नोटबंदी का बड़ा घोटाला बेनकाब

नोटबंदी का बड़ा घोटाला बेनकाब

अमित शाह पर फिर लगा इल्जाम तो हर तरफ खामोशी छा गई, मीडिया मैनेजमेंट भी खूब हुआ

“नोटबंदी के पांच दिनों के अंदर ही अहमदाबाद जिला को-आपरेटिव बैंक की अमित शाह की डायरेक्टरी वाली ब्रांच में 750 करोड़ तो काबीना वजीर जयेश भाई रडाडिया की चेयरमैनी वाली राजकोट ब्रांच में 693 करोड़ के पुराने नोट कैसे जमा हो गए? क्या पांच दिनों में इतनी रकम के नोटों की गिनती किसी भी तरह मुमकिन है? जवाब है कि इतने नोट तो पांच दिनों में किसी भी तरह गिने ही नहीं जा सकते हैं।”

“बीजेपी सरकारों वाली रियासतों के को-आपरेटिव बैंकों में पांच दिनों में कुल 14 हजार 300 के पुराने नोट जमा हो गए तो 14 नवम्बर को आर्डर आ गया कि अब कोई भी को-आपरेटिव बैंक पुराने नोट जमा नहीं कर सकता। नोटबंदी का यह बड़ा घोटाला सामने आया तो मीडिया पर दबाव डालकर खबरें रूकवाई गई। कांग्रेस जांच का मतालबा कर रही है तो वजीर-ए-आजम मोदी और बीजेपी सदर अमित शाह खामोश हैं।”

“एमएनएस चीफ राजठाकरे को-आपरेटिव बैंकों के जरिए किए गए इतने बड़े घोटाले से पहले ही कह चुके हैं कि मोदी ने बीजेपी को फायदा पहुचाने के लिए नोटबंदी की थी। उन्होने कहा कि नोटबंदी के बाद आठ दिसम्बर 2016 को कनार्टक के बीजेपी लीडर शेखर रेड्डी के कब्जे से 33 करोड़ 60 लाख के दो-दो हजार के नए नोट बरामद हुए थे मोदी बताएं यह उसे कैसे मिले।”

हिसाम सिद्दीकी
नई दिल्ली! वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी के जरिए की गई नोटबंदी बड़ा घोटाल था कांग्रेस के इस इल्जाम को उस वक्त तकवियत मिल गई जब पता चला कि बीजेपी सदर अमित शाह सन् 2000 में जिस अहमदाबाद जिला को-आपरेटिव बैंक के चेयरमैन थे और बैंक वेबसाइट के मुताबिक अब भी उसके डायरेक्टर हैं उसकी अहमदाबाद ब्रांच में ही नोट बंदी के अगले पांच दिनों में 750 करोड़ के पुराने हजार और पांच सौ के नोट जमा हो गए। इतना ही नहीं राजकोट जिला को-आपरेटिव बैंक में भी उसी मुद्दत में 693 करोड़ 19 लाख कीमत के पुराने नोट जमा हो गए। मंबई के मनोरंजन एस राय की आरटीआई के जवाब में नाबार्ड ने यह जवाब दिया तो न्यूज एजेंसी आईएएनएस ने यह खबर जारी करके धमाका कर दिया। राजकोट के जिस बैंक में पांच दिनों में ही 693 करोड़ 19 लाख रूपए जमा हो गए उसके चेयरमैन जयेश भाई विटठल भाई रदाडिया हैं जो बीजेपी के सीनियर लीडर और गुजरात सरकार में काबीना वजीर हैं। नाबार्ड के जवाब के मुताबिक गुजरात जिला को-आपरेटिव बैंक की ग्यारह ब्रांचों में पांच दिनों में 3118 करोड़ के पुराने नोट जमा हुए। इतना ही नहीं अब पता चला है कि बीजेपी सरकारों वाली रियासतों के को-आपरेटिव बैंकां में पांच दिनों मे ही तकरीबन 14 हजार तीन सौ करोड़ के पुराने नोट जमा हो गए। यहां यह बताना भी काबिले जिक्र है कि वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी ने आठ नवम्बर 2016 को हजार और पांच सौ के पुराने नोट बंद करने का एलान किया था फिर उसके पांचवें दिन 14 नवम्बर की शाम को एक आर्डर यह भी आ गया कि अब कोई भी जिला को-आपरेटिव बैंंक पुराने नोट नहीं जमा कर सकता। मतलब साफ है अपने और अपनों के नोट जमा हो गए तो जमा करने पर पाबंदी लगा दी गई। पांच दिनों में ही इतनी बड़ी रकम कैसे जमा हो गई और वह रकम किसकी थी? कांग्रेस पार्टी ने यह रकम अमित शाह की बताते हुए पूरे मामले की तहकीकात कराने का मतालबा किया है। सरकार या बीजेपी की जानिब से कोई ठोस जवाब नहीं आया। इतना जरूर हुआ कि मीडिया पर ऐसा दबाव पड़ा कि इस खबर को ज्यादा अहमियत नहीं मिली। कुछ अखबारात ने यह खबर पहले तो अपनी वेबसाइट पर पोस्ट की लेकिन शायद दबाव पड़ने पर रात में ही खबर हटा ली तो कुछ ने खबर में शामिल अमित शाह का नाम हटा दिया। शायद दबाव ही था कि अगले दिन नाबार्ड ने भी घुमाफिरा कर सफाई पेश की, जिसका कोई मतलब नहीं निकाला जा सका। अब अस्ल सवाल यह उठ रहे हैं कि क्या किसी भी को-आपरेटिव बैंक की ब्रांचों में पांच दिनों में 750 करोड़ के नोटों की गिनती मुमकिन है? इसका जवाब देते हुए बैंकों के कई मौजूदा और कई रिटायर्ड कैशियरों ने कहा कि पांच दिनों में इतने नोटों की गिनती किसी भी कीमत पर मुमकिन नहीं है। तो जमा करने वालों ने जितनी रकम डिपाजिट स्लिप में लिख दी बैंक ने उसे ही मान लिया और नकली और फटे नोटों की जांच भी नहीं की गई।
एक सवाल यह भी पूछा जा रहा है कि अहमदाबाद जिला को-आपरेटिव बैंकों में पांच दिनों में इतनी बड़ी रकम जमा होते ही 14 नवम्बर की शाम को यह आर्डर क्यों आ गया कि अब यानी 14 नवम्बर के बाद कोई भी को-आपरेटिव बैंक पुराने नोट जमा नहीं कर सकेगा। को-आपरेटिव बैंकां मे पुराने नोटों को जमा करने पर पाबंदी लगाने के आर्डर के बाद बीजेपी और खुद वजीर-ए-आजम मोदी की जानिब से अपोजीशन पार्टियों का मजाक उड़ाते हुए यह भी कहा गया था कि को-आपरेटिव बैंकों में पुराने नोट जमा करने पर रोक लग जाने की वजह से कई सियासी पार्टियों के लीडरान की सांसें रूकती दिख रही हैं क्योकि अब काला धन सफेद करने का एक बड़ा जरिया खत्म कर दिया गया है।
अहमदाबाद को-आपरेटिव बैंक में जमा हुई इतनी बड़ी रकम के मामले की गहराई से जांच कराई जाए कांग्रेस के इस मतालबे पर मोदी और अमित शाह तो खामोश हैं ही सरकार और पार्टी की जानिब से कोई कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है। बोले भी क्यों मोदी सरकार और बीजेपी लीडरान पर आजतक सैकड़ों संगीन इल्जामात लग चुके हैं लेकिन किसी भी मामले की तहकीकात नहीं कराई गई है। कांग्रेस ने तो अब नोटबंदी को बड़ा घोटाला होने के अपने इल्जाम को दोहराया हैं महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के सदर राज ठाकरे तो पहले एक प्राइवेट टीवी चैनल के प्रोग्राम में साफ कह चुके हैं कि मोदी ने सिर्फ बीजेपी को फायदा पहुचाने के लिए नोटबंदी का फैसला किया था। राज ठाकरे ने कहा था कि आठ नवम्बर 2016 को नोटबंदी हुई पूरा देश दो हजार रूपए बदलने के लिए बैंकों के सामने लम्बी-लम्बी कतारों में खड़ा था और नोटबंदी के ठीक एक महीने बाद 8 दिसम्बर 2016 को कर्नाटक बीजेपी के एक लीडर शेखर रेड्डी के कब्जे से 33 करोड़ 60 लाख कीमत के नए दो हजार के नोट बरामद हुए थे आखिर इतनी नई करेंसी उसके पास कहां से आ गई थी और मोदी सरकार ने उसके खिलाफ क्या कार्रवाई की? उन्होने कहा कि दिसम्बर में जो भी एलक्शन हुआ तो बीजेपी ने दो-दो हजार के नए नोट बोरों में भर कर बांटे थे अगर नोटबंदी घोटाला नहीं तो क्या था?
याद रहे कि बीजेपी के सदर अमित शाह जिस जिला को-आपरेटिव बैंक के डायरेक्टर हैं, वजीर-ए-आजम नरेंद्र मोदी के जरिए अचानक लिए गये नोटबंदी के फैसले के बाद देश मे सबसे ज्यादा पुराने नोट उसी बैंक में जमा किए गये थे वह भी सिर्फ पांच दिनों में। आईएएनएस के मुताबिक मुंबई के एक आरटीआई एक्टिविस्ट के सवाल के जवाब में यह खुलासा नाबार्ड ने किया है।
एक आरटीआई के मुताबिक 8 नवंबर 2016 को नोटबंदी के एलान के बाद 5 दिन के अंदर अहमदाबाद जिला को-आपरेटिव बैंक में तकरीबन 750 करोड़ रुपये के हजार और पांच सौ के बंद हो चुके नोट जमा हुए जो किसी को-आपरेटिव बैंक में जमा हुई सबसे बडी रकम है। अहमदाबाद जिला को-आपरेटिव बैंक के बाद बंद हो चुके नोट सबसे ज्यादा राजकोट जिला को-आपरेटिव बैंक में जमा हुए, जिसके चेयरमैन जयेशभाई विट्ठलभाई रदाड़िया हैं, जो गुजरात की विजय रूपाणी सरकार में कैबिनेट मिनिस्टर हैं। यहां 693 करोड़ 19 लाख कीमत के पुराने नोट जमा हुए थे।
मुंबई के आरटीआई एक्टिविस्ट मनोरंजन एस राय की आरटीआई के जवाब में यह जानकारी नाबार्ड, जो इन बैंकों की सबसे बड़ी अपीलीय इकाई है, के चीफ जनरल मैनेजर एस. सर्वनावेल के जरिए दी गयी है। मनोरंजन ने आईएएनएस से बात करते हुए कहा, ‘नोटबंदी के फैसले के बाद रियासती को-आपरेटिव बैंकों और जिला को-आपरेटिव बैंकों में जमा हुई रकम के बारे में पहली बार आरटीआई के तहत कोई जानकारी सामने आई है और यह चौंकाने वाली है।
8 नवंबर 2016 को वजीर-ए-आजम मोदी ने 500 और 1000 के नोटों को बंद करने का फैसला लिया था और अवाम को बैंकों में अपने पास जमा पुराने नोट बदलवाने के लिए 30 दिसंबर 2016 तक यानी 50 दिनों की मियाद दी गई थी। इस फैसले के 5 दिन बाद यानी 14 नवंबर 2016 को सरकार की जानिब से यह हिदायत भी दी गई कि किसी भी को-आपरेटिव बैंक में 14 नवम्बर के बाद नोट नहीं बदले जाएंगे।
इन्हीं पांच दिनों में, अहमदाबाद जिला को-आपरेटिव बैंक (एडीसीबी) ने 745 करोड़ 59 लाख के बंद हो चुके नोट जमा किए। बैंक की वेबसाइट के मुताबिक अमित शाह अब भी इस बैंक के डायरेक्टर हैं और इस ओहदे पर कई सालों से बने हुए हैं। साल 2000 में वह इस बैंक के चेयरमैन भी थे। 31 मार्च 2017 तक इस बैंक में कुल 5,050 करोड़ रुपये जमा हुए थे और माली साल 2016-17 का इसका मुनाफा 14 करोड़ 31 लाख ़का था।
अब सवाल यह है कि क्या अहमदाबाद को-आपरेटिव बैंक में 5 दिनों में 750 करोड़ की गिनती हो सकती है? मुंबई के आरटीआई एक्टिविस्ट मनोरंजन राय को आरटीआई से जानकारी मिली है कि नोटबंदी के दौरान देश में सबसे ज्यादा पुराने नोट गुजरात के दो को-आपरेटिव बैंकों में बदले गए। एक का नाम है अहमदाबाद जिला को-आपरेटिव बैंक जिसके डायरेक्टर बीजेपी के सदर अमित शाह हैं। यहां पर 5 दिनों में 750 करोड़ जमा हुए। दूसरा बैंक है राजकोट का जिला को-आपरेटिव बैंक जहां 693 करोड़ रुपये जमा हुए। इस बैंक के चेयरमैन गुजरात के काबीना वजीर जयेशभाई विट्ठलभाई रडाडिया हैं। पांच दिनों में 1300 करोड़ से ज्यादा के पांच सौ और एक हजार के नोट इन दो बैंकों की ब्रांचों में तब्दील किए गए।
मनोरंजन राय को यह इत्तेला आरटीआई के जरिए ग्रामीण बैंकों को कंट्रोल करने वाले बैंक नाबार्ड ने दी है। इस खबर को कई मीडिया वेबसाइट ने छापा है। अमित शाह के चेयरमैनी वाले बैंक में 5 दिन में सबसे ज्यादा 750 करोड़ जमा हुए हैं तो जाहिर है शक भी होना था और सियासत भी होनी थी। यह खबर कई मीडिया ग्रुपों की वेबसाइट पर आई तो फौरन ही कुछ में पूरी खबर तो कुछ में अमित शाह का नाम हटवा दिया गया।
जब यह मालूम किया गया कि क्या वाकई पांच दिनों में 750 करोड़ रुपये जमा हो सकते हैं और गिने जा सकते हैं तो बैंकों में काम करने वाले कुछ तजुर्बेकार कैशियरों से बात की गई इस तनाजे की बुनियाद या अंजाम जो भी हो, यह जानना भी कम दिलचस्प नहीं है कि 750 करोड़ रुपये गिनने में कितना वक्त लग सकता है, कितनी मशीनें लगेंगी और कितने कैशियर लगेंगे? कैशियरों की बातचीत की बुनियाद पूरे यकीन के साथ कहा जा सकता है कि इतनी बड़ी रकम पांच दिनों में किसी भी ब्रांच में गिनी नहीं जा सकती है।
एक कैशियर ने बताया कि नोटबंदी के दौरान 11 से 13 नवंबर 2016 के बीच वह और उनके तीन साथी कैशियर सुबह आठ बजे से रात के 10 बजे तक नोट गिनते रहे तब भी चार दिनों में 26 करोड़ ही गिन पाए। जबकि वह खुद को नोट गिनने के मामले में काफी एक्सपर्ट मानते हैं। नाम न बताने की शर्त पर कैशियर ने कहा कि हमें सिर्फ नोट नहीं गिनने होते हैं, नोटों की गड्डी को एक तरफ से सजाना होता है,उसे उलट-पलटकर देखना होता है, फिर कस्टमर से बात करनी पड़ती है, फटे पुराने और असली-नकली चेक करने पड़ते हैं, गिनती सही हो इसकी तसल्ली के लिए दो-दो बार गिनते हैं। इसके बाद गिने गए नोट की फाइल में एंट्री होती है। इन सबमें एक कस्टमर के साथ दो से पांच मिनट और कई बार उससे भी ज्यादा का वक्त लग सकता है। काबिले जिक्र बात यह भी है कि नोट गिनने की मशीन सभी जगह नहीं होती है। अगर हो भी तो आप इस मशीन को तीन से चार घंटे ही लगातार चला सकते हैं क्योंकि उसके बाद गरम हो जाती है। गरम होने के बाद गिनती कम-ज्यादा होने लगती है। मशीन को कुछ देर के लिए आराम देना पड़ता है। बाकी वक्त को जोड़ लें तो आप सिर्फ नोट नहीं गिन रहे होते हैं, लंच भी करते हैं, चाय भी पीते हैं और टायलेट के लिए भी कुर्सी से उठते हैं।
इन कैशियरों से पूछा गया कि अहमदाबाद जिला को-आपरेतटिव बैंक के तीन जिलों में 190 ब्रांचें हैं। क्या 190 ब्रांचों में 750 करोड़ पुराने नोट गिनकर बदले जा सकते हैं या जमा हो सकते हैं? तो उन्होंने एक हिसाब बताया, कहा कि 1000 के 40,000 पैकेट और 500 के 80,000 पैकेट मिलाकर 750 करोड़ होते हैं। इस तरह सवा लाख पैकेट गिनने के लिए 500 से 800 कैशियरों और इतनी ही मशीनों की जरूरत पड़ेगी। किसी भी को-आपरेटिव बैंक के पास न तो इतने कैशियर होते हैं और न ही इतनी मशीनें और न ही उनकी ट्रेनिंग ऐसी होती है क्योंकि को-आपरेटिव बैंकों में मुश्किल से रोज आठ-दस लाख ही जमा हो पाते हैं।
कैशियरों ने कहा कि 190 ब्रांचों के हिसाब से औसतन 4 करोड़ की रकम होती है जिसे गिनना नामुमकिन है। मुमकिन है कि इस हिसाब-किताब में गलती हो, लेकिन यह जानने की कोशिश करना ही दिलचस्प है कि बैंकों की ब्रांचों में नोट गिनने की सलाहियत कैसी होती है। हमने की, और आपको बताई। इससे आप इस सवाल तक पहुंच सकते हैं कि क्या वाकई इतने नोट गिने गए होंगे, मगर इससे सीधे इस सवाल तक नहीं पहुंच सकते कि किस खाते में किसने पैसे जमा कराए। यह जांच का मामला होता है।
अमित शाह का नाम आया इसलिए कई वेबसाइट ने खबर छापकर हटा ली और कुछ ने खबर छापकर नहीं हटाई लेकिन अमित शाह का नाम हटा दिया। कांग्रेस ने जांच की मांग की तो बीजेपी ने चुप्पी साध ली। वैसे बीजेपी के एक मेम्बर पार्लियामेट ने इस इल्जाम को बेतुका कहा है। आरटीआई एक्टिविस्ट ने भी खबर लिखे जाने तक कुछ नहीं बोला, जिससे पता चले कि उन्हें कहां और किस बात का शक है। नाबार्ड ने तरदीद की है कि कोई गड़बड़ी नहीं हुई है। अहमदाबाद जिला को-आपरेटिव बैंक देश के बेहतरीन को-आपरेटिव बैंकों में अव्वल है। नोटबंदी के दौरान यहां के हर एक खातेदार के खाते में औसतन 46,795 रुपये ही जमा हुए है जो कि बहुत नहीं है।
इसी तरह के इल्जाम नोटबंदी के दौरान खूब उठे थे कि लोगों ने अपना कालाधन बदल लिया। सरकार ने उस वक्त ऐसे खातों की जांच की बात की थी और खुद वजीर-ए-आजम ने जोरशोर से इसका एलान भी किया था। इसी कड़ी में इसकी भी जांच हो सकती थी मगर अब जब सब चुप ही हो गए हैं तो कौन किससे पूछे?