सेक्युलरिज्म के मजबूत सिपाही अनवर जलालपुरी

सेक्युलरिज्म के मजबूत सिपाही अनवर जलालपुरी

प्रोफेसर मलिक जादा मंजूर अहमद के खला को भरने वाला शायर और नाजिम नहीं रहा

 

लखनऊ! मरहूम प्रोफेसर मलिकजादा मंजूर अहमद ने मुशायरों की निजामत को एक फन बनाकर उसे जो बुलंदी बख्शी थी उसे बरकरार रखने में अनवर जलालपुरी का अहम रोल रहा है। अनवर जलालपुरी ने शायर के साथ-साथ नाजिमे मुशायरा के तौर पर भी आलमी  शोहरत हासिल की। प्रोफेसर मलिकजादा मंजूर अहमद के इंतकाल के बाद अनवर जलालपुरी का दुनिया से रूखसत होना मुशायरों की दुनिया के लिए एक बडा सदमा है। दरअस्ल अनवर जलालपुरी की बेटी नुजहत का अक्टूबर (2017) मंे लंदन मंे इंतकाल हो गया था। इससे उन्हें बहुत सदमा पहुचा था। पिछली 28 दिसम्बर को वह जलालपुर से बेटी के चालीसवें के फातिहा में शिरकत करके लौटे थे उसी शाम बाथरूम मंे ब्रेन हैमरेज से उनपर फालिज का हमला हुआ और उन्हंे ट्रामा संेटर मंे भर्ती कराया गया। दो जनवरी को सुबह तकरीबन सवा नौ बजे उनका इंतकाल हो गया। उनकी उम्र तकरीबन 71 साल थी। तीन जनवरी को उन्हें उनके आबाई वतन जलालपुर में जुहर की नमाज के बाद सुपुर्दे खाक कर दिया गया।

अनवर जलालपुरी इस बात से अच्छी तरह वाकिफ थे कि मुशायरे की निजामत अक्सर शायर की शायराना सलाहियत को पीछे छोड़ देती है। उसके बावजूद उन्होने यह जोखिम उठाया और मरते वक्त तक मुशायरों की निजामत करते रहे। हालांकि इसके साथ उन्होने अपनी शायराना सलाहियत का भी लोहा मनवाया और शायर अनवर पर नाजिमे मुशायरा अनवर कभी हावी नहीं हो सका। यूं तो उन्होने तकरीबन डेढ दर्जन किताबें लिखी लेकिन उनका जिक्र उन किताबों के मुसन्निफ के बजाए रविन्द्रनाथ टैगोर की गीतांजलि और भगवद गीता के श्लोकों का मजूम तर्जुमा करने की वजह ज्यादा होता है। उन्होनेे गीता के 700 श्लोकों को 1761 अशआर के पैकर मंे ढाला था।

अनवर लालपुरी के इंतकाल के बाद मुशायरों की निजामत का वह दायरा भी सिमट जाएगा जिसे वह बरकरार रखे थे। अनवर जलालपुरी तकरीबन पैंतीस साल तक मुल्की और आलमी सतहों के कवि सम्मलेन व मुशायरों का लाजिमी जुज हुआ करते थे। अरब मुल्कों में हिन्दुस्तानी एम्बेसी में होने वाले मुशायरों में उनकी शिरकत लाजिमी होती थी। इसके अलावा अमरीका, पाकिस्तान, इंग्लैण्ड समेत अरब मुल्कों में होने वाले मुशायरों में वह शिरकत और निजामत करते रहे हैं। उन्होने शायरी के अलावा नस्र में खासा लिखा है और वह भी किताबी शक्ल में शाया हो चुका है। मअकबर द ग्रेटफ टीवी सीरियल में उन्होने अपने कलम के जौहर दिखाए और उनके अंदर छुपा अदीब सामने आया। इस सीरियल में अनवर जलालपुरी ने गीत और डायलाग लिखे थे। डेढ इश्किया फिल्म में नसीरउद्दीन शाह और माधुरी दीक्षित के साथ फिल्म में मुशायरे के एक सीन में वह मुशायरे की निजामत करते नजर आए थे।

अनवर जलालपुरी की अदबी सलाहियतों के मद्देनजर उन्हें कई ओहदों व अवार्डों से नवाजा गया। वह मदरसा एजूकेशन कौसिल के चेयरमैन रहे। उसके बाद अखिलेश यादव सरकार ने उन्हें प्रदेश के सबसे बड़े अवार्ड यशभारती से नवाजा। इसके अलावा उन्हें ब्रज कला केन्द्र दिल्ली की जानिब से मकुनाल गर्ग ब्रज विभूति सम्मानफ और मअम्बेडकर रत्नफ से भी नवाजा गया।

अनवर जलालपुरी के इंतकाल पर अफसोस जाहिर करते हुए वजीर-ए-आला योगी आदित्यनाथ ने कहा कि उनकी किताब मउर्दू शायरी में गीताफ काफी मशहूर हुई। जबकि गवर्नर राम नाईक ने कहा कि अनवर जलालपुरी उर्दू शायरी और मुशायरे का वह नाम है जिसे किसी पहचान की जरूरत नहीं है। उनके इंतकाल की खबर सुनकर ऐसा लगा जैसे किसी ने मुशायरे से शम्मा ए महफिल उठा ली हो। समाजवादी पार्टी के सदर और साबिक वजीर-ए-आला अखिलेश यादव ने अनवर जलालपुरी को खिराजे अकीदत पेश करते हुए कहा कि मुशायरों की निजामत का उनका अपना अलग एक अंदाज था। वह सूफी शोअरा की रिवायत के एक मजबूत दस्तखत थे। कांगे्रस के प्रदेश सदर राज बब्बर ने इंतकाल पर अफसोस जाहिर करते हुए कहा कि ईश्वर उनके घर वालों को यह गम बर्दाश्त करने की ताकत दे। अनवर जलालपुरी के इंतकाल से उर्दू हिन्दी अदब को खासा नुक्सान हुआ है।

मशहूर शायर प्रोफेसर वसीम बरेलवी ने अनवर जलालपुरी के इंतकाल पर अफसोस जाहिर करते हुए कहा कि उनकी शायरी सही मायनों (अर्थों) में गंगा-जमुनी तहजीब की नुमाइंदगी करती थी। उन्होने कभी मुश्किल जबान नहीं इस्तेमाल की और कभी हल्के शेर नहीं कहे। उन्होने लतीफों के सहारे महफिल नहीं लूटी बल्कि लफ्जों की बंदिश और अल्फाज के उतार-चढाव से महफिल पर छा जाते थे। सामईन के हिसाब से महफिल कोे चलाना तलवार की धार पर चलने जैसा होता है और अनवर साहब इस फन में माहिर थे। लंदन में एक मुशायरे की निजामत के दौरान उन्होने किसी को मालूम नहीं पड़ने दिया कि यही उनकी बेटी का कैंसर का इलाज चल रहा है। बेटी की मौत से उन्हें इतना सदमा लगा कि काफी दिनों तक उन्होने अपना फोन भी बंद रखा और जब बेटी के फातिहे से पलटे तो फिर हमेशा के लिए खामोश हो गए।

अनवर जलालपुरी के इंतकाल से अदबी हलकों मे गम की लहर दौड़ गई बडी तादाद में हिन्दी के कवियांे, उर्दू के शोअरा और अदीबों ने उन्हें खिराजे अकीदत पेश करते हुए उनसे अपने रवाबित और उनकी शायराना सलाहियत का जिक्र किया। मुनव्वर राना ने उन्हें अपना भाई बताते हुए कहा कि उन्होनेे अपनी शायरी में फिरके और मजहब की खाई पाटने का काम किया था। अनवर जलालपुरी के इंतकाल से मुशायरों की गंगा-जमुनी तहजीब को जो नुक्सान हुआ है उसकी तलाफी आसान नहीं होगी। वह भले आज हमारे बीच नहीं हैं मगर अपनी शायरी और फन ए निजामत की वजह से वह हमेशा जिंदा रहेगे।

अनवर जलालपुरी का पूरा नाम अनवार अहमद था वह अम्बेडकर नगर के कस्बे जलालपुर में 6 जुलाई 1947 को पैदा हुए थे। उनके वालिद मरहूम हाफिज हारून एक नेक दिल इंसान थे जिसकी छाप अनवर जलालपुरी की जिंदगी में नजर आती थी। उन्होने अलीगढ मुस्लिम युनिवर्सिटी से इंग्लिश मंे एमए किया। फिर फैजाबाद से उर्दू में मास्टर डिग्री ली। इसके बाद वह जलालपुर के एनडी कालेज में इंग्लिश के लेक्चरार हो गए थे। फिराक गोरखपुरी की तरह अंगे्रजी का टीचर होने के साथ वह उर्दू में शायरी भी करते रहे।

उन्होने कई किताबें भी लिखी जिनमें मखारे पानी का सिलसिलाफ, मखुश्बू की रिश्तेदारीफ उनकी गजलों का मजमूआ है। देवनागरी में उनकी गजल का मजमूआ मजागती आंखेंफ के नाम से है। देवनागरी में उनके मजामीन मअपनी धरती-अपने लोगफ के उनवान से किताबी शक्ल में शाया हुए हैं। उर्दू शायरी में रूबाइयाते ख्य्याम, प्यार की सौगात अदब के अक्षर चुनिंदा अशआर उनके मजामीन का एक मजमूआ मरौशनी की सफीरफ के नाम से भी छपा है। जर्बे लाइलाह उनकी नातिया शायरी का मजमूआ है तो मजमाले मोहम्मदफ में उन्होने पैगम्बरे इस्लाम (स.अ.व.) की सीरत बयान की है। उनकी नातिया शायरी का एक मजमूआ मबाद अज खुदाफ और  दूसरा महरफे अबजदफ के उनवान से शाया हो चुका है। मराह रौ से रहनुमा तकफ में उन्होनेेे खुलफाए राशिदीन की सीरत का जिक्र किया है। कलम का सफर, सफीराने अदब के अलावा रविन्द्रनाथ टैगोर की नज्म मगीतांजलिफ और श्रीमद भागवत गीता का उर्दू तर्जुमा उर्दू शायरी में गीतांजलि और उर्दू शायरी में गीता के नाम से किया जिसने उन्हें बडी शोहरत दिलाई।

मदरसा शिक्षा परिषद उत्तर प्रदेश के चेयरमैन रहे अनवर जलालपुरी ख्वाजा मोईनउद्दीन चिश्ती उर्दू-अरबी फारसी युनिवर्सिटी लखनऊ की वर्किग कमेटी के भी मेम्बर रहे। वह जिला अम्बेडकर नगर के ला ट्रब्यूनल के मेम्बर, उत्तर प्रदेश हज कमेटी के मेम्बर, उर्दू अकादमी की वर्किग कमेटी के मेम्बर और जलालपुर में मिर्जा गालिब इंटरकालेज के बानी और मैनेजर रहे थे।

प्रोफेसर शारिब रूदौलवी कहते हैं कि अनवर जलालपुरी एक बहुत अच्छे इंसान, एक अच्छे शायर और अदीब थे। उन्होने शोअरा का तआरूफ सिर्फ स्टेज से जबानी नहीं कराया बल्कि हम अस्र शायरों और अदीबों पर मजामीन लिखकर उनकी शेअरी और अदबी हैसियत के तअय्युन में मदद की। अपने दो मजामीन के मजमूओं मकलम का सफरफ और मसफीराने अदबफ में उन्होंने तकरीबन पचास शोअरा और अदीबों के शेअरी और अदबी कारनामों को जायजा लिया जिसमें उन्होने मजाज से लेकर अपने हम अस्र शायरों में रईस अंसारी और डाक्टर नसीम निकहत की शायरी का बडी खूबसूरती से जायजा लिया।

अनवन जलालपुरी बुनियादी तौर पर शायर थे लेकिन उन्होनेे अंगे्रजी और उर्दू अदबियात मे एमए किया था। फारसी जबान से अच्छी वाकफियत रखते थे। हिन्दी जबान पर उन्हें पूरी पकड हासिल थी। इसलिए अदब या नस्र व नज्म के बारे में उनकी राय की अदबी व इल्मी अहमियत थी।

अपने हम अस्र अदब और अदीबों पर गहरी नजर के साथ वह दूसरी जबानों पर बहुत अच्छी पकड़ रखते थे। आम तौर पर देखा गया है कि शायरों को दूसरी जबानों के शेअर व अदब से ज्यादा ताल्लुक नहीं रहता। उनकी दुनिया अलग एक दुनिया होती है। लेकिन अनवर जलालपुरी की यह इफिरादियत काबिले जिक्र है कि उन्हें अंग्रेजी अदबियात के साथ हिन्दी, संस्कृत, फारसी और बंगाली अदब से इसी तरह दिलचस्पी थी। उन्होने रविन्द्रनाथ टैगोर की गीतांजलि के सौ साल मुकम्मल होने पर (1913-2013) 2013 ही में गीतांजलि का मंजूम तर्जुमा किया। उनसे पहले नियाज फतेहपुरी और फिराक गोरखपुरी गीतांजलि का उर्दू नस्र में तर्जुमा कर चुके थे। इसके अलावा अनवर जलालपुरी तर्जुमे की दुश्वारियों से वाकिफ थे। इन दुश्वारियों के बावजूद उन्होने गीतांजलि को उर्दू के शेअरी कालिब में पेश करने की कोशिश की उनके सामने नस्र के तर्जुमे जरूर थे लेकिन इसके बावजूद गीतांजलि की खूबियों को समझ कर एक ऐसे शेअरी कालिब में ढालना कि समझ में आ सके बहुत मुश्किल काम था। टैगोर की शायरी कई तसव्वुफ, रूहानियत से मिलकर बनी है इन सब अनासिर का तर्जुमे में ख्याल रखना आसान नहीं था। मगर बड़ी खूबी के साथ उन्होेने गीतांजलि की तमाम नज्मों, गीतों का तर्जुमा उर्दू नज्म में किया। जहां तक उनके तर्जुमों का सवाल है उन्होने रूबाइयाते उमर ख्य्याम का भी तर्जुमा किया लेकिन उनके दो तर्जुमे सबसे अहम हैं लेकिन भगवत गीता का तर्जुमा और पाराए गम के मफहूम को शेअरी पैकर देना था। उन्हें शेअर गोई पर बड़ी कुदरत और इस्तेमाले जबान का सलीका था। वह बुनियादी तौर पर शायर थे। उन्होने नज्में भी कहीं हैं और गजलें भी रूबाइयात भी लिखी हैं और कतआत भी। उनके अशआर पढकर उनके हुस्ने इजहार का अंदाजा होता है वह अपने को हिन्दी, उर्दू, अवधी का शेअरी वारिस समझते थे और इसका इजहार उन्होने अपने एक शेअर में इस तरह किया है- कबीर व तुलसी व रसखान मेरे अपने हैं, वारिसे जफर व मीर जो है मेरी है।

अनवर जलालपुरी की शायरी उनके नफ्सियाती मुताले को एक बडा असासा है। उनकी शायरी में दो एहसासात साथ-साथ चलते दिखाई देते हैं। एक परेशानी, दिल गिरफ्तगी और उदासी का और दूसरा अना और सरबुलंदी का। यूं हर दोनों अहसासात एक दूसरे की जिद हैं। लेकिन बाज ऐसे मजबूत किरदार होते हैं जो उदासी और दिल शिकस्तगी से गुजरते तो जरूर हैं लेकिन उनसे हार नहीं मानते। यह जिंदगी का तवाना तसव्वुर है जो उन्हें मीरास हिन्दी के बावजूद सरबुलंद रखता है। यहां नेजे पर सर के बुलंद होने के बावजूद दुनिया से खिराज लिया है और दिन के बाद रात अगर हमें मिली तो हमने इस अंधेरे ओर इस तारीकी से लडने के लिए चिराग जला लिया। यह उनकी फिक्री रजाइयत ही है जो उनसे यह कहलाती है- अभी आंखों की शम्मएं जल रही हैं प्यार जिंदा है/ अभी मायूस मत होना अभी बीमार जिंदा है। लेकिन शायरी का यह बीमार आंखे बंद होने के बाद भी जिंदा है। इसमें किसी को शक नहीं है।