सुप्रीम कोर्ट पर लगा दाग धुलना मुश्किल

सुप्रीम कोर्ट पर लगा दाग धुलना मुश्किल

चार सीनियर जजों के मीडिया के जरिए देश के सामने आने के बावजूद चीफ जस्टिस अपना रवैया तब्दील करने को तैयार नहीं

 

 

”चार सीनियर जजों जस्टिस जे चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ सुप्रीम कोर्ट की तारीख में पहली बार मीडिया की मार्फत मुल्क के अवाम से रूबरू हुए और बताया कि सुप्रीम कोर्ट में सबकुछ ठीक नहीं है। इसलिए मुल्क की जम्हूरियत (लोकतन्त्र) खतरे में है। फौरन खुद को हिन्दुत्व का ठेकेदार बताने वाली फौज सोशल मीडिया पर तो मेन स्ट्रीम मीडिया इन्हीं चारों पर टूट पड़ा, चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा को हिन्दुत्व का बेमिसाल योद्धा तक कह कर इस फौज ने चीफ जस्टिस को शक के दायरे में खड़ा कर दिया।“

 

”प्रसाद एजूकेशन ट्रस्ट के मेडिकल कालेज का मामला छः-सात बार सुप्रीम कोर्ट गया। हर बार जस्टिस दीपक मिश्रा की कयादत (अगुवाई) वाली बंेच में ही पेश हुआ हर बार फैसला ट्रस्ट के हक में हुआ। सुप्रीम कोर्ट के जज को देने के नाम पर एक गरोह ने दो करोड़ एडवांस मांगा, सीबीआई ने दो करोड़ की नकदी के साथ पांच लोगों को गिरफ्तार भी कर लिया। अब सीनियर एडवोकेट प्रशांत भूषण का इल्जाम है कि रिश्वत किस जज के लिए थी हालात से सबकुछ वाजेह (स्पष्ट) है उनका इशारा जस्टिस दीपक मिश्रा की जानिब ही है।“

 

”वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी बार-बार दावा करते हैं कि उनकी सरकार आने से पहले सत्तर सालों में देश में कोई काम ही नहीं हुआ। अब उन्हीं के करीबी बताए जाने वाले चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के दौर में सुप्रीम कोर्ट में जो कुछ हो रहा है उससे मोदी के दावे पर ही मोहर लग रही है कि हां सत्तर सालों में मुल्क में ऐसा कुछ नहीं हुआ जैसा अब मौजूदा दौर में हो रहा है। यह भी अजीब बात है कि मोदी सरकार ने इस तनाजे (विवाद) में किसी भी तरह मुलव्विस होने से भी इंकार कर दिया।“

 

नई दिल्ली! सत्तर सालों में देश मे कुछ नहीं हुआ, वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी का यह बयान बारह जनवरी को उस वक्त सही साबित हो गया जब मुल्क की अदलिया (न्यायपालिका) में दीमक की तरह लग चुकी बेईमानी का मामला मंजरेआम पर लाने की गरज से सुप्रीम कोर्ट के चार सीनियर जजों जस्टिस जे चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ ने सुप्रीम कोर्ट की तारीख में पहली बार मीडिया से रूबरू होकर देश को बताया कि मुल्क की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट तक में सब कुछ ठीक नहीं है। अपनी ईमानदारी और गैरजानिबदारी (निष्पक्षता) के लिए जाने जाने वाले चारों फाजिल जजों ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा या किसी दूसरे जज पर सीधे तौर पर बेईमानी का कोई इल्जाम तो नहीं लगाया लेकिन मीडिया के जरिए उन्होंने देश को जितना बताया उससे साफ जाहिर होता है कि चीफ जस्टिस की तस्वीर (छवि) काफी धुंधली है। सोशल मीडिया पर भगवा ब्रिगेड ने इन चारों जजों के खिलाफ जो घटिया और घिनौना प्रोपगण्डा करने के साथ-साथ चीफ जस्टिस की तारीफों के पुल बांधे उस प्रोपगण्डे ने भी अंदरूनी हालात काफी हद तक जाहिर कर दिए। इन लोगों ने लिखा कि चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा हिन्दुत्व के सपूत हैं उनके रिटायर होने से पहले वह अयोध्या में आलीशान (भव्य) राम मंदिर बनाने का रास्ता साफ करने वाले हैं। इसीलिए चार सीनियर जजों ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया। खुद को मोदी का बड़ा भक्त बताने वाले एक शख्स ने तो फेसबुक पर लिख दिया कि नरेन्द्र मोदी और दीपक मिश्रा की जोड़ी मुल्क को हिन्दू राष्ट्र बनाने की मजबूत बुनियाद डाल देंगेे। खुद कोे हिन्दुत्व का ठेकेदार बताने वाली भगवा ब्रिगेड ने जिस अंदाज में चारों सीनियर जजों पर हमले किए उसे देखकर तो शक और भी गहरा हो गया कि जस्टिस दीपक मिश्रा के चीफ जस्टिस बनने के बाद से सुप्रीम कोर्ट के मामलात भी ठीक नहीं रह सके हैं। चार जजों की प्रेस कांफ्रेंस के बाद मोदी सरकार ने इस पूरे मामले में दखल न देने का एलान करके मामले को मजीद मश्कूक (और भी ज्यादा संदिग्ध) बना दिया। सवाल यह है कि अगर सुप्रीम कोर्ट तक में बेईमान पहुच जाएं, बात देश और दुनिया के सामने आ जाए तो ऐसी हालत में कोई भी सरकार इतने संगीन मामले पर अपने हाथ कैसे खडे़ कर सकती है। मामला हल करने का काम तो सरकार को करना ही पड़ेगा। बार कौंसिल आफ इण्डिया, वकीलों की दूसरी तंजीमों और हाई कोर्ट व सुप्रीम कोर्ट के बड़ी तादाद में रिटायर्ड जजों ने इस मसले को हल करके मुल्क की अदलिया (न्यायपालिका) की साख बचाने में दिन-रात मेहनत की, चारों जजों की चीफ जस्टिस के साथ चाय पर बातचीत भी हो गई लेकिन चैथे दिन सोलह जनवरी को चीफ जस्टिस ने अहम मुकदमात की सुनवाई करने के लिए अपनी कयादत (नेतृत्व) में पांच जजों की जो संवैधानिक बंेच बनाई उसमें किसी सीनियर जज को शामिल न करके वाजेह (स्पष्ट) कर दिया कि वह किसी का राय-मश्विरा सुनने को तैयार नहीं हैं वह अपनी मर्जी मुताबिक ही काम करते रहेगें। ठीक उसी तरह जिस तरह नरेन्द्र मोदी देश की सरकार चला रहे हैं। जिन दो मुकदमों की वजह से चार जजों ने मीडिया के जरिए मुल्क के सामने जाने का गैरमामूली फैसला किया उनमें एक हैं अमित शाह के खिलाफ सुनवाई करने वाले स्पेशल सीबीआई जज लोया की मुश्तबा (संदिग्ध) मौत का और दूसरा मामला है प्रसाद एजूकेशन ट्रस्ट मेडिकल कालेज का। सीनियर एडवोकेट प्रशांत भूषण ने साफ-साफ इल्जाम लगाया है कि इस मेडिकल कालेज के मामले में बड़े पैमाने पर रिश्वत का लेन-देन हुआ है, सीबीआई ने रिश्वत की शक्ल में दिए गए दो करोड़ रूपए मौके से बरामद किए एक रिटायर्ड हाई कोर्ट जज समेत आधा दर्जन लोग गिरफ्तार हुए। उस मेडिकल कालेज में मामले की सुनवाई जितनी बार सुप्रीम कोर्ट में हुई हर बेंच में दीपक मिश्रा खुद शामिल रहे और हर बार कालेज के फायदे में फैसले हुए बेईमानी का इससे बड़ा सुबूत और क्या चाहिए?

सीबीआई जज बीएच लोया की मुश्तबा (संदिग्ध) मौत का मामला चीफ जस्टिस ने जूनियर जज अरूण मिश्रा की बंेच कोे भेजा था लेकिन यह हंगामा होने के बाद सोलह जनवरी को जस्टिस अरूण मिश्रा ने खुद को इस मुकदमे से अलग कर लिया। इस दरम्यान चैदह जनवरी को अचानक जज लोया का बेटा अनुज लोया एक वकील आमिर नाईक और फैमिली दोस्त बताए जाने वाले के बी काटके के साथ मीडिया से रूबरू होकर कहता है कि उसे अपने वालिद की फितरी (स्वाभाविक) मौत पर शक नहीं है इसलिए अब इस मामले में हमें परेशान न किया जाए। वहीं उनके फैमिली दोस्त के बी काटके ने साफ कहा कि हम कई दिनों से परेशान थे हमने बीजेपी सदर अमित शाह से बात की तो उन्होने ही प्रेस कांफ्रेंस करने के लिए कहा और प्रेस कांफ्रेंस का इंतजाम कराया है।

चार सीनियर जज साहबान ने प्रेस कांफ्रेंस करके जो मुद्दा उठाया था वह था सुप्रीम कोर्ट में जड़े जमा चुकी बेईमानी का, लेकिन इस मामले पर बहस चलवाकर बड़ी चालाकी के साथ इस मामले की बहस को इस तरफ मोड़ दिया कि चार सीनियर जजों को इस तरह सुप्रीम कोर्ट के अंदरूनी मामलात को मंजरेआम पर लाना चाहिए था या नहीं? जबकि अस्ल मसला था बेईमानी रूकनी चाहिए या नहीं। बेईमानी का इल्जाम भी पूरी तरह बेबुनियाद नहीं है यह समझने के लिए प्रसाद एजूकेशन ट्रस्ट का मुकदमा ही काफी है। ट्रस्ट ने 2015 में एक नया मेडिकल कालेज खोलने की दरख्वास्त सरकार को दी जिसे सरकार ने मेडिकल कौंसिल आफ इण्डिया को भेज दिया। कौंसिल ने जरूरी वसायल (संसाधन) ट्रस्ट के पास न होने की वजह से इजाजत देने से इंकार कर दिया। ट्रस्ट सुप्रीम कोर्ट चला गया तो मई 2016 में सुप्रीम कोर्ट की ओवर साइट कमेटी ने कौंसिल को हिदायत दी कि वह अपने फैसले पर नजरसानी (पुर्नविचार) करे इसी बुनियाद पर सरकार ने प्रसाद एजूकेशन ट्रस्ट को मेडिकल कालेज खोलने की इजाजत दे दी। मई 2017 में मेडिकल कौंसिल की टीम ने मेडिकल कालेज का मुआयना किया वहां अस्पताल जैसा कुछ था ही नहीं, ताले लटक रहे थे। कौंसिल ने सरकार को इसकी रिपोर्ट दी तो सरकार ने कालेज की मंजूरी (मान्यता) मुस्तरद (रद्द) कर दी। साथ ही कौंसिल को हिदायत दी कि वह कालेज की जानिब से जमा की गई बैंक गारण्टी को अपने हक में भुना ले।

प्रसाद ट्रस्ट ने एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट का रूख किया, मामला जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस अमिताभ राय और जस्टिस ए एम खानबिलकर की बंेच ने सुना तो कहा कि ट्रस्ट के साथ नाइंसाफी की गई है इसलिए मरकजी सरकार को इस मामले पर एक बार फिर गौर करना चाहिए। इस हिदायत के बाद प्रसाद एजूकेशन के एक ट्रस्टी बीपी यादव ने ओड़ीसा, इलाहाबाद और झारखण्ड हाई कोर्टों में रहे जस्टिस आई एम कुद्दसी से बात की उन्होने सुप्रीम कोर्ट के किसी जज से सेटिंग करके मामला सुप्रीम कोर्ट से वापस करा कर दुबारा इलाहाबाद हाई कोर्ट भेजवाया। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 25 अगस्त 2017 को आर्डर सुना दिया कि कालेज मेडिकल में एडमीशन कर सकता है। इसी के साथ हाई कोर्ट ने ट्रस्ट की जानिब से जमा की गई बैंक गारण्टी भुनाने पर भी रोक लगा दी। चार दिन बाद इण्डियन मेडिकल कौंसिल ने हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। यह अपील भी जस्टिस दीपक मिश्रा की कयादत (अगुवाई) वाली बंेच में सुनवाई के लिए लगी तो सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने एक बार फिर ट्रस्ट के  हक में फैसला देते हुए हाई कोर्ट के फैसले पर ही मोहर लगा दी और आईएमसी की अपील खारिज कर दी। 18 सितम्बर को मामला मुकम्मल तौर पर सेटल कराने के लिए कालेज ट्रस्ट फिर सुप्रीम कोर्ट पहुचा तो फैसला ट्रस्ट के हक मंे हुआ इस बार भी इस मामले की सुनवाई करने वाली बंेच की कयादत (अगुवाई) जस्टिस दीपक मिश्रा ही कर रहे थे। इसके अगले ही दिन रिश्वत के लिए इकट्ठा की गई दो करोड़ की रकम के साथ इस मामले में मुलव्विस पांच लोगों को सीबीआई ने गिरफ्तार कर लिया। यह रकम किस जज को देने के लिए आई थी किसी ने जज का नाम नहीं लिया लेकिन प्रशांत भूषण कहते हैं कि जब हर बार सुप्रीम कोर्ट से जस्टिस दीपक मिश्रा की बेंच ने ही ट्रस्ट के हक में फैसला दिया तो यह बात आसानी से समझी जा सकती है कि रिश्वत की रकम किसे दी जानी थी। उन्होने एक पीआईएल दायर करके मतालबा किया कि पूरे मामले की तहकीकात के लिए एक एसआईटी बनाई जाए।

सुप्रीम कोर्ट से जो आवाजें उठी उनका हल होना तो मुश्किल दिखता है। लेकिन इस झगडे़ में कुछ लोगों को चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की जिंदगी का पूरा चिट्ठा खोलने का मौका मिल गया। सोशल मीडिया पर जिस तरह की बातें दीपक मिश्रा के लिए लिखी गई उन्हें पढकर ऐसा लगता है कि  जैसे दीपक मिश्रा एक वकील से बने जज न होकर आदतन बेईमान हों। प्रसाद एजूकेशन ट्रस्ट का मामला तो अब सामने आया है। दीपक मिश्रा ने वकील की हैसियत से 1979 में ही उडीसा सरकार को एक हलफनामे के साथ दरख्वास्त देकर कहा कि वह एक ब्राहमण खानदान से ताल्लुक रखते हैं। उनके पास कोई जमीन नहीं है इसलिए बेजमीन काश्तकारों को सरकार की तरफ से दी जाने वाली जमीनों मेें से उन्हें भी दो एकड जमीन दी जाए। उन्हें दो एकड जमीन एलाट हो गई किसी ने इसकी शिकायत की तो उसकी तहकीकात हुई तहकीकात मे एलाटमेट गैरकानूनी पाया गया और 1985 मंे जमीन का एलाटमेंट रद्द हो गया।

दीपक मिश्रा के वालिद रघुनाथ मिश्रा 1961 से 1971 तक कांग्रेस पार्टी के मेम्बर असम्बली रहे और मिनिस्टर भी उसी दौरान दीपक मिश्रा के चाचा लोकनाथ मिश्रा राज्य सभा के मेम्बर रहे और उनके एक दूसरे चाचा रंगनाथ मिश्रा सीनियर वकील उसके बाद हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक के जज। उन्होने 18 सितम्बर 1950 से ही वकालत शुरू कर दी थी। ऐसे मजबूत खानदानी हैसियत के बावजूद दीपक मिश्रा ने गलत हलफनामा देकर गरीबोे को मिलने वाली जमीन में से दो एकड जमीन हथिया ली थी। जमीन का एलाटमेट तो कैंसिल हो गया लेकिन गलत तरीके से जमीन हथियाने के मामले में दीपक मिश्रा के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई उल्टे उन्हें मुसलसल तरक्की मिलती रही यहां तक कि वह मुल्क के चीफ जस्टिस बन गए।

अरूणाचल प्रदेश के वजीर-ए-आला रहे कलिखोपुल ने 13 जुलाई 2013 को खुदकुशी कर ली थी। मरने से पहले उन्होने अपना जो सूसाइड नोट लिखा था उसमें साफ लिखा था कि उनकी सरकार गैरकानूनी तरीके से गिराई गई थी। उस वक्त आदित्य मिश्रा ने उनसे 37 करोड़ रूपए यह कहकर मांगे थे कि वह सुप्रीम कोर्ट से उनकी सरकार की बहाली का आर्डर करा देगे। यह आदित्य मिश्रा कोई मामूली आदमी नहीं बल्कि आज के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के भाई हैं। इन तमाम बातों के बावजूद दीपक मिश्रा मुल्क के चीफ जस्टिस है। उनके सिलसिले में जिस तरह की बातें और हकायक (तथ्य) मंजरेआम पर आ चुके हैं उनके बावजूद अगर दीपक मिश्रा अपने ओहदे पर बने रहेंगे तो क्या सुप्रीम कोर्ट और मुल्क की अदलिया (न्यायपालिका) की साख बरकरार रह पाएगी?