रोजा और तर्के गुनाह

रोजा और तर्के गुनाह

 

मौलाना ओसामा आकिल इस्मतुल्लाह

अल्लाह तआला का इशाद है-‘ऐ ईमान वालो! रोजा तुम पर फर्ज किया गया है जैसे पहली उम्मतों पर फर्ज किया गया था ताकि तकवा हासिल कर सको।’ (बकरा-183) और इसी रमजान महीने में एक रात बड़ी अहम है जिसे लैलतुल कद्र (कद्र की रात) कहा जाता है और यह रमजान के आखिरी अशरे की ताक रातों (21, 23, 25, 27, 29) में से एक रात है। नबी करीम (सल0) फरमाते हैं कि पूरे बाहर महीनों में रमजानुल मुबारक यह एक बाबरकत महीना है जिसमें जन्नत के दरवाजे खोल दिए जाते हैं और शैतान कैद कर दिए जाते हैं। (बुखारी व मुस्लिम) यह वह मुबारक महीना है जिसका पहला अशरा रहमत का है, दूसरा अशरा मगफिरत का है और तीसरा अशरा जहन्नुम से आजादी का है।

जो लोग रोजा रखकर और तरावीह पढ कर भी गुनाहों और जरायम से बाज नहीं आते और तौबा व इस्तगफार से महरूम रहते हैं वह बड़े बदकिस्मत रोजेदार हैं कि रोजा और तहज्जुद के बावजूद सवाब से महरूम हैं। ऐसे लोगों के बारे में आप (सल0) का इरशाद है-‘कितने रोजेदार ऐसे हैं जिन्हें उनके रोजे से भूक व प्यास के सिवा कुछ नहीं मिला और कितने तहज्जुद गुजार ऐसे हैं जिनके तहज्जुद से उनको शबबेदारी के सिवा कुछ नहीं मिलता (मुसनद दारमी) ऐसे बेअमल रोजेदारों का रोजा बेकार है। हदीस कुदसी में है कि नबी करीम (सल0) अल्लाह तआला का फरमान सुनाते हैं। अल्लाह तआला ने इरशाद फरमाया-‘रोजा मेरे लिए है और मैं इसका बदला दूंगा। यानी रोजा बंदा मेरे लिए रखता है तो उसकी जजा खुद दूंगा। (बुखारी शरीफ) नबी करीम (सल0) रोजेदार के हक में इरशाद फरमाते हैं-‘जिस शख्स ने कौल व बातिल और उसपर अमल तर्क नहीं किया तो अल्लाह तआला को उसके भूके और प्यासे रहने की कोई परवा नहीं है। (बुखारी)

जब रमजानुल मुबारक का महीना आता है तो आम तौर पर यह देखने को मिलता है कि नौजवान जिनको अल्लाह तआला ने जिस्मानी तौर पर काफी कुवत व ताकत दे रखी है यानी देखने में बिल्कुल सेहतमंद और तनदुरूस्त होते हैं, मोटे-फरबे नजर आते हैं मगर वह रोजे से बिल्कुल लापरवा होते हैं तो ऐसे लोगों को मालूम होना चाहिए कि वह एक फर्ज रोजा बिला उज्र तर्क करने का कफ्फारा सारी उम्र के रोजे से भी नहीं बन सकते। (सही बुखारी)

इस मुबाकर महीने में झूट, बोहतान, गीबत, हराम खोरी और दीगर तमाम आलूदगियों से पूरी तरह परहेज करना चाहिए। रोजे की हालत में कान, आंख, पेट, सतरगाह और दीगर तमाम आजा की हिफाजत न कर सके तो ऐसे रोजेदारों के बारे में नबी करीम (सल0) ने इरशाद फरमाया है-‘बहुत से रोजेदार ऐसे हैं जिनको भूक और प्यास के अलावा कुछ हासिल नहीं होता।’

रोजे की हालत में जहां गुनाहों से परहेज लाजिम है वहीं बेफायदा और लायानी मशागिल से बजचना भी बेहद जरूरी है। क्योंकि बेमकसद के मशगले इंसान को अस्ल मकसद से हटा देते हैं। बहुत से लोग ऐसे हैं जो रोजा को अहमियत नहीं देते बल्कि खेल-कूद, शतरंग, तफरीह, तमाशा, टेलीविजन और फिल्मबीनी में अपना कीमती वक्त जाया कर देते हैं। इस मुबारक महीने में दिलों की सफाई बहुत जरूरी है जिस दिल में बुग्ज व हसद, कीना और अदावत हो वह दिल इस मुबाकर महीने की बरकतों और सआदतों से फायदा नहीं उठा सकते इसलिए बेहतर है कि आपस में जो रंजिश हो उससे दिल को पाक व साफ कर लिया जाए और किसी से आपस में अदावत और कीना न रखा जाए। इस मुबारक महीने का दिल व जबान और अमल से एहतराम किया जाए। खुलेआम खाना-पीना रोजेदारों से तंज करना बहुत ही गुस्ताखी है ऐसा करने से ईमान के फुकदान होने का अंदेशा है।

नबी करीम (सल0) का इरशाद है -‘जिस रोजेदार ने झूट बोलना, झूट पर अमल करना और नादानी का काम न छोड़ा तो अल्लाह को कोई जरूरत नहीं है कि ऐसा शख्स बिला वजह रोजे के नाम पर अपना खाना-पीना छोड़े। (बुखारी)

रोजे के जरूरी आदाब में यह बात भी शामिल है कि जिस तरह खाने-पीने से मुंह बंद रखते हैं उसी तरह दूसरे गुनाहों को बिल्कुल तर्क कर दे। बड़ी अजीब सी बात है कि लोग रोजे की हालत में खाने-पीने  और सोहबत के तर्क को तो बहुत जरूरी समझते हैं लेकिन गुनाह केे तर्क को जरूरी नहीं समझते। हालांकि वह तीनों काम ऐसे हैं कि दूसरे दिनों में हलाल भी थे और रमजानुल मुबारक में भी इफ्तार के बाद से सेहरी तक जायज है। जब रोजे की वजह से बाज हलाल काम भी हराम हो गए तो जो आमाल हर वक्त हराम है उनका तर्क करना रोजे में क्यों जरूरी न होगा?

अल्लाह तआला का इरशाद है-‘फिर जिसने जर्रा बराबर भी नेकी की होगी वह उसको देख लेगा और जिसने जर्रा बराबर भी बुराई की होगी वह उसको देख लेगा।’ नबी करीम (सल0) ने इरशाद फरमाया-‘ अगर तुम गुनाहों से न बचे तो खाना-पीना छोड़ने का क्या फायदा।’ इस हदीस के मकसूद पर गौर करने की जरूरत है। यानी यह कि गुनाह को तर्क का एहतमाम खासकर रोजे में बहुत जरूरी है। यह बात हर मुसलमान जानता है कि गुनाह एक बुरी चीज है तो कम से कम एक महीने के बाद गुनाह करने की इजाजत होगी। क्योंकि नफ्स से वादा मुशाबहत शक्ल है इसलिए मैंने यह कहा कि एक महीने के लिए गुनाह न करने का अहद कर लो इसमें आसानी होगी और हमेशा के लिए तंबीह (नसीहत) हो जाती है। पस नफ्स से कह दो कि रमजान तक कोई गुनाह न करे और सिर्फ एक महीने का अहद उससे लो फिर उसके बाद मुझे यकीन है कि इंशाअल्लाह रमजानुल मुबारक तकवा की हालत में गुजर गया तो फिर यह तकवा इशाअल्लाह बाकी रहेगा।

गरज कि इस मुबारक महीने के लिए तमाम गुनाहों को तर्क कर दो जबान के गुनाह भी जैसे बिला वजह गालियां बकना, गीबत करना, दूसरों की शिकायतें करना, कसदन किसी गंदे मजमून का मुताला करना वगैरह। कान के गुनाह भी जैसे गाने सुनना, गालियां सुनना, बेकार की बातें सुनना वगैरह। हाथ के गुनाह जैसे किसी पर बेजा जुल्म करना, अपने से कमजोरों को मारना-पीटना, सूदी मजमून का लिखना वगैरह। इसी तरह पैरों (कदमों) के गुनाह भी जैसे नाच गानों की महफिलांे में जाना, झूटे मुकदमों की पैरवी के लिए जाना, झूटी शहादत के लिए जाना, कहीं चोरी की नीयत से जाना वगैरह। और सबसे बढकर पेट के गुनाह जैसे रिश्वत, सूद, और गसब के माल खाना वगैरह। गरज कि रमजानुल मुबारक में हर किस्म के गुनाह चाहे वह कबीरा हो या सगीरा हमे तर्क करने देने चाहिए। फिर हमरा रोजा सही मायनी में एक मुबारक रोजा होगा और फिर यही रोजा यौमे हश्र में हमारी शफाअत करेगा। ऐसे ही रोजे के बारे में अल्लाह तआला इरशाद फरमाते हैं-‘मैं खुद इसका बदला देता हंू।’ और अगर हम गुनाह तर्क न किए तो रोजा तो होगा लेकिन ऐसा होगा जैसे तुम अपने किसी दोस्त से कहो कि वह तुम को एक आदमी ला दे और वह तुम को एक ऐसा आदमी ला दे जिसके कान भी न हों, आंख भी न हों, लंगड़ा भी हो बात भी न कर सकता हो तो यह शख्स आदमी तो जरूर है लेकिन बेकार सिर्फ सांस चल रहा है। इसी तरह गुनाहों में लिपटा हुआ रोजा भी ऐसा ही है कि उसे जमीन दफन कर दिया जाए। ा

खुलासा कलाम यह कि शरीअत ने हमें जिन चीजों के करने पर कारबंद बनाया है उन्हें बजा लाएं और जिनसेे बचने की तंबीह की है उनको बिल्कुल तर्क कर दे। तभी हमरा रोजा इस्लामी रोजा होगा। अल्लाह तआला हम मुसलमानों को रमजानुल मुबारक के महीने में ज्यादा से ज्यादा नेक आमाल करने और बुरे कामों से बचने की तौफीक अता फरमाए-आमीन।