पद्मावत के बहाने अराजकता

पद्मावत के बहाने अराजकता

सुप्रीम कोर्ट के आर्डर के बावजूद उत्तर भारत में सड़कों पर दहशत का माहौल करणी सेना को सरकारी पुश्तपनाही

 

 

”सुप्रीम कोर्ट के एक नहीं दो-दो आर्डर के बावजूद राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश, गुजरात और गोवा जैसे बीजेपी सरकारों वाले प्रदेशों में 25 जनवरी को फिल्म नहीं दिखाई जा सकी। सभी प्रदेशों की सरकारें सड़कों पर दहशत फैलाने वालों के साथ खडी दिखाई दी। इंतहा यह कि जयपुर लिटरेरी फेस्टिवल में आने को तैयार बैठे प्रसून जोशी और जावेद अख्तर तक को वसुंधरा सरकार तहफ्फुज (सुरक्षा) देने को तैयार नहीं हुई।“

 

”मुखालिफत पद्मावत फिल्म की थी तो दिल्ली नोएडा के दरम्यान डीएनडी पर 23 जनवरी को ही सैकड़ों गाडियों पर हमले क्यों हुए, लोगों पर हमले क्यों किए गए। 24 जनवरी को मासूम बच्चों से भरी स्कूल बस पर हमला क्यों किया गया। अहमदाबाद समेत गुजरात के कई हिस्सों में शापिंग माल्स पर हमले क्यों हुए। गुडगांव के सिनेमाहाल पर 23 जनवरी को ही हमला करके करणी गुण्डों ने सिनेमा देख रहे मर्दांे, औरतों और बच्चों को दौड़ा-दौड़ा कर क्योें पीटा।“

 

”लोकेन्द्र सिंह कालवी की करणी सेना का आंदोलन शुरू हुआ, देखते ही देखते आधा दर्जन से ज्यादा सेनाएं किसने बनवा दी। फिल्म को शुरू से ही राजपूत मुखालिफ कहा गया। 25 जनवरी आते-आते हिन्दू मुखालिफ कहा जाने लगा। इन साजिशों के पीछे किसका दिमाग है। यहूदी बच्चे शोेशे के लिए आंसू बहाने वाले वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी अपने गुजरात समेत चार प्रदेशों में फैली अराजकता पर खामोश क्यांें रहे।“

 

 

नई दिल्ली! संजय लीला भंसाली की मपद्मावतीफ से मपद्मावतफ बनी फिल्म की मुखालिफत के बहाने करणी सेना, अखिल भारतीय छत्रिय महासभा, राष्ट्रीय करणी सेना, अखण्ड हिन्द पार्टी जैसी तंजीमों ने हरियाणा, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश और बिहार समेत उत्तर भारत की तमाम बीजेपी सरकार वाली रियासतों में अराजकता पैदा कर दी। शुरू में एक करणी सेना मैदान में थी लेकिन देखते ही देखते राष्ट्रीय करणी सेना, अखण्ड हिन्द पार्टी, छत्रिय सेेना, राजपूत सेना, राजपूत समाज, युवा छत्रिय सभा नाम की आधा दर्जन से ज्यादा तंजीमें सामने आ गई। इन सेनाओं में कौन-कौन है यह तो कोई नहीं जानता लेकिन लोकेन्द्र सिंह कालवी, सूरजपाल सिंह मअम्मूफ, महिपाल सिंह मकराना, हितेन्द्र ठाकुर, अभिषेक सोम और सुखदेव नाम के लोगों ने मुख्तलिफ टीवी चैनलों के जरिए बार-बार न सिर्फ खुलेआम सुप्रीम कोर्ट के आर्डर तक की धज्जियां उड़ाई बल्कि संजय लीला भंसाली को जिंदा जलाने, उनकी गर्दन काटने, उनको दफन करने, फिल्म की हीरोइन दीपिका पादुकोण की नाक-कान काटने और जिंदा जलाने की धमकियां देते रहे।  इसके बावजूद बीजेपी सरकारें न सिर्फ मनपुंसकोंफ की तरह तमाशाई बनी रही बल्क् िअराजकता फैलाने वालों के सामने घुटने टेकती रही। जो लोग सड़कों पर दहशत फैलाते फिरते रहे उनकी हरकतों को देखकर लगा कि मपद्मावतफ फिल्म तो बहाना है अस्ल निशाना कुछ और है। क्योंकि फिल्म की रिलीज 25 जनवरी को होनी थी लेकिन 22 जनवरी सेक ही गुण्डों ने सड़कोे पर दहशतगर्दी शुरू कर दी थी। इंतहा तो तब हो गई जब गुडगांव में इन दहशतगर्दों ने मासूम बच्चों से भरी स्कूल बस पर हमला कर दिया। बस के शीशे तोड दिए। रोते-बिलकते बच्चों को बस में मौजूद टीचरों ने सीटों के नीचे छुपाकर बचाया। टीवी चैनलों पर बस का वीडियो देखकर पूरे मुल्क में लोगों ने गम और गुस्से का इजहार किया लेकिन करणी सेना और उसके साथ दहशत फैलाने वाली दूसरी तंजीमों के लोगों को कोई शर्म नहीं आई। 23 जनवरी से ही गुण्डों ने सडकों पर अराजकता फैलानी शुरू कर दी थी। किसी की समझ में यह नहीं आया कि फिल्म की मुखालिफत में दिल्ली-नोएडा के दरम्यान डीएनडी पुल पर सैकड़ों गाड़ियां क्यों तोडी गईं ा आम लोगों के साथ मारपीट क्यों की गई। हरियाणा के कई जिलों में तीन दिन पहले ही कई सिनेमाघरों पर हमले क्यों हुए, सिनेमा देखने वालों औरतों और बच्चों को दौडा-दौडा कर क्यों मारा गया। अहमदाबाद समेत गुजरात के कई शहरों में शापिंग माल्स क्यो जलाए गए। इन तमाम सवालात का जवाब तब मिला जब 25 जनवरी आते-आते फिल्म की मुखालिफत करने वालों ने यह कहना शुरू कर दिया कि फिल्म के जरिए सिर्फ राजपूतों ही नहीं पूरे हिन्दू समाज की तौहीन की गई है। इसी के साथ इस अराजकता को राजपूतों के बजाए पूरे हिन्दुओं का मसला बनाने की कोशिश शुरू कर दी गई है तो लोगों को समझ मंे आया कि इस पूरे हंगामे के पीछे अस्ल ताकतें कौन हैं। वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी की खामोशी भी बहुत कुछ कह गई। उत्तर भारत की बीजेपी सरकारों के चीफ मिनिस्टर्स और उनकी पूरी सरकारी मशीनरी सीधे-सीधे या घुमा फिराकर तो अराजकता फैलाने वालों के साथ थी ही, बिहार के कुर्मी वजीर-ए-आला नितीश कुमार और उनकी सरकार इतनी उतावली हो गई कि फिल्म रिलीज होने की तारीख 25 जनवरी को सबसे ज्यादा हंगामे बिहार में ही हुए और पुलिस अराजक अनासिर की मदद करती रही। उत्तर प्रदेश के वजीर-ए-आला योगी आदित्यनाथ भी शुरू से ही फिल्म के खिलाफ थे लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आर्डर के बाद उत्तर प्रदेश में सूरतेहाल को काबू करने की पूरी कोशिश कीं मेरठ, सहारनपुर, देवबंद, कानपुर और लखनऊ में राजपूत सेना और छत्रिय महासभा के नाम पर कुछ लोगों ने हंगामा जरूर किया। एक मेरठ में शापिंग माल और सिनेमाहाल पर हमले हुए उसके अलावा बाकी शहरों में ज्यादा संगीन किस्म के वाक्यात पेश नहीं आए।

राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार सुप्रीम कोर्ट के वाजेह (स्पष्ट) आर्डर के बावजूद करणी सेना के साथ ही खडी रही। सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म रिलीज करने का आर्डर किया तीन सरकारें अपील में गई सुप्रीम कोर्ट ने अपील रद्द कर दी और हुक्म दिया कि सरकारें सिनेमाघरों और नाजरीन (दर्शकों) की हिफाजत का बंदोबस्त करें। इसके बावजूद राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, हरियाणा और गोवा में फिल्म नहीं दिखाई गई। उत्तर प्रदेश सरकार ने बार-बार कहा कि फिल्म दिखाई जाए, तहफ्फुज (सुरक्षा) का पूरा इंतजाम किया जाएग लेकिन वजीर-ए-आला योगी आदित्यनाथ सुप्रीम कोर्ट के आर्डर से पहले फिल्म के लिए जितना कुछ कह चुके थे पुलिस और जिला इंतजामिया के अफसरान के लिए वह इशारा काफी था। इसलिए कुछ शहरों के चंद सिनेमाघरों के अलावा फिल्म कहीं नहीं दिखाई गई।

25 जनवरी को जयपुर में लिट्रेरी फेस्टीवल शुरू हो रहा था जिसमें सेंसर बोर्ड के चेयरमैन प्रसून जोशी और मशहूर शायर व मुसन्निफ जावेद अख्तर को शरीक होना था लेकिन करणी सेना के गुण्डों के सामने वसुंधरा राजे सरकार इस हद तक सरेडर कर गई कि वह इन सिर्फ दो लोगों को तहफ्फुज (सुरक्षा) देने के लिए तैयार नहीं हुई और दोनों का प्रोग्राम कैेसिल हो गए। करणी सेना के सदर कहे जाने वाले महिपाल सिंह मकराना ने एलान किया था कि सेंसर बोर्ड से फिल्म को पास करके प्रसून जोशी भी संजय लीला भंसाली की सफ (श्रेणी) में शामिल हो गए हैं और हम भंसाली या उन जैसे किसी भी शख्स को माफ नहीं करने वाले। करणी सेना के बानी (संस्थापक) लोेकेन्द्र सिंह कालवी ने कहा था कि इस वक्त हम भडके हुए हैं और प्रसून जोशी हमारे लिए लाल कपडे की तरह हो गए है। अगर वह जयपुर आए तो उनके साथ जो सुलूक होगा वह हम पहले से बयान नहीं कर सकते। जावेद अख्तर के लिए भी हमारा यही मौकुफ (दृष्टिकोण) है क्योंकि वह भी भंसाली के साथियों में हैं।

सुप्रीम कोर्ट के देा आर्डरों के बावजूद लोकेन्द्र सिंह कालवी, महिपाल सिंह मकराना, बीजेपी और आरएसएस लीडर से अचानक राजपूत बने सूरज पाल सिंह मअम्मूफ अखण्ड हिन्द पार्टी के हितेन्द्र ठाकुर, युवा छत्रिय सभा के सदर कहे जाने वाले अभिषेक सोम, अचानक सामने आई राष्ट्रीय करणी सेना के सुखदेव सिंह समेत राजपूतों और हिन्दुत्व के तमाम ठेकेदार जहर उगलते रहे लेकिन सरकारें खामोश रहीं। 25 जनवरी की शाम को हरियाणा पुलिस ने बच्चो की बस पर हमला करने वाले 18 लोगों और जहर उगलने वाले सूरजपाल सिंह अम्मू को हिरासत में लिया जा चुका था। 14 लोगों को अदालत ने जेल भी ली भेज दिया था।

तमाम मुखालिफत के बाद फिल्म जहां-जहां रिलीज हुई और लोगों ने इसे देखा उन्होने फिल्म के खिलाफ होने वाले हंगामों को बेबुनियाद और सियासत से मुतास्सिर बताया। फिल्म देखकर निकलने वाले कई लोगों का कहना था कि फिल्म में ऐसा कुछ नहीं दिखाया गया है जिसके लिए हंगामा किया जा रहा है। हंगामा करने वालों ने अगर फिल्म देख ली होती तो उनकी भी समझ में आ जाता कि फिल्म में भंसाली ने राजपूतों की शान को गिराने का नहीं बल्कि बढाने का काम किया है। जो राजपूती आन-बान और शान फिल्म में दिखाई गई है उसके बारे में तो हंगामा करने वाले भी ठीक से नहीं जानते होगे। राजपूती शान के ठेकेदार बने लोग अगर चाहते हैं कि पूरा मुल्क राजपूतों खुसूसन राजपूतानियों के रौब, दबदबे, शान और आन के बारे में जाने तो उन लोगों को चाहिए कि वह फिल्म को टैक्स फ्री करने का मतालबा करें। बगैर फिल्म को देखे हंगामा करने से तो लगता है कि कुछ गुमनाम सी तंजीमें फिल्म की मुखालिफत को अपनी शोहरत का जरिया बना रही हैं। टीवी चैनलों पर बैठकर बहस करने वाले राजपूती शान के ठेकेदार और कुछ एंकर की जेहालत का आलम यह है कि वह रानी पद्मावती के बारे में सिर्फ उतना जानते हैं जितना पद्मावत मे लिखा गया है। पद्मावत सूफी शायर मलिक मोहम्मद जायसी के जरिए लिखी गई एक मसनवी (महाकाव्य) है जिसमें उन्होने रानी पद्मावती के किरदार को बडे जानदार तरीके से पेश किया है।

इस फिल्म की मुखालिफत में आगे-आगे रहने वाली करणी सेना जैसी कई राजपूत तंजीमों (संगठनों) का इल्जाम है कि फिल्म मे तारीख (इतिहास) को तोड़मरोड कर पेश किया गया है और फिल्म रानी पद्मावती व राजपूती आन (गौरव) की तौहीन करती है। सवाल यह है कि यह इल्जाम लगाने वाले करणी सेना जैसी राजपूती शान के ठेकेदारों ने जब फिल्म को देखा ही नहीं तो उन्हें कैसे मालूम कि फिल्म में इतिहास को तोडा मरोडा गया है और रानी पद्मावती की तौहीन की गई है। दूसरी बात रानी पद्मावती के वजूद के बारे में भी मुवर्रिखीन (इतिहासकारों) में एख्तेलाफ है तो कभी उन तारीखदानों (इतिहासकारों) के खिलाफ कोई मुजाहिरा क्यों नहीं हुआ।                 िफल्म की मुखालिफत करने वाले इतिहास को तोडमरोड कर पेश करने का इल्जाम लगाते हैं मगर खुद इतिहास की वही जानकारी रखते है जो पद्मावत में दर्ज है। जिन लोगों ने फिल्म देखी है उनका कहना है कि संजय लीला भंसाली ने रानी पद्मावती के किरदार को बडे पुरवकार (गौरवशाली) अंदाज में पेश किया है।

फिल्म की मुखालिफत के दौरान 23 जनवरी को हिन्दू तंजीमों (संगठनों) से जुडे कुछ लोगों ने लाजिक्स माल में फिल्म देखी। फिल्म देखने के बाद उन लोगों ने कहा कि फिल्म मे अब मुखालिफत जैसा कुछ नहीं है। राजपूती आन को ठेस पहुचाने वाले सीन फिल्म से हटा दिए गए है। लिहाजा अब न तो फिल्म की मुखालिफत होनी चाहिए और न ही इतना हमलावर होने की जरूरत है। हिन्दुत्ववादी तंजीमों से जुडे सुरेश चैहान, तारीखदां हेमेन्द्र राजपूत और डाक्टर एचएस रावत ने कहा कि करणी सेना के ओहदेदारान के कहने पर फिल्म देखी गई थी। फिल्म में कुछ भी काबिले एतराज नहीं है। सवाल यह है कि  अगर फिल्म में कुछ भी काबिले एतराज नहीं है तो फिर सडकों पर फिल्म की मुखालिफत के लिए लोगों को कौन उकसा रहा है। जिन राजपूत लोगोेें ने फिल्म देखी है उनकी राय भी मालूम कर लेना चाहिए मगर फिल्म की मुखालिफत को हवा देने वाले कुछ चैनल उन राजपूतों से बात भी करने के लिए तैयार नहीं है जिन्होने फिल्म देखी है।

इन हंगामों के पीछे सियासी खेल है इतना अंदाजा तो वजीर-ए-आजम समेत बीजेपी हुकूमतों वाली रियासतों के चीफ मिनिस्टर्स की खामोशी से ही लग जाता है। लेकिन जिस तरह से बसों, सिनेमाघरों और शापिंग माल्स को निशाना बनाया जा रहा है वह तो जुर्म के जुमरे में आता है गुडगांव में स्कूल बस पर पथराव किया गया और राजपूती शान के किसी ठेकेदार ने इस पर माफी नहीं मांगी। कांगे्रस सदर राहुल गांधी ने इस हमले की मजम्मत करते हुए कहा कि हरियाणा मंे बीजेपी की सरकार है, बीजेपी की नफरत और हिंसा की सियासत मुल्क को आग के हवाले कर रही है। उन्होने कहा कि हिंसा कमजोरी की निशानी है। क्या मासूम बच्चों की बस पर हमला करना राजपूती शान को बट्टा लगाने वाला काम नहीं है। दिल्ली के वजीर-ए-आला अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि मरकजी सरकार सुप्रीम कोर्ट और प्रदेश सरकारें मिलकर अगर एक फिल्म रिलीज नहीं करवा पा रहे हैं तो मुल्क में सरमायाकारी (निवेश) कैसे आएगी? अदम तहफ्फुज (असुरक्षा) के जज्बे में विदेशी सरमायाकार (निवेशक) मुल्क में पैसे लगाने से कतराएंगे जो मुल्क की मईशत (अर्थव्यवस्था) के लिए अच्छा नहीं होगा।