तलाक-ए-बिदअत मुखालिफ मोदी कानून

तलाक-ए-बिदअत मुखालिफ मोदी कानून

वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी के नौरत्नों में शामिल वजीर कानून रविशंकर प्रसाद ने किसी एनजीओ के जरिए इकट्ठा किए गए आदाद व शुमार (आंकड़ों) की बुनियाद पर तलाक-ए-बिदअत यानी एक ही मजलिस में या वक्त पर तीन बार इकट्ठा तलाक देने वालों के खिलाफ एक कानून बनाया जिसे आनन-फानन लोक सभा से पास भी करा लिया गया। कहा गया कि यह मुस्लिम ख्वातीन के और मुल्क के लिए एक तारीखी कानून है। इस कानून के मुताबिक अब अगर किसी शख्स ने अपनी बीवी को एक ही बार में तीन बार तलाक, तलाक, तलाक कहकर खुद से अलग करने की हरकत की तो बीवी की शिकायत पर उस शख्स को तीन साल तक के लिए जेल की हवा खानी पड़ेगी। उसे अपनी बीवी और बच्चों को खर्च भी देना पडे़गा। याद रहे कि 22 अगस्त 2017 को सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच ने अपने फैसले में कहा था कि एक साथ तीन तलाक कुरआन से साबित नहीं है इसलिए इस किस्म की तलाक को गैर इस्लामी गैर कानूनी नाजायज और गैर अखलाकी (अनैतिक) करार दिया जाता है। आइंदा अगर कोई शख्स एक साथ तीन तलाक देगा तो वह तलाक दोनों यानी शौहर और बीवी के लिए काबिले कुबूल नहीं होगी। सरकार को सुप्रीम कोर्ट से दरख्वास्त करनी चाहिए थी वह इसमें इतना आर्डर और शामिल कर दे कि अब भी अगर कोई शख्स एक साथ तीन तलाक देगा तो बीवी की शिकायत पर उस शौहर के खिलाफ मघरेलू हिंसाफ कानून के तहत सख्त कार्रवाई होगी। सुप्रीम कोर्ट ने उसी वक्त सरकार से कहा था कि वह इस सिलसिले में एक कानून बनाए लेकिन उस वक्त रविशंकर प्रसाद ने ही कह दिया था कि सरकार इस पर कोई कानून नहीं बनाएगी। अब अचानक ऐसी कौन सी जरूरत पड़ गई कि सरकार ने जल्दबाजी में लंगड़ा-लूला कानून बना कर औरतों को ही नुक्सान पहुचाने का इंतजाम कर दिया। यह कानून मुस्लिम ख्वातीन के मफाद (हित) के खिलाफ है। इसका अंदाजा अभी उन चंद ख्वातीन को नहीं है जो आरएसएस लीडर इंद्रेश कुमार के इशारों पर काम कर रही हैं। सरकार को कानून बनाने की इतनी जल्दी थी कि सरकार ने इस्लाम के जानकारों, उलेमा, मुस्लिम तंजीमों, उन ख्वातीन जिनको आगे करके कानून बनाने का रास्त साफ किया गया उनको मोदी वजारत में शामिल दोनों वजीरों मुख्तार अब्बास नकवी और एम जे अकबर तक से इस पर कोई मश्विरा नहीं किया।

सिविल कानून को क्रिमिनल कानून का जामा पहनाकर रविशंकर प्रसाद और नरेन्द्र मोदी चाहे जितना अपनी पीठ थपथपाने का काम करें यहां तो रविशंकर प्रसाद से बड़ी चूक हो गई है। उन्होने मुल्क के सिविल लाॅ को शरअी कानून की हैसियत देने की गलती की है और एक शरअी कानून बना दिया है। दूसरे खलीफा हजरत उमर ने एक साथ तीन तलाक को तस्लीम कर लिया था लेकिन तलाक देने वाले को तीस कोडा़े की सजा भी तय कर दी थी। यही शरअी कानून है। रविशंकर प्रसाद ने तीस कोड़ों को तीन साल की कैद में तब्दील कर दिया। रविशंकर प्रसाद ने तीन तलाक न मानने वाले कई मुस्लिम मुल्कों के नाम गिनवाए उन तमाम मुल्कों में जम्हूरियत नहीं है देश के लोगों का बनाया हुआ कोई संविधान नहीं है उनमें तो इस्लामी और शरअी या डिक्टेटराना कानून चलते हैं यानी उन्होेने शरअी कानून को ही तस्लीम कर लिया है। चूंकि रविशंकर प्रसाद को इस्लाम की मालूमात नहीं है और जरूरत से ज्यादा काबिलियत जाहिर करने के चक्कर में उन्होने इस्लाम के किसी जानकार से मश्विरा नहीं किया। इसीलिए उन्होने नए कानून में तीन साल तक की सजा का बंदोबस्त कर दिया। उन्हें मालूम ही नहीं है कि अगर किसी शौहर और बीवी ने चार महीनों से ज्यादा मुद्दत तक जिस्मानी ताल्लुक (शारीरिक संबंध) कायम नहीं किए तो यह अमल  उनके तलाक की जायज (वैलिड) वजह बन जाता है। जो शौहर तीन सालों के लिए या डेढ-दो सालों के लिए भी जेल चला गया तो सजा की मुद्दत तक वह अपनी बीवी के साथ जिस्मानी ताल्लुक कायम नहीं कर सकेगा और तलाक की सूरत खुद ब खुद पैदा हो जाएगी।

मुस्लिम समाज में सिर्फ औरतें की नहीं अक्सरियत में मर्द भी ऐसे हैं जो एक वक्त में ही तीन तलाक के खिलाफ हैं। अस्सी फीसद से ज्यादा मुस्लिम मर्द औरतें किसी भी तरह के तलाक के खिलाफ हैं। हर मुसलमान जानता है कि किसी ऐसी मजबूरी के सिवाए कि दोनों का एक साथ रह पाना या गुजर कर पाना पूरी तरह नामुमकिन हो जाए, तलाक नहीं होना चाहिए। कुरआन ने तलाक का जो तरीका बताया है उसे अख्तियार किया जाए तो तलाक होने की शायद सूरत ही बाकी नहीं रहेगी। सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया है कि अब मुल्क में एक साथ तीन तलाक काबिले कुबूल नहीं होगी तो फिर एक साथ तीन बार तलाक कहने वाले को सजा किस बात की मिलेगी? अगर रविशंकर प्रसाद खुद ही मअक्ले कुलफ वाला वकील बनने के बजाए मामले का जानकारों से मश्विरा करके कानून बनाते तो एक बेहतर और सख्त कानून बन सकता था। जिस का खौफ भी लोगों पर हावी रहता। मसलन कानून में यह बंदोबस्त होता कि एक साथ तीन तलाक कहने वाले को उसके महर की दस से बीस गुनी रकम बीवी के बैंक अकाउंट मे जमा करनी पड़ेगी जिसपर मुस्तकबिल में भी सिर्फ और सिर्फ बीवी का अख्तियार (अधिकार) रहेगा शौहर वह पूरी रकम या उसका कुछ हिस्सा वापस नहीं ले पाता। इसके अलावा शौहर पर भारी भरकम जुर्माना भी लगाया जाता इस तरह तलाक देने वाले पर दस से पन्द्रह साल तक अगली शादी करने पर पाबंदी लगाई जा सकती थी। बीवी की शिकायत पर इस तरह तलाक-ए-बिदअत देने वाले के खिलाफ मघरेलू हिंसाफ कानून के तहत सख्त कार्रवाइयों का बंदोबस्त कानून में हो सकता था। निकाहनामे में शर्त शामिल की जा सकती थी कि शौहर कभी भी बीवी को एक साथ तीन तलाक नहीं दे सकता। अगर कोई ऐसी मजबूरी होती कि तलाक के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं रह जाता तो कुरआन के अहकामात के मुताबिक ही तलाक हो सकता। इनके अलावा भी कई ऐसी कानूनी और समाजी बंदिशें शौहरांे पर आयद की जा सकती थीं जिनका असर शौहर पर ताउम्र रहता।

आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड समेत जो मुसलमान और मुस्लिम तंजीमें यह कहकर इस कानून की मुखालिफत कर रही हैं कि यह कानून शरीअत में दखल अंदाजी करता है हम समझते हैं कि उनका एतराज भी गलत और नामुनासिब है। उन्हें तो यह कह कर इसकी मुखालिफत करनी चाहिए कि यह जल्दबाजी में कमअक्ली से बनाया गया बेवकूफियों भरा कानून है। इससे मुस्लिम ख्वातीन को फायदा होने के बजाए नुक्सान होगा और सुप्रीम कोर्ट का आर्डर बेमायनी हो जाएगा। इसलिए हम इसकी मुखालिफत करते हैं। इस कानून के पीछे दरअस्ल मोदी सरकार की एक छुपी हुई मंशा यह है कि वह 2019 के लोक सभा एलक्शन से पहले मुल्क में यूनिफार्म सिविल कोड के नाम पर हिन्दुत्ववादी कानून लाने की कोशिश कर सकती है। इस कानून पर रद्देअमल (प्रतिक्रिया) जानने की कोशिश फिलहाल की गई है। अभी से इंद्रेश कुमार के इशारों पर काम करने वाली कुछ मुस्लिम ख्वातीन ने कहना शुरू कर दिया है कि एक से ज्यादा शादियों पर पाबंदी भी लगाई जाए वर्ना एक से तीन साल तक की सजा काटने के बाद एक साथ तीन तलाक कहने वाले मर्द खुद तो दूसरी शादी करके आराम से रहेगे, भुगतेगी वह खातून जिसकी शिकायत पर शौहर को तीन साल की सजा हुई होगी। आरएसएस से जुडे़ कई लोग भी इन कम अक्ल मुस्लिम ख्वातीन की बात को आगे बढाने में लग चुके हैं। रविशंकर प्रसाद यह भी कहते हैं कि तील साल तक की सख्त सजा के खातून से लोग डरेगे। यह उनकी खाम ख्याली है। पूरी दुनिया में सख्त कानून का फायदा होने के बजाए नुक्सान होने की ही मिसालें भरी पड़ी हैं। अपने मुल्क में ही कत्ल की सजा मौत और उम्रकैद है। इतनी सख्त सजा के बावजूद मुल्क में कत्ल की कितनी वारदातें हो रही हैं यह किसी से छुपा नहीं  है। सख्त कानून पर मुल्क के मशहूर माहिरे कानून फैजान मुस्तफा बताते हैं कि ब्रिटेन में पुराने वक्त जेब काटने वाले को अवामी तौर पर फांसी की सजा दी जाती थी अवाम को हुक्म था कि इलाके के लोग इकट्ठा होकर मौत की सजा होते देखेंगे भी। एक बार लंदन में ऐसे ही एक जेब कतरे को अवामी तौर पर फांसी की कार्रवाई हो रही थी, देखने वालों की भीड़ इक्टठा थी तो उस भीड़ में शामिल इक्कीस लोगों की जेबें कट गई थीं। उसी वाक्ए के बाद ब्रिटेन ने इस सजा पर नजरसानी (पुर्नविचार) किया था।