जज लोया के परिवार को मैनेज करने की कोशिश?

जज लोया के परिवार को मैनेज करने की कोशिश?

इंडिया संवाद

नई दिल्ली! अहमदाबाद में बीस नवम्बर की रात 11 बजे अचानक महाराष्ट्र के चीफ मिनिस्टर देवेंद्र फडण्वीस अहमदाबाद पहुंचते हैं। उनके साथ होते हैं महाराष्ट्र के ही सीनियर बीजेपी लीडर चंद्रकांत पाटिल। फिर बंद कमरे में होती है अमित शाह के साथ मीटिंग।  रातोंरात हुई इस मुलाकात के अब सियासी गलियारे में मायने तलाशे जा रहे। चूंकि मीटिंग उस वक्त हुई, जब ठीक दो घंटे पहले सोहराबुद्दीन केस की सुनवाई करने वाले जज बृजगोपाल की मुश्तबा (संदिग्ध) मौत के खुलासे की खबर आग की तरह सोशल मीडिया पर फैल रही थी। अपोजीशन भी सोशल मीडिया पर इसे टाप ट्रेंड कराकर बीजेपी के चाणक्य की  घेराबंदी में जुटा था। ऐसे नाजुक वक्त में जब महाराष्ट्र के चीफ मिनिस्टर के साथ मीटिंग होगी तो तमाम अटकलें भी लगेंगी। अटकलें लगें भी क्यों न, जब केस में चाहे जज का ताल्लुक लातूर से हो या फिर मुश्तबा (संदिग्ध) मौत की खुलकर  जूडीशियल तहकीकात का मतालबा कर रही, जज की बहन अनुराधा या फिर मौत की जगह यानी नागपुर का सरकारी गेस्ट हाउस। सबका महाराष्ट्र से ही ताल्लुक है।

हालांकि बीजेपी के सीनियर लीडरान इसे महज एक आम मुलाकात बताते हैं। मसला गुजरात चुनाव से जुड़ा बताते हैं। खुद देवेंद्र फडण्वीस ने भी मीटिंग से निकलकर सहाफियों से इस मुलाकात के पीछे दो वजहें बताई हैं- एक वजह महाराष्ट्र में कैबिनेट की मुतवक्के तौसीअ (संभावित कैबिनेट विस्तार) और दूसरी वजह गुजरात एलक्शन में महाराष्ट्र इकाई की जानिब से सरगर्म तआवुन (सहयोग)।

बीजेपी लीडर और फडण्वीस जो कह रहे, उसे सियासी जानकार आधा सच मानते हैं। मुलाकात की जो टाइमिंग चुनी गई, मतलब उसी के निकाले जा रहे। कहा जा रहा है कि एनडीए में शामिल हुए नारायण राणे को कैबिनेट में लेना है या नहीं और महाराष्ट्र कैबिनेट की तौसीअ का फैसला जब गुजरात चुनाव के बाद होना है। चुनाव भी 18 दिसंबर तक चलेगा। ऐसे में इतनी इमरजेसी मीटिंग की जरूरत क्यों पड़ी।

इंडिया संवाद ने भी कुछ भरोसेमंद जराए से इस मीटिंग के अंदरखाने की बात समझने की कोशिश की। लब्बोलुआब निकला कि मेनस्ट्रीम मीडिया की रिपोर्ट में जो बातें आ रहीं, मामला दरअसल उतना नहीं  बल्कि और गहरा है। मेनस्ट्रीम मीडिया ने बगैर गहराई में उतरे ही जल्दबाजी और खुशामद में खबर दौड़ा दी कि कैबिनेट की तौसीअ और गुजरात एलक्शन के सिलसिले में अमित शाह से फडण्वीस की मुलाकात हुई है। मगर माजरा कुछ और ही है।

जराए का कहना है कि सोहराबुद्दीन केस से जुड़े सीबीआई के जज बृजगोपाल की मुश्तबा (संदिग्ध) मौत के मामले से जुड़ी खबर जिस तरह से तीन साल बाद बीस नवम्बर को वायरल हुई, उससे अमित शाह परेशान हैं। एलक्शन के टाइम पर यह खबर कैसे प्लांट हुई, जो परिवार पहले चुप्पी साधे था, वह अचानक सामने कैसे आ गया। क्या परिवार के पीछे कोई उनका सियासी मुखालिफ खड़ा है, जो उन्हें घेराबंदी के लिए उकसा रहा है। ऐसे कई सवाल अमित शाह के जेहन में उमड़-घुमड़ रहे हैं। इन्हीं सवालो की तलाश में अमित शाह को महाराष्ट्र के चीफ मिनिस्टर देवेंद्र फडण्वीस की जरूरत महसूस हुई है। क्योंकि जज का परिवार महाराष्ट्र का है और जो रिपोर्टर निरंजन टकले इस मामले मंे धड़ाधड़ खुलासे कर रहे, वह भी मुंबई के बाशिंदे हैं। ऐसी सूरत में सिर्फ महाराष्ट्र सरकार ही मदद कर सकती है।

क्या परिवार को मैनेज करने की तैयारी है

अमित शाह और देवेंद्र फडण्वीस की मुलाकात इस मायने में भी खास है, क्योंकि जिस जज की मुश्तबा (संदिग्ध) मौत का मामला उछल रहा, उसके परिवार से जुड़े लोग पुणे और लातूर में रहते हैं। जब एक दिसंबर 2014 को जज की मौत  की खबर परिवार को मिली थी तब किसी फर्द ने कोई बयानबाजी नहीं की थी। मगर तीन साल बाद अब परिवार खुलकर सामने है। जज के वालिद हरकिशन, बहन अनुराधा और भांजी नुपूर ने जज बृजगोपाल की मौत को मुश्तबा (संदिग्ध) बताते हुए आला सतही जूडीशियल तहकीकात की मांग शुरू कर दी है। चूंकि सोहराबुद्दीन केस के अस्ल मुल्जिम अमित शाह रहे हैं, ऐसे में लाजिमी है कि जज की मुश्तबा मौत का मामला जितना उछलेगा, वह उनके लिए ही मुसीबत बनेगा। क्योंकि अपोजीशन तो घेराबंदी अमित शाह की ही करेगा।

बीजेपी के ही एक लीडर का कहना है कि चुनावी मौसम में उछली इस खबर ने पार्टी को जरूर फिक्र में डाल दिया है।  भले ही जज की मौत से शाह का कोई लेना-देना न हो, मगर सोशल मीडिया और आम लोगों में जज की मुश्तबा मौत और केस से अमित शाह के जुड़ने पर जो कहानियां गढ़कर अपोजीशन घेराबंदी करने में जुटा है, उससे पार पाना मुश्किल है। जराए बता रहे हैं कि कि शाह और फडण्वीस की मुलाकात में इस मामले का भी चर्चा हआ। शाह को लगता है कि जज के परिवार को कोई भड़का रहा। लिहाजा पता लगाया जाए कि परिवार के पीछे कौन शख्स खड़ा है जो कि गेस्ट हाउस में मौत के इस मामले में उनकी घेराबंदी में जुटा है।

क्या कहता है परिवार

30 नवंबर 2014 को नागपुर के गेस्ट हाउस में जज बृजगोपाल लोया की  मौत हो गई थी। जस्टिस लोया साथी जज स्वप्ना जोशी की बेटी की शादी में शरीक होने नागपुर गए थे। उनके रहने का इंतजाम वीआइपी गेस्ट हाउस में हुआ था। अगले दिन एक दिसंबर को परिवार को बताया गया कि मौत  हार्टफेलियर से हुई। जज का परिवार लातूर जिले के गेटगांव का रहने वाला है। उनके वालिद आज भी आबाई गांव में रहते हैं। मेडिकल पेशे से जुड़ीं बहन अनुराधा पुणे में रहतीं हैं।  उस वक्त परिवार ने कुछ नहीं कहा था लेकिन खोजी सहाफी निरंजन टकले को जज की मौत का मामला आम नहीं बल्कि मुश्तबा (संदिग्ध) लगा। इस पर उन्होंने जज की भांजी नुपूर से राब्ता कायम किया। फिर उन्होंने जज की बहन और पेश से डाक्टर अनुराधा बियानी से बातचीत की।

हालांकि जान का खतरा बताकर जज की बीवी और उनके बेटे ने रिपोर्टर निरंजन से बातचीत से इन्कार कर दिया था। जज की बहन और भांजी ने मौत को पूरी तरह से मुश्तबा बताते हुए चैंकाने वाले दावे किए। उन्होंने बताया कि मुंबई हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने मौत से पहले बृजगोपाल को सौ करोड़ रिश्वत की पेशकश की थी। वह चाहते थे कि बृजगोपाल सोहराबुद्दीन केस में मुल्जिमान को फायदा पहुंचाने के लिए उनकी मर्जी मुताबिक फैसला दें। उन्होंने इन्कार कर दिया था। इस दरम्यान मुश्तबा (संदिग्ध) मौत होती है। फिर नए जज कुर्सी संभालते हैं तो अमित शाह समेत सभी 11 मुल्जिमान को एक महीने के अंदर फर्जी एनकाउंटर के मामले में क्लीन चिट मिल जाती है।