भूकों, अनपढों और गुलामों का – न्यू इण्डिया बना रहे हैं मोदी

भूकों, अनपढों और गुलामों का – न्यू इण्डिया बना रहे हैं मोदी

हर शोबे (क्षेत्र) में नाकाम मरकजी सरकार, बीजेपी और आरएसएस को मजहबी लफ्फाजी का सहारा

”भूक से परेशान अवाम वाले 119 मुल्कों में हिन्दुस्तान 100वें नम्बर पर, दुनिया में माडर्न गुलामों की कुल तादाद का पांचवां हिस्सा हिन्दुस्तान में है। मुल्क की युनिवर्सिटीज में  40 से 75 फीसद तक टीचिंग स्टाफ की कमी, युनिवर्सिटी ग्राण्ट कमीशन में चेयरमैन, डिप्टी चेयरमैन और सेक्रेटरी तीनों अहम ओहदे खाली। भुकमरी और बेरोजगारी में और भी ज्यादा इजाफे का खतरा। इन हकायक (वास्तविक्ताओं)  के दरम्यान नरेन्द्र मोदी 130 करोड़ लोगों को दिखा रहे हैं मन्यू इण्डियाफ का ख्वाब।“

 

”संस्कृत के नाम पर किस्म-किस्म के ड्रामे। बनारस की सम्पूर्णानन्द संस्कृत युनिवर्सिटी को सालों से नहीं मिली ग्राण्ट। प्रोफेसर्स और टीचर्स की आधे से ज्यादा असामियां खाली, टीचिंग स्टाफ, नान टीचिंग स्टाफ और तलबा (विद्यार्थी) अगलग-अलग किस्म के मतालबात के लिए लम्बी मुद्दत से धरने पर। हास्टल्स की हालत  जानवरों के कांजी हाउस से बदतर, स्वच्छता अभियान का मुल्क भर में ड्रामा संस्कृत युनिवर्सिटी के शौचालयों में दरवाजे तक नहीं। यह हाल है खुद को गंगा का बेटा बताने वाले मोदी के अपने चुनावी हलके का, किस बुनियाद पर हो रहा है मविश्व गुरू बनने का दावाफ?“

 

”हर मैदान में नाकाम मोदी और उनकी फौज कांग्रेस लीडरान पर जाती हमले करने पर उतरी। मोदी, अमित शाह और उनकी बड़बोली वजीर स्मृति ईरानी राहुल गांधी पर इल्जाम लगाती फिर रही हैं कि उन्हें मोदी सरकार का विकास दिख नहीं रहा है लेकिन खुद भी विकास के काम गिनवा नहीं पा रहे है।। अब तो मोदी जवाहर लाल नेहरू की गुजरात से मुबय्यना (कथित) नफरत भी तलाश कर लाए हैं। अपनी कामयाबियां तो कोई बयान करने लायक हैं नहीं इसलिए नेहरू से राहुल गांधी तक के कांगे्रसी लीडरान पर जाती हमले शुरू कर दिए, लेकिन देश के लोग सब देख रहे हैं।“

 

नई दिल्ली! सत्तर सालों में मुल्क में जो नहीं हुआ वह अब मैं नरेन्द्र मोदी कर रहा हूं, अपनेे इस दावे को साबित करने के लिए मोदी ने नाख्वांदगी (अशिक्षा), भुकमरी, बेरोजगारी और गरीबी के बावजूद महज गलत बयानी यानी झूट, जुमलेबाजी और लफ्फाजी के जरिए मन्यू इण्डियाफ बनाने की ठान ली है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2017 की रिपोर्ट के मुताबिक भुकमरी का शिकार 119 मुल्कों में हिन्दुस्तान सौवें नम्बर पर पहुच गया है। 2014 में नरेन्द्र मोदी ने मुल्क की बागडोर संभाली थी। उस वक्त भारत 55वें नम्बर पर था। मतलब यह कि मोदी की तीन साल की हुकूमत में मुल्क ने जो चैतरफा तरक्की की है भुकमरी उसी का नतीजा है। हर वक्त विकास-विकास का झूटा नारा लगाने वाले नरेन्द्र मोदी ने भले ही अपने नजदीकी कारपोरेट घरानों को लूट की खुली छूट दे दी हो, रामदेव जैसे योग व्यापारी ने बेईमानी और खुली लूट के जरिए अपनी जायदाद में 186 फीसद का इजाफा कर लिया हो, रामदेव के साथ रहने वाला लावारिस नेपाली बच्चा बालकृष्ण 43 हजार करोड़ का मालिक बनकर मुल्क के सौ दौलतमंदों की फेहरिस्त मंे उन्नीसवें नम्बर पर पहुच गया हो, मुल्क का आम आदमी तो भुकमरी का ही शिकार हुआ है। इसीलिए भुकमरी का शिकार 119 मुल्कों की फेहरिस्त में मोदी सरकार के तीन सालों में ही भारत 55वें नम्बर से 100वें नम्बर पर पहुच गया। हर तरफ तबाही व बर्बादी के बावजूद मोदी की गलत बयानियां (झूट) जारी हैं। पटना युनिवर्सिटी के जलसे मंे उन्होेने एक बार फिर जुमलेबाजी करते हुए कह दिया कि दस हजार करोड़ रूपयों से मुल्क की बीस युनिवर्सिटियों को इण्टरनेशनल सतह की युनिवर्सिटी बना दिया जाएगा। बगैर किसी बजटरी प्रोवीजन के उन्होने इतना बड़ा झूटा एलान कर दिया। मुल्क की तालीम की सतह (स्तर) इस सरकार ने इस हद तक गिरा दी है कि मरकजी वजीर रविशंकर प्रसाद को मजबूरन अपनी बेटी दिव्या को सिर्फ एमबीए कराने के लिए अमरीका भेजना पड़ा। अगर मुल्क में एक भी कालेज या युनिवर्सिटी स्टैण्डर्ड की होती तो शायद रविशंकर प्रसाद को मोटी रकम खर्च करके अपनी बेटी को अपने से दूर सात समन्दर पार न भेजना पड़ता। मुल्क की युनिवर्सिटीज में चालीस से सत्तर फीसद तक प्रोफेसर्स और लेकचरार की जगहें खाली पड़ी हैं। मुल्क की तहजीबी जुबान संस्कृत की तालीम के लिए बनारस में डाक्टर सम्पूर्णानन्द संस्कृत युनवर्सिटी समेत सिर्फ दो इदारे हैं दोनों को तीन-चार सालों से ग्राण्ट नहीं मिली है। आला तालीम (उच्च शिक्षा) का बंदोबस्त देखने वाले इदारे युनिवर्सिटी ग्राण्ट कमीशन में चेयरमैन, डिप्टी चेयरमैन और सेक्रेटरी तक के ओहदे तीन साल से खाली पड़े हैं। यूनाइटेड नेशन्स के इण्टरनेशनल लेबर आर्गनाइजेशन  और आस्टे©ंलिया के वाकफ्री फाउण्डेशन ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि दुनिया भर में इस वक्त 40 मिलियन माडर्न गुलाम हैं इनमें 25 मिलियन एशियाई मुल्कों में हैं जिनमें 14 से 18 मिलियन सिर्फ हिन्दुस्तान में रहते हैं यानी दुनिया भर के गुलामों मंे तकरीबन आधे हिन्दुस्तान में हैं। समाज और तालीम की इस संगीन सूरतेहाल के बावजूद नरेन्द्र मोदी मन्यू इण्डियाफ बनाने की लफ्फाजी कर रहे हैं। क्या मुल्क की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठे शख्स को इस तरह झूट बोलकर मुल्क को गुमराह करना चाहिए?

मुल्क में भुकमरी का शिकार और नए जमाने की गुलामी का शिकार बन चुके लोगों की तादाद में मुसलसल इजाफा ही होता जा रहा है। इसके बावजूद वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी कभी इन लोगों की बात नहीं करते। खुद मोदी उनकी बीजेपी के सदर अमित शाह और बड़बोली वजीर स्मृति ईरानी बार-बार यह बयानबाजी तो कर ही रही हैं कि कांगे्रस और राहुल गांधी को मविकासफ से चिढ है हमारी सरकार ने विकास के जो काम किए हैं वह राहुल गांधी को दिखाई नहीं देते लेकिन यह लोग यह नहीं बताते कि विकास के क्या-क्या काम हुए हैं अगर राहुल गांधी को विकास के काम नहीं दिखते यह लोग खुद वह काम गिनवाते क्यों नहीं हैं? अब तो गुजरात का एलक्शन सर पर आ गया तो मोदी बताने लगे हैं कि जवाहर लाल नेहरू से राहुल गांधी तक सभी ने हमेशा गुजरात से नफरत की है। वह यह दावा भी करने लगे हैं कि नेहरू ने वल्लभ भाई पटेल, महात्मा गांधी और मोरारजी देसाई जैसे गुजरात के सपूतों की हमेशा तौहीन की। शायद वह यह कहना भूल गए कि नेहरू ने गुजरात के ही एक सपूत मोहम्मद अली जिनाह को मुल्क का पहला वजीर-ए-आज न बनने दे कर मुल्क की तकसीम करा दी थी।

मोदी के दौर में भारत में भुकमरी के मामलात मंे मुसलसल इजाफा ही होता रहा है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के जिन 119 मुल्कों में भुकमरी का मसला है उनमें भारत आज सौवें नम्बर पर है। 2014 में मोदी सरकार बनी उस वक्त मुल्क 55वंें नम्बर पर था। 2015 में खिसक कर 80वें नम्बर पर, 2016 में 97वंे नम्बर तो इस साल 2017 में 100वें नम्बर पर पहुच चुका है। खबर लिखे जाने के दौरान झारखण्ड से खबर आई कि सिमडोगा में एक परिवार एक हफ्ते से भूका था नतीजा यह हुआ परिवार की ग्यारह साल की एक बेटी संतोष कुमारी की भूक से मौत हो गई। सुप्रीम कोर्ट के आर्डर के बावजूद नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार पर आधार कार्ड का जो भूत सवार है उससे भी संगीन मसायल पैदा हो रहे हैं। झारखण्ड के फूड मिनिस्टर सरयू राय ने संतोष कुमारी की मौत पर कहा कि उसके परिवार के पास जो राशन कार्ड है उसमें उसका नाम भी दर्ज है लेकिन जुलाई से उस राशन कार्ड पर कोई राशन इस लिए नहीं दिया गया कि वह आधार कार्ड से जुड़ा हुआ नहीं था।

मुल्क में बडे़ पैमाने पर भुकमरी है, मजदूरों को गुलामों की तरह रखने के रिवाज में इजाफा हो रहा है, डिग्री कालेजों और युनिवर्सिटियों में लेक्चरार व प्रोफेसर्स न होने की वजह से नौजवान तालीम हासिल नहीं कर पा रहे है, बेरोजगारी में बेतहाशा इजाफा हो रहा है और आधार कार्ड को हर शोबे (क्षेत्र) में लाजमी बनाए जाने से लोगों को तरह-तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। यह तमाम बातें सद फीसद (100ः) सच है। इस बात का सबूत यह है कि मोदी सरकार की जानिब से इनमें से किसी भी खबर की तरदीद (खण्डन) नहीं की जा रही है। अगर इनमें से एक बात भी गलत होती मोदी और उनकी फौज आसमान सर पर उठा लेती।

मुल्क में इस वक्त पैदा होता हर पांचवां बच्चा या तो मौत के मुंह में चला जाता है या फिर संगीन मरज में मुब्तला हो जाता है। वजह यह है कि हमल (गर्भ) के वक्त उसको जनम देने वाली खातून को न तो पेट भर खाना मिलता है और न ही मुनासिब गिजा। ग्लोबल हंगर इंडेक्स के सर्वे में सिर्फ इस पहलू को ही नहीं देखा जाता है कि कितने लोगों को खाना मयस्सर (उपलब्ध) नहीं है। यह भी देखा जाता है कि जो खाना मिलता है उसकी क्वालिटी कैसी है। भारत सरकार और प्रदेश सरकारें हर साल जच्चा-बच्चा की सेहत से मुताल्लिक तरह-तरह की स्कीमों का एलान तो करती है। इन स्कीमांे को जमीनी सतह पर उतारने की जिम्मेदार एजेंसियां और सरकारी मोहकमें हकीकत में कितना काम करते हैं इसकी निगरानी का सिस्टम बहुत ही कमजोर और नाकिस है जिसकी वजह से हामिला (गर्भवती) ख्वातीन को न तो जरूरी इलाज मिल पाता है न ही माकूल गिजा। ऐसी सूरत में कमजोर और मालन्यूट्राइड बच्चे पैदा होते हैं। यह बच्चे पांच साल की उम्र पूरी करते-करते तरह-तरह के अमराज (बीमारियों) का शिकार हो जाते हैं। तकरीबन 20-25 फीसद बच्चे तो अपना पांचवां जन्म दिन देखने से पहले ही मौत के मुंह में चले जाते हैं जो बचते हैं वह तनदुरूस्त नहीं होते। लगता है सरकारों को इसकी कोई फिक्र नहीं है। मुल्क की तरक्की का पैमाना भी इंसानी वसायल (मानव संसाधन) के बजाए कंक्रीट के जंगलांें, सड़कों, सारफीन (उपभोक्ता) बाजारों और कारों व मोटर साइकिलों की भीड़ को ही  समझ लिया गया है।

गुजिश्ता उन्नीस सितम्बर को इण्टरनेशनल लेबर आर्गनाइजेशन (आईएलओ) और वाक फ्री फाउंडेशन (डब्ल्यूएफएफ) के इश्तेराक से एक रिपोर्ट जारी की गई है जिसमें कहा गया है कि इस सारी दुनिया में करीब छियालीस मिलियन लोग जदीद गुलामों की जिंदगी जीने को मजबूर हैं जिसमें चैदह मिलियन से अट्ठारह मिलियन तक जदीद गुलाम सिर्फ हिन्दुस्तान में पाए जाते हैं। यह रिपोर्ट मैजूदा मोदी सरकार के दावों की पोल पट्टी खोलती है मगर सरकार उसकी एजेसियां जदीद गुलामी से मुताल्लिक ऐसे आंकडे़ को मानने से इंकार कर रहे हैं। इंटेलीजेंस व्यूरो ने इस सिलसिले में पीएमओ, नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर, वजारते खारजा, लेबर मिनिस्ट्री को एक नोट भेजकर इस रिपोर्ट के बारे में कहा है कि इस रिपोर्ट से मुल्क की साख को नुक्सान पहुच सकता है और इसकी वजह से मुल्क ने तरक्की का 8.7 शरह का जो निशाना हासिल करने का मंसूबा बनाया है उसपर बहुत बुरा असर पड़ सकता है। हिन्दुस्तान मंे जदीद गुलामों के चैदह से अटठारह मिलियन तक होने का अंदाजा लगाने वाली एजेंसी कह रही है कि उसने जदीद गुलामी का पता लगाने के लिए जो तरीका अख्तियार किया है वह ठीक है और जो तरीके की तंकीद कर रहे हैं वही उसका हल या कम से कम मुतबादिल बताएं। जिस एजेंसी ने जदीद गुलामी के सिलसिले मंे दुनिया भर में सर्वे किया है उसके मुताबिक एशिया  पैसफिक खित्ते में जदीद गुलामों की सबसे ज्यादा तादाद पाई जाती है। इसमें तीस मिलियन की ऐसी आबादी है जबकि अटठारह मिलियन के करीब हिन्दुस्तान में बसते हैं।

मोदी के मुल्क के तरक्की करने के दावों की कलई एक और रिपोर्ट उतारती  नजर आती है और यह रिपोर्ट गैर मुल्की एजेसी की जानिब से नहीं तैयार की गई है बल्कि नेशनल सैम्पल सर्वे की तैयार की हुई है। नेशनल  सैम्पल सर्वे की 69वीं राउंड रिपोर्ट कह रही है कि मुल्क की बहुत बड़ी आबादी जेल कैदियों से भी बदतर जिंदगी गुजारने पर मजबूर है। उनके पास रहने के लिए जमीन और मकान तक नहीं है। नेशनल सैम्पल सर्वे जो मुख्तलिफ शोबोें अवामी जिंदगी का सर्वे वक्त-वक्त पर करता रहता है। उसकी हर रिपोर्ट हुकूमत को आइना दिखाती हैं और उसके दावों की कलई खोलती है। ताजा सर्वे भी कुछ इसी तरह का है जो देहातों और शहरों में लोगों की जिंदगी गुजारने से मुताल्लिक है। सर्वे में कहा गया है कि मुल्क के ज्यादातर शहरी जिन मकानों में जिंदगी गुजारते हैं उनकी हालत काबिले रहम है। सर्वे की रिपोर्ट में ऐेसे लोगों का मुवाजना जेलों से किया गया है और उसके लिए जेल मैनुअल को माडल बनाया गया है। जेल मैनुअल के मुताबिक कैदियों को 96 स्क्वायर फुट जगह मुकर्रर है जबकि गरीब आबादी का बीस फीसद से ज्यादा हिस्सा देहातों में 78 स्क्वायर फुट शहरों में 75 स्क्वायर फुट में जिंदगी गुजारने को मजबूर है। इससे जाहिर होता है कि हम तरक्की के चाहे जितने दावे करें जमीनी हकीकत खुद को  चिढाती नजर आती है। ऐसा लगता है कि मोदी हुकूमत ने मुल्क के गरीबों और उनकी हालते जार के बारे में सोचना ही छोड़ दिया है। मीडिया में और सरकारों में बात मुल्क के अमीरों और कार, मोटर साइकिलें  और स्मार्ट फोन खरीदने वालों की होती है और यह बताने की कोशिश की जाती है कि अगर मुल्क मंे गुरबत होती लाखांे कारें और मोटर साइकिलें और लाखों स्मार्ट फोन और करोड़ों मोबाइल फोन क्यों कर खरीदे जाते। बाजार ने लोगों को मोबाइल फोन का इस कदर आदी बना दिया है कि फटेहाल रहने के बावजूद उनके हाथों मेें मोबाइल फोन जरूर दिखाई देता है।जोजाजोज