मोदी हेल्थ केयर स्कीम कितनी हकीकत कितना फसाना

मोदी हेल्थ केयर स्कीम कितनी हकीकत कितना फसाना

अंदलीब अख्तर

नई दिल्ली! आम बजट में नेशनल हेल्थ प्रोटेक्शन स्कीम का सबसे ज्यादा चर्चा है। इसे दुनिया के किसी भी मुल्क में सरकार की तरफ से दी जाने वाली सबसे बड़ी सेहत इंश्यूरेंस होने का दावा किया जा रहा है। इसी तरह की स्कीम अमरीकी सदर बराक ओबामा ने अमरीकी शहरियों के लिए की थी जिसे मओबामा केयरफ का नाम दिया गया था और उसी मुनासिबत से मोदी सरकार की हेल्थ केयर स्कीम को ममोदी केयरफ का नाम दिया जा रहा है। इस स्कीम के तहत 10 करोड़ हिन्दुस्तानी परिवारों के पचास करोड़  लोगों को शामिल किया जाएगा। इसके तहत साल भर में 5 लाख रुपये हेल्थ बीमा किया जाएगा।

इस स्कीम को बिला शुब्हा एक अहम स्कीम कहा जा सकता है और वजीर सेहत जेपी नड्डा के लफ्जों में यह एक तारीखी और इंकलाबी स्कीम है। लेकिन जब सहाफियों ने उनसे यह जानना चाहा कि इस स्कीम का फायदा लोग कैसे उठा पाएंगे तो वह खामोश हो गए और सिर्फ इतना ही कह सके कि सरकार सभी को हेल्थ कवर देना चाहती है, इसमें वक्त लगेगा, यह मामला सरकार और प्लानिंग कमीशन के एजेंडे में है।

अरुण जेटली ने 50 करोड़ लोगों को पांच लाख रूपए का इंश्योरेंस देने का वादा तो कर दिया लेकिन इसके लिए बजट में सिफ 2 हजार करोड़ रुपये अलाट किए गए। यानी फी कस (प्रतिव्यक्ति) प्रीमियम के लिए सिर्फ चालीस रुपये। अब सवाल यह है कि ऐसी कौन सी कंपनी है जो चालीस रुपये प्रीमियम पर यह इंश्यूरेंस देगी। अगर हिसाब लगाएं तो स्कीम को नाफिज करने के एक लाख बीस हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की जरूरत है जोकि भारत के कुल सेहत बजट का भी तकरीबन दोगुना है।

प्लानिंग कमीशन के सीईओ, अमिताभ कांत कहते हैं कि इस स्कीम में कुल खर्च का 60 फीसद मरकज और चालीस                 फीसद रियासतें बरदाश्त करेंगी। खुसूसी रियासतों का नव्वे फीसद तक मरकज बरदाश्त करेगा। रियासतें चाहें तो ट्रस्ट बनाकर भी इस स्कीम पर अमल कर सकती हैं। सरकार का दावा है कि इस स्कीम में सरकारी और प्राइवेट सेक्टर की इश्योरेस कम्पनियां दिलचस्पी ले रही हैं। इसलिए इसमें पैसे की कमी नहीं होगी।

अगर सरकार के इन तमाम दावों को तस्लीम कर भी लिया जाए तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस स्कीम पर अमल दरामद करने और लोगों को फायदा पहुचाने के लिए सेहत खिदमात, अस्पताल, डाक्टर, इलाज के लिए जरूरी साज व सामान कहां से आएंगे। मुल्क में सेहत खिदमात की जो सूरतेहाल है वह किसी से पोशीदा नहीं है। आए दिन मीडिया में ऐसी खबरें और तस्वीरें आ जाती हैं जिनको पढकर और देखकर इंसानियत शर्मिदा हो जाती है।

हाल ही में  कंफेडे©ंशन आफ इंडियन इंडस्ट्रीज ने सेहत खिदमात के मार्केट के इमकानात पर मरकूज  एक रिपोर्ट शाया की है। इस रिपोर्ट के मुताबिक मुल्क में मौजूद सेहत खिदमात के ढांचे का सत्तर फीसद हिस्सा सिर्फ बीस शहरों तक महदूद है।  इसलिए इसमें हैरत की बात नहीं  कि तीस फीसद हिन्दुस्तानी इब्तेदाई सतह की भी सेहत से मुताल्लिक सहूलतों से महरूम हैं। मतलब एक बड़ी जरूरत तो अभी सेहत खिदमात की मुकम्मल तौसीअ की है ताकि लोगों को आए दिन की बीमारियों के इलाज के लिए गांवों से बड़े शहरों की तरफ आने के लिए मजबूर न होना पड़े। दूसरी जरूरत है सेहत खिदमात के मौजूदा बुनियादी ढांचे के फुकदान को दूर करने की। मुल्क मेे आबादी के लिहाज से डाक्टर्स, नर्स और अस्पताल में बेड की तादाद बहुत कम है। सीआईआई के दस्तावेजात के मुताबिक 0.7 डाक्टर, 1.3 नर्स और अस्पतालों में बेड की तादाद 1.1 है। यही वजह है कि दिल्ली में एलएनजेपी जैसे अस्पताल में भी आपको एक-एक बेड पर दो-दो और तीन-तीन मरीज देखने को मिल जाएंगे।

2017 की सूरतेहाल यह है कि खातून हेल्थ वर्करों के तेरह फीसद और मर्द हेल्थ वर्करों की 37 फीसद पोस्ट अभी खाली हैं। फिलहाल तेरह फीसद इब्तेदाई सेहत सेटर्स और ग्यारह फीसद जैली सेहत सेेंटर के बारे में ही कहा जा सकता है कि वह हिन्दुस्तानी सेहत के मेयार के मुताबिक हैं।

सरकार के बजट एलान के हवाले से सेहत के शोबे में लम्बी मुद्दत तक काम करने वाले माहिर सीएम गुलाटी का कहना है कि प्राइवेट अस्पतालों में  सरकार के इंश्योरेस की बुनियाद पर गरीबों का इलाज नहीं हो सका। इससे मरीजों के बजाय प्राइवेट अस्पतालों का ही फायदा  होगा। गुलाटी का कहना है कि यह स्कीम  उसी वक्त असरदार  होगी जब सरकारी अस्पतालों और हेल्थ संेटर्स को मजबूत किया जाएगा लेकिन मुश्किल यह है कि सरकार ने हेल्थ को पब्लिक सर्विस के बजाय इंडस्ट्री बना दिया है। सरकारी इंश्योरेंस पर प्राइवेट अस्पतालों का मौकुफ क्या है यह भी फिलहाल कोई नहीं जानता।

सरकार के मौजूदा आंकड़ों को अगर सही मान लें तो अभी मुल्क की पच्चीस फीसद आबादी ही आज सरकारी बीमा कवरेज में है। बेहतर सरकारी अस्पतालों के फुकदान में उन्हें ज्यादातर खर्च अपनी जेब से ही करना पड़ता है और अगर वह प्राइवेट अस्पतालों में जाते हैं तो पूरी तरह लुट जाते हैं। सवाल यह है कि जब सरकारी अस्पतालों के बाहर लोग परेशान घूम रहे हैं और इंश्योरेंस स्कीमों का फायदा मरीजों से ज्यादा इंश्योरंेस कम्पनियों को होता है, तो सरकारी अस्पतालों कीं हालत सरकार दुरूस्त क्यों नहीं करती। अगर सरकारी अस्पतालों को दुरूस्त कर दिया जाए तो लाखों लोगों को रोजगार भी मिल सकता है।

अपोजीशन ने भी इल्जाम लगाया है कि सरकार ने एलान तो कर दिया है लेकिन सवाल है कि इसके लिए पैसा कहां से आएगा। इससे भी बड़ी बात यह है कि इस स्कीम को शुरू होने में अभी सात से नौ महीने तक लग सकते हैं। इसके लिए सरकार को बड़े पैमाने पर तैयारी करना होगी तभी इसका फायदा लोगों को होगा।

इस स्कीम पर आरएसएस की तंजीम स्वदेशी जागरण मंच ने भी सरकार को वार्निंग दे दी है। स्वदेशी जागरण मंच ने कहा है कि हेल्थ इंश्योरेंस स्कीम में गैर मुल्की कंपनियों को शामिल नहीं होने दिया जाए ताकि मुल्क के कीमती वसायल को हिन्दुस्तान में ही बरकरार रखा जा सके।