खातूून रिजर्वेशन बिल अब पास होना ही चाहिए

खातूून रिजर्वेशन बिल अब पास होना ही चाहिए

पार्लियामेंट और असम्बलियों में औरतों को एक-तिहाई रिजर्वेशन देने की बात करने वाला खातून रिजर्वेशन बिल एक बार फिर चर्चा में है। कांग्रेस पार्टी सदर सोनिया गांधी ने हाल ही में वजीर-ए-आजम नरेंद्र मोदी को खत लिख कर उनसे यह अपील की है कि इस बिल को वह लोकसभा में पास कराएं। सोनिया ने अपने खत में वजीर-ए-आजम को इस बात का भी यकीन दिलाया है कि पार्लियामेंट में उनकी पार्टी खातून रिजर्वेशन बिल की हिमायत करेगी। यह खत जैसे ही मीडिया में आम हुआ सियासत में उबाल आ गया। खातून रिजर्वेशन की हिमायत करने वाली पार्टियों ने इस मांग से अपना सुर मिलाया, तो बीजेपी को भी मजबूरन यह बात कहना पड़ी कि ममउनकी सरकार इस बिल को पास कराने को लेकर मपाबंदफ है। अगले सरमाई इजलास में वह यह बिल पार्लियामेंट में पेश करेगी।फफ बहरहाल मोदी सरकार इस बिल को लेकर कितनी संजीदा है ?, यह आने वाला वक्त बतलाएगा। लेकिन सरकार का अभी तक का जो रवैया है, उससे कतई नहीं लगता कि वह खातून रिजर्वेशन बिल के लिए संजीदा है। अगर सरकार संजीदा होती, तो बिल कभी का पार्लियामेंट में पास हो जाता। लोकसभा में अक्सरियत होने के बाद भी, पिछले तीन सालों में उसने अपनी तरफ से कोई कोशिश नहीं की है कि बिल पार्लियामेंट में पेश हो। जबकि अपने चुनावी मंशूर (घोशणा पत्र ) में बीजेपी और अपनी चुनावी मीटिगों में वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी ने औरतों से वायदा किया था कि वह मरकज की सत्ता मंे आए, तो खातून रिजर्वेशन बिल जरूर पास होगा।

पार्लियामेंट और असम्बलियों में औरतों को 33 फीसद रिजर्वेशन मिले, इसके लिए मुल्क की ख्वातीन लंबे अर्से से जद्दोजेहद कऱ रही हैं। जैसे-तैसे खातून रिजर्वेशन बिल तैयार हुआ, तो पिछले बीस सालों से यह पार्लियामेंट में अटका हुआ है। साल 1996 में उस वक्त की एच. डी. देवगौड़ा सरकार में यह बिल पहली बार पेश किया गया, लेकिन कई मर्द मेम्बरान पार्लियामंेट की मुखालिफत के चलते बात आगे नहीं बढ़ी। इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में इसे दोबारा एवान के सामने रखा गया, लेकिन उन्हीं की पार्टी के कुछ मेम्बरान पार्लियामेंट और दीगर हलीफ पार्टियों की मुखालिफत की वजह से बिल पास नहीं हो पाया। आखिरकार खातून रिजर्वेशन बिल को साल 2010 में आकर ऊपरी सदन राज्यसभा से मंजूरी मिली। कांग्रेस वाली यूपीए सरकार के दौर में 9 मार्च, 2010 को बिल राज्यसभा में तो पास हो गया था, लेकिन लोकसभा में समाजवादी पार्टी, बीएसपी और राष्ट्रीय जनता दल जैसी पार्टियों की सख्त मुखालिफत की वजह से यह बिल पास नहीं हो पाया। तब से ही यह बिल पार्लियामेंट में अटका पड़ा हुआ है। जब भी इस बिल को पार्लियामेंट में लाने की बात होती है, तो ओबीसी लीडर बिल में यह कहकर अड़ंगा लगाते हैं कि इससे दलित, पिछड़े और अकलियती तबके की ख्वातीन को नुकसान होगा। वह चाहते हैं कि खातून रिजर्वेशन कोटे में इस तबके की औरतों का कोटा हो, जिससे उनकी मुनासिब नुमाइंदगी हो। बहरहाल ओबीसी की सियासत कहें या फिर मर्द इजारादारी वाली सियासत, खातून रिजर्वेेशन बिल अपने अंजाम तक नहीं पहुंच पा रहा है। इसमें कहीं न कहीं मर्दोें का वह डर भी शामिल है कि रिजर्वेशन के बाद एक-तिहाई मर्द असम्बलियों और पार्लियामेंट में नहीं पहुंच पाएंगे। बिल अमल में आने के बाद पार्लियामेंट में 263 और असम्बलियों में 1373 ख्वातीन आ जाएंगी। यानी पार्लियामेंट के दरवाजे इतने ही मर्दोें के लिए हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे। हालांकि बिल के मुताबिक औरतों की रिजर्व सीटें हर चुनाव में बदलतीं रहेंगी, लेकिन इससे कई मर्दाें के सियासी मुस्तकबिल पर असर तो पड़ेगा ही।

हमारा मुल्क दुनिया का सबसे बड़ा जम्हूरी मुल्क है, जहां एक अरब से ज्यादा की आबादी में से कोई 76 करोड़ वोटर अपनी सरकार चुनते हैं। लेकिन देश की सबसे बड़ी पंचायत यानी पार्लियामेंट में हमारी आधी आबादी औरतों की अगर नुमाइंदगी देखें, तो यह बारह फीसद से ऊपर नहीं पहुंच पाई है। अब तक हुए सोलह आम चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि पार्लियामेंट में खातून मेंम्बरान पार्लियामेटं की तादाद दहाई की दहलीज से सिर्फ एक बार आगे बढी है, वह भी सोलहवीं लोकसभा में। साल 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में 62 खातून उम्मीदवारों को जीत मिली थी, जिसके बाद चार और खातून मेम्बरान पार्लियामेंट पिछले तीन सालों के दौरान बाईएलक्शन के जरिए पहुंची हैं और खातून मेम्बरान  पार्लियामेंट की नुमाइंदगी 11.4 फीसद से फरवरी, 2016 में 12 फीसद हो गया। पार्लियामंेट में ख्वातीन का यह अब तक का सबसे ज्यादा आंकड़ा है। बावजूद इसके साठ करोड़ से अधिक की खातून आबादी वाले मुल्क, जिसमें 38 करोड़ से ज्यादा खातून वोटर हों, वहां 543 रूक्नी लोकसभा में उनका यह नुमाइंदगी सचमुच मायूसकुन है। जबकि सियासत ही एक ऐसा जरिया है, जिसका समाज के हर शोबे पर असर पड़ता है। कानून बनाने से लेकर मुल्क के लिए नई पालीसियां भी पार्लियामेंट से ही तय होती हैं।

इंटरनेशनल पार्लियामेंट्री यूनियन के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया में फिलवक्त 21.8 फीसद महिला सांसद मौजूद हैं। खास तौर से यूरोपीय देषों के अंदर संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व साल दर साल बढ़ता जा रहा है। वहीं एषिया और अरब देषों में लाख कोषिषों के बाद भी संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ने का नाम नहीं ले रहा। महिला सांसदों के औसत के लिहाज से भारत दुनिया में 111 वें पायदान पर है। यानी महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने के मामले में हमारे देश की सूरतेहाल काफी खराब है। इस मामले में तरक्की के कई शोबों में हमसे पिछड़े अफ्रीका के देश बेहतर पोजीशन में हैं। खातून की नुमाइंदगी के लिहाज से यह देश भारत के मुकाबले कहीं आगे हैं। आंकड़ो के लिहाज से देखें तो साल 1952 में हिन्दुस्तानी पार्लियामेंट में कुल 499 सीटों में से 22 पर ख्वातीन चुनी गई थीं, यानी 4.4 में चुनाव हुए, तो पार्लियामेंट में औरतों की तादाद और भी कम हो गई। 1977 के पार्लियामेंट्री एलक्शन में पार्लियामेंट के अंदर औरतों की तादाद 19 रह गई। यानी 3.4 फीसद, जो कि पार्लियामेंट में औरतों की अब तक की सबसे कम नुमाइंदगी है। जाहिर है जब औरतें पार्लियामेंट में पहुंच ही नहीं पातीं, तो उनकी सरकार में हिस्सेदारी कैसे होगी ? साल 1952 में चुनी गई देश की पहली सरकार में सिर्फ 4.4 थीं। यह आंकड़ा हालांकि धीरे-धीरे बढ़ रहा है। लेकिन आबादी के लिहाज से आज भी यह उतना नहीं बढ़ पाया है, जितना कि होना चाहिए। 1984 में चुनी गई मरकजी सरकार में खातून वजीरोें की तादाद 10 फीसद तक पहुंच गई। लेकिन यह आंकड़ा तब से लेकर अब तक यहीं अटका हुआ है। लाख कोशिशोें के बाद भी ना तो पार्लियामेंट में और ना ही मरकजी सरकार में औरतों की तादाद बढ़ पा रही है। राज्यसभा जो कि हमारी पार्लियामेंट का ऊपरी सदन होता है, वहां भी औरतों की नुमाइंदगी कभी हौसला अंफजा नहीं रही है। राज्यसभा में फिलवक्त 12.8 फीसद खातून मेम्बर हैं जो कि 22 फीसद के आलमी औसत से काफी कम है। यानी राज्यसभा में भी उनकी हिस्सेदारी ना के बराबर है। सत्ता में औरतों की नुमाइंदगी के तयीं अगर सियासी पार्टियां वाकई संजीदा होतीं, तो वह उन्हें राज्यसभा के जरिए पार्लियामेंट में पहुंचा सकती थीं। लेकिन यहां भी इन पार्टियों का मर्द तबका नहीं चाहता कि वह पार्लियामेंट में पहुंचें। क्योंकि अगर औरतें पार्लियामेंट में पहुंच गईं, तो उनकी सियासत में इजारादारी खत्म हो जाएगी। पार्लियामेंट में औरतों की कमजोर नुमाइंदगी की यह सूरत तब है, जब कांग्रेस, बीएसपी, तृणमूल कांग्रेस जैसी पार्टियों की कमान ख्वातीन बिलतरतीब सोनिया गांधी, मायावती, ममता बनर्जी के हाथों में है और यह लीडर फैसला लेने के मामले में अपनी पार्टियों में काफी असरदार रोल अदा करती हैं। यह खातून लीडर अगर चाहें तो अपनी पार्टियों में टिकट देने के मामले में औरतों की हिस्सेदारी बढ़ाने की पहल कर सकती हैं। लेकिन यह खातून लीडर लाख चाहकर भी अपनी पार्टियों को इस मसले पर तैयार नहीं कर पाई हैं। देश की अहम पार्टियों का अंदरूनी ढांचा और सोच कुछ ऐसी है कि वह नहीं चाहता कि पार्लियामेंट में औरतोें की नुमाइंदगी बढ़े। जब भी पार्लियामेंट में खातून रिजर्वेशन की बात होती है, तो इन पार्टियों के लीडरान बेवजह के सवालों से रिजर्वेशन के जरूरी मुद्दे को पीछे धकेल देते हैं। जाहिर है पार्लियामेंट में औरतों की नुमाइंदगी तभी बढ़ेगी, जब खातून रिजर्वेशन   बिल को मंजूरी मिलेगी। खातून रिजर्वेशन बिल पार्लियामेंट में कई दहाइयों से अटका पड़ा हुआ है, अब वक्त आ गया है कि यह बिल इत्तेफाके राय से पास हो। पार्लियामेंट में औरतों की हिस्सेदारी बढ़ेगी, तो न सिर्फ हमारे समाज में औरतों की सूरतेहाल बेहतर होेगी, बल्कि पूरा समाज और देश की हालत और भी बेहतर होगी। बिल, वुमेन इमपावरमेट  की सिम्त में एक अहम कदम साबित होगा। समाज में चाहे कोई सा भी शोबा हो औरतों के तयीं कई रूकावटें मौजूद हैं और यह रूकावटें दिन ब दिन बढ़ती जा रही हैं। यह रूकावटें तभी दूर होंगी, जब औरतें खुद सत्ता में होंगीं।