कारपोरेट कम्पनी के लिए 13 गरीबों का कत्ल

कारपोरेट कम्पनी के लिए 13 गरीबों का कत्ल

चेन्नई! तमिलनाडु तोतिकोरन के मेलवतीन में वेदंता ग्रुप स्टरलाइट कम्पनी के खिलाफ मुजाहिरा कर रहे निहत्थे लोगों पर 22 मई को फायरिंग करके पुलिस ने एक दर्जन लोगों की जान ले ली। डीएमके लीडर एम के स्टालिन ने इस वाक्ए को जलियांवाला बाग जैसा वाक्या करार दिया है। अगले दिन 23 मई को पुलिस ने फायरिंग की जिसमें एक नौजवान मारा गया। 22 मई की फायरिंग में मरने वालों में एक सत्रह साल की लड़की भी शामिल थी जो इस बात का सबूत है कि स्टरलाइट के खिलाफ मुजाहिरा करने वाले लोग अपनी बात कहने के लिए इकट्ठा हुए थे अगर उन्हें तशद्दुद (हिंसा) करना होता तो मुजाहिरे में औरतें शामिल न होतीं। अब कोई पुलिस अफसर यह बताने के लिए तैयार नहीं है कि फायरिंग क्यों और किस के आर्डर पर हुई। इस बीच 23 मई को एक वीडियो सामने आ गया जिसमें पुलिस की एक बक्तर बंद गाड़ी की छत पर सादे कपड़ों में चढा एक शख्स एके सीरीज की खतरनाक रायफल से फायरिंग कर रहा है। पीछे से तमिल जबान में कोई शख्स यह कह रहा है ‘मारो-मारो, एक तो मरना चाहिए’। मशहूर अदाकार रजनीकांत ने इस फायरिंग की मजम्मत करते हुए कहा कि जब तक इलाके के लोग मुत्मइन न हों फैक्ट्री में काम नहीं शुरू होना चाहिए। अदाकार से सियासतदां बने कमल हासन जख्मियों को देखने अस्पताल पहुचे उन्होने कहा कि यह तो जुल्म की इंतेहा है। 23 मई को हाई कोर्ट ने फैक्ट्री का काम बंद करने का आर्डर देते हुए इसे माहौलियात (पर्यावरण) से मुताल्लिक क्लियरेंस दिए जाने पर सवाल उठाए और कहा कि अवामी सुनवाई के बगैर काम शुरू नहीं किया जाना चाहिए था। फायरिंग के सिलसिले में तो कई लोग अब यह कहने लगे हैं कि पुलिस की मिलीभगत से फैक्ट्री मालिकान ने ही बेवजह फायरिंग करवाई। चैतरफा दबाव के बाद वजीर-ए-आला ए के पलानी स्वामी ने हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज से पूरे मामले की तहकीकात कराने का एलान किया।
1996 में फैक्ट्री के जरिए पूरे इलाके में आलूदगी (प्रदूषण) फैलाने का इल्जाम लगाते हुए अवाम ने बडे़ पैमाने पर मुजाहिरा किया था तभी 12 मार्च को फैक्ट्री गैस लीक हो गई तो तेरह मार्च को उस वक्त की वजीर-ए-आला जय ललिता ने फैक्ट्री बंद करने का आर्डर कर दिया था। मई 2015 में एनजीटी और एनईईआरआई दोनों की क्लियरेंस के बाद फैक्ट्री में काम शुरू हुआ यह काम प्लाण्ट की तौसीअ (विस्तार) का भी था। लोगों ने फिर हंगामा किया लेकिन मरकजी सरकार की मेहरबानी से फैक्ट्री का काम जारी रहा। 27 मार्च 2018 को रियासती पालूशन बोर्ड ने फैक्ट्री के लाइसंेस पर रोक लगाई और काम बंद हो गया। अब इलाके के लोगों का कहना है कि वह किसी भी कीमत पर स्टरलाइट को चलने नहीं देंगे क्योंकि इससे उनकी जिंदगी को खतरा है।
याद रहे कि मनमोहन सिंह सरकार के दौरान वेदंता ग्रुप ने उडीसा के साहिली इलाके मंे बड़े पैमाने पर स्टरलाइट का काम शुरू करने की बात की थी उस वक्त मरकजी वजारत माहौलियात (पर्यावरण) ने इसकी इजाजत नहीं दी थी जयंति नटराजन वजारत माहौलियात में वजीर थी। जयंति के बाद यह मोहकमा जयराम रमेश को मिला तो उन्होने भी इजाजत नहीं दी। उस वक्त भारतीय जनता पार्टी ने इल्जाम लगाया था कि वेदंता से उनके प्रोजेक्ट को क्लियर करने के लिए लम्बी रिश्वत मांगी गई। रिश्वत नहीं मिली तो प्रोजेक्ट क्लियर नहीं किया गया। 2014 में मोदी सरकार आने के बाद दीगर कई कारपोरेट घरानों की तरह वेदंता ग्रुप के भी हौसले बुलंद हो गए जिसका नतीजा तमिलनाडु में सामने आया है।
वेदंता ग्रुप की स्टरलाइट कम्पनी के खिलाफ मुबैयना (कथित) मशाल मुजाहिरे पर काबू पाने के लिए पुलिस को ताकत का इस्तेमाल करना पड़ा जिसके नतीजे मंे एक दर्जन मुजाहिरीन मौत की आगोश में चले गए। मुजाहिरीन के खिलाफ ताकत का इस्तेमाल अगर जरूरी था तो फिर सरकार की जानिब से हलाक होने वालों के घर वालों को दस-दस लाख और शदीद तौर पर जख्मी लोगों को तीन-तीन लाख और मामूली तौर पर जख्मियों को एक-एक लाख रूपए का मुआवजा देने का एलान क्यांे करना पड़ा। हलाक होने वालों के घरवालों और जख्मियों को मुआवजा देने का सरकार का फैसला यही जाहिर करता है कि मुजाहिरीन के खिलाफ पुलिस ने ताकत का जो इस्तेमाल किया है वह दुरूस्त नहीं था। अगर मुजाहिरीन तशद्दुद पर आमादा थे और उन्होने अवामी इमलाक को नुक्सान पहंुचाया तो पुलिस कार्रवाई हक बजानिब थी तो फिर मुआवजा देने की जरूरत क्यों आन पडी। दरअस्ल मामला यह है कि मरकजी सरकार यही चाहती है कि स्टरलाइट कम्पनी अपने प्लाण्ट का काम जारी रखे। उसे इसकी कतई फिक्र नहीं है कि स्टरलाइट प्लाण्ट चलने से होने वाली आलूदगी का इलाके के लोगों की जिंदगियांे पर कितना ही बुरा असर क्यों न पडे उसकी उसे परवा नहीं है तभी तो बगैर किसी सर्वे और लोगोें की दिक्कतों और परेशानियांे को नजरअंदाज करते हुए प्लाण्ट चलाने का फैसला कर दिया गया। जब हालात काबू से बाहर हो गए और कई लोगों की जानें चली गईं और कई लोग जख्मी हो गए तब सरकार की जानिब से यह एलान किया गया कि पूरे मामले की जांच एक रिटायर्ड जज से कराई जाएगी। कहा गया कि 22 मई को करीब पांच हजार मुजाहिरीन तशद्दुद पर उतारू थे और पुलिस से भिड गए और गाडियों और अवामी इमलाक को आग के हवाले कर दिया। तशद्दुद और पुलिस कार्रवाई के बाद सरकार ने यकीन दिलाया कि प्लाण्ट के बारे में लोगों के जज्बात का एहतराम करते हुए कार्रवाई की जाएगी। लेकिन सरकार की जानिब से यह भी कहा गया है कि लाठी चार्ज और गोलीबारी समेत पुलिस कार्रवाई नागुजीर हालात के सबब हुई है। तो दूसरी तरफ सरकार के बयान में यह भी कहा गया कि जिला कलेक्ट्रेट और स्टरलाइट प्लाण्ट तक करीब बीस हजार लोगों ने जूलूस निकाला। मंशा प्लाण्ट और कलेक्टेªट का घेराव करने का था। यह लोग मतालबा कर रहे थे कि तांबा प्लाण्ट को मुस्तकिल तौर से बंद किया जाए इसी दौरान तशद्दुद भड़क उठा। भीड़ के जरिए किए गए तशद्दुद में पुलिस गाडियों को आग के हवाले कर दिया गया जो कलेक्टेªट में खडी थीं और कलेक्टर दफ्तर में पथराव किया गया। सरकारी बयान में यह भी कहा गया कि बेकाबू होते हालात को काबू में करने के लिए कार्रवाई करके तशद्दुद (हिंसा) पर कंट्रोल किया गया। अगरचे हालात काबू मंे हैं लेकिन पूरे इलाके में कशीदगी पाई जा रही है। लोग यह सवाल भी कर रहे हैं कि जब मामला सुप्रीम कोर्ट मंे जेरे समाअत है तो प्लाण्ट को चलाने का फैसला क्यों किया गया। वेदंता ग्रुप की इकाई स्टरलाइट इंडस्ट्रीज इंडिया लिमिटेड का प्लाण्ट तूतिकोेरेन के मेलवेतन में पिछले बीस साल से चल रहा है। मार्च 2013 मंे प्लाण्ट में गैस लीक का वाक्या पेश आया था तो उस वक्त की वजीर-ए-आला जय ललिता ने उसे बंद करने का हुक्म दिया था। उसके बाद कम्पनी एनजीटी में चली गई। एनजीटी ने रियासती सरकार का फैसला उलट दिया। रियासती सरकार सुप्रीम कोर्ट चली गई और अब रियासती सरकार की अपील सुप्रीम कोर्ट में जेरे समाअत (पेंडिंग) है।