकी वजह से आखिरत की नाकामी से उनको दोचार होना पड़ता है। जबकि सहाबा तमामतर फजायल व मुनाकिब और सआदतों के बावजूद जिंदगी भर अपनी मगफिरत की तरफ से फिक्रमंद रहे और हर वक्त अल्लाह तआला के रहम व करम और फजल व इनायत के तालिब बने रहे।
इसलिए एक सहाबी के मरजुल वफात का वाक्या जिक्र करते हुए हजरत अबू नजरा (रजि0) फरमाते हैं कि अबू अब्दुल्लाह नामी सहाबी बीमार हुए दूसरे साथी उनकी अयादत और मिजाज पुर्सी के लिए गए। जिनको देख कर अबू अब्दुल्लाह रोने लगे। साथियों ने उनको तसल्ली देते हुए कहा कि आप क्यों रोते हैं? क्या आपको याद नहीं कि जब आप मुसलमान होने के लिए आए थे तो आपकी मूछें बड़ी बड़ी थीं जिनको देख कर नबी करीम (सल0) ने इरशाद फरमाया था कि तुम बराबर अपनी मूछों को कतरवाते रहना यहां तक कि आखिरत में मुझ से आ मिलो! गोया नबी करीम (सल0) ने तो आपको दुनिया ही में आखिरत में निजात की बशारत दे दी है। क्योंकि आखिरत में नबी करीम (सल0) से जा मिलना उसीको नसीब होगा कि जिस की मगफिरत हो जाएगी। (तो फिर आप परेशान क्यों रहते हैं?) अबूअब्दुल्लाह बोले कि मुझे नबी करीम (सल0) का यह फरमान खूब याद है मगर मेरे सामने नबी करीम (सल0) का एक दूसरा फरमान है जो मुझे बेचैन किए दे रहा है। एक दिन मैंने नबी करीम (सल0) को यह फरमाते हुए सुना था कि कयामत के दिन अल्लाह तआला कुछ लोगों को अपनी दाहिनी मुट्ठी में लेकर जन्नत में दाखिल कर देगा और कुछ लोगों को दूसरी मुट्ठी में लेकर जहन्नुम में झोंक देगा और ऐ साथियो! मुझे नहीं मालूम कि मैं खुदा की कौन सी मुटठी में हूंगा। बस यही वह फिक्र है जो मुझ को रूला रही है।
रिवायत इस तरह है-‘हजरत अबू नजरा (रजि0) फरमाते हैं कि सहाबा में से एक शख्स जिनको अबू अब्दुल्लाह कहा जाता था बीमार हुए, लोग उनकी अयादत को गए, तो वह रोने लगे, साथियों ने कहा कि आप क्यों रोते हैं? क्या नबी करीम (सल0) ने आप से यह नहीं फरमाया था कि तुम अपनी मूछें कतरवाते रहना, यहां तक कि मुझसे आ मिलो, वह कहने लगे क्यों नहीं? (आपने यह फरमाया था) लेकिन मैंने नबी करीम (सल0) को यह कहते हुए सुना है कि अल्लाह तआला अपनी दाहिनी मुटठी में (कुछ लोगो को) लेगा और (कुछ लोगों को) दूसरी मुटठी में और आप ने फरमाया कि दाहिनी तरफ वाले जन्नत के लिए होगे और दूसरी तरफ वाले जहन्नुम के लिए होगे और मुझे नहीं मालूम कि मैं खुदा की कौन सी मुटठी में हूंगा।’ (अहमद, मिश्कात)
हर शख्स को जो आखिरत में निजात का ख्वाहां हों तीन बातों का ख्याल रखना लाजिम और जरूरी है वरना तो उसके आमाल अकारत और जाया हो जाएंगे और आखिरत में कुछ हाथ नहीं लगेगा। जब आदमी को किसी नेकी की तौफीक हो जाए तो उसपर इतराने और अकड़ने के बजाए अल्लाह तआला की हम्द व सना करे उसका शुक्र अदा करे क्योंकि उसके फजल व करम और तौफीक के बगैर इंसान न किसी खैर को अंजाम दे सकता है और न ही किसी बुराई से बच सकता है।
इसलिए एक रिवायत में नबी करीम (सल0) फरमाते हैं कि अगर इंसान के दिल में नेकी और भलाई का जज्बा पैदा हो तो उसको अल्लाह की तरफ से समझे और हम्द व सना करे और अगर बुराई का ख्याल दिल में आए तो उसको शैतान की तरफ से जान कर अऊजुबिल्लाह पढे। इरशादे नबवी है-‘हजरत अब्दल्लाह बिन मसूद (रजि0) फरमाते हैं कि नबी करीम (सल0) ने इरशाद फरमाया कि बनो आदम में शैतान भी असर डालता है और फरिश्ता भी उसके दिल पर असर अंदाज होता है, शैतान तो उससे बुराई का वादा करता है और हक की तकजीब कराता है। जबकि फरिश्ता खैर का वादा करता है और हक की तस्दीक पर उसको उभारता है लिहाजा जो शख्स इस तरह (खैर) का ख्याल दिल में पाए उसको चाहिए कि अल्लाह की हम्द व सना करे क्योंकि यह मिन जानिबुल्लाह है और जो दूसरा (बुराई का ख्याल) पाए तो वह अऊजुबिल्लाह पढे।
दूसरी अहम बात यह है कि इंसान आमाले खैर को अंजाम देने के बाद मुस्तकिल उसकी कुबूलियत की दुआ करता रहे और निहायत तवाजेह व इंकसारी के साथ अपने रब को मुखातिब करके यह आवाज लगाता रहे कि ऐ खुदा! हक तो यह है कि हक अदा न हुआ कहां मैं और कहां तेरी शाने बुलंद व बाला? कहां मेरी इबादात और कहां तेरी जाते वाला सिफात? कहां मुझ जैसा बंदा जलील और कहां अहकमुल हाकिमीन, शहंशाहों का शहंशाह? ऐ खुदा तू महज अपने फजल व करम से मेरी बेहैसियत और टूटी फूटी इबादतों को शरफे कुबूलियत से मालामाल फरमा कर मुझ जैसे नालायक और गुनाहगार बंदे को दोनों जहां में सुर्खरूई नसीब फरमा।
अल्लाह तआला की जात चूंकि बड़ी बेनियाज है इसलिए उसकी इबादत करने वाले अगर बेरूखी और लाताल्लुकी का इजहार करते हुए नियाजमंदी, खौफ व रिजए और उम्मीद को छोड़ बैठेंगे तो नेकियों के जाया होने का खतरा पैदा हो जाएगा। इसलिए कुरआने करीम में अल्लाह तआला हजरत इब्राहीम व इस्माईल (अलै0) का तजकिरा करते हुए इरशाद फरमाता है कि जब दोनो बाप बेटों ने काबेतुल्लाह की तामीर का अजीमुश्शान काम सर अंजाम दे दिया तो अब यह फिक्रदामनगीर हुई कि पता नहीं यह अमल खैर बारगोहे इलाही में मकबूल भी होगा यह रद्द कर दिया जाएगा इसलिए फौरन नियाजमंदी का इजहार करते हुए कुबूलियत की दरख्वास्त पेश करने लगे। अल्लाह का इरशाद है-‘ और जब इब्राहीम व इस्माईल खाना काबा की बुनियादें उठाते थे तो यह दुआ करते थे कि ऐ हमारे रब कुबूल कर हमारी तरफ से बेशक तू ही सुनने वाला और जानने वाला है।’ (बकरा-127)
जब अम्बिया (अलै0) कुबूलियत से बेफिक्र का इजहार नहीं करते थे तो हम और आप कैसे इस बात का यकीन कर सकते हैं कि हमारे आमाल जरूर कुबूल हो जाएगें और हमारी निजात यकीनी है।
तालिबे निजात के लिए जरूरी है कि हमेशा ऐसे कामों से बचता रहे जो नेकियों को जाया कर देते हैं यानी खास तौर पर उन गुनाहों से दूर रहे जो इंसान की नेकियों को बर्बादी के घाट उतार देते हैं मसलन हसद है, यह दिल का वह रोग है जिससे इंसान के नेक आमाल खाक में मिल जाते हैं। इसलिए इरशादे नबवी है-‘बेशक हद नेकियों को इस तरह खा जाता है जैसे आग खुश्क लकड़ियों को खा जाती है।’ (अबू दाऊद, मिश्कात)
हक तल्फी करना यह भी ऐसा गुनाह है कि जिस के चलते इंसान की नेकियां उसके काम नहीं आ सकेगी। बल्कि उनको हकदारों में तकसीम कर दिया जाएगा और वह हाथ मलता रह जाएगा। इसी तरह बदजुबानी का गुनाह भी इंसान की नेकियों को खा जाता है नमाज, रोजा हज जकात हर तरह की नेकी जबान के गलत इस्तेमाल की वजह से जाया हो जाती है। झूट फरेब गाली गलौज गीबत इल्जाम तराशी फहश गोई वगैरह जैसे गुनाहे जबान ही से किए जाते हैं जिनसे नेक आमाल अकारत और जाया हो जाते हैं। अल्लाह तआला हम सबकी हिफाजत फरमाए और हमारी तमाम नेकियों को महज अपने फजल व करम से कुबूल फरमाए-आमीन।