गुजरात में मोदी की नैतिक हार

गुजरात में मोदी की नैतिक हार

विकास न होने के राहुल के इल्जामात के जवाब में मोदी ने थामा धर्म और पाकिस्तान का हथियार

 

”नरेन्द्र मोदी अपनी मुबय्यना (कथित) ईमानदारी का ढिढोरा चाहे जितना पीट लें राहुल गांधी का यह इल्जाम उनपर अच्छी तरह चस्पा हो चुका है कि नैनो फैक्ट्री के लिए उन्होने टाटा को जो तैतीस हजार करोड़ की सब्सिडी दी थी उस रकम की बंदरबांट की गई है। नैनो फैक्ट्री शुरू नहीं हुई तो उन काश्तकारों में बहुत नाराजगी है जिनकी बेशकीमती जमीने एक्वायर कर टाटा को दी गई थी।“

 

”अपनी मीटिंगों में भीड़ न देख कर मोदी ने यहां तक कह दिया कि कांगे्रस ने पटेलों की हमेशा तौहीन की यहां तक कि केशुभाई पटेल और आनन्दी बेन पटेल तक को चीफ मिनिस्ट्री से हटवाने के लिए कांगे्रस दफ्तर मंे साजिशें रची गई और पैसा भी खर्च किया गया। वह भूल गए कि केशुभाई पटेल को हटवाकर खुद चीफ मिनिस्टर बने थे और आनन्दी बेन पटेल को खुद उन्होंने वजीर-ए-आला बनाया फिर हटाया अब उन्हें और उनकी बेटी अनार पटेल को टिकट न देकर उन्होेेने पटेलों के साथ क्या किया।“

 

”हर एलक्शन की तरह इस बार भी गुजरात पहुचते ही नरेन्द्र मोदी ने हिन्दुत्व, धर्म, मुस्लिम, पाकिस्तान और दहशतगर्दी का राग अलापना शुरू कर दिया। हाफिज सईद की नजरबंदी जारी रखने में डिप्लोमेटिक  फ्रण्ट पर पूरी तरह नाकाम मोदी ने सफेद झूट बोलते  हुए कहना शुरू कर दिया कि हाफिज सईद की रिहाई पर राहुल गांधी और कांगे्रस तालियां बजा रही है। रविशंकर प्रसाद ने कह दिया कि नौ साल पहले राहुल गांधी ने अमरीका की सफीर से कहा था कि लश्करे तैयबा से ज्यादा खतरा भारत को भगवा दहशतगर्दी से है। अब मोदी और उनकी पार्टी तरक्की के मुद्दे के बजाए इन्हीं मुद्दों पर एलक्शन लड़ रही है।“

 

अहमदाबाद! मजहब, मुसलमान, पाकिस्तान और दहशतगर्दी के सहारे गुजरात असम्बली का एलक्शन भले ही बीजेपी जीत ले लेकिन वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी और रविशंकर प्रसाद, अरूण जेटली और स्मृति ईरानी जैसी उनकी वजीरों की बौखलाहट से साफ जाहिर है कि मोदी शायद पहली बार एखलाकी (नौतिक) तौर पर यह एलक्शन पूरी तरह से हार चुके हैं। वैसे तो नरेन्द्र मोदी ने अक्टूबर में एलक्शन का एलान होने से कब्ल ताबड़तोड़ कई दौरे करके प्रदेश और देश की तरक्की के बडे़-बड़े दावे किए लेकिन एलक्शन मुहिम बाकायदा शुरू होने के बाद नरेन्द्र मोदी ने सत्ताइस नवम्बर से एलक्शन दौरे शुरू किए तो गुजरात में तरक्की की जगह धर्म, मुसलमान, पाकिस्तान और दहशतगर्दी ने ले ली। यह हथियार मोदी के जाने-माने और परखे हथियार हैं उन्हें अब भी यकीन है कि धर्म, मुसलमान, नफरत और पाकिस्तान जैसे जज्बाती मुद्दों में फंसा कर वह गुजरात के आम लोगों के वोट ठग लेेंगे। उन्होने पहली पब्लिक मीटिंग पाटीदार समाज के गढ कहे जाने वाले राजकोट के जसरड़ में की तो तमाम कोशिशों के बावजूद भारतीय जनता पार्टी और उनके लिए इतनी भीड़ भी इकट्ठा नहीं कर सकी कि डायस के सामने मैदान के आगे के आधे हिस्से में पड़ी कुर्सियां भर पाती। जाहिर है मोदी के लिए यह इंतेहाई मायूसकुन सूरतेहाल थी, नतीजा यह कि उन्होने फौरन पाकिस्तान और वहां के दहशतगर्द गरोह के सरगना हाफिज सईद का दामन थाम लिया और बोले कि हाफिज सईद की रिहाई पाकिस्तान की एक अदालत के आर्डर पर हुई तो राहुल गांधी और कांगे्रस उसकी रिहाई पर तालियां बजा रही हैं। दरअस्ल नरेन्द्र मोदी अपनी नाकामी पर पर्दा डालने के लिए इस किस्म की बातें कर रहे हैं। वजीर-ए-आजम बनने के बाद तीन सालों में आधी दुनिया से भी ज्यादा मुल्कों का दौरा कर चुके हैं। अमरीका, चीन, जापान, आस्टे©ंलिया, जर्मनी, फ्रांस और रूस जैसे मुल्कों का दौरा करने के बाद हर बार मोदी ने लम्बे-चैड़े दावे करते हुए कहा कि इन सभी मुल्कों ने भारत के साथ मिलकर दहशतगर्दी के खिलाफ लड़ने का वादा किया है। बार-बार यह भी कहा गया कि हमने दुनिया की सतह पर पाकिस्तान को अलग-थलग कर दिया है। यह दावे खोखले साबित हुए क्योंकि एक तो इन तमाम मुल्कों ने मिलकर पाकिस्तान पर इतना दबाव भी नहीं डाला कि वह हाफिज सईद को नजरबंद ही रखता, दूसरा यह कि अमरीका ने चंद दिन पहले ही पाकिस्तान को सात हजार करोड़ डालर की मदद देने का भी एलान कर दिया। अपनी इस डिप्लोमेटिक नाकामी पर पर्दा डालने के लिए अब मोदी, कांगे्रस पर इल्जाम लगा रहे हैं। 2002 से 2014 तक असम्बली के तीन और एक लोक सभा एलक्शन नरेन्द्र मोदी ने हिन्दू मुस्लिम का मुद्दा गर्म करके जीते हैं इसीलिए इस बार फिर उन्होने वही पुराना पैंतरा चला है। मरकजी वजीर कानून रविशंकर प्रसाद ने प्रेस कांफ्रेंस करके कहा कि नौ साल कब्ल राहुल गांधी ने अमरीकी सफीर (राजदूत) से कहा था कि भारत को अल कायदा के मुकाबले भगवा दहशतगर्दी से ज्यादा बड़ा खतरा है। रविशंकर की प्रेस कांफ्रेंस के फौरन बाद इसपर बहस भी शुरू करा दी गई ताकि राहुल गांधी पर हिन्दू मुखालिफ होने का इल्जाम चस्पा किया जा सके। अब एक तरफ राहुल गांधी अकेले हैं मकामी तौर पर हार्दिक पटेल, जिग्नेश मावानी और अल्पेश ठाकोर उनकी मदद कर रहे हैं तो दूसरी तरफ इन चार नौजवानों के मुकाबले नरेन्द्र मोदी खुद तो मैदान में हैं ही उन्होेने पचास मरकजी वजीरों, एक दर्जन से ज्यादा चीफ मिनिस्टर्स, डेढ सौ मेम्बरान पार्लियामेंट तकरीबन इतने ही मुख्तलिफ प्रदेशोें  के मेम्बरान असम्बली और आरएसएस स्वयं सेवकों की एक भारी भरकम फौज को उतार रखा है यही तो उनकी जेहनी और एखलाकी शिकस्त है।

शिकस्त के खौफ से परेशान दिख रहे नरेन्द्र मोदी ने राहुल गांधी पर हमले करते-करते हिमाचल प्रदेश की तरह एक बार फिर जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी तक पहुच गए। उन्होनेे इल्जाम जड़ दिया कि जब सरदार पटेल ने सोमनाथ मंदिर की नव तामीर (पुर्ननिर्माण) का काम कराया था राहुल के नाना जवाहर लाल नेहरू की भौवें तन गई थीं। हालांकि हकीकत यह है कि सोमनाथ मंदिर की दुबारा तामीर का फैसला नेहरू की कैबिनेट ने ही लिया था। गुजरात में तरक्की की बात करने के बजाए मोदी इस हद तक उतर गए कि बोले मोरबी में जब आफत आई थी तो इंदिरा गांद्दी यहां आईं, यहां की बदबू वह बर्दाश्त नहीं कर पाईं तो नाक पर रूमाल लगाकर भागी थीं। दूसरी तरफ आरएसएस के स्वयं सेवक उसी गंदगी में घुस कर लोगों की मदद कर रहे थे। फौरन ही कांग्रेस ने उस वक्त की एक तस्वीर जारी करके मोदी को मुंह तोड़ जवाब दिया। इस तस्वीर में आरएसएस के तमाम लोग कपड़े से अपनी नाक बंद किए दिख रहे हैं।

नरेन्द्र मोदी ने एक और नया पैंतरा चला है कि वह एक गरीब घर से आते हैं इसके बावजूद उनके कैरियर पर बेईमानी का एक भी दाग नहीं है। यह गुजरात के लिए इंतेहाई फख्र की बात है और गुजरात की इज्जत पर कीचड़ उछालने के मकसद से दिल्ली से उनके अपने घर में आकर एक शख्स (राहुल गांधी) उनपर अनाप-शनाप इल्जाम लगा रहा है। अब उनका यह दांव चलता नहीं दिख रहा है। मोदी पर वैसे तो राहुल गांधी ने कई संगीन इल्जामात लगाए हैं लेकिन नैनो कार फैक्ट्री के नाम पर टाटा मोटर्स को तैंतीस हजार करोड़ की सब्सिडी देकर उसमें बंदरबांट का इल्जाम ऐसा है जिस पर आम गुजराती भी अब यकीन करने लगा है। कोई आठ साल पहले चीफ मिनिस्टर की हैसियत से मोदी ने टाटा को अहमदाबाद के नजदीक हजारों करोड़ की बेशकीमती जमीन मुफ्त में दे दी थी। इसके अलावा सरकारी खजाने से टाटा को तैंतीस हजार करोड़ की सब्सिडी एडवांस में दे दी गई। जिन काश्तकारोें की जमीन एक्वायर की गई थी उनसे वादा किया गया था कि हर घर के कम से कम एक फर्द को नैनो कम्पनी में नौकरी दी जाएगी। आज तक टाटा की नैनो फैक्ट्री लगी नहीं किसी को नौकरी नहीं मिली और टाटा ने गरीब अवाम के हक का तैंतीस हजार करोड़ रूपया भी हज्म कर लिया। कांगे्रस का इल्जाम है कि इस तैंतीस हजार करोड़ की आपस में बंदरबांट कर ली गई। इसी में से एक बड़ी रकम 2014 के लोक सभा एलक्शन में भी खर्च की गई। मोदी समेत बीजेपी का एक भी लीडर इस सवाल पर मुंह खोलने की हिम्मत नहीं कर पा रहा है।

राजकोट रैली से भी मोदी की मीटिंगों में भीड़ कम होनी शुरू हुई तो बाद की किसी भी मीटिंग में उनकी पार्टी इस बार उनके नाम पर भीड़ इकट्ठा नहीं कर पा रही है। उनसे ज्यादा भीड़ तो हार्दिक पटेल, जिग्नेश मावाणी और अल्पेश ठाकोर की मीटिंगों में जुटती दिखती है। इससे मोदी अपना आपा भी खो बैठे और बेसिर पैर की बातें करने लगे। उन्होने कहा कि कांग्रेस ने गुजरात में पटेलों की हमेशा मुखालिफत की है। इंतेहा यह कि केशुभाई पटेल को हटाने के लिए कांगे्रस के दफ्तर में साजिश रची गई। उन्होेंने खुद आनन्दी बाई पटेल को अपना जानशीन बनाया था कांग्रेस ने उनके खिलाफ साजिशें भी की और पैसा भी खर्च किया और उन्हें भी हटवा कर दम लिया। यह बौखलाहट नहीं है तो और क्या है। केशुभाई पटेल को हटवा कर तो मोदी खुद ही गुजरात की सत्ता पर काबिज हुए थे उन्हें हटाए जाने के वक्त अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी अडवानी बहुत ताकतवर होम मिनिस्टर और डिप्टी प्राइम मिनिस्टर थे तो क्या यह सभी कांगे्रस के इशारों पर काम करते थे? आनन्दी बेन पटेल को खुद मोदी ने अपना जानशीन (उत्तराधिकारी) बनाया था फिर उन्हे हटा कर विजय रूपानी को चीफ मिनिस्टर बना दिया। अब कह रहे हैं कि आनन्दी बेन को हटाने की कांगे्रस ने साजिश की और पैसा भी खर्च किया, तो क्या खुद मोदी ने कांग्रेस से पैसे लेकर आनन्दी बेन को हटाया था? अब पटेल तबके की तौहीन करने की गरज से ही खुद मोदी ने आनन्दी बेन का टिकट काट दिया। आनन्दी बेन अपनी सीट से अपनी बेटी अनार पटेल को  टिकट दिलाना चाहती थीं उन्हें न देकर मोदी ने अपने एक करीबी भूपेन्द्र पटेल को उनकी सीट से टिकट दे दिया। आनन्दी की इससे ज्यादा तौहीन और क्या होगी। इसके अलावा मौजूदा वजीर रोहित पटेल मौजूदा मेम्बर असम्बली आर एम पटेल, नागरजी ठाकोर और विछिया भूरिया वगैरह का टिकट काट कर मोदी और अमित शाह ने साफ मैसेज दे दिया उन्हें पटेलों, बैकवर्ड और दलितों की अब कोई फिक्र नहीं है।

मोदी अपने पचास वजीरों, एक दर्जन से ज्यादा चीफ मिनिस्टर्स, डेढ सौ मेम्बरान पार्लियामेंट और मेम्बरान असम्बली की भारी भरकम फौज लेकर गुजरात मंे चार लड़कों से उलझे हुए हैं। इसके बावजूद उनके मौजूदा चीफ मिनिस्टर विजय रूपानी ही राजकोट पच्छिम सीट से हारते नजर आ रहे हैं। उनका एक आडियो वायरल हुआ है जिसमें उन्हें सुरेन्द्र नगर  के नरेश संगीतम से फोन पर यह कहते हुए सुना जा सकता है कि नरेश भाई मेरी हालत बहुत खराब है, मदद कीजिए। फिर दोनों के दरम्यान मुलाकात तय होती है और नरेश संगीतम आजाद उम्मीदवार की हैसियत से दाखिल अपना नामिनेशन वापस ले लेते हैं। इस वक्त गुजरात में नरेन्द्र मोदी की हालत ठीक वैसी ही हो रही है जैसी हालत 2004 के लोक सभा एलक्शन में उस वक्त के वजीर-ए-आजम अटल बिहारी वाजपेयी की थी। उस वक्त पूरे देश में मइंडिया शाइनिंगफ और मफीलगुडफ का बोलबाला था आज मोदी का मुबय्यना मविकासफ और मकरप्शन फ्रीफ सरकार का नारा है। उस वक्त एक तरफ अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवानी, मुरली मनोहर जोशी, प्रमोद महाजन जैसा मैनेजर, खुद मोदी, जार्ज फर्नाडीज, नितीश कुमार, ममता बनर्जी, करूणा निधि, बाल ठाकरे, फारूक अब्दुल्लाह, चन्द्रबाबू नायडू, नवीन पटनायक, प्रकाश सिंह बादल और शरद यादव जैसे कद्दावर लीडरान की भारी भरकम फौज एनडीए के नाम पर एक तरफ थी। दूसरी तरफ पूरी कांगे्रस का हौसला पस्त था। एक अकेली सोनिया गांधी इन सबके खिलाफ मोर्चा संभाले हुए थीं। उस वक्त तक सोनिया गांधी रोमन मंे लिखी हुई अपनी तकरीर भी ठीक से पढ नहीं पाती थी। इसके बावजूद सोनिया गांधी ने एनडीए की भारी भरकम फौज को पटखनी दे दी थी। 2009 का एलक्शन भी उन्होंने जीता और दस सालों तक  लगातार डाक्टर मनमोहन सिंह जैसे मशहूर एकनामिस्ट को मुल्क का वजीर-ए-आजम बनाए रखा। आज 2004 की सोनिया गांधी के रोल में राहुल गांधी हैं जो सियासी एतबार से काफी पुख्ता (परिपक्व) हो चुके हैं। लगता है राहुल गांधी गुजरात से ही मोदी की सियासी पारी खत्म करने का काम कर देगे और अगर गुजरात से मोदी के पैर उखड़ गए तो 2019 के लोक सभा तक तमाम एलक्शन वह हारेगें।