रफेल सौदे में बड़ी रिश्वत

रफेल सौदे में बड़ी रिश्वत

मोदी सरकार में बेईमानी और बदउनवानी पिछली सरकारों के मुकाबले कम नहीं ज्यादा ही हैं

 

”मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार ने फ्रांस से 126 रफेल जेट फाइटर्स का सौदा 526 करोड़ दस लाख फी जेट के हिसाब से किया था इसी कीमत मंे दसाल्ट एविएशन कम्पनी रफेल की टेक्नोलाजी भी हिन्दुस्तान एरोनाटिक्स लिमिटेड को देती। नरेन्द्र मोदी सरकार उसी रफेल को 1570 करोड़ 80 लाख में बगैर टेक्नोलाजी के खरीद रही है। इस के बावजूद कि साढे तीन साल में मोदी सरकार में कोई बेईमानी नहीं  हुई।“

 

”राहुल गांधी बार-बार मतालबा कर रहे हैं कि नरेन्द्र मोदी रफेल सौदे में इजाफी कीमतों पर जवाब दें लेकिन मोदी कुछ बोल नहीं रहे हैं। डिफेंस मिनिस्ट्री छोड़कर गोवा वापस जाते वक्त मनोहर पर्रिकर ने कहा था कि डिफेंस मिनिस्टर की हैसियत से वह सो नहीं पा रहे नींद नहीं आती थी। उन्हें वजाहत (स्पष्ट) करना चाहिए कि ज्यादा काम केे बोझ की वजह से उन्हें नींद नहीं आती थी या अपनी नाक के नीचे हो रहे घोटाले उन्हें सोने नहीं देते थे?“

 

”यूपीए सरकार ने 126 रफेल फाइटर्स का सौदा किया था शर्त थी कि 18 जहाज पूरी तरह फ्रांस से बन कर आएंगे बाकी 108 एचएएल में तैयार किए जाएंगे। जिनकी टेक्नोलाजी फ्रांस एचएएल को सौपंेगा। मोदी ने सरकारी सेक्टर के ेएचएएल को बाहर करके अनिल अंबानी की कम्पनी अंबानी डिफेंस को उसकी जगह दे दी अंबानी डिफेंस को डिफेंस प्रोडक्शन का कोई तजुर्बा ही नहीं है। उन्होने सरकार की मंजूरी के बगैर फ्रांस की दसाल्ट एविएशन में साझेदारी की 49 फीसद एफडीआई भी ली अनिल पर यह मेहरबानियां क्यों?“

 

नई दिल्ली! कांगे्रस सदर राहुल गांधी कई महीनों से एक सवाल कर रहे हैं कि आखिर वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी यह क्यों नहीं बताते कि फ्रांस से लड़ाकू जहाज मरफेलफ तीन गुनी कीमत पर क्यों खरीदे जा रहे हैं और रफेल को भारत सरकार के जहाजसाज इदारे हिन्दुस्तान एरोनाटिक्स लिमिटेड के बजाए अनिल अंबानी की नई बनी कम्पनी के जरिए क्यों खरीदा जा रहा है। राहुल गांधी ने बार-बार कहा कि इस सौदे में बडे़ पैमाने पर कमीशन या रिश्वत का दखल है। राहुल गांधी के इल्जामात पर मोदी ने एक बार भी मुंह खोलना गवारा नहीं किया। मोदी खामोश क्यों हैं अब इस का जवाब रफेल के ही एक दूसरे सौदे से मिल गया है। डिफेंस जराए के मुताबिक सऊदी अरब और यूनाइटेड अरब अमीरात के बायकाट के बाद कतर ने अपने डिफेंस को मजबूत करने के लिए फ्रांस से मरफेलफ लड़ाकू जहाज खरीदने का एक सौदा किया है। फ्रांस उससे जो कीमत ले रहा है वह भारत के जरिए दी जाने वाली कीमत के मुकाबले आधे से भी कम है। इससे तो यही साबित होता है कि इस सौदे में बड़े पैमाने पर घपला और घोटाला हुआ है। वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी और उनके तमाम वजीर व पार्टी के लोग बार-बार दावा करते फिरते हैं कि साढे तीन साल की उनकी सरकार में एक भी घपला या घोटाला नहीं हुआ। यह दावा भी अब झूटा दिखने लगा है। हकीकत यह है कि मोदी सरकार में दूसरी सरकारों के मुकाबले घपले और घोटाले कम नहीं कुछ ज्यादा हो रहे हैं। लेकिन तमाम इल्जामात के बावजूद मोदी ने एक भी मामले में कोई तहकीकात नहीं कराई अगर तहकीकात ही नहीं हुई तो यह दावा कैसे किया जा सकता है कि आज बेईमानी नहीं होे रही है। याद रहे कि मनोहर पर्रिकर ने जब डिफेंस मिनिस्ट्री छोड़ कर गोवा के वजीर-ए-आला बनने को तरजीह (प्राथमिक्ता) दी थी उस वक्त उन्होने कहा था कि डिफेंस मिनिस्टर की हैसियत से वह सो नहीं पा रहे थे उनको नींद नहीं आती थी। उनकी यह कैफियत क्यों थी उन्हें खुद इसका खुलासा करना चाहिए या इसकी तहकीकात होनी चाहिए। क्या उन्हें इस लिए नींद नहीं आ रही थी कि उनकी नाक के नीचे उनकी वजारत में बड़े पैमाने पर घोटाले कराए जा रहे थे और वह बेबस (असहाय) होकर सिर्फ देख रहे थे रिश्वत खोरी रोक नहीं पा रहे थे। रफेल ही नहीं मोदी सरकार ने अमरीका से हावित्जर 777 तोपों का सौदा किया। दो तोपें आई दो सितम्बर 2017 को पोखरण में एक तोप का टेस्ट किया गया तो एक ही फायर में उसकी नाल फट गई। मतलब साफ है कि मोटा कमीशन खाकर घटिया किस्म की तोपें अमरीका से खरीदी गई। इंतेहा तो यह है कि बाद में डिफेंस मिनिस्ट्री ने कह दिया कि तोप खराब नहीं थी दरअस्ल उसमें अपना हिन्दुस्तानी गोला डालकर टेस्ट किया गया तो गोेले की खराबी की वजह से तोप की नाल फट गई। घटिया तोप होने के बावजूद सौदा रद्द नहीं किया गया। इतना बडा झूट बोला गया कि भारतीय गोला इस्तेमाल किया गया। दुनिया जानती है कि तोप जिस कम्पनी की होती है गोले भी वही कम्पनी सप्लाई करती है। करगिल लड़ाई के दौरान सिर्फ बोफोर्स ही कामयाब तोप साबित हुई थी। उस वक्त वाजपेयी सरकार ने लंदन की एक असलहा कम्पनी के जरिए बोफोर्स से गोले खरीदे थे क्योंकि भारत सरकार ने बोफोर्स से सौदों पर पाबंदी लगा रखी थी। अब लम्बी रिश्वत खाकर खरीदी जा रही अमरीका की घटिया तोपों में देसी गोला लगाने का झूट बोला जा रहा है। कांगे्रस के दौर में जब भी किसी पर इल्जाम लगा फौरन उसकी तहकीकात कराई गई मोदी ने एक भी इल्जाम की तहकीकात नहीं कराई है।

रफेल की खरीद में बड़े पैमाने पर रिश्वत खोरी हुई इसका अंदाजा इस बात से भी लगता है कि 2012 में मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार ने एक सौ छब्बीस (126) रफेल जेट एयर क्राफ्ट का सौदा दस बिलियन बीस मिलियन (10.2 बिलियन) डालर में किया था इस कीमत में एयर क्राफ्ट की तकनीकी भी भारत को मिलनी थी। मई 2014 में नरेन्द्र मोदी मुल्क के वजीर-ए-आजम बने तो अप्रैल 2015 में उन्होने फ्रांस का दौरा किया और यूपीए सरकार ने फ्रांस की कम्पनी दसाल्ट एविएशन के साथ रफेल का सौदा किया था वह सौदा रद्द कर दिया गया और कहा गया कि यह सौदा नए सिरे से किया जाएगा। बाद में मोदी सरकार ने सिर्फ 36 रफेल जेट्स का सौदा कर लिया। सितम्बर 2016 में दोनों मुल्कों के डिफेंस मिनिस्टर्स ने इस सौदे पर दस्तखत किए। यूपीए सरकार ने जो सौदा किया था उसके मुताबिक 126 फाइटर्स में से 18 पूरी तरह फ्रांस से बनकर आने थे बाकी फ्रांस टेक्नोलाजी एचएएल को ट्रांसफर करता और 108 राफेल फाइटर्स एचएएल तैयार करता। मोदी सरकार ने तीन गुनी कीमत पर सौदा किया उसमें भी टेक्नोलाजी ट्रांसफर होना शामिल नहीं है। नए सौदे में सरकारी सेटर के एचएएल की जगह अनिल अंबानी की रिलायंस डिफेंस शामिल हो गई। अनिल की कम्पनी को डिफेंस का कोई तजुर्बा नहीं है जब कि जवाबित (नियमों) के मुताबिक कम से कम तीन साल के तजुर्बे वाली किसी कम्पनी को इस किस्म की डील में शामिल होने की इजाजत दी जा सकती है।

मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार ने टेक्नोलाजी समेत 526 करोड़ दस लाख रूपए में एक रफेल जेट का सौदा किया था अब मोदी सरकार टेक्नोलाजी के बगैर ही 1570 करोड़ 80 लाख में एक जेट को खरीद रही है। इस पर भी दावा यह कि सौदे में कोई घपला नहीं है। इस सौदे मे कदम-कदम पर रिश्वत खोरी की बू आती है। मोदी सरकार ने रफेल के साथ सौदा फाइनल किया उसके ठीक दस दिन बाद 3 अक्टूबर 2016 को रिलायंस डिफेंस लिमिटेड ने फ्रांस की दसाल्ट एविएशन कम्पनी के साथ साझेदारी कर ली और मोदी सरकार के जरिए खरीदे जाने वाले 36 रफेल जेट्स के सौदे में शामिल हो गए। एचएएल को सौदे से बाहर कर दिया गया। अनिल अंबानी और उनकी कम्पनी पर मोदी इतने मेहरबान हैं कि अनिल अंबानी नेे भारत सरकार की कैबिनेट कमेटी की मंजूरी के बगैर ही दसाल्ट एविएशन के साथ साझेदारी कर ली। इतना ही नहीं भारत सरकार को बताए और मंजूरी लिए बगैर अंबानी ने भारत सरकार या कैबिनेट कमेटी की मंजूरी और इजाजत लिए बगैर ही डिफंेस कम्पनी के लिए 49 फीसद गैर मुल्की सरमायाकारी (एफडीआई) भी ले ली। मोदी सरकार ने अनिल अंबानी को आसानियां फराहम करने के लिए 24 जून 2016 को डिफेंस सेक्टर में 49 फीसद तक की गैर मुल्की सरमायाकारी (एफडीआई) को मंजूरी दी थी। मतलब साफ है अंबानी के हाथों में चांदी का जूता है तो उनके सारे गुनाह माफ हैं।

यह भी पता चला है कि वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी ने खुद अकेले सिर्फ अनिल अंबानी के मश्विरे पर रफेल की डील में इतना बड़ा उलट फेर किया। सौदा तय करने से पहले उन्होने अपने डिफेंस मिनिस्टर और एक्सपर्ट्स की टीम या कैबिनेट को भरोसे में नहीं लिया था। उस वक्त के डिफेंस मिनिस्टर मनोहर पर्रिकर गोवा में अपनी पसंद की एक दुकान से मछली खरीद रहे थे वहीं रेडियो पर उन्होने खबर सुनी कि वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी ने फ्रांस की दसाल्ट एविएशन के रफेल फाइटर जेट का सौदा दुबारा कर लिया। अगर मोदी ईमानदार हैं उनपर इस सौदे को लेकर राहुल गांधी ने जो इल्जामात लगाए हैं उनकी तहकीकात करा दे। मनोहर पर्रिकर ने कहा था कि डिफेंस मिनिस्टर की हैसियत से उन्हें नींद नहीं आती थी वह सो नहीं पा रहे थे उन्हें भी अब अपने इस बयान की वजाहत (स्पष्टीकरण) करनी चाहिए कि उन्हें ज्यादा काम के बोझ की वजह से नींद नहीं आती थी या फिर अपनी मिनिस्ट्री में ही बड़े पैमाने पर हो रहे घपलों की वजह से नींद नहीं आती थी?