हिन्दुत्व के बहाने संघवादफ थोपने की कोशिश

हिन्दुत्व के बहाने संघवादफ थोपने की कोशिश

अखिलेश मिश्र यादगारी में आरएसएस के खौफनाक इरादों पर रौशनी डाली गई

 

लखनऊ! राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने पिछले सौ साल में समाज में जो जहर घोला है उसके असरात को हर कहीं और हर शोबे में शिद्दत से महसूस किया जाने लगा है। हिन्दुत्व के बहाने जो बातें आरएसएस और उसकी जेली तंजीमों की जानिब से उछाली जाती हैं उनका हिन्दुत्व से कोई ताल्लुक नहीं है। यह मसंघवादफ हैै। संघवाद दरअस्ल खौफ और नफरत की सियासी मशीन है और संघ कुन्बा पूरे मुल्क पर यही संघवाद थोप कर स्वर्ण तबके की बालादस्ती (वर्चस्व) कायम करना चाहता है। स्वर्ण वादी ताकतें हिन्दुत्व की शक्ल में स्वर्ण, हिन्दी जबान का हिन्दुत्व थोपना चाहती है। आरएसएस के लोगों ने हिन्दूराष्ट्रवाद की जगह मसांस्कृतिक राष्ट्रवाद और अध्यात्मिक लोकतन्त्रफ (सकाफती कौमपरस्ती और रूहानी जम्हूरियत) पर अपने को मरकूज किया है। वह सकाफती कौम परस्ती और सकाफत की बात करते हैं लेकिन मसंस्कृतिफ से उनका मकसद हिन्दुत्व से जुड़ी रिवायात से होता है और वह वेदों से हवाले लेकर लोगों की हिमायत पाना चाहते हैं। इन ख्यालात का इजहार पिछले दिनों महिन्दुस्तान के कुछ तसव्वुर और हमारा समाजफ मौजूअ पर सेंटर फार द स्टडी आफ डेवलपिंग सोसाइटीज के प्रोफेसर आदित्य निगम और जवाहर लाल नेहरू युनिवर्सिटी की प्रोेफेेसर नवेदिता मेमन ने मशहूर सहाफी अखिलेश मिश्र की याद में अकादमी आफ रिसर्च टे©ंनिंग एण्ड ह्यूमन एक्शन और अखिलेश मिश्र ट्रस्ट के जेरे एहतमाम कैफी आजमी अकादमी के हाल में एक प्रोग्राम में किया।

प्रोफेसर आदित्य निगम ने कहा कि राष्ट्रवाद का नारा बुलंद करने वाले वह हैं जिनका जंगे आजादी की तहरीक में कोई हिस्सा नहीं है और आज जिस आईन (संविधान) को मुकद्दस तरीन दस्तावेज बताते नहीं थक रहे हैं उस आईनसाजी से उनका दूर का भी वास्ता नहीं रहा। मुल्क अंगे्रजों की गुलामी से जल्द ही आजाद होगा इसकी आहट सुनाई देने लगी थी तो उसी वक्त आजाद हिन्दुस्तान का अपना आईन हो इसकी बात भी शुरू हो गई थी। मुल्क को आजाद कराने की लड़ाई मंे मुख्तलिफ धारों के लोग शामिल थे बस एक ही धारा ऐसी थी जो आजादी की लड़ाई से दूर रही उस धारे ने मुल्क का अपना आईन हो इसमें भी कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। यही एक धारा ऐसी थी जिससे वाबस्ता कोई शख्स आईन साज कौंसिल में शामिल नहीं हुआ। क्यांेकि उनका सेक्युलर और जम्हूरी आईन पर कोई यकीन ही नहीं था। उसी धारे के लोग आज जब एक्तेदार में आए हैं तो आईन को एक मुकद्दस दस्तावेज बताकर उसके सहारे मसंघवादफ को नाफिज करने में मसरूफ अमल दिखाई दे रहे हैं। वह इसके लिए हिन्दुत्व का सहारा ले रहे हैं। जबकि उनका हिन्दुत्व वह नहीं है जो आम हिन्दुओं से ताल्लुक रखता हो। उनके हिन्दुत्व में स्वर्ण बालादस्ती पोशीदा है। उन्होने कहा कि शुरू से ही हिन्दुओं में अपनी गिरफ्त मजबूत करने के लिए आरएसएस ने खौफ और नफरत की सियासत को तरजीह दी। 1992 के बाद तो उसने नफरत की आग लगाने का सिलसिला जारी रखा है। जबकि सेक्युलर ताकतें सिर्फ उस आग को बुझाने में ही लगी रहीं और संघ के लोग समाज में नफरत पैदा करते रहे। मुल्क के आज जो हालात हैं वह इसी का नतीजा है कि आपसी मेल मिलाप को बढावा देने वाली ताकतों की तवानाई आग बुझाने में ही लगी रही। समाज में भाईचारा कायम करने के लिए तवील मुद्दती लायहा ए अमल को अख्तियार करने की जरूरत थी और ऐसे नेटवर्क को समाज केे हर तबके तक वुसअत देना दरकार थी। मुल्क मंे अम्न व अमान, भाईचारा और आपसी मेेलमिलाप के लिए जमीनी सतह पर मुहिम चलाना बहुत जरूरी हो गया है। उन्होेने कहा कि आज मुल्क जातवाद की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है। कम्युनिस्टों को आगे बढकर जातवाद को खत्म करने में अहम रोल अदा करना चाहिए।

जवाहर लाल नेहरू युनिवर्सिटी में प्रोफेसर नवेदिता मेमन ने अपने खिताब में कहा कि अगरचे सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में हिन्दुत्व को तर्जेजिंदगी से ताबीर किया है लेकिन हमारे मुल्क में किसी एक तरह का हिन्दुत्व नहीं है। हिन्दुत्ववादी ताकतें हिन्दुत्व की शक्ल में स्वर्ण, हिन्दी लसानी (भाषई) हिन्दुत्व को थोपना चाहती हैं। लेकिन हमारे मुल्क में हिन्दुत्व के नाम पर अलग-अलग इलाकों, मंतिकों और खित्तों मेे ऐसे जुदा-जुदा रस्म व रिवाज और रिवायात हैं जो बाहम मुतजाद (परस्पर विरोधाभासी) हैं। उन्होने कहा कि यह हिन्दुत्व की ऐसी रिवायात का मुल्क है जहां कही पर महिषासुर को असुर माना जाता है तो कहीं उसकी पूजा होती है। कहीं दुर्गा पूजा में ब्रत रखा जाता है तो कहीं गोश्त खाया जाता है। उन्होेने कहा कि जो हिन्दुत्व देश पर थोपना चाहते हैं उन्हें यह भी सोचना होगा कि वह किस हिन्दुत्व का इंतखाब करेंगे? हमारा मुल्क ऐसी मुख्तलिफ रसूम व रिवाज व रिवायात से मिलकर बना है।

प्रोग्राम की सदारत करते हुए प्रोफेसर शारिब रूदौलवी ने कहा कि हमें बताया गया था कि इंसानियत सबसे बड़ा मजहब है। लेकिन ऐसा बताने वाले धीरे-धीरे कम होते गए इससे नए समाज का ख्वाब भी धीरे-धीरे खत्म होता गया। साबिक वजीर और बुजुर्ग लीडर अम्मार रिजवी ने कहा कि अब तक सियासी पार्टियों ने मुसलमानों को वोट बंैक की तरह इस्तेमाल किया है इसे समझने की जरूरत है। अगर समाज में अम्न व अमान रखना है तो सियासी पार्टियों को अपने तर्जे अमल और नजरियात मे तब्दीली लाना होगी। उन्होने कहा कि आज लोगों में सच सुनने की आदत नहीं है। हमारे जैसे सेक्युलर लोगों ने ही इस मसले को बढाया है। इसलिए पुरानी चीजों को भूल कर आगे बढना चाहिए। प्रोग्राम की निजामत लखनऊ युनिवर्सिटी के साबिक प्रोफेसर रमेश दीक्षित ने की। इस मौके पर शहर की अदबी और सकाफती शख्सियतों के साथ समाजी कारकुनों की बड़ी तादाद मौजूद थी।