नोटबंदी, जीएसटी से देश में तबाही

नोटबंदी, जीएसटी से देश में तबाही

अपनी जिद पर अड़े नरेन्द्र मोदी के फैसले ने छोटी और मंझोली सनअतों व व्यापार को बंद कराया

 

”वजीर-ए-आजम मोदी कहते हैं कि हाल (वर्तमान) के लिए वह मुल्क के मुस्तकबिल (भविष्य) को खराब नहीं करेंगे। सत्तर साल में वह मुल्क के पहलेे प्राइम मिनिस्टर हैं जो अवाम की लाशों और हड्डियों पर मुल्क के मुस्तकबिल का महल खड़ा करना चाहते हैं। उन्हें यह ख्याल नहीं है कि जिस मुल्क और कौम का हाल (वर्तमान) ही बर्बाद हो जाएगा वह मुस्तकबिल बनाने में कभी कामयाब नहीं हो सकता है। मआशी (आर्थिक) हालात ठीक न हुए तो हाल और मुस्तकबिल दोनों ही बर्बाद ही होंगे।“

”खुदरा महंगाई की शरह (दर) पांच महीनों में सबसे ऊपर गई है, खरीफ की फसलों में 45 लाख टन से ज्यादा की गिरावट सरकार खुद तस्लीम कर रही है, कांस्ट्रक्शन और प्रापर्टी व्यापार बंद हो चुका है, हर तरह के बाजारों में चालीस से सत्तर फीसद तक की गिरावट दर्ज की जा चुकी है, छः महीनों में डेढ करोड़ से ज्यादा लोग बेरोजगारी का शिकार हो चुके हैं, मुल्क में काश्तकारी के बाद सबसे बड़ा कपड़ा व्यापार तबाही के दहाने पर है। इन्हीं बुनियादों पर मोदी मुल्क का मुस्तकबिल बनाने का दावा कर रहे हैं।“

”खबर है कि नवम्बर के आखिर से अगले साल दिसम्बर तक मोदी और जेटली एक-एक, दो-दो करके कुछ सामानों पर लगा जीएसटी कम करेंगे ताकि दिसम्बर से अगले अगस्त तक होने वाले गुजरात समेत आठ प्रदेशों के असम्बली एलक्शन में और फिर अप्रैल-मई 2019 के लोक सभा में इसका फायदा उठा सकें। उन्हें वोटों का कितना फायदा होगा यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा लेकिन अगले छः महीनों मे अवाम के लिए तबाही आ चुकी होगी।“

 

नई दिल्ली! शादियों का मौसम सर पर लेकिन दिल्ली के चावड़ी बाजार और सदर बाजार में सन्नाटा, सर्राफा बाजार की रौनक लौटने का नाम नहीं ले रही, रेडीमेड कपड़ों के बाजार में बिक्री में 45 फीसद की गिरावट, कपड़ा बाजार का कारोबार भी आधा रह गया, जयपुर और पूरे राजस्थान में ग्रेनाइड समेत माइनिंग के बाजार में बिक्री सिर्फ तीन फीसद, टेक्सटाइल मार्केट उजड़ा सा नजर आने लगा। देश के सबसे बड़े कपड़ा बाजार सूरत में व्यापार एक-चैथाई ही बचा, मजदूरों और रोजमर्रा कमाने खाने वालों के सामने पेट पालने का मसला। मुरादाबाद ब्रासवेयर एक्सपोर्ट एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी का दर्द कि ब्रासवेयर बाजार का कारोबार सिर्फ चालीस    फीसद बचा है वह भी कब तक बचा रहेगा कोई नहीं जानता। देश की मआशी (आर्थिक) राजधानी कही जाने वाली मुंबई में हीरा व्यापारी घर बैठने को मजबूर शहर के बडे़ व्यापारियों की हालत तो खराब ही है सड़कों के किनारे के छोटे होटलों में चाय और बड़ा पाव बेचने वालों का रोना है कि उनका कारोबार आधा रह गया है। आला तालीम के लिए 13 से 15 फीसद शरह सूद (व्याजदर) पर कर्ज लेकर कालेजों में दाखिला कराने वाले तलबा (विद्यार्थियों) की फीस पर 28 फीसद की जीएसटी की मार, लोहा मण्डियों में सन्नाटा, कांस्ट्रक्शन बदं होने से सीमेंट, स्टील बिजली और हार्डवेयर मार्केट बंद होेने के कगार पर, डेढ करोड़ से ज्यादा मजदूरों और कामगारों की रोजी छिन गई। यह है वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी की नोटबंदी और जीएसटी लगाए जाने का नतीजा। इसके बावजूद वजीर-ए-आजम मोदी कह रहे हैं कि हाल (वर्तमान) ठीक रखने के लिए वह मुल्क के मुस्तकबिल (भविष्य)को खतरे में नहीं डालना चाहते है। मुल्क के मआशी (आर्थिक) हालात पर फिक्र और तशवीश जाहिर करने वाले एकोनामिस्ट का मजाक उड़ाते हुए उन्होने कह दिया कि कुछ लोगों को मायूसी (निराशा) फैलाने में मजा आता है। नाम लिए बगैर वह यशवंत सिन्हा, अरूण शोरी, पी. चिदम्बरम और डाक्टर मनमोहन सिंह जैसे लोगों केा मआशी मामलात में बेवकूफ बताने की कोशिश करते दिखे। मआशी (आर्थिक) मामलात से पूरी तरह नावाकिफ वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी ने अपनी जिद की वजह से पहले पांच सौ और एक हजार के नोट बंद करने का तुगलकी फरमान जारी किया। जिससे मुल्क की सनअतों और व्यापार पर बहुत बुरा असर पड़ा फिर सात महीने बाद ही आधी अधूरी तैयारी के साथ जीएसटी लगवा कर मुल्क की छोटी और मंझोली सनअतों, उद्योगों व व्यापार का पूरी तरह गला ही घोंट दिया। गुजिश्ता चन्द महीनों में ही तकरीबन डेढ करोड़ नौजवानों का रोजगार छिन चुका है। हर तरह की छोटी-बड़ी सनअतों और व्यापार का साठ फीसद से ज्यादा काम बंद हो चुका है। इसके बावजूद मुल्क के मुस्तकबिल के साथ खिलवाड़ करने पर तुले नरेन्द्र मोदी न तो अपनी जिद छोड़ रहे हैं और न ही किसी माहिरे मआशियात (अर्थशास्त्री) का मश्विरा सुनने को तैयार हैं। वजीर-ए-आजम बनने के बाद से वह बार-बार कहते रहे हैं कि सत्तर सालों में मुल्क मे कुछ नहीं हुआ, सत्तर सालों मंे उन जैसा वजीर-ए-आजम भी मुल्क को नहीं मिला। अब उनकी बात सच साबित हो रही है। सत्तर सालों में वह मुल्क के पहले वजीर-ए-आजम हैं जो जानबूझ कर मुल्क को तबाही की जानिब ले जा रहा है। इससे पहले किसी प्राइम मिनिस्टर ने ऐसा नहीं किया था।

डाक्टर मनमोहन सिंह, अमत्र्य सेेन, पी. चिदम्बरम, अरूण शोरी, सुब्राहमण्यम स्वामी, यशंवत सिन्हा के अलावा ब्रिटिश और अमरीकी एक्नामिस्ट ने भी हिन्दुस्तान के मआशी (आर्थिक) हालात के और ज्यादा खराब होने का खतरा बताया। वजीर-ए-आजम मोदी ने सभी की बातों को तंज और मजाक मंे उड़ा दिया। चार अक्टूबर को एक तरफ मोदी कह रहे थे कि उनके कामों से भारत का मुस्तकबिल रौशन होगा तो उसी दिन रिजर्व बैंक आफ इंडिया में उन्हीं के बिठाए हुए गवर्नर उर्जित पटेल भी कह रहे थे कि मुल्क की जीडीपी के अभी और नीचे जाने और मआशी हालात के खराब होने का खतरा है। इन तमाम लोगांे की बातों को मोदी किसी भी हालत में सुनने को तैयार नहीं हैं। क्योंकि उनके दिमाग में तो यह गुरूर भरा हुआ है कि सत्तर सालों में उनसे ज्यादा काबिल वजीर-ए-आजम इस मुल्क को कभी मिला ही नहीं है। वह जो कुछ कर और कह रहे हैं वही ठीक है। बाकी पूरी दुनिया जाहिलों जैसी बातें करती है। जिसकी उन्हें कोई परवा नहीं है।

नोटबंदी और फिर जीएसटी का बहुत बुरा असर काश्तकारों पर भी पड़ा है। नरेन्द्र मोदी सरकार की ही वजारते जराअत (कृषि मंत्रालय) का अंदाजा है कि इस साल खरीफ की फसल में चालीस लाख टन गल्ला कम पैदा होगा। सिर्फ धान की ही पैदावार में बीस लाख टन की कमी का अंदाजा जराअत मिनिस्ट्री ने लगाया है। मिनिस्ट्री की इत्तेला के मुताबिक सिर्फ धान (चावल) ही नहीं दालों और तिलहन की पैदावार में भी काफी बड़े पैमाने पर कमी होने का अंदेशा है। फसलों की कमी का सीधा असर मुल्क की जीडीपी  पर पड़ने वाला है। एक छत्तीसगढ ही अकेला प्रदेश है जहां के सत्ताइस में से बीस जिले खुश्कसाली (सूखे) का शिकार मान लिए गए हैं। धान का कटोरा कहे जाने वाले इस प्रदेश में दस-बीस हजार टन धान भी पैदा नहीं हुआ है। छत्तीसगढ के काश्तकारों ने पहले नोटबंदी की मार झेली अब खुश्कसाली (सूखे) का शिकार हो गए हैं।

सनअती शरह तरक्की (औद्योगिक विकास दर) में सबसे ज्यादा गिरावट गुजिश्ता पांच महीनों में आई है। जुलाई में यह शरह सिर्फ 1.2 फीसद दर्ज की गई थी जबकि गुजिश्ता साल इसी मुद्दत मंे सनअती शरह तरक्की 4.5 फीसद थी। कांस्ट्रक्शन और प्रापर्टी मार्केट में कोई सुधार होने के बजाए मुसलसल गिरावट ही दर्ज की जा रही है। कांस्ट्रक्शन शोबे (क्षेत्र) में गिरावट की एक बड़ी वजह ईंटों, मौरंग और बालू जैसे सामानों की आसमान छूती कीमतें हैं ऊपर से जीएसटी की मार। कास्ट्रक्शन व्यापार में लगे लोगों का कहना है कि अब फ्लैट बनाने में जो लागत आ रही है अगर 5 से 10 फीसद भी मुनाफा कमाने की कोेशिश की जाए तो कोई भी फ्लैट खरीदने के लिए तैयार नहीं है। जीएसटी और थोक व्यापार में माल कम आने की वजह से गुजिश्ता पांच महीनों में खुदरा बाजार में मंहगाई की शरह (दर) में तकरीबन चार फीसद तक का इजाफा हो चुका है ऐसा तो कभी नही हुआ था।

वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी और उनके फाइनेंस मिनिस्टर अरूण जेटली दोनों ने ही अब यह भी इशारा दिया है कि जीएसटी की शरहों (दरों) पर नजरसानी (पुनर्विचार) किया जा सकता है। कुछ जरूरी चीजों को जीएसटी से पूरी तरह छूट भी दी जा सकती है। सियासी माहिरीन का ख्याल है कि जीएसटी के जरिए पहले तो मोदी ने लोगों की नींदंे हराम कर दीं अब दिसम्बर के आखिर में गुजरात के असम्बली के एलक्शन हैं नवम्बर के आखिर तक कुछ सामानों पर जीएसटी  कम करके और कुछ पर पूरी तरह हटा कर मोदी गुजरातियों के वोट लेने की कोशिश करंेगे। थोड़ा-थोड़ा करके यह सिलसिला वह अगले साल नवम्बर तक जारी रखेंगे ताकि 2019 के लोक सभा एलक्शन तक में वह इसका फायदा उठा सकें। इस किस्म के हरबे अख्तियार करके दिसम्बर से अगले साल अगस्त तक मध्य प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान और कर्नाटक असम्बली इंतखाबात मंें फिर2019 के लोक सभा एलक्शन में कितना फायदा उठा पाएंगे यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा फिलहाल तो अवाम की तबाही है।

खुद वजीर-ए-आजम मोदी के अपने प्रदेश गुजरात में कपड़ा व्यापार का देश का सबसे बड़ा सेण्टर सूरत है। पहले नोटबंदी फिर जीएसटी के बाद वहां के व्यापारियों के सामने जीने मरने का सवाल पैदा हो गया है। सूरत का कपड़ा व्यापार कोई मामूली व्यापार नहीं है। वहां तकरीबन साठ हजार व्यापारी हैं। सवा लाख से ज्यादा परमानेंट और तकरीबन तीन लाख दिहाड़ी मजदूर इस बाजार में काम करते हैं। बाजार के जिम्मेदारान का कहना है कि पचास हजार से ज्यादा मजदूर काम छोड़ कर अपने-अपने गांव वापस चले गए हैं। क्योंकि हमारे पास उनको देने के लिए मजदूरी का पैसा तक नहीं है। इस कपड़ा व्यापार से पूरे मुल्क में सवा करोड़ कपड़ा व्यापारी जुड़े हुए हैं। एक अंदाजे के मुताबिक इन सवा करोड़ कपड़ा व्यापारियों के पीछे काम करने वाले कोई दस करोड़ लोग जुड़े हुए हैं। उनका क्या होगा इसकी किसी को फिक्र नहीं है। सूरत के तकरीबन तमाम कपड़ा व्यापारी शुरू से ही भारतीय जनता पार्टी की रीढ की हड्डी बने हुए हैं। 2014 के लोक सभा एलक्शन के वक्त इन लोगों ने कपड़ा पैक करने वाले डिब्बों तक पर छपवा रखा था कि अबकी बार मोदी सरकार अब उन्ही व्यापारियों ने अपनी रसीदों पर छपवा दिया है महमारी भूल कमल का फूलफ। इन व्यापारियों को जितनी तकलीफ व्यापार न चलने की है उससे ज्यादा तकलीफ इस बात की है कि जीएसटी से मुताल्लिक उनकी तकलीफें और परेशानियां सुनने के लिए खुद मोदी या उनका कोई वजीर तक तैयार नहीं है। हमंे हाल (वर्तमान) से ज्यादा मुल्क के मुस्तकबिल (भविष्य) की फिक्र  है। मोदी के इस बयान पर सूरत के व्यापारियों का कहना है कि मोदी पहले ऐसे वजीर-ए-आजम हैं जो मजदूरों और व्यापारियों की लाशों पर मुल्क के मुस्तकबिल का महल खड़ा करना चाहते हैं।