कश्मीर से भागी क्यों बीजेपी

कश्मीर से भागी क्यों बीजेपी

“चंद दिन पहले तक अमित शाह कहते थे कि हमारी सरकार ने कश्मीर में दहशतगर्दी कम की है अब सरकार गिराते वक्त राम माधव ने कहा कि महबूबा सरकार दहशतगर्दी पर काबू पाने में नाकाम रहीं उल्टे इस दरम्यान कट्टरपन में इजाफा हुआ। अब इसमें सच कौन बोल रहा है और झूट कौन? बीजेपी अपनी बहादुरी तो बयान करती है लेकिन यह कभी नही बताती कि कश्मीर में तीन सालों मे कितने फौजी जवान और अफसरान को शहादत देना पडी़।”
“तीन साल की मोदी-महबूबा सरकार के दौरान पाकिस्तानी एजेसियों ने कश्मीर वादी में ही हजारों नौजवानां को दहशतगर्द बनाकर वहां रायफलें थमा दीं सबसे ज्यादा फौजी जवान भी इन्हीं तीन सालों में शहीद हुए। रियासत की तरक्की के नाम पर कोई काम नहीं हुआ बीजेपी ने अपने एलक्शन मेनीफेस्टों में जो बडे़-बडे़ वादे किए थे उनकी तरफ तो किसी ने देखा भी नहीं।”
“महबूबा और बीजेपी की मिलीजुली सरकार में लूट और रिश्वत का बाजार हर तरफ गर्म रहा। हद यह है कि सरकारी जमीनों के साथ फौज की जमीनों पर भी कब्जे करके प्लाटिंग कर दी गई। जम्मू रीजन और कश्मीर वादी के लोगों के दरम्यान जो भाईचारा होता था तीन सालों में उसे भी नफरत मे तब्दील कर दिया गया। हालात इतने खराब हो चुके थे कि मैदान छोडकर भागने के सिवा बीजेपी के पास कोई रास्ता ही नहीं बचा था।”

 

हिसाम सिद्दीकी
नई दिल्ली! कश्मीर मामलात में मोदी और उनकी हुकूमत पूरी तरह नाकाम हो गई। बकौल गुलाम नबी आजाद जम कर पैसा कमाने और फौजी जवानों और अफसरान को दहशतगर्दों के हाथों मरवाने के बाद बीजेपी सरकार भाग खड़ी हुई। अब खबरें यह है कि वहां किसी सख्त रिटायर फौजी को भेज कर आम कश्मीरियों को बडे़ पैमाने पर ‘ठीक किया जाएगा’ यानि गोली बंदूक का राज चलेगा। वहां एनएसजी तैनात भी कर दी गई है। खुद बीजेपी के कई लीडरान ने कहा कि महबूबा मुफ्ती की वजह से मुल्क दुश्मनों और पत्थरबाजों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं की जा पा रही थी। अब रास्ता साफ हो गया है। राम माधव ने बडी सफाई से कहा कि तीन साल में कश्मीर में कट्टरपन में बडे़ पैमाने पर इजाफा हुआ है। एनडीए पार्टनर्स के साथ दगाबाजी करने वाली भारतीय जनता पार्टी ने महबूबा मुफ्ती के साथ जम्मू-कश्मीर हुकूमत मे साझेदारी करके पहले मुल्क, कश्मीर और फौजियों की हर तरह से तौहीन कराई फिर बड़ी चालाकी के साथ महबूबा सरकार से अपना हाथ खींच लिया। बीजेपी में इतनी भी अखलाकियात (नैतिकता) नहीं रही कि सरकार से अलग होने से पहले तीन साल तक साथ निभाने वाली महबूबा मुफ्ती को यह बताते कि अब हम सरकार नहीं चला सकते। महबूबा तो दूर बीजेपी ने अपने असम्बली स्पीकर, डिप्टी चीफ मिनिस्टर और दीगर वजीरों तक को यह भनक नहीं लगने दी कि वह महबूबा सरकार गिरा रही है। 19 जून को दोपहर में बीजेपी ने गवर्नर के जरिए महबूबा को उस वक्त इसकी इत्तेला दी जब पार्टी जनरल सेक्रेटरी राम माधव मीडिया नुमाइंदों को बुंलाकर यह एलान करने जा रहे थे कि बीजेपी जम्मू-कश्मीर सरकार से अलग हो रही है। जम्मू-कश्मीर सरकार में शामिल सभी वजीरों और स्पीकर को अमित शाह अपने आफिस मे लिए बैठे थे दूसरी तरफ राम माधव मीडिया से मुखातिब होकर सरकार से हटने का एलान कर रहे थे। बीजेपी ने कश्मीर के सिलसिले में मोदी सरकार की तमाम नाकामियों पर पर्दा डालने के लिए नाकामियों का पूरा ठीकरा वजीर-ए-आला रही महबूबा मुफ्ती के सर फोड़ दिया। बीजेपी सदर अमित शाह चंद रोज पहले तक दावा कर रहे थे कि कश्मीर में दहशतगर्दी के वाक्यात में बहुत बडी कमी आई हैं। सरकार गिराते वक्त राम माधव ने कहा कि महबूबा मुफ्ती की वजह से दहशतगर्दों पर काबू नहीं पाया जा सका और वादी में कट्टरपन में इजाफा हो गया तो इन दोनों में झूट कौन बोल रहा है?
कश्मीर जैसा हस्सास (संवेदनशील) मसला सरकार के हाथ से निकल गया तीन साल की लूट-खसोट के बाद अपनी नाकामियों का बोझ सर पर उठाए बीजेपी कश्मीर से भाग खडी हुई। इतने अहम वाक्ए पर भी वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी के मुंह से एक लफ्ज नहीं निकला जबकि वह छोटी-छोटी बातों में भी लम्बी-लम्बी तकरीरें करते रहते हैं। कश्मीर में मोदी और महबूबा की मिली जुली सरकार के दौरान तीन सौ से ज्यादा बहादुर फौजियों की जान चली गई। जम्मू बार्डर के गांवों में रहने वाले सैकड़ों लोग मारे गए, हजारों लोगों को अपना गांव छोड़ कर दूसरी जगह मुंतकिल होना पड़ा, काश्तकारों की आमदनी का जरिया यानि बडी तादाद में मवेशी भी मारे गए। वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी, डिफेंस मिनिस्टर निर्मला सीतारमण और होम मिनिस्टर राजनाथ सिंह बार-बार घिसा पिटा बयान देते रहे कि हम फौजियों की कुर्बानी को जाया नहीं जाने देगे। दहशतगर्दों और दहशतगर्द भेजने वाले पाकिस्तान को मुंह तोड जवाब देंगे लेकिन जवाब देते हुए सरकार कभी दिखाई नहीं दी। दूसरी तरफ महबूबा सरकार में शामिल बीजेपी वजीर और मेम्बरान असम्बली तक ने जम कर लूट मचाई, सरकारी और फौजी जमीनों पर कब्जे किए। जम्मू-कश्मीर में किसी दौर में इतने बडे पैमाने पर बदउनवानी (भ्रष्टाचार) नहीं हुई। हद यह है कि मामूली रेवेन्यू अफसर से आईएएस अफसर तक के तबादलो में पैसा खाया गया।

पूरा मुल्क जानता है कि भारतीय जनता पार्टी ने 2019 के लोक सभा एलक्शन के पेशेनजर महबूबा मुफ्ती से अपना दामन बचाने का काम किया है क्योंकि इस सवाल पर हर तरफ पार्टी की थू-थू तो हो ही रही थी मोदी के हिन्दुत्ववादी हामी भी अवाम को जवाब नहीं दे पा रहे थे। हुकूमत किसी भी तरह दहशतगर्दी पर काबू नहीं कर पा रही थी। तीन साल की महबूबा-बीजेपी सरकार में सबसे खतरनाक काम यह हुआ कि हजारों कश्मीरी नौजवानों ने पाकिस्तान के इशारे पर रायफलें थाम लीं मकामी तौर पर इतने दहशतगर्द पैदा हो चुके हैं कि अब पाकिस्तान को अपने यहां से भेजने की जरूरत ही नहीं है इन तीन सालों मे दूसरा खतरनाक काम यह हुआ है कि जम्मू और कश्मीर वादी दोनो ही इलाकों के लोगों के दरम्यान जो भाईचारा था वह नफरत में तब्दील हो गया।
जम्मू-कश्मीर में भारतीय जनता पार्टी के पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी से रिश्ता तोडने के बाद तमाम सियासी पार्टियां और सियासी तजजियानिगार यही कह रहे हैं कि यह एक बेमेल शादी थी और यह तो होना ही था मगर भारतीय जनता पार्टी ने सरकार में पार्टनर पीडीपी को बगैर कुछ बताए ही सरकार से अलग होने का फैसला किया वह न सिर्फ जम्हूरी कद्रों के मनाफी है बल्कि सीधे-सीधे गद्दारी के जुमरे में आता है और हर किसी को हैरान करने वाला है। सबसे बडी बात यह है कि मार्च 2015 में जब हुकूमतसाजी के लिए यह गठजोड़ हुआ था तब यह कहा गया था कि यह गठजोड़ मुल्क के मफाद में है और जब रिश्ता तोडने का फैसला किया गया तो यही कहा जा रहा है कि बीजेपी के लिए एक्तेदार कोई मायनी नहीं रखता मुल्क का मफाद पहले है। ऐसा कह कर यह तास्सुर देने की कोशिश है कि मुल्क में सिर्फ भारतीय जनता पार्टी ही ऐसी सियासी पार्टी है जो मुल्क के मफाद में अपने को वक्फ किए हुए बाकी तमाम सियासी पार्टियां खुदगरज, मौका परस्त और एक्तेदार की लालची हैं।
भारतीय जनता पार्टी के सरकार से हिमायत लेने के फैसले का एलान करने के बाद जनरल सेक्रेटरी राम माधव ने जो वजूह बयान कीं वह सीधे-सीधे बीजेपी को कठघरे में खडी करने वाली हैं। उन्होने कहा कि मरकज ने हर तरह की मदद की लेकिन महबूबा मुफ्ती रियासत में हालात पर काबू पाने में नाकाम साबित हुई। पीडीपी से गठजोड का मकसद रियासत जम्मू कश्मीर की तरक्की करना था। लेकिन महबूबा मुफ्ती ने जम्मू और लद्दाख को नजरअदांज किया। रमजान के दौरान फौजी आपरेशन रोका गया उम्मीद थी कि इसका मुसबत (सकारात्मक) असर होगा मगर न तो दहशतगर्दां पर असर पड़ा न तो हुर्रियत लीडरों पर। वारदातों में इजाफा हुआ। हम भले ही सरकार में थे लेकिन कयादत महबूबा मुफ्ती के हाथों में थी। पुलिस, इंतजामिया उनके मातहत थे। रियासत में हालात को संभालने में वह नाकाम रही। कश्मीर हिन्दुस्तान का अटूट हिस्सा है और सूबा के एत्तेहाद और सालमियत से किसी भी सूरत में समझौता नहीं किया जा सकता है। कश्मीर के हालात पर काबू पाने के लिए हमने सरकार से अलग होने का फैसला किया। लेकिन उन्होने सरकार से नाता तोडने की जो वजूह बताई हैं उनमें एक भी वजह ऐसी नहीं है जो अचानक पैदा हुई हो। राम माधव ने जो वजहें तफसील से बताई वह तो हुकूमतसाजी के वक्त से बदस्तूर पाई जा रही थीं हां एक वजह का एहसास हाल ही में बीजेपी को हुआ था कि अगर 2019 तक यह गठजोड़ बरकरार रहा तो लोक सभा एलक्शन में शदीद दुश्वारियों का सामना करना पड़ सकता है। क्योकि पीडीपी के साथ रहते हुए अवाम का सामना आसान न होगा। एक बीजेपी लीडर के मुताबिक जम्मू कश्मीर में जो सूरतेहाल पैदा हो गई थी और जिस तरह हमारे वोटर हम से नाराज होते जा रहे थे खुसूसन जम्मू और लद्दाख मे तो हमारे पास पीडीपी का साथ छोडने के अलावा कोई रास्ता ही नहीं बचा था। तजजियानिगार अब यह कह रहे हैं कि जम्मू कश्मीर हुकूमत में शामिल एक धडे ने खुद अपनी ही सरकार से गवर्नर राज की सिफारिश करके अपनी नाकामी को तस्लीम कर लिया है तो इसका जवाब सुब्रामण्यम स्वामी ने बेहतर तरीके से दिया है। उन्होने इसका एतराफ किया कि महबूबा मुफ्ती के साथ सरकार बनाना एक जुआ था मगर यह बाजी बीजेपी हार गई। उन्होने साफ लफ्जों में कहा कि डोगरा समाज हमारे खिलाफ हो गया है। हम अगर अब भी सरकार में शामिल रहते तो सारी सीटेंं हार जाते। सुब्रमण्यम स्वामी ने अपने ट्वीट में यह भी कहा कि राम माधव ने बीजेपी-पीडीपी सरकार की नाकामी का एतराफ किया है। इसके लिए राम माधव और डोभाल के सिवा कौन जिम्मेदार है?
बीजेपी के हिमायत लेने के फैसले की इत्तेला मिलते ही वजीर-ए-आला महबूबा मुफ्ती ने अपने काबीनी वुजरा और सीनियर लीडरों के साथ हंगामी मीटिंग की और गवर्नर एनएन वोहरा को अपना इस्तीफा सौपने का फैसला किया। गवर्नर को इस्तीफा देने के बाद उन्होने एक पुर हुजूम प्रेस कांफ्रेस में अपनी बातें तफसील से रखी। महबूबा मुफ्ती ने कहा कि यह गठजोड एक्तेदार के लिए कम बडे़ मकसद के लिए किया गया था। उन्होने कहा कि सरकार ने रियासत की शिनाख्त बरकरार रखने में कोई कसर नहीं छोडी। अम्न के लिए अलगाव पसंदों और पाकिस्तान से भी बात होना चाहिए मगर मरकजी सरकार और बीजेपी इसके खिलाफ थे। उन्होने कहा कि बीजेपी चाहती थी कि कश्मीर में ताकत और सख्ती की पालीसी अख्तियार की जाए मगर यह पालीसी कश्मीर में नहीं चल सकती। पीडीपी की पालीसी हीलिंग टच की है। उनकी सरकार ने दफा 370 के ताल्लुक से जो खदशात और अंदेशे थे उसे दूर किया। रमजान में यकतरफा सीज फायर कराया, मकालमा (संवाद) की राह खोली, ग्यारह हजार नौजवानों पर दर्ज मुकदमात वापस कराए हमारा एजेण्डा पूरा हुआ।
इस तरह देखा जाए तो जम्मू कश्मीर हुकूमत में शामिल दोनों सियासी पार्टियां अपनी अपनी कांस्टीटूएंसी से मुखातिब हैं और अपनी सियासी जमीन को मुस्तहकम करने में लग गई हैं यही वजह है कि कहा जा रहा है कि महबूबा मुफ्ती सरकार से हाथ खीचने का फैसला रमजान में ही कर लिया गया था और राम माधव ने हाल ही में गवर्नर एनएन वोहरा से मुलाकात के दौरान गवर्नर राज की तारीख तय कर दी गई थी बीजेपी का यह मानना है महबूबा मुफ्ती के फैसलों से हुए सियासी नुक्सान की तलाफी दहशतगर्दी के खिलाफ सख्ती दिखाकर की जा सकती है।
पीडीपी से नाता तोडने पर अपना रद्देअमल जाहिर करते हुए कांग्र्रेस सदर राहुल गांधी ने कहा कि गठजोड़ सरकार ने जम्मू कश्मीर को आग में झोक दिया जिस में बेकुसूर लोगों और हमारे बहादुर जवानों की जानें चली गई। फौजी नुक्ता-ए-नजर से हिन्दुस्तान को नुक्सान हुआ है और यूपीए सरकार की बरसों की सख्त मेहनत पर पानी फिर गया। गवर्नर राज में नुक्सान जारी रहेगा। गुरूर, अनारकी और नफरत हमेशा नाकाम होती है जबकि जम्मू कश्मीर के साबिक वजीर-ए-आला और कांग्रेस के सीनियर लीडर गुलाम नबी आजाद ने कहा कि मार्च 2015 में बीजेपी और पीडीपी के बीच जो गठजोड हुआ था वह पूरी तरह से गैर अखलाकी (अनैतिक) था। उन्होने कहा कि चुनावी मुहिम के दौरान दोनां पार्टियों ने एक दूसरे पर संगीन इल्जाम लगाए थे लेकिन एलक्शन खत्म होने के बाद हाथ मिला लिया। उन्होने कहा कि पीडीपी पर कश्मीर के लोगों ने भरोसा किया तो जम्मू के लोगों ने बीजेपी के तयीं एतमाद जाहिर किया। पीडीपी ने कश्मीर के लोगों के साथ और बीजेपी ने जम्मू के लोगों के साथ गद्दारी की और मरकजी सरकार ने रियासत और पूरे मुल्क के साथ गद्दारी की। गुलाम नबी आजाद ने कहा कि इन लोगों ने जो पाप किया है उससे बरी नहीं हो सकते। उन्होने कहा कि चुनाव के वक्त वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी ने बडी बडी बातें की थीं कश्मीरियत, जम्हूरियत और इंसानियत की। उन्होने कश्मीरियत को खत्म किया, इंसानियत को दफन किया और जम्हूरियत को नुक्सान पहुचाया। उन्होने कहा कि कभी सीज फायर की इतनी खिलाफवर्जी नहीं हुई और न ही इतने जवान मारे गए। उन्होने कहा कि पहले दहशतगर्द बनने वाले नौजवान कम पढे लिखे होते थे लेकिन इस वक्त पढे लिखे लोग दहशतगर्द बन गए। उन्होने कहा कि दोनां पार्टियों ने फिर वही राग अलापना शुरू कर दिया है जो चुनाव से पहले शुरू किया गया था जबकि गठजोड के वक्त कहा गया था कि जम्मू और कश्मीर के बीच जो जज्बाती दूरी है उसे पाटा जा सकता है। लेकिन इसके लिए जो एजेडा बना था वह भुला दिया गया और दोनों पार्टियां अपनी अवामी हिमायत को मुतमइन करने में लगी रहीं।

कश्मीर मे गवर्नर राज नाफिज होने के बाद ऐसी आवाजें उठना शुरू हो गई हैं कि गठजोड सरकार जाने के बाद रियासत के मसायल को नए सिरे से निपटाने का मौका मिलेगा। गवर्नर राज के दौरान पुलिस नीम फौजी दस्तों और फौज को दहशतगर्दी के खिलाफ काम करने का खुला मौका मिलेगा। सलामती दस्ते दहशतगर्दी, अलगावपसदी, पत्थरबाजों के खिलाफ सियासी मदाखलत के बगैर काम कर सकेंगे। बीजेपी ने कश्मीर से दहशतगर्दी को खत्म करने के बडे बडे दावे किए थे मगर जमीनी हकीकत यह है कि जहां 2013 में तशद्दुद के वाक्यात महज 170 पेश आए थे तो दिसम्बर 2017 में यह तादाद बढकर 400 से ज्यादा हो गई और दावा यही किया गया कि हालात पहले से बहुत बेहतर हैं। लेकिन हिमायत वापस लेने के बाद बीजेपी लीडर कश्मीर के जो हालात बयान कर रहे हैं वह यही बताते हैं कि असलियत दावों से बहुत मुख्तलिफ थी और हालात बद से बदतर होते जा रहे थे।
गवर्नर राज नाफिज होने के बाद होम मिनिस्टर राजनाथ सिंह ने कहा हम कश्मीर से दहशतगर्दी का सफाया करके ही दम लेगें। दहशतगर्दी किसी भी कीमत पर बरदाश्त नही की जाएगी। तो आर्मी चीफ बिपिन रावत ने कहा कि कश्मीरवादी में पहले की तरह दहशतगर्दों के खिलाफ फौजी मुहिम जारी रहेगी। उन्होने यह भी कहा कि गवर्नर राज में फौजी मुहिम पर कोई असर नहीं पडेगा। उन्होने यह भी कहा कि फौजी आपरेशनों में किसी तरह की सियासी मदाखलत नहीं होती।