सीरते नबवी (सल0) और हुस्ने मआशरत

सीरते नबवी (सल0) और हुस्ने मआशरत

मौलाना मोहम्मद इस्लाम कासमी

नबी करीम (सल0) की सीरत का हर पहलू और हर गोशा इंसान के लिए एके मशाले राह है जिसकी रौशनी में दुनिया की हर कौम और हर इंसान कामयाबी की मंजिल तक पहुच सकता है। नबी करीम (सल0) की जिंदगी, अमल और इरशादात किसी मखसूस तबके के लिए नहीं है वह तो दोनों आलम के लिए पैगम्बरे रहमत और रसूले हिदायत हैं और कयामत तक के लिए हैं। उनकी बअसत बेशक जजीरा अरब में हुई और सबसे पहले अल्लाह की जानिब दावत भी इसी कौम को दी गई मगर यह दावते तौहीद व रिसालत सिर्फ इसी इलाके या इसी कौम के लिए खास नहीं थी धीरे-धीरे यह पैगाम पूरी दुनिया तक पहुचा।

नबी करीम (सल0) ने दावत के बाद इंसानियत की फलाह और दुनिया मे जिंदगी गुजारने के तरीकों को कुरआन की रौशनी में आम किया। अल्लाह की हिदायत जारी रही, कुरआन रहनुमाई करता रहा और नबी करीम (सल0) को अपने अमल, किरदार और सीरत से इंसानों को दर्स और तर्बियत देते रहे। बअसत से पहले ही अल्लाह ने उनको रसूल बनाने के लिए मुंतखब कर लिया था इसलिए बचपन से ही इस अजीम मंसब के लिए तर्बियते इलाही जारी रही। बचपन से ही इन अवसाफ से संवरे रहे जो आला कद्रों के हामिल होते हैं। जवानी में अल सादिक अल अमीन की हैसियत से पूरे अरब में मशहूर हुए हर तरह की रायज बुराइयों से दूर रहे गोशा नशीनी और खलवत का तरजीह दी गरज कि नबुवत मिलने से पहले भी सीरते तैयबा में वह तमाम खूबियां मौजद रहीं जो इंफिरादियत लिए थीं इसलिए तब्लीगे दीन के वक्त मुशरिकीने मक्का ने जब मुखालिफत की तो किसी ने उनके किरदार या मआशरती जिंदगी को मायूब नहीं बताया न उनके अखलाक व आदात को निशाना बनाया।

सीरते नबवी को मुताला कीजिए मालूम होगा कि मक्की जिंदगी जो बअसत के बाद मुखालिफत, मुखालिफीन की साजिशों, ईजारसानी, असहाबे रसूल की अहानत व अजीयत और तमामतर परेशानियों से इबारत है उसमें भी नबी करीम (सल0) ने अपने हुस्ने सुलूक, नर्मी, दरगुजर से ईमान वालों और उनपर ईमान लाने वालों को भी अवसाफ हमीदा का दर्स दिया, हुस्ने मआशरत का आला नमूना पेश किया और अपने किरदार व अमल से व तर्बियत की मिसाल कायम फरमाई। और जब हिजरत के बाद मदीना गए और वहां मुसलमानों की तादाद बढी इस्लाम लाने वालों में इस्तेहकाम आया गजवात में फतेह हासिल हुईग दुनिया अरब से निकल कर दावत व तब्लीग मुहज्जत कौमों और ताकतवर हुक्मरानों तक की गई। अब न वह मक्की जिंदगी की मजबूरियां थीं न मुखालिफतें, बेगाने अपने हुए और जो अपने अब तक मुखालिफ थे वह भी दाखिल बहलका इस्लाम हुए तो मुसलमानों की ताकत भी हासिल हुई और गुरबत भी दूर हुई। अल्लाह के रसूल होेने के साथ इतनी बड़ी जमाअत के अमीर और सरबराह भी हैं मगर आप (सल0) ने अपने अवसाफ ही को बरकरार रखा जिससे तवाजेअ का इजहार हो कमजोरों  की मदद, दुश्मनों के साथ दरगुजर और आपस में भी चारा कायम रहे। आप (सल0) ने एक ऐसा मआशरा तश्कील दिया जिसमें अल्लाह की इताअत, ऊपर की पैरवी, अल्लाह के कलमा के लिए जद्दोजेहद, तमाम मुसलमानों में भाई चारा, अपनों और बेगानों के साथ हुस्ने सुलूक आला अखलाक, इंसानियत की निजात, शिर्क से तौबा, बदआमालियों से एहतराज, मुनाफिकत से नफरत, हर एक का एहतराम और फख्र व रियाकारी का खात्मा जैसी आदतें अपनाने पर जोर दिया गया।

तमामतर दौलत हासिल होने के बावजूद आप (सल0) ने अपनी सीरत में और तवाजेअ ही को पेशे नजर रखा। इसकी तरगीब दी और खुद अपने अमल से इसकी मिसाल कायम फरमाई। अपने साथियों को हुक्म दिया कि उन्हें बनी बशर ही का दर्जा दें। हजरत उमर फारूक (रजि0) की रिवायत है आप (सल0) ने फरमाया-मतुम मेरी तारीफ हद से ज्यादा न करो, जिस तरह नसारा ने ईसा बिन मरियम (अलै0) की मुबालिगा के साथ तारीफ की मैं तो सिर्फ एक बंदा हूं इसलिए खुदा का बंदा और रसूल कहा करो।

फिर आप (सल0) ने अपने इरशादात के जरिए मुसलमानों को जिंदगी गुजारने के जो तरीके बताए और कुरआनी तालीमात के जरिए अवामिर और नवाही और दीन की दीगर इबादात के साथ-साथ मामलात के जो आदाब बताए मआशरत के जिन रहनुमा उसूलों पर गामजन रहने की तलकीन फरमाई उनको अपने आमाल, किरदार और अखलाक के जरिए अमली तर्बियत भी अता फरमाई। एक इंसान किस तरह जिंदगी गुजारे कैसे मामलात करे अपनों या बेगानों से कैसा सुलूक रखे बनी करीम (सल0) की हयाते तैयबा इसकी मुकम्मल मिसाल है।

खाना, पीना, उठना, सोना, जागना, बाल-बच्चों, नाते-रिश्तेदार से मिलना जुलना, असहाब की मजलिस, खलवत व जलवत, सफर व हज्र और मुसलमानों व गैर मुस्लिमों सके बरताव, हर एक के हुकूक और उनकी अदाएगी की उम्दा सूूरत और दीगर उमूर यह सब नबी करीम (सल0) की सीरत में मौजूद हैं और उनकी हर-हर तफसील हदीस व सीरत की किताबों मंे जमा हैं जो उम्मत को फलाह की जमानत देने के लिए और उनकी जिंदगी को मिसाली बनाने के लिए रहनुमाई कर रही हैं।

सीरते नबवी के जैल में यहां हम एक तवील हदीस का खुलासा पेश करना काफी समझते हैं जो तिरमिजी शरीफ की किताब शिमाइल में मरवी हजरत हसन और हुसैन (रजि0) की जबानी है। हजरत अली (रजि0) से रसूल (सल0) के घर में होने के वक्त और घर के बाहर के वक्त की मसरूफियात और असहाब के साथ मजलिस में आपके तौर तरीके का जिक्र है।

नबी करीम (सल0) ने घर के अंदर मामूलात को तीन हिस्सो में तकसीम कर रखा था एक तो इबादात के लिए यानी नमाज वगैरह पढने के लिए दूसरे बाल-बच्चों के लिए यानी उनके हुकूक की अदाएगी में लगाना, घर वालों से बातचीत, हंसना बोलना, हालात व वाक्यात और जरूरियात मालूम करना। और तीसरा हिस्सा खास अपने लिए था यानी इसमें अपनी जरूरियात की तकमील और आराम का हिस्सा था। इस हिस्से में से भी आप ने आधा हिस्सा तकरीबन मखसूस सहाबा की आमद व उनकी जरूरियात के लिए छोड़ रखा था, यह सहाबा आते तो आप (सल0) उनको मसले मसायल बताते और मुश्किलात का हल पेश फरमाते यही खास बाहर जाकर आम सहाबा को वह बातें बयान कर देते। नबी करीम (सल0) की सीरत को एक जुज यह था कि आप अहले इल्म व दानिश और मोअज्जिज अफराद को खुसूसी इजाजत देते और उनको दूसरों पर बाज मामलात में तरजीह भी दिया करते थे। और जिन को जिस कदर हाजत होती उसी कदर तकमील भी फरमाते। उनके साथ बातें करते और उनको उम्मत की भलाई की हद तक जरूरी उमूर सुपुर्द फरमाते थे। फिर फरमाते थे कि जो यहां मौजूद नहीं हैं उनतक भी हिदायतें पहुचा दी जाएं। साथ ही यह भी इरशाद फरमाते कि अगर कोई शख्स शर्म या झिझक से अपनी जरूरत मुझ से बयान न कर सकता हो उनसे मालूम करके मुझ तक पहुचा दें।

इस हिस्से में आने वाले हजरात बेजरूरत बातें नहीं करते थे और न ही आप सुनते थे सब आप (सल0) के पास से इस हाल में निकलते कि इल्म व हिदायत का कुछ न कुछ हिस्सा लेकर जाते और आप उनकी तवाजेअ भी फरमाते कुछ खाने पीने को होता तो इनायत फरमा देते।

जब नबी करीम (सल0) घर से बाहर तशरीफ लाते और मजलिस नहीं होती तब भी जरूरी उमूर के अलावा अपनी जबान महफूज रखते यानी फुजूल बातों में वक्त बर्बाद नहीं फरमाते। आने वालों की  दिलजूई फरमाते, ऐसी बातें न फरमाते जिनसे उनकी दिलशिकनी हो या ऐसा रवैया भी नहीं अपनाते जिससे उनके दिलों में तौहिश हो कोई कबीले का सरदार या मोअज्जिज आदमी आता तो आप (सल0) उसकी इज्जत अफजाई फरमाते। लोगों को अजाबे इलाही और नुक्सानदेह चीजों से डराते और एहतेयात करने को कहते और जाहिर है खुद भी आप (सल0) उसी पर अमल पैरा होते। हर एक के लिए खंदा पेशानी थी। अपने साथियों के हालात मालूम करते और उनकी जरूरियात भी दरयाफ्त फरमाते। कोई अच्छी बात हो या अच्छा काम तो उसकी तारीफ करते बुरी बात को भी बुरा कहते और उससे बचने की ताकीद फरमाते। और तमाम उमूर में एतदाल रखते फिर सहाबा की इस्लाह से मामूली गफलत भी नहीं बरतते थे हक बात हर सूरत में बयान फरमाते कोई कमी या बेशी न होती और आप के नजदीक अजीम मरतबत वह होता जो लोगों में हमदर्दी और गमख्वारी का रवैया रखता।

जब नबी करीम (सल0) की मजलिस होती तो उसकी इब्तदा और इंतहा खुदा के जिक्र से होती। अगर आप दूसरों की मजलिस में जाते तो जहां जगह मिलती बैठ जाते और इसका हुक्म भी देते थे कि आगे बैठने के चक्कर में फलांग लगाने की जरूरत नहीं। मजलिस के हर हमनशीन के साथ यकसां सुलूक और तवज्जो फरमाते इस तरह कि हर एक को गुमान होता कि मैं ही हुजर (सल0) की तवज्जो का मरकज हूं।

आप जरूरतमंद की जरूरत पूरी तवज्जो से सुनते दरम्यान में खडे़ ने होते कि कहीं जरूरतमंद का बयान अधूरा न रह जाए। और हर मुमकिन जरूरत की तकमील भी फरमाते और अगर मुमकिन न होता तो शीरीं कलामी से उसकी दिलदारी फरमा देते। आप (सल0) सबके लिए बाप के दर्जे में थे और इसलिए सबके साथ एक सा सुलूक होता और मजलिस में इल्म व हया और सब्र व अमानत का गलबा ही रहता। कोई शोर व गुल न होता न इसमे किसी की बुराई न गीबत और न किसी की ऐबजूई होती। लोगों की लगजिशों को शोहरत नहीं दी जाती, अहले मजलिस असहाबे तकवा होते उस तकवे की बुनियाद पर अफजलियत हो सकती थी। मजलिस के अफराद एक दूसरे के साथ इज्जत से पेश आते और अगर कोई अजनबी होता तो उसके लिए सबके दरवाजे खुले होते, हर एक उसकी दिलदारी की कोशिश करता। (तिरमिजी)