एक जज की मौत और कई सवाल

एक जज की मौत और कई सवाल

स्पेशल सीबीआई अदालत के जस्टिस बृजगोपाल हरकिशन लोया की मौत के तकरीबन तीन साल बाद जस्टिस लोया के घरवालों ने अपनी खामोशी तोड़ते हुए मुश्तबा हालात में हुई उनकी मौत पर कई सवाल खड़े किए हैं। एक अंग्रेजी मैगजीन मद कारवांफ की रिपोर्ट के मुताबिक यह सब बातें जज लोया के परिवार ने उसे बताई थीं। इन बातों के अलावा परिवार ने जस्टिस मोहित शाह जो जून 2010 से सितंबर 2015 के बीच बंबई हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस थे, पर यह सनसनीखेज इल्जाम भी लगाया है कि सोहराबुद्दीन इनकाउंटर मामले में उन्होंने जज लोया को  फैसला देने के एवज में 100 करोड़ रुपये की रिश्वत की पेशकश की थी। मद कारवांफ की इस हंगामाखेज रिपोर्ट में जस्टिस लोया की बहनों और वालिद के बयान शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक जस्टिस लोया की बीवी शर्मिला और बेटे अनुज ने मैगजीन के रिपोर्टर से बात करने से मना कर दिया, क्योंकि उन्हें अपनी जान का खतरा था। परिवार ने मैगजीन को यह बात भी बताई कि उन्होंने जस्टिस लोया की मौत की जांच के लिए एक जांच कमीशन बनाने की मांग की थी, लेकिन उसकी यह मांग नहीं मानी गई। मद कारवांफ अपनी इस रिपोर्ट में यह बात भी बताती है कि उसके रिपोर्टर ने इस मामले में जस्टिस मोहित शाह और बीजेपी के कौमी सदर अमित शाह दोनों को सवाल भेजे थे, लेकिन रिपोर्ट के शाया होने के वक्त तक दोनों ही फरीकैन से उसे कोई जवाब नहीं मिला। मैगजीन की रिपोर्ट में जस्टिस लोया के परिवार ने जो इल्जाम लगाये हैं, वह बेहद संगीन हैं। इल्जाम डायरेक्ट या इनडायरेक्ट तौर पर जिन लोगों के ऊपर लगे हैं, वह आम जिंदगी में बावकार ओहदों पर फायज हैं। लिहाजा सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह इस मामले की फौरी गैरजानिबदाराना जांच कराये। दिल्ली हाई कोर्ट के साबिक चीफ जस्टिस एपी शाह, मुंबई हाई कोर्ट के साबिक जज  बीजी कोलसे पाटिल और साबिक मरकजी वजीर अरुण शौरी ने भी हाल ही में यह बात कही है कि सरकार, सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में एक खुसूसी जांच टीम बनाये, जो इस मुश्तबा मौत की जांच करे ताकि सच दुनिया के सामने आ सके।

जस्टिस बृजगोपाल हरकिशन लोया, सीबीआई की खुसूसी अदालत में सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले की सुनवाई कर रहे थे। इस मामले में अमित शाह समेत गुजरात पुलिस के कई आला अफसरों के नाम थे। जस्टिस लोया की मौत 1 दिसम्बर 2014 को नागपुर में हुई और इसकी वजह दिल का दौरा पड़ना बताया गया था। जस्टिस लोया, नागपुर अपनी साथी जज स्वप्ना जोशी की बेटी की शादी में गए हुए थे। जस्टिस लोया के परिवार ने उनकी मौत पर जो सवाल उठाए हैं, वह वाकई हैरतअंगेज हैं। मसलन लोया की मौत के वक्त को लेकर साफ नहीं है। पोस्ट मार्टम रिपोर्ट के मुताबिक उनकी मौत का वक्त 1 दिसंबर, 2014 को सुबह 6 बजकर 15 मिनट दर्ज है, जबकि घरवालों के मुताबिक उन्हें एक तारीख को सुबह 5 बजे फोन पर उनकी मौत की इत्तेला दी गई थी। लोया की मौत दिल के दौरे से होना बताया गया, जबकि घरवालों ने उनके कपड़ों पर खून के धब्बे देखे थे। लोया के वालिद के मुताबिक उनके सिर पर चोट भी थी। परिवार को लोया का फोन मौत के कई दिन बाद लौटाया गया, जिसमें से डाटा डिलीट किया गया था। परिवार को बताया गया कि रात में दिल का दौरा पड़ने के बाद नागपुर के रवि भवन में ठहरे लोया को आटो रिक्शा से अस्पताल ले जाया गया था। वीआईपी लोगों के ठहरने का इंतजाम होने के बावजूद क्या रवि भवन में कोई गाड़ी नहीं थी, जो उन्हें अस्पताल ले जा सकती थी ? रवि भवन से सबसे नजदीकी आटो स्टैंड की दूरी दो किलोमीटर है, ऐसे में आधी रात को आटो मिलना कैसे मुमकिन हुआ ? एक सवाल ईश्वर बहेटी नाम के शख्स पर भी है। इसी शख्स ने जस्टिस लोया की मौत के बाद मुर्दा जिस्म को उनके आबाई गांव ले जाने की जानकारी घरवालों को दी, साथ ही लोया का फोन भी परिवार को लौटाया था। पोस्ट मार्टम रिपोर्ट के हर पन्ने पर एक शख्स के दस्तखत हैं, जिसके नीचे मरने वाले से रिश्ता मचचेरा भाईफ लिखा है, लेकिन परिवार का कहना है कि परिवार में ऐसा कोई शख्स ही नहीं है। एक अहम सवाल और, रिपोर्ट कहती है कि लोया की मौत कुदरती वजहोें से हुई, तो फिर पोस्ट मार्टम की जरूरत क्यों पड़ी ? इसके अलावा पोस्ट मार्टम के बाद पंचनामा भी नहीं भरा गया। कानूनी अमल के मुताबिक उम्मीद की जाती है कि पुलिस मोहकमा मरने वाले के तमाम निजी सामान को जब्त कर सील कर देगा, पंचनामे में उनकी लिस्ट बनाएगा और ज्यों का त्यों परिवार को सौंप देगा। लेकिन इस मामले में परिवार को पंचनामे की कापी तक नहीं दी गई।

शक की वजह और भी हैं, जो इस बात का चीख-चीखकर इशारा कर रही हैं कि मामले में कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ है। सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामला सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चल रहा था। यह काफी हस्सास और अहम मामला है। अदालत ने साल 2012 में इस मामले की खुसूसी सीबीआई जांच के आर्डर देते हुए उस वक्त दो बातें वाजेह तौर पर कही थीं, पहली-इस मामले की गैरजानिबदाराना जांच के लिए सुनवाई गुजरात से बाहर हो। दूसरी-एक ही जज इस जांच को शुरू से लेकर आखिर तक सुनवाई करे। बहरहाल पहले आर्डर के मुताबिक यह मामला गुजरात से बाहर महाराष्ट्र भेज दिया गया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के दूसरे आर्डर की सीधे-सीधे खिलाफवर्जी की गई। मामले की जांच की शुरुआत जज जेटी उत्पत ने की। 6 जून 2014 को जज उत्पत ने अमित शाह को इस मामले की सुनवाई में मौजूद न होने को लेकर फटकार लगायी और उन्हें 26 जून को अदालत में पेश होने का हुक्म दिया। लेकिन 25 जून 2014 को जज उत्पत का तबादला पुणे सेशन कोर्ट में हो गया। जज जेटी उत्पत की जगह जस्टिस बृजगोपाल लोया आये, उन्होंने भी अमित शाह के अदालत में हाजिर न होने पर सवाल उठाये। इस मामले में जस्टिस लोया ने सुनवाई की तारीख 15 दिसम्बर 2014 तय की, लेकिन 1 दिसम्बर 2014 को अचानक उनकी मौत हो जाती है। उनके बाद सीबीआई की खुसूसी अदालत में यह मामला जज एमबी गोसवी को सौंप दिया गया। लोया की मौत के 29 दिन बाद जज एमबी गोसवी ने अमित शाह को यह कहते हुए बरी कर दिया कि उन्हें मुल्जिम अमित शाह के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला। जज गोसवी ने अपने फैसले में बचाव फरीक की इस दलील की भी तस्दीक की, कि सियासी मंशा के तहत सीबीआई ने अमित शाह को फंसाया है। हैरान करने वाली बात यह है कि जिस मामले में सीबीआई ने मुल्जिम अमित शाह के खिलाफ तकरीबन 10,000 पन्नों की चार्जशीट पेश की थी, उसने फैसले के खिलाफ कोई अपील नहीं की। उसके बाद आज तक इस मामले में 11 दीगर लोग, जिनमें गुजरात पुलिस के आला अफसर भी शामिल हैं, को बरी किया जा चुका है। सीबीआइ ने इस पर भी न तो कोई एतराज जताया और न ही कोई अपील की। यह सवाल उठना लाजिमी हैं कि फिर सोहराबुद्दीन, तुलसी प्रजापति और सोहराबुद्दीन की बीबी कौसर बी की मौत कैसे हुई?, इन कत्ल के लिए कौन जिम्मेदार है ? कत्ल के पीछे जो राज है, वह कभी खुलेगा या नहीं ?

जस्टिस बृजगोपाल हरकिशन लोया के परिवार ने जो सवाल उठाए हैं और जो हकायक सामने निकलकर आ रहे हैं, उसमें साफ दिखाई देता है कि जस्टिस लोया की मौत मुश्तबा हालात में हुई थी। लिहाजा इस मामले की जांच होनी ही चाहिए। जज लोया के कत्ल से जुड़े इस संगीन मामले में अगर सरकार, आगे बढ़कर कोई कार्रवाई नहीं करती, तो सुप्रीम कोर्ट इस मामले का नोटिस ले और खुद अपनी निगरानी में इस पूरे मामले की गैरजानिबदाराना जांच कराए। जांच कराना इसलिए भी जरूरी है कि इस मामले में जांच के लिए पहली नजर में मवाद दस्तयाब है। बृजगोपाल हरकिशन लोया कोई आम आदमी नहीं थे, बल्कि सीबीआई के एक मोअज्जिज जज थे। किसी अहम मामले की सुनवाई करते हुए कानून और सिस्टम का रखवाला ही अगर महफूज नहीं होगा, तो इस समाज में कौन महफूज है ? कौन आइंदा सच की तरफदारी करेगा ? जस्टिस लोया के परिवार ने सीबीआई जज मोहित शाह के ऊपर रिश्वत देने के जो इल्जाम लगाये हैं, वह भी बेहद संगीन हैं। यकीनन इससे अदलिया का वकार कम हुआ है। अगर इन इल्जामात की जांच नहीं की गई, तो अदलिया की साख पर धब्बा लगेगा।