मुसलमानों को दीवार से लगाती मोदी सरकार

मुसलमानों को दीवार से लगाती मोदी सरकार

गौरक्षकों के नाम पर दहशतगर्दी करने वालों ने सात महीने पहले राजस्थान में डेरी और दूध का कारोबार करने वाले पहलू खान को सड़क पर पीट-पीट कर मार डाला, मरने से पहले पहलू खान ने जिन कातिलों के नाम लिए थे राजस्थान सरकार ने उन्हें बगैर किसी जांच के क्लीन चिट दे दी जो गिरफ्तार किए गए उन्हंें भी जमानत पर छुड़वा दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कह रखा है कि अगर मरने से पहले कोई शख्स मारने वाले का नाम बताएगा तो मुल्जिम के खिलाफ मरने वाले की गवाही को ही सबसे ज्यादा मजबूत सुबूत माना जाएगा, लेकिन राजस्थान सरकार ने इसको कोई अहमियत नहीं दी। जुनेद को सरेआम टे©ंन के डिब्बे में पीट-पीटकर टे©ंन से फेंका गया उसकी मौके पर ही मौत हो गई। मुकदमा चला तो हरियाणा की बीजेपी सरकार ने पब्लिक प्रासीक्यूटर कातिलों की पैरवी करते नजर आए। अदालत ने डंाट लगाई तो अदालत से बाहर जुनेद के घर वालों पर दबाव डाला जाने लगा कि वह कातिलों से पैसे लेकर सुलह कर लें। अब अलवर में एक और डेरी व्यापारी उमर खान को गाय की स्मगलिंग करने का इल्जाम लगा कर गोली मार कर कत्ल किया गया उसकी लाश केा मस्ख (छतविछत) करके रेलवे लाइन के किनारे फेेंक दिया गया। उसके एक साथी ताहिर को गोली मार कर जख्मी कर दिया गया। वंसुधरा राजे सरकार के दबाव में अलवर के पुलिस कप्तान राहुल प्रकाश ने कह दिया यह लोग जरायम करने के आदी रहे हैं। इनके खिलाफ गायों की स्मगलिंग के कई मामलात दर्ज हैं।

24 सितम्बर 2002 को अहमदाबाद के अक्षरधाम मंदिर पर हुए दहशतगर्दी के हमले मे गुजरात पुलिस और क्राइम ब्राच ने जिन बीस मुसलमानों को मुल्जिम बनाया था उसमें सिर्फ आठ की गिरफ्तारी हुई क्राइम ब्रांच और गुजरात सरकार केे दबाव में छः को सजा मिली दो को मौत की सजा बाकी को दस साल से उम्र कैद तक। सुप्रीम कोर्ट ने क्राइम ब्रांच की पूरी तहकीकात को बोगस बताकर रिजेक्ट कर दिया  और फंसाए गए सभी मुल्जिमान को बरी कर दिया। इसके बावजूद बाइस साल बाद सऊदी अरब से अपने घर वापस आने वाले अब्दुल रशीद अजमेरी को पन्द्रह साल पुराने इसी मामले में क्राइम ब्रांच की सुप्रीम कोर्ट से रिजेक्ट हो चुकी तहकीकात पर ही हवाई अड्डे से ही गिरफ्तार कर लिया गया। अबू जैद सऊदी अरब से वापस आया तो इस्लामिक स्टेट का दहशतगर्द बताकर उसे मुंबई हवाई अड्डे से गिरफ्तार किया गया फिर तीन दिन के अंदर आजमगढ से आधा दर्जन मुसलमानों को इसी किस्म के इल्जाम मंे उठा लिया गया। यह चंद मिसालें हैं ऐसे दर्जनों मामलात हैं जिनमें मुसलमानों को जबरदस्ती फंसाया गया है।

मरकज में नरेन्द्र मोदी और प्रदेशों में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें आने के बाद मुसलमानों पर जुल्म और पुलिस की ज्यादतियों के वाक्यात में तेजी से इजाफा हुआ है। राजस्थान, हरियाणा और झारखण्ड तो जैसे मुस्लिम मुखालिफत और उनपर मजालिम के अड्डे बन गए हैं। ऐसा भी नहीं है कि इन वाक्यात की खबर वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी तक पहुचती नहीं हैं। खबरें पहुचती हैं तभी तो उन्होने एक नहीं कई बार गौरक्षा के नाम पर सड़कों पर दहशतगर्दी फैलाने वालों को वार्निंग भी दी है और रियासती सरकारों से कहा है कि ऐसे गुण्डों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। उनके बयान आते रहे और उन्हीं की पार्टी की सरकारें उन बयानात को हवा में उड़ाती रही, इसका क्या मतलब है? इस वक्त तो मोदी की मर्जी के बगैर मुल्क में पत्ता तक नहीं हिलता फिर गौगुण्डों पर दिए गए उनके बयानात और वार्निंग का केाई असर इन दहशतगर्दों और उनकी हौसला अफजाई करने वाली प्रदेश सरकारों पर क्यों नहीं पड़ा? इससे तो अब खुद वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी ही शक के दायरे में आ गए हैं। अब ऐसा महसूस होने लगा है कि यह हरकतें सभी की मिलीभगत का नतीजा हैं। लगता यह है कि मोदी ने अपने लोगों को कोई मैसेज दे रखा है कि दुनिया को दिखाने के लिए वह बयान देते हैं गौरक्षा के नाम पर जो लोग सड़कों पर दहशत का माहौल कायम किए हुए हैं वह अपना काम करते रहें। इस दरम्यान सुप्रीम कोर्ट ने भी इन वाक्यात को रोकने के लिए प्रदेश सरकारों को सख्त हिदायत देते हुए आर्डर दिया था कि प्रदेश सरकारें हर जिले में नोडल अफसरान तैनात करें जो इस किस्म के वाक्यात पर नजर रखेंगे। वजीर-ए-आजम मोदी अपनी पार्टी की सरकारों से क्यों नहीं पूछते कि सुप्रीम कोर्ट के आर्डर पर अमल क्यों नहीं हो रहा है। वसुंधरा राजे बताएं कि उन्होने कितने जिलों में नोडल अफसरान की तैनाती की है?

हमारे जैसे जो लोग मुसलमानों के दरम्यान रहते हैं वह अच्छी तरह महसूस कर रहे हैं कि गौरक्षक गुण्डों, पुलिस और बीजेपी सरकारों के इस तरह के रवैय्ये से मुस्लिम नौजवानों में मायूसी पैदा हो रही है। मायूसी बहुत ही खतरनाक होती है नौजवान तबका मुसलमान हो, हिन्दू हो, सिख हो या कोई और अगर वह मायूसी (निराशा) का शिकार होता है तो गुमराही के रास्ते पर ही चल पड़ता है। गुमराही उन्हें जरायम की दुनिया की तरफ भी ले जाती है और दहशतगर्दी की तरफ भी ले जाती है। हमारा सवाल यही है कि आखिर बीजेपी सरकारें मुस्लिम नौजवानों को जरायम और दहशतगर्दी के रास्ते पर ढकेलने का काम क्यों कर रही है? इससे इन्हें वोटों का कुछ फायदा भले ही हो जाए, मुल्क और समाज को तो नुक्सान ही होना है। आखिर राजस्थान और हरियाणा सरकारों की समझ में क्यों नहीं आता कि गौरक्षा के नाम पर दहशतगर्दी का शिकार बनाए गए मुसलमानों के लिए अभी तक तो आम मुसलमान और मेव समाज के लोग सिर्फ बयान देकर और अपने मतालबात पेश करके खामोश हो जाया करते थे उमर खान के कत्ल के बाद उसी मेव समाज के लोग कई दिनों तक सड़कों पर डटे रहे उमर खान का पोस्टमार्टम भी पांचवें दिन हो पाया। उनमें जबरदस्त गुस्सा दिखाई पड़ा। उनकी पंचायत की जानिब से कहा गया कि अब हालात बर्दाश्त से बाहर हो चुके हैं। अब हम खामोश नहीं बैठ सकते यही सूरतेहाल खतरनाक है। सरकारों को दीवार पर लिखी इबारत को पढ लेना चाहिए इससे पहले कि हालात हाथ से निकल जाएं और कुछ लोग मायूसी का शिकार होकर गुमराही के रास्ते पर चल पड़ें। हम नौजवानों के गुमराही के हामी नहीं हैं हम तो सिर्फ सरकार को जगाने की कोशिश कर रहे हैं। इतना जरूर बता दें कि आखिर में इंसाफ और कानून का रास्ता ही गुस्सा ठंडा कर सकेगा।

अलवर के पुलिस कप्तान राहुल प्रकाश के बयान पर तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए थी आखिर वह किस किस्म के अफसर हैं जो कत्ल के एक घिनौने वाक्ए पर बयान देते हैं कि मरने वाला तो गाय की स्मगलिंग करता था, अगर वह गायों का स्मगलर था तो राहुल प्रकाश और उनकी मातहत पुलिस ने कोई सख्त कार्रवाई क्यों नहीं की? क्या वह यह कहना चाहते हैं कि गायों के किसी भी मुबय्यना (कथित) स्मगलर को सड़क पर पीट-पीटकर या गोली मारकर कत्ल करने का अख्तियार गौरक्षकों के नाम पर किसी भी इंसानी झुण्ड को मिल गया है। वह कौन सी पुलिसिंग करना चाहते हैं? सुप्रीम कोर्ट ने जिस तहकीकात को रिजेक्ट कर दिया उसी रिजेक्टेड तहकीकात पर अजमेरी की गिरफ्तारी का क्या जवाज (औचित्य) है? इस्लामिक स्टेट का दहशतगर्द बताकर जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया वह इतने खतरनाक दहशतगर्द हैं कि पुलिस के मुताबिक उनसे देश की हिफाजत को खतरा पैदा हो गया था। उनके पास से एक चाकू तक बरामद नहीं हुआ और पुलिस यह भी नहीं बता सकी कि वह लोग क्या साजिश रच रहे थे। मुसलमानों में अब हर किसी की जुबान पर यही सवाल है कि सीबीआई और पुलिस दिल्ली से तेरह महीनों से गायब जेएनयू के तालिब इल्म नजीब का पता तो लगा नहीं सकी। जिन लड़कों और लड़कियों ने दो साल कब्ल जेएनयू में देश के खिलाफ घटिया, घिनौनी और काबिले सजा नारेबाजी की थी सरकारी एजेंसियां आज तक उनतक भी नहीं पहुच सकी लेकिन वही एजेंसियां और पुलिस अपने एयरकण्डीशन्ड दफ्तरों में बैठकर यह मालूम कर लेती हैं कि हजारों मील दूर सऊदी अरब में बैठे फलां मुसलमान इस्लामिक स्टेट के एजेण्ट है और अरब में बैठकर भारत में दहशत फैलाने की साजिश रच रहे हैं। यह पुलिस और एजेंसियों का फ्राड नहीं तो और क्या है। आखिर इस फ्राड या जालसाजी की जरूरत क्यों पड़ गई? आईएसआईएस या इस्लामिक स्टेट नाम के दहशतगर्द गरोह जिस सीरिया और इराक के लिए अमरीका ने असलहों की ताकत से खड़े किए थे वहां तो वह कुछ कर नहीं पाए और अपनी मौत मारे गए, भारत में वह क्या साजिश करेंगे? आज तक देश में दहशतगर्दी का एक भी ऐसा वाक्या पेश नहीं आया जो इस्लामिक स्टेट ने अंजाम दिया हो। खुद होम मिनिस्टर राजनाथ सिंह एक नहीं कई बार कह चुके हैं भारत के मुसलमान इस्लामिक स्टेट के जाल में नहीं फंसे हैं चंद गिनती के नौजवान जरूर गुमराह होकर सीरिया चले गए वह भी मारे गए। पुलिस और एजेंसियों को अब यह फर्जी कार्रवाइयां बंद करनी चाहिए मुसलमानों को ठेल कर दीवार से लगाना खतरनाक खेल है।