आरएसएस के घर में प्रणव मुखर्जी

आरएसएस के घर में प्रणव मुखर्जी
हिसाम सिद्दीकी
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने इस बार साबिक राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को नागपुर के रेशमी बाग में वाके अपने सदर दफ्तर में बुलाया। सात जून के जलसे में जाने के लिए प्रणव मुखर्जी ने हामी ही भरी थी कि हंगामा मच गया। प्रणव मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी समेत सी के जाफर शरीफ और जयराम रमेश जैसे उनके पुराने दोस्तों ने मश्विरा दिया कि उन्हें आरएसएस हेडक्वार्टर में नहीं जाना चाहिए। लेकिन वह गए। वहां उन्होने जम्हूरियत में रवादारी (सहिष्णुता) और राष्ट्रवाद पर जो कुछ कहा जाहिर है वह आरएसएस के राष्ट्रवाद से पूरी तरह उलट था। प्रणव मुखर्जी के आरएसएस के सदर दफ्तर जाने को पूरा आरएसएस कुन्बा अपनी जीत की तरह पेश कर रहा है तो दूसरी तरफ कांग्रेस उनकी तकरीर को अपनी जीत मानकर बात कर रही है। कई कांग्रेस लीडरान का कहना है कि उन्होने आरएसएस दफ्तर में जाकर राष्ट्रवाद के नाम पर पूरे आरएसएस कुन्बे को आइना दिखाने का काम किया है। मतलब यह कि दोनों ही इसे अपनी जीत की शक्ल में पेश कर रहे हैं। कांग्रेस लीडरान तो अब अपनी खिसियाहट मिटाने के लिए इस पूरे मामले पर मुबैयना (कथित) आइने का पर्दा डालने का काम कर रहे हैं। दूसरी तरफ आरएसएस के पास चूंकि उनके पूर्वजों में एक विनायक दामोदर सावरकर के अलावा कोई दूसरा कद्दावर लीडर हुआ ही नहीं इसलिए वह उधार की शख्सियतों के जरिए अपनी हैसियत बढाने की कोशिशों में लगा रहता है। इसी लिए आरएसएस कुन्बा और खुद नरेन्द्र मोदी कभी सरदार वल्लभ भाई पटेल पर कब्जा करने की कोशिशें करते दिखते हैं तो गुजराती होने की वजह से कभी गांधी को अपना बनाने की कोशिशें करते हैं तो कभी लाल बहादुर शास्त्री को अपनाते दिखते हैं। इसमें कोई शक नहीं कि सावरकर जंगे आजादी के बडे़ सिपाही थे लेकिन गिरफ्तार होने के बाद शायद वह जेल की अजीयतें (यातनाएं) बर्दाश्त नहीं कर पाए और माफी मांग कर बाहर निकले तो नफरत के रास्ते पर चल पडे़। ऐसी सूरत में आरएसएस करे तो क्या करे इसी उधेड़बुन में उन्होने प्रणव मुखर्जी को बुलाया था।
प्रणव मुखर्जी का आरएसएस हेडक्वार्टर पर जाना यकीनन आरएसएस की ही जीत है आज उनके पास दिखाने के लिए भी कोई बड़ी शख्सियत नहीं है। आरएसएस कुन्बे में जो कुछ बचा है उसमें दो ही लोग हैं एक अटल बिहारी वाजपेयी जो प्रणव मुखर्जी से बहुत बड़ी शख्सियत के मालिक हैं लेकिन वह शदीद तौर पर बीमार है। दूसरे लाल कृष्ण आडवानी हैं जिनकी हैसियत खुद उन्हीं के पाले पोसे नरेन्द्र मोदी ने ही किसी लायक नहीं छोड़ी। आज नरेन्द्र मोदी के रसोइए की जितनी हैसियत है लाल कृष्ण आडवानी उस हैसियत के भी नहीं हैं। अब तो वह हाथ जोड़े खड़े रहते हैं और नरेन्द्र मोदी उनकी तरफ देखते तक नहीं हैं। शख्सियतों के इतने बडे़ बोहरान (संकट) से गुजर रहे आरएसएस ने प्रणव मुखर्जी को बुलाकर अपना बोहरान (संकट) बड़ी हद तक कम कर लिया। कांग्रेस के जो लोग अपनी जीत का एहसास करा रहे हैं वह सिर्फ और सिर्फ शुतुरमुर्ग जैसी हरकतें कर रहे हैं। जिस तरह शुतुरमुर्ग रेत में अपना सर घुसेड़ कर यह समझने लगता है कि उसे कोई देख नहीं पा रहा है। ठीक उसी तरह कांग्रेसी यह समझने लगे हैं कि आरएसएस दफ्तर में जाकर प्रणव मुखर्जी आरएसएस को राष्ट्रभक्ति का कांग्रेसी फलसफा (दर्शन) दे आए हकीकत यह है कि आरएसएस पर प्रणव मुखर्जी की बातों का जर्रा बराबर भी असर नहीं पड़ा है। मुखर्जी के नागपुर से वापस आने के अगले ही दिन से आरएसएस चीफ मोहन भागवत समेत कई लीडरान के बयानात आने लगे कि हिन्दुस्तान का मुस्तकबिल (भविष्य) तो सिर्फ हिन्दुत्व में ही है। हिन्दुत्व मे सभी को पूरी तरह शामिल करने के अलावा भारत के पास दुनिया का लीडर बनने का दूसरा कोई जरिया नहीं है।
इस पूरे मामले में सबसे अच्छी बात खुद प्रणव मुखर्जी की अपनी बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी ने ही कही। उन्होने प्रणव के वहां जाने से पहले ही कहा था कि उनके वालिद आरएसएस हेडक्वार्टर पर जाकर क्या कहेंगे यह तो चंद दिनों में ही भुला दिया जाएगा। बस तस्वीरें रहेंगी और उन तस्वीरों को दिखा कर आरएसएस हमेशा फायदा उठाता रहेगा। हो भी यही रहा है। प्रणव मुखर्जी ने ‘संघ भवन’ में जाकर राष्ट्रवाद के लिए जो कुछ कहा उसे आरएसएस लीडरान ने अगले ही दिन भुला दिया और अपने फार्मूले को ही सबसे अच्छा करार दे दिया। हां दुनिया को दिखाने के लिए उनकी तस्वीरें ही रह गई हैं। जिन्हें वह आने वाले कई सालों तक दिखाते और उन्हें दिखाकर फायदा उठाते रहेगें।
प्रणव मुखर्जी इंतेहाई चालाक किस्म के सियासतदां हैं। वह एक दो बार के अलावा कभी एलक्शन नहीं लडे़ लेकिन कांग्रेस की पहली सफ (प्रथम पंक्ति) के लीडर बने रहे। वह इतने चालाक हैं कि लाल बहादुर शास्त्री की तरह कांग्रेस में रह कर पूरी जिंदगी आरएसएस के मफाद में काम करते लेकिन पंडित जवाहर लाल नेहरू जैसा होशियार लीडर भी शास्त्री की हकीकत समझ नहीं सका था। उसी तरह प्रणव मुखर्जी हैं, रहे कांग्रेस में, राजीव गांधी के दौर के अलावा तकरीबन पूरी सियासी जिंदगी उन्होने वजीर बन कर गुजारी लेकिन काम वह भी आरएसएस के फायदे में ही करते रहे। राजीव गांधी ने उन्हें पहचाना था तो उन्होने न सिर्फ यह कि उन्हें वजीर नहीं बनाया बल्कि कांग्रेस से बाहर भी कर दिया था। उस वक्त प्रणव मुखर्जी ने बंगाल में अपनी अलग इलाकाई पार्टी बना ली थी एक ही एलक्शन में उनकी सियासी हैसियत भी जाहिर हो गई थी। राजीव गांधी के बाद वह फिर कांग्रेस में वापस आ गए। मनमोहन सिंह की कयादत वाली यूपीए के दूसरे दौर की सरकार 2009 से 2014 के दरम्यान प्रणव मुखर्जी मनमोहन सिंह को हटाकर वजीर-ए-आजम बनने के लिए इतने उतावले रहने लगे थे कि कई बार उन्होने अपनी ही सरकार को परेशानी में डालने का काम भी किया। उस वक्त कई सीनियर कांग्रेसियों को यह शुब्हा भी हुआ था कि वजीर की हैसियत से वह अपनी ही सरकार को ‘सर्बोटाज’ कर रहे थे। उन्हें बाइज्जत तरीके से सरकार से बाहर करने की गरज से ही सोनिया गांधी ने उन्हें राष्ट्रपति बना दिया था। राष्ट्रपति बनने के बाद 2014 में जब नरेन्द्र मोदी मुल्क के वजीर-ए-आजम बने तो प्रणव मुखर्जी उनके साथ हो लिए। मुल्क की तारीख में पहली बार आरएसएस के चीफ मोहन भागवत को राष्ट्रपति भवन में दावत पर बुलाया गया।  खुद नरेन्द्र मोदी ने कई बार कहा है कि प्रणव मुखर्जी ने राष्ट्रपति रहते हुए उनके साथ वैसा ही बर्ताव किया जैसा कोई वालिद अपने बेटे से करता है।
अपनी इसी चालाकी की वजह से प्रणव मुखर्जी ने आरएसएस हेडक्वार्टर पर अपनी तकरीर में आरएसएस के राष्ट्रवाद से उलट राष्ट्रवाद की बातें तो कीं लेकिन एक बार भी यह नहीं कहा कि गांधी के कातिल और देश के पहले दहशतगर्द नाथूराम गोडसे से आरएसएस ने आज तक खुद को अलग न करने का काम क्यों नहीं किया। गोडसे सीधे आरएसएस से जुड़ा तो नहीं था लेकिन देश में आज जो लोग कई प्रदेशों में उसका जन्म दिन मनाते हैं उसकी तारीफें करते हैं और उसका मंदिर बनाने का एलान करते हैं वह लोग तो आरएसएस के ही हैं। खुद नाथूराम गोडसे आरएसएस की आडियोलाजी मानता था। उसी से मुतास्सिर (प्रभावित) होकर उसने गांधी को कत्ल करने का गुनाह किया था। प्रणव मुखर्जी साबिक राष्ट्रपति हैं इसी हैसियत से उन्हें नागपुर बुलाया गया था उनकी मौजूदगी में जो प्रोग्राम हुआ उसमें भगवा झण्डा फहराया गया, आरएसएस का गीत नमस्ते सदा वत्सले गाया गया। न तो उस जलसे में कौमी परचम तिरंगा फहराया गया न कौमी तराना ‘जन गण मन’ गाया गया न कौमी गीत वंदे मात्रम लेकिन इन बातों का प्रणव मुखर्जी ने अपनी तकरीर में न तो जिक्र किया और न ही इसपर एतराज किया। मतलब साफ है कि उन्हें आरएसएस की अपनी ‘हिन्दूराष्ट्र’ की कार्रवाई से कोई गुरेज नहीं था। इसी लिए उन्होने गांधी के कत्ल का जिक्र तक नहीं किया।
दुनिया जानती है कि आरएसएस ने हमेशा नफरत की सियासत की है। इसके बावजूद प्रणव मुखर्जी ने विजिटर्स बुक में अपना कमेण्ट लिखते हुए लिखा कि ‘हेडगेवार’ देश के अजीम (महान) सपूत थे। उन्हें खिराजे अकीदत (श्रद्धांजलि) देने का मौका पाकर उन्हें (मुखर्जी को) फख्र महसूस हो रहा है। अब उनसे कौन पूछे कि आखिर हेडगेवार अपने किन कामों की वजह से देश के अजीम सपूत बन गए? देश के पहले होम मिनिस्टर सरदार पटेल ने खुद ही हेडगेवार को ग्यारह सितम्बर 1948 को लिखे अपने खत में कहा था भले ही आप और आप की तंजीम आरएसएस खुद को देशभक्त बताती है लेकिन दिक्कत तब पैदा होती है जब आप लोग मुसलमानों से इंतकाम (प्र्रतिशोध) लेने की बात करते हैं और बेगुनाहों को मारने मरवाने में हिचक महसूस नहीं करते। सरदार पटेल ने लिखा था कि आरएसएस पर पाबंदी लगे छः महीनों से ज्यादा हो गए फिर भी आप लोग हमारी बातों को मानने की कोशिश तक नहीं करते। जिन हेडगेवार को सरदार पटेल तक ने गलत रास्ते पर चलने वाला करार दिया था वह हेडगेवार प्रणव मुखर्जी को देश के अजीम सपूत दिखने लगे शायद इसलिए कि हेडगेवार भी प्रणव मुखर्जी की तरह पहले कांग्रेसी थे कांग्रेस से निकल कर ही उन्होने आरएसएस बनाने का काम किया था।