ठुमरी की मलिका गिरिजा देवी नहीं रहीं

ठुमरी की मलिका गिरिजा देवी नहीं रहीं

कोलकाता! पद्म विभूषण इनाम याफ्ता ठुमरी की महारानी और बनारसी रंग की बेमिसाल क्लासिकी गुलूकारा गिरिजा देवी का 24 अक्टूबर को रात दिल का दौरा पड़ने के बाद मकामी अस्पताल बीएम बिरला हार्ट सेंटर में 88 साल की उम्र में इंतकाल हो गया। उनके परिवार में उनकी एक बेटी है। गिरिजा देवी को ठुमरी की मलिका कहा जाता था और प्यार से अप्पाजी बुलाया जाता था। गिरिजा देवी को 24 अक्टूबर को दोपहर में दिल की तकलीफ के बाद शहर के बीएम बिरला हार्ट रिसर्च सेंटर में भर्ती करवाया गया था। उनके परिवार के जराए ने बताया कि उन्हें वेंटीलेटर पर रखा गया था। अस्पताल के तर्जुमान ने बताया, मम गिरिजा देवी को जब अस्पताल लाया गया तब उनकी हालत काफी संगीन थी। उन्हें सीसीयू में भर्ती किया गया था और उन पर निगरानी रखी जा रही थी। रात आठ बजकर 45 मिनट के तकरीबन उनका इंतकाल हो गया।फफ गिरिजा देवी जदीद मरकज के जरिए कराए गए मशहूर पेंटर एमएफ हुसैन (अब मरहूम) की सवानेह के प्रोग्राम में शिरकत करने के लिए लखनऊ आई थीं। जदीद मरकज को भी उनके इंतकाल पर अफसोस है।

वजीर-ए-आजम नरेंद्र मोदी ने गिरिजा देवी के इंतकाल पर अफसोस जाहिर किया। उन्होंने कहा कि गायिका की मौसीकाना अपील नस्लों के फर्क से ऊपर थी और हिन्दुस्तानी कलासिकी मौसीकी को मकबूल बनाने की उनकी कोशिशों को हमेशा याद रखा जाएगा। पच्छिम बंगाल की वजीर-ए-आला ममता बनर्जी  ने कहा कि गिरिजा देवी के इंतकाल से उन्हंे दुख पहुंचा। हिन्दुस्तानी क्लासिकी मौसीकी की दुनिया ने अपनी खूबसूरत आवाजों में से एक को खो दिया। मेरी हमदर्दी उनके चाहने वालों के साथ है। बनारस घराने की गुलूकारा को 1972 में पद्श्री अवार्ड मिला था। 1989 में उन्हें पद्म भूषण और 2016 में पद्म विभूषण से नवाजा गया था।

क्लासिकी मौसीकी में माहिर गिरिजा देवी की गुलूकारी में सेनिया और बनारस घराने की अदायगी की खास मिठास थी। वह ध्रुपद, खयाल, टप्पा, तराना, सदरा और रिवायती लोक संगीत की बेमिसाल गुलूकारा थीं। होरी, चैती, कजरी, झूला, दादरा और भजन में उनकी आवाज नए रंग और रस लेकर आती थी। उन्होंने ठुमरी के अदब का न सिर्फ गहरा मुताला किया बल्कि रिसर्च भी की थी। इसीलिए उन्हें ठुमरी की महारानी के नाम से भी शोहरत मिली।

गिरिजा देवी का जन्म 8 मई, 1929 को वाराणसी में हुआ था। गुलूकारी के शोबे में काबिले जिक्र तआवुन के लिए उन्हें 1972 में पद्मश्री, 1989 में पद्मभूषण और 2016 में पद्म विभूषण से नवाजा गया। गिरिजा देवी को संगीत नाटक अकादमी के जरिए भी एजाज दिया गया था। इनकी नवासी अनन्या दत्ता ने तबीयत बिगड़ने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया था। बकौल अनन्या, सुबह नानी ने खूब बात की थी। फिर थोड़ी तबीयत खराब होने की बात कही तो हम सब उन्हें चेकअप के लिए अस्पताल ले आए। नानी रात करीब साढ़े नौ बजे हम सबका साथ छोड़कर चली गईं।

आम तौर पर गुलूकार एक खास मैदान चुनता है जैसे क्लासिकी, सुगम संगीत या लोक संगीत और उसमें भी ध्रुपद, खयाल, ठुमरी, गजल, भजन वगैरह या फिर कोई खास लोक गायन शैली…लेकिन गिरिजा देवी की गायकी इन हदों में कभी नहीं बंधी। वह खालिस क्लासिकी मौसीकी में माहिर थीं तो सुगम संगीत में भी उन्हें महारत थी। इतना ही नहीं, वह लोक संगीत को तो खास पहचान देने वाली गुलूकारा थीं। हिंदुस्तानी मौसीकी के वसीअ आसमान पर उनकी आवाज हर जगह दमकती रही। यही वजह है कि वह आम फनकारों से कहीं ऊपर थीं। उनके शागिर्द भी गुलूकारी की सभी असनाफ (विधाओं) में हैं।

गिरिजा देवी के इंतकाल के साथ फनकारोें के शहर बनारस का एक सितारा टूट गया। ध्रुपद, खयाल, टप्पा, तराना, सदरा और लोक संगीत में होरी, चैती, कजरी, झूला, दादरा और भजन गायकी से मौसीकी के शायकीन के दिलों पर राज करने वालीं गिरिजा देवी ने हिन्दुस्तानी मौसीकी की दुनिया को अपनी पूरी जिंदगी दे दी। जब वह कजरी और झूला गाती थीं तो सुरों का सावन यूं बरसता था कि सामईन उसमें भीगे बगैर नहीं रह सकते थे। चाहे होरी हो या चैती या फिर दादरा, उनकी गायकी हमेशा लोक संगीत की रिवायती मिठास को समेटे रही। लोक संगीत की इन स्टाइल (शैलियांे) से आम सामईन को रूशनास कराने इन्हें मकबूल बनाने में गिरिजा देवी का तआवुन कभी भुलाया नहीं जा सकेगा।

एक तरफ जहां आम लोगों में गाया और सुना जाने वाला लोक संगीत है तो दूसरी तरफ क्लासिकी मौसीकी, गिरिजा देवी मौसीकी के हर फन में माहिर थीं। आदि संगीत ध्रुपद से वे नाद ब्रम्ह की आराधना करते हुए सुरों के समंदर में डूबी होती थीं तो खयाल गायकी में उम्दा लयकारी से सुनने वालों को झूमने पर मजबूर कर देती थीं।

गिरिजा देवी को मठुमरी क्वीनफ कहा जाता था। बनारस में जन्मीं गिरिजा देवी के वालिद रामदेव राय जमींदार थे। वह हारमोनियम बजाते थे। गिरिजा देवी को हकीकत में वालिद से ही मौसीकी की विरासत मिली। आजादी के पहले के जमाने में एक जमींदार की बेटी का गुलूकारी सीखना इतना आसान नहीं था लेकिन वालिद की सरपरस्ती की वजह से ही वह मौसीकी सीख पाईं और आगे बढ़ने की हिम्मत जुटा पाईं। गुलूकार और सारंगी के माहिर सरजू प्रसाद मिश्रा से पांच साल की उम्र में उन्होंने खयाल और टप्पा गुलूकारी (गायन) सीखना शुरू कर दिया था। उन्होंने आगे जाकर गुरु श्रीचंद मिश्रा से मौसीकी की मुख्तलिफ असनाफ (शैलियां) सीखीं। क्लासिकी मौसीकी के सेनिया और बनारस घराने की खास गायकी उनकी पहचान थी।

गिरिजा देवी ने सिर्फ संगीत की साधना ही नहीं की गुलूकारों की कई नस्लों को भी परवान चढाया। राजन मिश्र, साजन मिश्र, मालिनी अवस्थी, शुभा मुद्गल, सुनंदा शर्मा जैसे न जाने कितने शागिर्द और शागिर्दा हैं जो गिरिजा देवी और बनारस घराने की गायकी की रिवायत को आगे बढा रहे हैं। इस संगीत साधिका के सुर कभी अपना असर नहीं खोएंगे..उनके शागिर्दाें के जरिए रिवायत का दरिया बहता हुआ अगली नस्ल तक जाएगा।