मुस्लिम नामों के सहारे नफरत का – खेल खेलती मोदी हुकूमत

मुस्लिम नामों के सहारे नफरत का – खेल खेलती मोदी हुकूमत

”टीपू सुल्तान को गालियां बक कर मोदी के वजीर अनन्त कुमार हेगडे़ ने साबित कर दिया कि आजादी की जंग के दौरान अंगे्रजों की गुलामी और जासूसी करने वाले अपने पुरखों के रास्ते पर ही चह आज भी मजबूती से चलते रहना चाहते हैं। इतने संगीन मसले पर भी खामोश रह कर वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी ने भी हेगड़े के बयान की खामोश ताईद ही की है।“

 

 

”टीपू सुल्तान के वजीर-ए-आजम पुर्रय्या पंडित, शमाया अयंगर होम मिनिस्टर, सूबा राव वजीर-ए-दरबार। राम नाम की अंगूठी पहनने और मैदाने जंग में मरने वाले तारीख (इतिहास) के अकेले सुल्तान, जिसने मराठों के तोड़े और लूटे हुए मठ और मंदिर कोलार के मोकम्बिका मंदिर की दुबारा तामीर की उन्हें हेगड़े हिन्दू दुश्मन कह रहे हैं क्योकि टीपू ने अंगे्रजों के लिए जासूसी करने वाले कोरटपुर व मालाबार के हिन्दुओं और मोपला व महादेवी के मुसलमानों को कत्ल कराया था।“

 

नई दिल्ली! मुल्क में मुसलसल बढती बेरोजगारी, कमर तोड़ महंगाई, शरह तरक्की (जीडीपी) में गिरावट, नोटबंदी और जीएसटी लगाने के नादिर शाही फैसलों से हर तरफ से बुरी तरह घिर चुकी नरेन्द्र मोदी सरकार को कुछ रिलीफ दिलाने के लिए आरएसएस परिवार ने एक बार फिर कुछ मुस्लिम नाम तलाश करके उनपर हमले शुरू कर दिए ताकि उन्हीं मुगलों और शहीद टीपू सुल्तान के नामों के भरोसे मोदी खुद को सियासी परेशानी से फिलहाल बचा सकें। यहां यह बताना जरूरी है कि इस किस्म की नफरत और फिरकापरस्ती की सियासत शुरू करने या कराने के पीछे किसी और का नहीं खुद वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी का फैसला होता है। गुजरात असम्बली के 2012 के एलक्शन में मअहमद मियां पटेलफ को गुजरात का अगला चीफ मिनिस्टर बनाने की साजिश कांग्रेस कर रही है। जेम्स माइकल लिंगदोह (ईसाई) चीफ एलकश्न कमिशनर हमें एलक्शन हराना चाहते हैं। गंगा मैय्या ने हमें बनारस बुलाया है, श्मशान और कब्रस्तान, ईद पर बिजली तो होली, दीवाली पर भी बिजली मिले यह वह चंद जहरीले जुमले हैं जो खुद नरेन्द्र मोदी ने अलग-अलग मौकों पर उछाल कर हिन्दुओं के जज्बात भड़काए और उनके वोट ठगे हैं। अब गुजरात असम्बली का एलक्शन फिर सर पर है तो मोदी ने अपनी पार्टी के जहरीली जुबान वालों को फिर जहर उगलने पर लगा दिया है। बीजेपी तर्जुमान संबित पात्रा ने मोदी के रास्ते पर चलते हुए 23 अक्टूबर को एक हिन्दी टीवी चैनल की बहस में नौजवान पाटीदार लीडर निखिल सवानी से यह सवाल किया कि निखिल आप तो यह बताइए कि आप गुजरात के लीडर की हैसियत से नरेन्द्र मोदी, अमित शाह और विजय रूपानी को देखना चाहते हैं या अहमद पटेल को देखना चाहिए। बीजेपी का यही अस्ल जहर है जो उसके लोग अक्सर उगलने लगते हैं।

एक बार भारतीय जनता पार्टी और मोदी के सितारे गर्दिश में दिख रहे हैं इसीलिए इस किस्म की जहरीली बातें और बयानात से भी उन्हंे फायदा मिलता नहीं दिख रहा है। पहले पार्टी ने अपने एक दंगाई और गोश्त व्यापारी सरधना (मेरठ) के मेम्बर असम्बली संगीत सोम से मुगलों और ताजमहल के खिलाफ जहर उगलवाया फिर नार्थ कन्नड़ से लोक सभा मेम्बर और मोदी सरकार में वजीर अनन्त कुमार हेगड़े  को शहीद टीपू सुल्तान पर कीचड़ उछालने के लिए मैदान में खुला छोड़ दिया। संगीत सोम ने मुगलों को भारत का गद्दार जालिम करार देते हुए मेरठ के एक जलसे में कहा कि जल्दी ही मुगलों को इतिहास की किताबों से हटा दिया जाएगा, ताजमहल एक मंदिर था उसे हम मंदिर ही तस्लीम करते हैं, इसके बावजूद ताज महल को हम अपने मुल्क की तहजीबी (सांस्कृतिक) धरोहर तस्लीम नहीं कर सकते। उधर कर्नाटक मे मरकजी वजीर अनन्त कुमार हेगडे़ ने टीपू सुल्तान के खिलाफ बोलते हुए बदतमीजी और मुल्क पर शहीद होने वाले एक बेमिसाल बहादुर हुक्मरां को कातिल, पागलपन की हद तक मजहबी और जानी (बलात्कारी) तक कह डाला। नरेन्द्र मोदी इन दोनों के बयानात पर खामोश रहे, बोलते भी कैसे इन दोनों बदजुबान बयानबाजों के मुंह से जो कुछ निकला वह अल्फाज तो शायद मोदी के ही थे।

ताजमहल और टीपू सुल्तान के चाहने वालों का कहना है कि संगीत सोम और अनन्त कुमार हेगडे़ ने इन दोनों के खिलाफ इसलिए बयानबाजी की है कि ताजमहल बनाने वालों की अगली नस्लें और टीपू सुल्तान सीधे तौर पर अंग्रेजों के खिलाफ थे। दुनिया की तारीख में टीपू सुल्तान अकेले ऐसे बादशाह थे जो अपने मुल्क के लिए लड़ते हुए मैदाने जंग में शहीद हुए। उनसे पहले न बाद में आज तक कोई भी हुक्मरां लड़ते हुए शहीद नहीं हुआ। संगीन तौर पर जख्मी टीपू सुल्तान को जब यह अंदाजा हो गया कि वह जिंदा बच नहीं सकेंगे तो उन्होने अपने दीवान (प्राइम मिनिस्टर) पुर्नय्या पंडित के हाथों में अपने बेटे का हाथ थमाते हुए कहा था कि पंडित मैं अपने वारिस को आप के सुपुर्द कर रहा हूं अब इसकी जिम्मेदारी आप पर है। पुर्नय्या पंडित उनके बेटे को लेकर महफूज जगह चले गए। सैकड़ों बहादुर हिन्दुस्तानी फौजियों की लाशों के साथ टीपू सुल्तान का जस्दे खाकी (पार्थिव शरीर) भी जंग बंद होने के बाद मिली थी।

अनन्त कुमार हेगडे़ और संगीत सोम का ताल्लुक आरएसएस से है तारीख गवाह है कि  आरएसएस ने जंगे आजादी में कभी हिस्सा नहीं लिया बल्कि हमेशा अंगे्रजों का साथ दिया। इस तरह अंग्रेज भी हेगड़े और संगीत सोम के पुरखों के पुज्यनीय (काबिले एहतराम) थे फिर टीपू हांे या मुगल या कांगे्रस जिस किसी ने अंगे्रजों की मुखालिफत की यह लोग अंग्रेजों की भक्ति में उसी के खिलाफ बोलेंगे। यह लोग आज तक अंगे्रजों की गुलामी से खुद को बाहर नहीं निकाल पाए हैं। यही वजह है कि आरएसएस और बीजेपी का कोई भी वर्कर या प्रचारक कभी अंग्रेजों के खिलाफ एक लफ्ज भी नहीं बोलता है। अब तो कर्नाटक में यह खबर आम है कि भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस अगले साल से पूरे कर्नाटक में बहुत बड़े पैमाने पर लार्ड कार्नवालिस का जन्म दिन मनाने का प्रोग्राम बना रहे हैं। लार्ड कार्नवालिस को यह लोग आज भी अपना मालिक पूजा के लायक तस्लीम करते हैं।

बीजेपी के लोग कितने दोगले और दोहरे किरदार के हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नरेन्द्र मोदी के मुल्क की सत्ता पर काबिज होने से पहले कर्नाटक बीजेपी के सभी लीडरान भी  हर साल टीपू सुल्तान की जयन्ती मनाते रहते थे। हद यह है कि तकरीबन पैतीस या सैंतीस साल कब्ल आरएसएस ने कर्नाटक की आरएसएस शाख ने मभारतीय महावीरों को श्रद्धांजलिफ प्रोग्राम के तहत कई बडे़ लोगों पर मभारत भारतीफ नाम की छोटी-छोटी किताबें शाया (प्रकाशित) कराई थीं, उन्हीं में एक किताब टीपू सुल्तान पर भी शाया हुई थी। आज कर्नाटक बीजेपी के सदर बीएस येदुरप्पा ने बीजेपी से अलग होकर 2012 मंे मकर्नाटक जनता यज्ञफ के नाम से अपनी अलग पार्टी बनाई थी तो एक जलसे में वह टीपू सुल्तान जैसी पोशाक पहनकर हाथ में तलवार लिए हुए डायस पर आए थे। वही येदुरप्पा अब मोदी की बीजेपी में हैं तो टीपू सुल्तान का नाम सुनने को तैयार नहीं हैं।

टीपू सुल्तान से अंगे्रजों के इन गुलाम नस्ल के लोगों को अब अचानक याद आ गया कि अगर कोरटपुर और मालाबार इलाकों के हिन्दू और नायर लोग टीपू  के खिलाफ अंगे्रजों की जासूसी करते थे तो टीपू ने उन्हें कत्ल क्यों करा दिया था। आखिर 1925 से 1947 तक पूरे मुल्क में आरएसएस के लोग अंगे्रजों के साथ रहे उनकी जासूसी की तो उन्हें किसी ने कुछ नहीं कहा। उस वक्त टीपू ने अंग्रेजों की जासूसी करने वाले कोरटपुर और मालाबार के हिन्दुओं की तरह मंगलौर के ईसाइयों और महादेवी व मोपला के मुसलमानोें को भी कत्ल कराया था। अब अगर उनकी सल्तनत में कुछ लोग उनके खिलाफ अंगे्रजों से मिल कर उनके लिए जासूसी करने लगे थे तो उनकी सजा मौत के अलावा और कुछ हो भी नहीं सकती थी। अस्ल झगड़ा यह है कि नार्थ कन्नड़ा इलाके में जहां भारतीय जनता पार्टी कभी बहुत मजबूत हुआ करती थी अब वहां बीजेपी के सियासी कदम उखड़ चुके हैं। इसीलिए पार्टी ने इस किस्म की जहरीली बयानबाजी शुरू कराई है ताकि गुजरात से कर्नाटक तक कुछ हिन्दुओं के जज्बात भड़का कर उनके वोट ठगे जा सकें। इन बयानात का फौरी फायदा यह हुआ है कि बीजेपी सदर अमित शाह के बेटे पर एक साल में 50 हजार से 80 करोड़ पचास लाख रूपए बनाने का मामला कुछ दब सा गया है।

जिस टीपू सुल्तान पर अंग्रेजों की औलादों की शक्ल में सामने आकर भारतीय जनता पार्टी के लोग घटिया बयानबाजी कर रहे हैं अगर वह टीपू फिरकापरस्त और कट्टर मुसलमान होते तो उनके दरबार के इंचार्ज वजीर सूबा राव, उनके होम मिनिस्टर शमाया अयंगर और वजीर-ए-आजम पुर्नय्या पंडित क्यों थे? दिल्ली के मुगल दरबार में टीपू सुल्तान सरकार के नुमाइंदगी करने के लिए कोई मुसलमान नहीं बल्कि मूलचंद और दीवान राय क्यों थे। आज कल इन ओहदों को                                            सफीर (राजदूत) कहा जाता है। मुल्क का पहला राकेट टीपू सुल्तान ने ही बनाया था। पुर्नय्या पंडित उस राकेट फोर्स के सिपहसालार भी थे। संघी अब यह प्रोपगण्डा कर रहे हैं कि टीपू सुल्तान ने मैसूर रियासत में आठ हजार मंदिर गिरवा दिए थे। यह झूटे लोग उन मंदिरों के नामों की फेहरिस्त अभी ते पेश् नहीं कर सके हैं। इन झूटों के पास इस सवाल का भी कोई जवाब नहीं है कि अगर आठ हजार मंदिर टीपू सुल्तान गिरवाते तो उनके महल के बराबर बना रंगानाथ स्वामी मंदिर कैसेे बचा रह गया। टीपू सुल्तान किस तरह के हिन्दू मुखालिफ थे कि उनके महल में दस दिनों तक दशहरा मनाया जाता था। यह रिवाज उनके बाद उनके खानदान के लोगों ने भी जारी रखी।

टीपू सुल्तान आरएसएस और बीजेपी  के मुताबिक हिन्दू दुश्मन कट्टर मुसलमान थे फिर वह राम राम दर्ज वाली अंगूठी क्यों पहनते थे। उन्होने 158 मंदिरों केे खर्च चलाने के लिए बाकायदा जागीरें और जमीनें क्यों दी थीं। हिन्दुस्तान मे आज तक जितने राजा महाराजा और बादशाह हुए उनमें एक टीपू सुल्तान ही थे जिनकी अंगूठी पर मरामफ का नाम ढला हुआ था। उनसे पहले या बाद में मराठा हुक्मरां ने मरामफ नामी अंगूठी पहनी इसका कोई सबूत नहीं मिलता है। 1791 में पेशवा माधवराव की मराठा फौज ने टीपू सुल्तान के साथ जंग में श्रगेरी के मठ और मंदिरों को भी उजाड़ दिया था। जंग खत्म होने के बाद श्रगेरी के शंकराचार्य ने मठ और मंदिरों की दुबारा तामीर (निर्माण) कराने के लिए तीस खत लिखे थे टीपू ने श्रगेरी के मठ और मंदिरों की दुबारा नए सिरे से तामीर के लिए तमाम जरूरी सामान, पैसों और कारीगरों का इंतजाम करके मठों और मंदिरों को दुबारा बनवाया था। टीपू सुल्तान को लिखे शंकराचार्य के सभी खत 1916 में सामने आए। आज भी वह मैसूर के आर्कालोजी डायरेक्टे©ंट में महफूज रखे हुए हैं।

सिर्फ श्रगेरी ही नहीं कोलोर में पार्वती देवी के मोकम्बिका मंदिर का तमाम सोना चांदी और हीरे जवाहरात मराठा हमलावर लूट ले गए थे। मंदिर की वेबसाइट पर आज भी इस लूट की तफसील (विवरण) मौजूद है। 18वीं सदी में यह एक इंतेहाई दौलतमंद और आलीशान मंदिर था। टीपू ने इस मंदिर को भी दुबारा बनवाया और उसे सोने, चांदी, हीरे जवाहारात का तोहफा दिया। इस मंदिर मे आज तक शाम 7.30 (साढे सात) बजे टीपू केे नाम से ही प्रार्थना शुरू की जाती है। कर्नाटक का शायद ही कोई घर ऐसा हो जहां की बुजुर्ग ख्वातीन और मर्द (नाना, नानी, दादी, दादा) टीपू सुल्तान की लवानियां न गाती और गाते हों। दो सौ साल से जारी इस सिलसिले को बीजेपी और आरएसएस खत्म करने की हैसियत में है क्या?