नर्मी से महरूमी हर खैर से महरूमी

नर्मी से महरूमी हर खैर से महरूमी

मौलाना अब्दुल वहाब संभली

दुनिया में शोर मचा है कि दहशगर्दी आलम के लिए एक मसला बनी हुई है लेकिन इससे ज्यादा अफसोसनाक बात यह है कि दहशतगर्दी की ऐसी मुअय्यन तारीफ नहीं बयान की जा सकी कि जिससे दहशतगर्दी  का मफहूम और इसके मायनी मुतअय्यन हों अगर इस इस्तलाह की तारीफ वाजेह होती तो इसकी रौशनी में एहकाम और सजाओं का निफाज भी मुमकिन और आसान होता और इस सूरत में दुनिया में अम्न व अमान का कयाम और कानूनी आजादियों का तहफ्फुज होना और इंसाफ के तकाजे पूरे होते। हासिल यह कि ऐसी इस्तलाह जो मुबहम हो वह कौमों की जिंदगी पर निहायत मनफी असरात डालती है। शकूक व शुब्हात को जन्म देती है और तखरीबकारी मचाती है। इसकी एक बदतरीन मिसाल दहशतगर्दी की इस्तलाह है। तारीख का यह कैसा अलमिया है कि नबी करीम (सल0) के जरिए जो दीन दीने रहमत बनाकर दुनिया के लिए भेजा गया उसपर दीदादिलेरी के साथ तशद्दुद पसंदी का इल्जाम और अलाहदगी पंसदी की तोहमत लगाई जाती है। जबकि इस्लाम की तालीमात और इसकी शरीअत के एहकामात न सिर्फ इन इल्जामात की तरदीद करते हैं बल्कि इस्लामी तारीख की सच्चाइयां भी इन तोहमात की नफी करती हैं।

मसले का हल यह हो सकता है कि एक तरफ तो सियासत, कानून और फिकह के माहिरीन, दहशतगर्दी की जामे व मुअय्यन तारीफ तय करें और दूसरी तरफ दहशतगर्दी के असबाब ढूढें जाएं और उनको खत्म किया जाए। समाज में पनपने वाला जुल्म दहशतगर्दी का सबब बनता है, बेरोजगारी, तालीम व इलाज जैसी बुनियादी सहूलतों से महरूमी जरायम को जन्म देने वाली साबित होती है। दीन के मसादिर और सरचश्मों पर बेबुनियाद हमलों का सिलसिला भी एक इज्तिराब पैदा करता है। तस्वीर का दूसरा रूख यह भी हो सकता है कि एक्तेदार के हुसूल का जज्बा तवायफुल मलूकी फैलाने का सबब बनता हो लेकिन यह बात भी खारिज नहीं हो सकती कि ऐसे इकदामात के पसेपुश्त भी कोई ममाशूकफ छुपा बैठा हो और धमाकों और धमकियांे की कार्रवाइयों से दुनिया को इस्लाम और मुसलमानों के ताल्लुक से यह तास्सुर देना चाहता हो कि मुसलमान एक गारतगर और अम्न दुश्मन कौम है जो आलमी अम्न व अमान, तहजीबी कद्रों और इंसानी हुकूक का एहतराम नहीं करती।

अफसोस कि किसी माशूक के हाथ आलाकार बनने वाले नादान यह भूल जाते हैं कि उनके हाथों इस्लाम और उम्मते इस्लामिया के मसालेह को नाकाबिले तलाफी नुक्सान पहुच सकता है और दीने रहमत की इशाअत व तब्लीग में अमली रूकावट पैदा हो सकती है। काश कि इसके सामने नबी करीम (सल0) का यह फरमान होता कि अल्लाह नर्मखू है और नर्मी को पसंद फरमाता है और नर्म खूई पर व अता  करता है जो तशद्दुद यह इसके सिवा किसी दूसरी चीज पर अता नहीं करता और आप का यह इशारा भी कि जो नर्मी से महरूम है वह खैर से महरूम है।

सच्ची बात यह है कि दुनिया आज भी अपने मसायल के हल के लिए इसी दर की मोहताज है जो दर अल्लाह का और उसके रसूल का दर है। इस्लामी शरीअत न सिर्फ मुसलमानों के मफादात की निगहबान है बल्कि उन लोगों को भी तहफ्फुज की जमानत देती है जो इसके साया आतिफत में पनाह लें, कुरआन का इरशाद है कि (यह अल्लाह की किताब है) जिसके सामने से बातिल आ सकता है न पीछे से, यह एक दाना और हमीद की तरफ से नाजिल कर्दा है। दियानतदारी के साथ अपने कौल व फेअल से शरीअते इस्लामिया पर अमल ही उम्मत को शकूक व शुब्हात के घेरों से आजाद कर सकता है और इंशाअल्लाह अल्लाह की नुसरत भी आ सकती है।