सीरते नबवी मशाले राह

सीरते नबवी मशाले राह

मौलाना मुजीब उद्दीन कासमी

दुनिया के किसी भी निजाम को चलाने के लिए जहां उसूल व जवाबित की जरूरत है वहीं इसकी अमली मश्क भी लाजिम है। जबकि यह एक वाजेह हकीकत है कि दुनिया का हर निजाम फानी और गैर बाकी है मगर जब इसके लिए यह कड़ी शर्तें हैं तो निजामे दीनी और मिनहाजे शरई जो कि कयामत तक बाकी रहने वाला और गैर फानी खुदाई दस्तूर है तो इसको जिंदा रखने के लिए उन उमूर की क्या जरूरत नहीं होगी हर साहबे अक्ल फैसला कर सकता है। इसीलिए अल्लाह तआला ने निजामे दीनी के उसूल व जवाबित तो आसमानी किताबों में बयान फरमा दिए मगर इसकी अमली मश्क के लिए अम्बिया (अलै0) की शख्सियात का इंतखाब फरमाया। इसलिए आसमानी एहकाम व हिदायात जो सरासर इंसानियत की फलाह व बहबूद व कामयाबी व कामरानी के रहनुमा खुतूत हैं उनपर अमल आवरी के लिए आलमे इंसानियत के तबकात में अम्बिया (अलै0) और उनकी सीरत ही लायके तकलीद है और उनमें भी सबसे बुलंद मर्तबा नबी करीम (सल0) का हासिल है। आप (सल0) की सीरत आलमगीर और दायमी नमूना अमली है। आप (सल0) की सीरते तैयबा के बेशुमार गोशे हैं उन ही में एक गोशा आप (सल0) की जिंदगी का अमली पहलू है। गुजिश्ता अम्बिया के सिलसिले में इस बाब के हवाले से तारीख खामोश है क्योंकि उनकी इलहामी किताबों पर या तो तहरीफ की गर्द जम गई या इंसाफ पसंद लोगों ने इस तरफ ध्यान नहीं दिया। इसलिए इस हवाले से गुजिश्ता अम्बिया की जिंदगी को पेश नहीं किया जा सकता। अलबत्ता आप (सल0) की हयात मुबारका का एक-एक पहलू बईना मौजूद है न उसको तहरीफ ने बदला और न ही वह बेतवज्जही का शिकार हुई। इस माद्दी दुनिया में अखलाक की इस्लाह जरूरी और मुद्दम है। तजुर्बा शाहिद है कि अखलाक की इस्लाह बगैर मुरब्बी के नहीं हो सकती और मुरब्बी भी ऐसा कि जिसकी इक्तेदा हर शोबा-ए-जिंदगी में बिला चंूचरा की जा सके, वह जात आप (सल0) की जात के सिवा कोई और नहीं हो सकती। आप की जिंदगी का अखलाकी पहलू निहायत वाजेह और आसान है। जिससे आप (सल0) के अखलाक और उम्मत के तयीं आपके तरहिमाना जज्बात को बयान किया गया है। इसलिए इरशाद फरमाया-म खुदा की इनायत से तुम उनके लिए नर्म हो और अगर तुम (कहीं) कज खल्क और सख्त दिल होते तो यह लोग तुम्हारे इर्दगिर्द से मुंतशिर हो जाते।फ (आले इमरान)

इस आयत में आप (सल0) की नर्मदिली का बयान हे जो दावा मय दलील के खुद सहीफा-ए-इलाही में मौजूद है जिससे आप (सल0) के नर्म दिल और रहीमुल खल्क होने का सुबूत मिलता है। एक दूसरी जगह इशाद है-मतुम्हारे पास तुम ही में से एक पैगम्बर आया जिस पर तुम्हारी तकलीफ बहुत शाक गुजरती है तुम्हारी भलाई का वह हरीस है ईमान वालों पर निहायत शफीक व मेहरबान है।फ (अल तौबा)

इस आयत में रसूल (सल0) के उन मुशफ्फिकाना जज्बात का जिक्र है जो तमाम इंसानियत और तमाम बनी आदम के साथ थे यह आप (सल0) के अखलाके अमली के मुताल्लिक आसमानी शहादतें हैं इसके अलावा अहादीस भी आप (सल0) के अखलाके करीमा पर शाहिद हैं इसलिए चंद सहाबा हजतर आयशा सिद्दीका (रजि0) की खिदमत में हाजिर हुए और अर्ज किया कि उम्मुल मोमिनीन! आप (सल0) के अखलाक व मामूलात बयान फरमाइए। उम्मुल मोमिनीन ने जवाब दिया क्या तुम ने कुरआने हकीम नहीं पढा? आप (सल0) का अखलाक कुरआने पाक था। (अबू दाऊद)

यानी कुरआने पाक अल्फाज व इबादत है और हजरत मोहम्मद (सल0) की सीरत उसकी अमली तफसीर। इंसान के अखलाक, आदात और आमाल का बीवी से बढकर कोई वाकिफकार नहीं हो सकता। आप (सल0) ने जब इस्लाम की दावत दी तो उस वक्त हजरत खदीजा (रजि0) आप (सल0) की जौजियत में पन्द्रह बरस गुजार चुकी थीं यह मुद्दत इतनी तवील है कि जिस में एक इंसान दूसरे के आदात व अखलाक और तौर तरीकों को तजुर्बे की कसौटी पर परख सकता है। आप (सल0) की जिंदगी हजरत खदीजा (रजि0) के लिए कुंदन थी इसलिए इधर आप (सल0) की जबान से दावा-ए-नबुवत हुआ उधर उनका दिल इसकी तस्दीक के लिए आमादा हो गया जब आप (सल0) नबुवत के बारेगिरां का ख्याल करते तो हजरत खदीजा (रजि0) ही आप को तस्कीन देतीं कि या रसूल (सल0)! आप (सल0) कराबतदारों का हक अदा फरमाते हैं हक की तरफदारी करते हैं मुसीबत जदा लोगों के काम आते हैं खुदा आप को तनहा नहीं छोड़ेगा। (बुखारी)

यह आप (सल0) के अखलाक की वह अमली मिसालें हैं जो एलाने नबुवत से पहले ही आप में मौजूद थीं। आप (सल0) की तमाम बीवियों में हजरत खदीजा (रजि0) के बाद सबसे ज्यादा बुलंद रूतबा हजरत आयशा (रजि0) थीं। वह नौ बरस मुस्तकिल आप (सल0) की जौजियत में रहीं वह गवाही देती हैं कि आप (सल0) की आदत किसी को बुरा-भला कहने की न थी आप गुनाह की बातों से कोसों दूर रहते थे। आप (सल0) बुराई के बदले में भलाई करते थे, आप (सल0) ने कभी किसी से अपना बदला नहीं लिया, आप (सल0) ने कभी किसी गुलाम, बांदी, औरत या खादिम यहां तक कि किसी जानवर तक को नहीं मारा। आप (सल0) ने किसी की जायज दरख्वास्त और फरमाइश को रद्द नहीं फरमाया। आप (सल0) के कराबतदारों में हजरत अली (रजि0) से बढकर कोई आप (सल0) के दिन रात के हालात व अखलाक से वाकिफ न था वह बचपन से जवानी तक नबी करीम (सल0) की खिदमत में रहे, वह गवाही देते हैं कि आप (सल0) हंसमुख, नर्म अखलाक और अच्छी तबीयत के मालिक थे, तबीयत में मेहरबानी थी, सख्त मिजाज न थे, कोई बुरा कलमा जबान से नहीं निकालते थे, किसी की कोई फरमाइश अगर मिजाज के खिलाफ होती तो खामोश रह जाते, लेकिन उसको साफ जवाब देकर मायूस न करते और न अपनी मंजूरी जाहिर फरमाते। आप (सल0) किसी की दिलशिकनी नहीं करते बल्कि दिलों पर मरहम रखते थे। हजरत अली (रजि0) फरमाते हैं कि आप (सल0) निहायत फैयाज, बड़े सखी, रास्त गो, नर्म तबा थे। जो लोग आप (सल0) की सोहबत में बैठते वह खुश हो जाते। (शिमाइल तिरमिजी) यह आप (सल0) के हक में उन लोगों की शहादतें हैं जो आप (सल0) के घर वाले और आप (सल0) की हर नकल व हरकत से वाकिफ थे। इससे मालूम हुआ कि आप (सल0) की सीरते मुबारका की अमली हैसियत कितनी बुलंद थी।

आप (सल0) की जिंदगी का सबसे रौशन पहलू यह है कि आप (सल0) ने बहैसियत पैगम्बर अपने उम्मतियों को जो नसीहत फरमाई उसपर सबसे पहले खुद अमल किया। आप (सल0) ने लोगों को खुदा की याद और मोहब्बत की नसीहत की। इसलिए आप (सल0) की जिंदगी के रात-दिन में कोई लम्हा ऐसा न था जिसमें आप (सल0) का दिल अल्लाह तआला के जिक्र से गाफिल हो। आप (सल0) हर वक्त खुदा की याद में मसरूफ रहते थे। अहादीस का बड़ा हिस्सा आप (सल0) की मोअल्लिमाना नसीहत से भरा पड़ा है। जो मुख्तलिफ हालात और मुख्तलिफ अवकात की मुनासिबत से आप (सल0) ने अपनी महबूब उम्मत को फरमाई हैं। आप (सल0) ने लोगों को पांच वक्त की नमाज का हुक्म दिया मगर खुद आप (सल0) का मामूल आठ वक्त नमाज पढने का था। यानी तुलूअ आफताद के बाद इश्राक, कुछ चढे पर चाश्त, फिर रात में तहज्जुद और मगरिब के बादा अदाबीन वगैरह यह वह नमाजें थीं जो आप (सल0) पंज वक्ता नमाजों के अलावा अदा फरमाते थे। इसलिए आप (सल0) हर रोज कम व बेश पचास-साठ रिकातें अदा फरमाया करते थे। यह था आप (सल0) की अकामते सलात का अमली नमूना, आप (सल0) ने रोजों का हुक्म दिया जो आम मुसलमानों पर साल भर में तीस दिन फर्ज हैं मगर आप (सल0) की कैफियत यह थी कि आप (सल0) का कोई हफ्ता कोई महीना रोजों से खाली नहीं जाता था। साल में दो महीने (शाबान, रमजान) पूरे रोजे में गुजर जाते थे हर महीने के अयामे बैज (तेरह, चैदह, पन्द्रह) मे अक्सर रोजे रखते थे, मोहर्रम के दस दिन और शव्वाल के छः रोजों में गुजरते हफ्ते में दो शंबा और जुमेरात का दिन रोजों में बसर होता यह था रोजों के मुताल्लिक आप (सल0) का अमली नमूना।

आप (सल0) ने लोगों को जकात व खैरात का हुक्म दिया तो सबसे पहले खुद इसपर अमल करके दिखाया। जो कुछ आप (सल0) की खिदमत में आता वह खुदार की राह में खर्च हो जाता। फतूहात व गजवात की वजह से माल व असबाब की कमी न थी मगर वह सब गैरों पर निछावर फरमा दिया करते थे। हजरत अबू जर (रजि0) फरमाते हैं कि एक बार रात में आप (सल0) के साथ एक रास्ते से गुजर रहा था आप (सल0) ने फरमाया अबू जर! अगर अहद का पहाड़ मेरे लिए सोना हो जाए तो मैं कभी पसंद नहीं करूंगा कि तीन रातें गुजर जाएं और उसमे से एक दीनार भी मेरे पास रह जाए अलबत्ता यह कि किसी का कर्ज अदा करने के लिए कुछ रख छोडूं। (बुखारी)

क्योंकि लोगों को आम हुक्म था कि जो मुसलमान कर्ज छोड़ कर मर जाए उसकी इत्तेला मुझे दो ताकि मैं उसका कर्ज अदा करूं। यह सिर्फ आप (सल0) का जबानी दावा न था बल्कि यह आप (सल0) के अज्म व सुलूक का इजहार था और इसी पर आप (सल0) का अमल था। आप (सल0) ने जुहद व कनाअत की तालीम दी मगर आप (सल0) का तर्जे अमल यह था कि अरब के गोशे-गोशे से जजिया, खिराज और जकात व सदकात के खजाने लदे चले आते थे और सबके सब फकीरों और मसाकीन पर खर्च हो जाते। आप (सल0) ने फरमाया कि फरजंदे आदम को इन चंद चीजों के सिवा और किसी चीज का हक नहीं रहने को एक झोंपड़ा, तन ढकने को एक कपड़ा और पेट भरने को रूख्ी सूखी रोटी और पानी। (तिरमिजी)

खुदा पर एतमाद व तवक्कुल की शान आप (सल0) की जात में नुमाया थी। आप (सल0) एक ऐसी अनपढ कौम में तशरीफ लाए थे जो अपने मोतिकदात के खिलाफ एक लफ्ज भी नहीं सुन सकती थी और उसके लिए मरने मारने पर तैयार हो जाती थी मगर आप (सल0) ने कभी इसकी परवा न की ऐन हरम में जाकर तौहीद की आवाज बुलंद की और वहां सबके सामने नमाज अदा फरमाई। जबकि हरम का सेहन कुरैश के रईसों की नशिस्तगाह था, जब खुलेआम तौहीदे बारी सुनाने का हुक्म हुआ तो आप (सल0) ने कोहे सफा पर खड़े होकर तमाम कबाइले कुरैश को नाम बनाम पुकार कर खुदाए बरहक का पैगाम पहुचाया। जिसके नतीजे में आप (सल0) को कुफ्फारे मक्का ने तरह-तरह की अजीयतें दीं आप (सल0) का जीना दूभर कर दिया और हदिया कर दी कि तीन साल तक शाब अबी तालिब की कैद में आप (सल0) का खानदान के साथ मुकातआ कर दिया लेकिन इसके बावजूद आप (सल0) ने अपने जानिसार साथियों के साथ जो जिंदगी बसर की है वह यकीनन रहती दुनिया तक सब्र व तहम्मुल के हवाले से एके अमली मिसाल है।

अखलाक व इबादात में अमली नमूने के साथ-साथ आप (सल0) की जिंदगी मआशरती और समाजी एतबार से कामिल नमूना है। इसलिए आप (सल0) की शाने दरगुजर का यह हाल था कि जो कुफ्फारे मक्का सालो साल आपको और आप के नाम लेवाओं को सताते रहे जुल्म व सितम के हर हथकण्डे आजमाते रहे उन्हंे आखिरकार वतन छोड़ने पर मजबूर कर दिया और इसके बाद भी चैन की संास लेने न दी। लेकिन जब इस्लाम को खुली फतह नसीब हुई और इस्लाम के यह बदतरीन दुश्मन मुकम्मल तौर पर आप (सल0) के कब्जे में थे तो आप (सल0) ने उनको आम माफी दे दी और यह फरमाया कि आज मैं तुम से वही कहता हूं जो यूसुफ (अलै0) ने अपने भाइयों से कहा था कि तुम पर कोई इल्जाम नहीं जाओ तुम सब आजाद हो।

तवाजेअ और ईफाए अहद का यह हाल था कि बअसत से कब्ल खरीद व फरोख्त के एक मामले में तीन दिन तक अपने वादे पर एक ही जगह तशरीफ फरमा रहे और बाद में साहबे मामला से सिर्फ इतना कहा कि तुम ने मुझे मशक्कत में डाल दिया। यह आप (सल0) की पाबंदी अहद की अमली मिसाल है। आप (सल0) ने सिर्फ अपने जाती मामले में ईफाए अहद की मिसाल पेश नहीं फरमाई बल्कि मफाद आम्मा और बवक्त जरूरत भी इसका सुबूत दिया। इसलिए गजवा बदर के मौके पर दो सहाबा (रजि0) (हुजैफा इब्ने यमान और अबू जसील) ने काफिरों से मजबूरन लड़ाई में मुसलमानों का साथ न देने का अहद कर लिया और फिर खिदमते अकदस में हाजिर होकर लड़ाई में शिरकत की इजाजत चाही जबकि इस मौके पर मुसलमानों की तादाद बहुत कम थी और एक-एक आदमी की बहुत जरूरत थी मगर आप (सल0) ने उनको कुफ्फार से किए हुए वादे पर कायम रहने का हुक्म दिया इससे बढकर ईफाए अहद की और क्या मिसाल हो सकती है।

यह चंद मिसालें हैं जो जिक्र की गईं वरना सीरत नबवी का कोई गोशा आप (सल0) के अमली नमूने से खाली नहीं है।

खुलासा कलाम यह कि इस्लाम खुद अपने पैगम्बर का अमली मुजस्सिमा और पैकर बनाकर पेश करता है और तमाम दुनिया में यह फख्र सिर्फ इस्लाम को हासिल है कि वह तालीम व उसूल के साथ-साथ  आप (सल0) के अमल और आप (सल0) की मिसाल को दुनिया के सामने पेश करता है। लिहाजा अल्लाह तआला ने जब ऐसे खैरूल बशर नबी रहमत को पैकरे मिसाली बनाकर मबऊस फरमाया है तो अहले ईमान के लिए अदाए शुक्र के तौर पर हर शोबा ए जिंदगी में आप (सल0) की इताअत व इत्तबा जरूरी है। आज हम आप (सल0) से मोहब्बत का दम तो भरते हैं बल्कि इसका ईमान का जुज होने का यकीन भी रखते हैं लेकिन इसके तकाजों की तकमील से गुरेजां हैं।

जरूरत इस बात की है कि हम अमली तौर पर भी आप (सल0) से अपनी मोहब्बत व वाबस्तगी का सुबूत दें क्योंकि दावा और अमल में अमल ही अस्ल है। इसी से खरे और खोटे की तमीज होती है। इसलिए अगर हम आप (सल0) से अपना ताल्लुक मजबूत रखना चाहते हैं तो ईमानियत, इबादात, मामलात, अखलाकियात, मआशरत गरज कि हर शोबा ए जिंदगी में आप (सल0) के अमली नमूने को अपने लिए मशाले राह बनाना होगा जिसका नतीजा यह हो कि इबादत का जौक व शौक बढे, अखलाकियात पाकीजा हों, मआशरत साफ सुथरी हो मामलात में भी एतदाल और तवाजुन आए और मुकम्मल जिंदगी अमल के एतबार से सुन्नत के मुताबिक हो जाए तब ही हम सच्चे और हकीकी आशिके रसूल (सल0) शुमार किए जा सकते हैं।