कामयाब रहा बायोपिक का ट्रेण्ड

कामयाब रहा बायोपिक का ट्रेण्ड

बायोपिक फिल्मों का रिवाज पुराना है। भारत की पहली फिल्म राजा हरिश्चंद एक तरह से बायोपिक फिल्म ही थी। उसके बाद भी संत तुकाराम वगैरह की जिंदगी पर कई फिल्में बनीं। लेकिन पिछले पंद्रह-सोलह सालों में जिस तरह खिलाड़ियों, डाकुओं और तारीखी हस्तियों की जिंदगी को मरकज में रख कर फिल्में बनाने का टे©ंण्ड बढ़ा है, वह कमाई के लिहाज से काफी मुफीद साबित हुआ है। इसीलिए बायोपिक फिल्में बनाने का जो टे©ंण्ड जोर पकड़ा था वह थमने का नाम नहीं ले रहा है।

सिनेमा में हमेशा किसी न किसी ट्रेंड का दौर चलता है। आजकल बायोपिक फिल्मों का दौर चल रहा है। बायोपिक फिल्में आम और अनजान आदमी पर नहीं बनती, बशर्ते उसकी जिंदगी में मसरबजीतफ जैसा कुछ अचानक, अजीब और मनो बडी किल्ड जेसिकाफ की जेसिका लाल जैसा सनसनीखेज न हो जाए या फिर मुतनाजा हों मअजहरफ जैसे, तो कहना ही क्या! तभी तो पूरी दुनिया के लिए आदर्श बन गए गांधीजी से लेकर हमजिन्सी प्रोफेसर (अलीगढ़) और चार्ल्स शोभराज और गवली तक पर बनती हैं बायोपिक्स। बायोपिक फिल्मों की बढ़ती मकबूलियत और ऐसा टे©ंण्ड यह साबित करता है कि मरीयलफ को मरीलफ में देखना फिक्शनरी से ज्यादा दिलचस्प है। इस टे©ंण्ड को पिछले चार-पांच सालों से ही बालीवुड ने अपनाया है वरना हालीवुड वगैरह में रूक-रूककर बायोपिक फिल्में बनती रहती हैं। इस टे©ंण्ड की आगाज   मपान सिंह तोमरफ (2012) से ही हो गया था लेकिन इसने जोर पकड़ा मभाग मिल्खा भागफ (2013) से। इसी का नतीजा था कि 2016 में सात बायोपिक फिल्में नीरजा, अजहर, एमएस धोनीः द अनटोल्ड स्टोरी, वीरप्पन, सरबजीत, बुधिया सिंह बार्न टु रन और दंगल आईं। इनमें चार फिल्में खिलाड़ियों पर हैं। भगत सिंह पर मशहीदफ नाम से पहली फिल्म 1965 में बनी।  फिर 2002 में दो फिल्र्में आइं- म23 मार्च, 1931ः शहीदफ और मद लीजेण्ड आफ भगत सिंहफ। इनके बाक्स आफिस के रिकार्ड अच्छे नहीं, लेकिन यह बाक्स आफिस की मोहताज कतई नहीं थीं। 1913 में बनी पहली फीचर फिल्म मराजा हरिश्चंदफ बायोपिक ही थी।