राजस्थान से आई गर्म हवा

राजस्थान से आई गर्म हवा

दो लोक सभा और एक असम्बली सीट के बाई एलक्शन के नतीजों के जरिए दिल्ली में राजस्थान से जो गर्म हवा आई है उसने बीजेपी को तो पसीने-पसीने कर दिया लेकिन ठंडी पड़ी कांग्र्रेस में थोड़ी गर्मी जरूर पैदा कर दी। वैसे भी सैकड़ों सालों का यह रिकार्ड है कि राजस्थान में अगर लू चल जाए तो दिल्ली का मौसम गर्म हो जाता है। इस बार अलवर और अजमेर लोक सभा और मांडलगढ असम्बली हलके के नतीजों की शक्ल में राजस्थान से दिल्ली जो हवाएं आईं उनमें गर्मी कुछ ज्यादा ही है। यह दीगर बात है कि इन नतीजों पर वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी उनकी बीजेपी के सदर अमित शाह, उनकी पार्टी के सीनियर लीडरान और उनके खुशामदी मीडिया ने ऐसा रवय्या अख्तियार किया कि जैसे वह बहुत उम्दा किस्म के एयरकंडीशन कमरों में बैठे हों और राजस्थान की लू व गर्म हवाआंे का उनपर कुछ असर ही न पड़ा हो।

यह सही है कि दो-तीन बाई एलक्शन हारने और जीतने से सियासी पार्टियों पर कोई बहुत बड़ा असर नहीं पड़ता और बीजेपी का भी यही मानना है कि तीन बाई एलक्शन हारने के बावजूद इस साल के आखिर में होने वाले असम्बली एलक्शन में वह एक बार फिर जीतकर राजस्थान की सत्ता पर कब्जा बरकरार रखेगी। दूसरी तरफ वोटों की तादाद के पेशे नजर कांग्रेस को पूरी उम्मीद ही नहीं बल्कि यकीन हो गया है कि असम्बली एलक्शन में वह बीजेपी को शिकस्त देकर राजस्थान की सत्ता हासिल कर लेगी। साबिक वजीर-ए-आला और आल इंडिया कांगे्रस के मौजूदा जनरल सेक्रेटरी अशोक गहलौत ने कहा है कि उन्होने अपनी पूरी सियासी जिंदगी में किसी भी पार्टी के लिए वोटरों में ऐसी नफरत नहीं देखी जैसी नफरत इस बार तीन हलकों के बाई एलक्शन में बीजेपी के लिए वोटरों में देखी है। राजस्थान प्रदेश कांगे्रस के सदर सचिन पायलट का कहना था कि यह नतीजे भारतीय जनता पार्टी की सरकार और वजीर-ए-आला वसुंधरा राजे के खिलाफ गुस्से का इजहार तो है ही अवाम में कांग्रेस की मकबूलियत की निशानी भी है। राजस्थान बीजेपी के सदर अशोक परनामी इन नतीजों को मामूली झटका मानते हैं लेकिन यह भी कहते हैं कि इस साल के आखिर में होने वाले असम्बली एलक्शन पर अलवर, अजमेर और मांडलगढ के नतीजों का कोई असर नहीं पडे़गा। हम दुबारा जीत कर सरकार बनाएंगे।

सियासी पार्टियों के लीडरान कुछ भी कहते रहें राजस्थान के इन तीन बाई एलक्शनों के नतीजों से कई अहम पैगाम आए हैं जिस अंदाज में दोनों पार्टियों को वोट मिले हैं उसपर भी गौर करने की जरूरत है। बीजेपी की प्रदेश में सरकार है वसुंधरा खुद को बहुत कामयाब वजीर-ए-आला बताती हैं इसके बावजूद अलवर लोक सभा सीट पर कांगे्रस के कर्ण सिंह यादव ने बीजेपी के जसवंत सिंह यादव को एक लाख छियान्नवे हजार चार सौ छियान्नवे (196496) वोटों के फर्क से हराया। इसी तरह अजमेर सीट कांग्रेस ने चैरासी हजार एक सौ बासठ (84162) वोटों के फर्क से जीती और मांडलगढ असम्बली सीट कांगे्रस ने तकरीबन तेरह हजार (13000) वोटो के फर्क से तब जीती जब वहां कांगे्रस का एक बागी उम्मीदवार लड़ रहा था जिसने बीस फीसद वोट काट लिए। अजमेर लोक सभा हलके के आदरबा बूथ पर मामाना गांव के 3207 वोट पड़े जिसमें 3206 कांग्रेस को मिले और सिर्फ एक बीजेपी को मिला। मांडलगढ असम्बली हलके के एक गंाव का सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें एक बुजुर्ग और उसकी बीवी दोनों मिलकर गांव वालों के सामने अपने बेटे को इसलिए पीट रहे थे क्योंकि उसने बीजेपी कोे वोट दिया था। यह नार्मल सूरतेहाल नहीं है। इस सूरतेहाल को भारतीय जनता पार्टी अपने हक में कर पाएगी या नहीं यही एक बड़ा सवाल है।

राजस्थान के नतायज से वैसे तो कई अहम पैगामात आए हैं लेकिन सबसे बड़ा पैगाम अलवर से आया है। आरएसएस, विश्व हिन्दू परिषद और गौरक्षकों व हिन्दू रक्षकों की शक्ल में फर्जी हिन्दुत्ववादियों ने अलवर जिले को काफी दिनों से हिन्दुत्व की तजुर्बागाह (प्रयोगशाला) बना रखा है। जिस अंदाज में लोगों ने एकजुट होकर बीजेपी के खिलाफ वोट किया उसका तो यही मतलब निकलता है कि कम से कम अलवर के लोगों ने मुसलमानों और कमजोर तबके के लोगों को पीट-पीटकर मारे जाने की आरएसएस की हरकतों को बहुत ही सलीके से रिजेक्ट किया है। अलवर वालों ने बतला दिया है कि वह पक्के हिन्दुस्तानी हैं जो किसी भी कीमत पर कमजोरों और कम तादाद वाले लोगों के खिलाफ हिंसा को बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं हैं। अगर अलवर वालों में यह जज्बा न होता तो भी शायद कांगे्रस जीतती लेकिन वोटों के इतने बड़े फर्क से नहीं जीत पाती। यही पैगाम अजमेर और मांडलगढ के भी लोगों ने दिया है। अब अगर यह पैगाम बीजेपी समझने की कोशिश न करे तो यह उनकी बड़ी भूल होगी।

दूसरा पैगाम यह है कि भारतीय जनता पार्टी जो देश में भ्रम फैला रखा है कि वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी से ज्यादा मकबूल (लोकप्रिय) लीडर देश में दूसरा कोई नहीं है उनका कोई मुतबादिल भी नहीं है। उस भ्रम को भी राजस्थान के लोगों ने तोड़ा है और यह बताया है कि इस देश में मकबूल लीडरों और मुतबादिल (विकल्प) की कोई कमी नहीं है और न कभी थी। 1977 और 2004 के एलक्शन भी इस बात का ठोस सुबूत हैं। तीसरा पैगाम यह है कि वसुंधरा राजे सिंधिया और उनकी भारतीय जनता पार्टी की सरकार राजस्थान के लोगांेे की तवक्कोआत (अपेक्षाआंे) पर खरी नहीं उतरी। लोगों की भलाई के काम नहीं हुए इसलिए असम्बली एलक्शन से आठ-नौ महीने पहले राजस्थान के लोगों ने मोदी और वसुंधरा को यह वार्निंग दे दी है कि वह राजस्थान से अपना बोरिया-बिस्तर फिलहाल समेट लें। अब राजस्थान के लोग झूटे वादों, जुमलेबाजी और मुफ्त की नारेबाजी में फंसने के लिए तैयार नहीं हैं। सरकारी गौशालाएं चलाने वाले बीजेपी के लोग गायों के चारे और इलाज का पैसा खा जाएं सैकड़ों गाएं भूक और बीमारी से तड़प-तड़प कर मर जाएं और आरएसएस व विश्व हिन्दू परिषद के नाम पर गुण्डे और दहशतगर्द मुसलमानों को पीट-पीटकर कत्ल करते रहे। यह जालसाजी अब राजस्थान और देश के लोग बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं हैं। राजस्थान के गांव की ख्वातीन (महिलाएं) नरेन्द्र मोदी हुकूमत की उज्जवला स्कीम के सच से भी वाकिफ हो चुकी हैं। जिसमें बहुत बड़े पैमाने पर प्रोपगण्डे के साथ गरीब ख्वातीन को पहला गैस सिलेण्डर तो दे दिया गया उसके बाद उन्हें आठ सौ रूपए फी सिलेण्डर के हिसाब से गैस खरीदने को कहा गया जो उनकी खरीद की सलाहियत से बाहर की बात है। इसलिए औरतें मोदी की किसी बात पर यकीन करने के लिए तैयार नहीं हैं। उन्होने भी अपने मर्दाे के साथ बढ-चढकर बीजेपी को हराने का काम किया। यह पैगाम समझने की जितनी जरूरत बीजेपी के लिए है उतनी ही कांगे्रस को भी है। अगर कांगे्रस यह समझ कर हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाए कि अब तो उनके लिए असम्बली एलक्शन जीतना यकीनी हो गया है और राजस्थान के लोगों ने राहुल गांधी को अपना लीडर और नरेन्द्र मोदी का मुतबादिल (विकल्प) मान लिया है और अपने इस फैसले से वह हटने वाले नहीं हैं तो यह कांगे्रस की भी गलतफहमी होगी।