सुप्रीम कोर्ट की तौहीन है अजमेरी की गिरफ्तारी

सुप्रीम कोर्ट की तौहीन है अजमेरी की गिरफ्तारी

”अक्षरधाम मंदिर पर 24 सितम्बर 2002 को हुए दहशतगर्दों के हमले के इल्जाम में क्राइम ब्रांच ने जिन आठ मुसलमानों को गिरफ्तार करके पोटा अदालत से मौत और उम्र कैद की सजाएं दिलाई थीं सुप्रीम कोर्ट ने सभी को बाइज्जत बरी करते हुए क्राइम ब्रांच की तहकीकात को रिजेक्ट कर दिया था। अब उसी रिजेक्टेड तहकीकात की बुनियाद पर अब्दुल रशीद अजमेरी को गिरफ्तार करके पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट की भी तौहीन कर दी।“

 

”हर बार गुजरात असम्बली एलक्शन से पहले दहशतगर्दी के नाम पर कुछ मुसलमानों की गिरफ्तारी एक रिवाज सा बन गया है। कासिम टिम्बरवाला और ओबैद मिर्जा को गिरफ्तार कराकर चीफ मिनिस्टर विजय रूपानी ने मीडिया को खबर दी। कहा गया कि दोनों इस्लामिक स्टेट के खतरनाक दहशतगर्द हैं जो मंदिर और धर्म गुरूओं पर हमले करने की साजिश कर रहे थेे। दो हफ्ते बाद तक उनके पास से एक डंडा तक बरामद नहीं हुआ।“

 

 

 

हिसाम सिद्दीकी

अहमदाबाद! भारतीय जनता पार्टी को सियासी फायदा पहुचाने के लिए गुजरात पुलिस और अहमदाबाद क्राइम ब्रंाच के अफसरान इतने बेलगाम नजर आने लगे हैं कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट तक की परवा नहीं हैं 2002 में असम्बली एलक्शन से ठीक पहले अहमदाबाद के अक्षरधाम मंदिर पर हमला हुआ था। तीस लोगों की जाने चली गई थी। उस मामले में क्राइम ब्रांच और पुलिस ने जो कहानी गढ कर 28 मुसलमानों को मुल्जिम बनाया था और 8 लोगों को ही गिरफ्तार करके पोटा कोर्ट और हाई कोर्ट से फांसी व उम्रकैद की सजा दिलवा दी थी सुप्रीम कोर्ट ने सभी को 2014 में न सिर्फ बरी कर दिया था बल्कि क्राइम ब्रांच की तहकीकात का झूट का पुलिंदा करार देकर उसे रिजेक्ट कर दिया था अब उसी रिजेक्टेड तहकीकात की बुनियाद पर क्राइम ब्रांच ने अब्दुल रशीद अजमेरी को गिरफ्तार करके सुप्रीम कोर्ट की तौहीन करने का काम किया है।

गुजरात असम्बली के पिछले कम से कम चार एलक्शनों की शुरूआत तो तरक्कियाती कामों के जिक्र से हुई लेकिन हर बार भारतीय जनता पार्टी खुसूसन वहां तकरीबन तेरह साल तक वजीर-ए-आला रहे आज मुल्क के वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी ने आखिर में हर एलक्शन को मजहब और धर्म से जोड़ कर लोगों के जज्बात भड़का कर वोट हासिल करने में कामयाबी हासिल की है। 2002 का एलक्शन तो  पूरी तरह गोधरा हादसे और गुजरात में हुए इंसानियत के कत्लेआम के पसमंजर में हुआ था। इसके बावजूद उस वक्त के वजीर-ए-आला नरेन्द्र मोदी ने तकरीबन हर पब्लिक मीटिंग में किसी ने किसी बहाने मियां नवाज शरीफ का जिक्र जरूर किया था। उस वक्त नवाज शरीफ का जिक्र करने का मकसद साफ था कि वह गुजरात के लोगों को किसी न किसी तरके सेे हिन्दू मुस्लिम का मैसेज दे रहे थे। उनके जमाने में दुबारा असम्बली एलक्शन आया तो उस वक्त उन्होने सोनिया गांधी और उस वक्त के चीफ एलक्शन कमिशनर को ईसाई बताकर गुजरात के लोगों को मैसेज दिया कि ईसाई लाबी उनको हराना चाहती है।  इसी मकसद से उन्होंने बार-बार जेएम लिंगदोह को जेम्स माइकल लिंगदोह कह कर मुखातिब किया था। 2012 के एलक्शन में जब केशुभाई पटेल अपनी अलग पार्टी बनाकर कांग्रेस के साथ मिलकर एलक्शन लड़ा तो वजीर-ए-आला और बीजेपी के एक बड़े लीडर की हैसियत से नरेन्द्र मोदी ने अपनी तकरीबन हर पब्लिक मीटिंग में गुजरात के आम लोगों से कहा कि कांगे्रस तो मअहमद मियां पटेलफ को गुजरात का चीफ                मिनिस्टर बनाने की सजिश कर रही है। मतलब यह कि हर एलक्शन में उन्होंने मुसलमानों और ईसाइयों को अलामत (प्रतीक) की शक्ल में इस्तेमाल करके वोटों का फायदा हासिल कर लिया।

गुजरात असम्बली का एलक्शन शुरू हो चुका है भारतीय जनता पार्टी, वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी, बीजेपी सदर अमित शाह और गुजरात के चीफ मिनिस्टर विजय रूपानी ने कुछ मुसलमानों और मुस्लिम नामों का अलामती (प्रतीकात्मक) इस्तेमाल फिर शुरू कर दिया है। 24 सितम्बर 2002 को अहमदाबाद के अक्षरधाम मंदिर पर हुए या एक साजिश के तहत करार दिए गए दहशतगर्दों के हमलेे में उस वक्त की नरेन्द्र मोदी सरकार के डिटेक्शन आफ क्राइम ब्रांच (डीसीबी) ने 28 लोगों को नामजद करके स्पेशल पोटा अदालत में चार्जशीट दाखिल करके कहा था कि 28 में से सिर्फ आठ को पकड़ा जा सका बाकी 20 फरार हैं। पोटा अदालत ने 2006 में छः को कुसूरवार ठहरा कर दो को मौत की बाकी चार को दस साल से उम्र कैद तक की सजा सुना दी थी। बाद में गुजरात हाई कोर्ट ने भी स्पेशल पोटा अदालत के फैसले पर मोहर लगा दी थी।

26 मई 2014 को जब नरेन्द्र मोदी वजीर-ए-आजम का हलफ लेकर मुल्क की सत्ता संभाल रहे थे ठीक उसी दिन सुप्रीम कोर्ट की एक बंेच ने सभी छः मुल्जिमान को बरी करते हुए डीसीबी की तहकीकात को मुकम्मल तौर पर खारिज करते हुए उसे झूटी कहानी का पुलिंदा करार दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर सख्त नाराजगी जाहिर की थी कि क्राइम ब्रांच ने किस तरह झूट की बुनियाद पर आठ बेगुनाह लोगों को फंसाने का काम किया। सुप्रीम कोर्ट ने यहां तक कहा था कि इस मामले को पोटा अदालत में ले जाने की मंजूरी देते वक्त गुजरात के होम मिनिस्टर ने या तो अपनी अक्ल का इस्तेमाल नहीं किया था यह फिर वह अपनी अक्ल घर पर रख कर आए थे। यहां यह जिक्र भी जरूरी है कि यह मामला पोटा अदालत में ले जाने की मंजूरी देने वाले होम मिनिस्टर भी वजीर-ए-आला नरेन्द्र मोदी ही थे। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद पोटा अदालत ने बाकी दो को बरी कर दिया था।

अब चूंकि एलक्शन में दहशतगर्दी का नाम लेना जरूरी है इसलिए अब्दुल रशीद नाम के साठ साल के एक शख्स को तीन नवम्बर को सुबह सवेरे अहमदाबाद हवाई अड्डे पर उस वक्त गिरफ्तार कर  लिया गया जब वह सऊदी अरब से अपने खानदान के लोगों से मिलने के लिए अहमदाबाद आए थे। इस खबर को अहमदाबाद क्राइम बं्राच ने बढा-चढा कर मीडिया में पेश किया कि अक्षरधाम मंदिर पर हुए दहशतगर्दाें के हमले की साजिश में शामिल अजमेरी को आखिर पकड़ ही लिया गया। सवाल है कि जब मुल्क की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट इस मामले में क्राइम ब्रंाच की तहकीकात को फर्जी, साजिशी और फिल्म की कहानी जैसी बता कर पूरी तरह से मरिजेक्टफ कर चुकी है तो फिर क्राइम ब्रांच अपनी उसी तहकीकात की बुनियाद पर पन्द्रह साल बाद किसी को गिरफ्तार कैसे कर सकती है? अजमेरी 22 साल बाद सऊदी अरब से वापस अहमदाबाद आए थे। क्राइम बं्राच का कहना है कि हां अजमेरी 22 साल बाद वापस आया है।

क्राइच ब्रांच की चार्जशीट के मुताबिक इस मामले में गिरफ्तार किए गए अशफाक अब्दुल्लाह भावनगरी ने अपने बयान मंे कहा था कि वह सऊदी अरब की राजधानी रियाज में काम करता था वहीं उसकी मुलाकात अब्दुल रशीद अजमेरी से होती थी। उसे मालूम है कि अजमेरी ने रियाज में बैठकर अक्षरधाम मंदिर पर हमला करने की साजिश रची थी। सुप्रीम कोर्ट भावनगरी के बयान को झूटा और गढा हुआ करार देकर रद्द कर चुका है। इसके बावजूद अहमदाबाद पुलिस ने हठधर्मी का मजाहिरा करते हुए अजमेरी को उसी केस में गिरफ्तार कर लिया जिसकी पूरी तहकीकात ही सुप्रीम कोर्ट से झूटी करार दी जा चुकी है। क्राइम ब्रांच और गुजरात पुलिस को पता था कि अजमेरी रियाज में कहां रहते हैं अगर वह मुल्जिम थे तो पन्द्रह सालों  से उन्हें सऊदी अरब से डिपोर्ट कराने की कार्रवाई क्यों नहीं की गई। इस दरम्यान उन्होने  रियाज मे वाके हिन्दुस्तानी सिफारतखाने (दूतावास) से अपने पासपोर्ट का रिनीवल भी कराया होगा गुजरात सरकार और सऊदी में कायम अपने सिफारतखाने को यह आर्डर क्यों नहीं भेजवाया कि अगर अजमेरी अपना पासपोर्ट रिन्यू कराने आए तो पासपोर्ट जब्त करके उसे डिपोर्ट कराया जाए। ऐसा इस लिए नहीं किया गया कि अब तक एलक्शन में दूसरे कई मुद्दे थे। अजमेरी या किसी दूसरे मुसलमान को गिरफ्तार करके आम गुजरातियों को पोलराइज करने की जरूरत नहीं थी। इस वक्त इसकी सख्त जरूरत है।

गुजरात सरकार, वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी और अजमेरी को गिरफ्तार करने वाली क्राइम ब्रांच के अफसरान को अच्छी तरह मालूम है कि अक्षरधाम मंदिर पर हुए मुबैयना (कथित) हमले में पहले ही                फंसाए गए आठ बेगुनाहों की तरह अजमेरी भी अदालत से बरी हो जाएंगे इसके बावजूद क्राइम ब्रांच ने सियासी मकासिद के लिए उन्हें गिरफ्तार करके इसका प्रोपगण्डा किया है। अगर इस मामले में सुप्रीम कोर्ट संजीदगी से कार्रवाई करेे तो क्राइम ब्रांच के अफसरान को अदालत की तौहीन करने के मामले में जेल की हवा खानी पड़ सकती है। यह तो धांधली की इंतेहा है कि जिस तहकीकात को सुप्रीम कोर्ट रद्द कर चुका है उसी तहकीकात की बुनियाद पर किसी को गिरफ्तार कर लिया जाए। यह धंाधली प्राइम मिनिस्टर की नाक के नीचे की जा रही है।

दहशतगर्दी के इल्जाम में अब्दुल रशीद की गिरफ्तारी पहली नहीं हे इससे पहले 27 अक्टूबर को क्राइम ब्रांच ने एक लैब टेक्नीशियन कासिम टिम्बर वाला और उसके एक दोस्त ओबैद मिर्जा को पकड़ लिया था। एलान किया गया कि यह दोनों इस्लामिक स्टेट के बहुत ही खतरनाक दहशतगर्द हैं जो हिन्दुओं के कई मंदिरों और धर्म गुरूओं पर हमला करने की साजिश रच रहे थे। इन दोनोें की गिरफ्तारी और कांग्रेस लीडर अहमद पटेल के साथ कासिम के रिश्ते बताने के लिए गुजरात के चीफ मिनिस्टर विजय रूपानी ने रात दस बजे मीडिया नुमाइंदों को बुलाया था उन दोनों की गिरफ्तारी और उनके खतरनाक होने का प्रोपगण्डा गुजरात सरकार ने बड़े पैमाने पर किया। अभी भी बीजेपी लीडरान उन दोनों की गिरफ्तारी का जिक्र एलक्शन कम्पेन में करते फिर रहे हैं।

गुजरात सरकार और क्राइम ब्रांच की यह कहानी कितनी झूटी और बेबुनियाद है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस्लामिक स्टेट के जोे दो मुबैयना (कथित) दहशतगर्द क्राइम ब्रांच के मुताबिक बड़े पैमाने पर मंदिरों और धर्म गुरूओं पर हमले करने की साजिश रच रहे थे उनकी गिरफ्तारी के दो हफ्तों बाद तक पुलिस या क्राइम ब्रांच उनके कब्जे से या उनके किसी ठिकाने से एक डंडा तक बरामद नहीं कर सकी। दूसरी बात यह कि सीरिया और इराक में जहां इस्लामिक स्टेट के अड्डे हैं वहां तो यह दहशतगर्द गरोह कुछ कर नहीं पा रहे हैं उसके दो एजेण्ट अहमदाबाद में क्या कर पाएंगे। अब तो रिहाई मंच ने अपने एक बयान में यहां तक इल्जाम लगाया है कि पांच नवम्बर को मुंबई एयरपोर्ट पर आजमगढ के रहने वाले अबू जैद तीन नवम्बर को अहमदाबाद हवाई अड्डे से अब्दुल रशीद अजमेरी की गिरफ्तारी और उससे भी पहले अहमदाबाद में कासिम टिम्बरवाला व ओबैद मिर्जा की गिरफ्तारी सिर्फ और सिर्फ गुजरात असम्बली के एलक्शन पर असर डालने के लिए की गई है। एलक्शन से पहले अभी कुछ और बेकुसूर मुसलमानों को दहशतगर्द बताकर उठाया जाएगा। गुजरात पुलिस का यह पुराना हथकण्डा है।

रिहाई मंच का इल्जाम सच दिखता है। क्योंकि 2001  में मोदी के गुजरात का वजीर-ए-आला बननेे के बाद से दहशतगर्दी के नाम पर जितने मुसलमानों को गिरफ्तार किया गया अदालतों से सभी छूट गए पुलिस और क्राइम ब्रांच की कहानी अदालत में झूट ही साबित हुई है।