बीजेपी में गाली गलौज कल्चर

बीजेपी में गाली गलौज कल्चर

वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी देश-विदेश मंे हर जगह गाते फिर रहे हैं कि सत्तर सालों मंें देश में कुछ हुआ ही नहीं जो कुछ हो रहा है वह 26 मई 2014 को उनके हाथों में मुल्क की सत्ता आने के बाद से ही होना शुरू हुआ है। झूट की इंतेहा यह कि नर्मदा बांध का ख्वाब देखने की बातें भी वह हठधर्मी के साथ करते हैं। उनकी हुकूमत के साढे तीन सालों में देश ने तरक्की की है या नहीं, लोग खुद को खुशहाल और महफूज (सुरक्षित) समझते हैं या नहीं, लोगों की जिंदगी आसान हुई है या नहीं इन तमाम बातों पर एख्तलाफ और बहस हो सकती है लेकिन जिस एक बात पर कोई बहस नहीं हो सकती और पूरे मुल्क के लिए यह बात काबिले तस्लीम है वह यह है कि मोदी के वजीर-ए-आजम बनने के बाद मुल्क में झूट और गाली गलौज की सियासत आ गई है। सत्तर साल के आजाद मुल्क में पहली बार यह माहौल पैदा किया गया है कि वह तो भगवान हैं उनके किसी फैसले पर सवाल नहीं किया सकता। उनके फैसले पर अगर किसी ने उंगली उठाई तो उठी हुई उंगली तोड़ दी जाएगी। उनके फैसलों पर कोई सवाल उठाएगा तो जवाब में गालियां मिलेगी उनके कामों और फैसलों में कमियां गिनाते हुए कोई कितना बड़ा शख्स कितनी ही दलीलंे पेश करे हर दलील के जवाब में सवाल उठाने वाले को एक गाली बक दी जाएगी। अब तो वाजेह (स्पष्ट) हो चुका है कि सोशल मीडिया पर गालियां बकने वालों को हर गाली के लिए बाकायदा एक तयशुदा रकम अदा की जाती है। गालियां बकने वालों का खानदानी (परिवारिक) बैकग्राउण्ड क्या है यह तो कोई नहीं जानता लेकिन उनकी हरकतों से अंदाजा लगता है वह अच्छे घरों और खानदानों के घरों के बाहर बहने वाली नालियों के कीड़े टाइप लोग हैं। इसीलिए तो उन्हें किसी भी खातून, लड़की या उनकी वालिदा की उम्र की ख्वातीन के लिए मरण्डीफ और मवैश्याफ जैसे अल्फाज लिखने में कोई हिचक नहीं होती है, शर्म नाम की तो खैर कोई चीज उनके अंदर है ही नहीं। इस गाली गलौज फौज के लिए बदतमीजी (अभद्रता) करने में माहिर लोगों की भर्ती का काम शायद खुद नरेन्द्र मोदी ने 2012 में उसी वक्त से शुरू करा दिया था जब पार्टी को आरएसएस की हिदायत मिली थी कि 2014 में मुल्क के अगले वजीर-ए-आजम की हैसियत से मोदी को प्रोजेक्ट किया जाए। मोदी की मइमेज मेकिंगफ के लिए जो टीम उस वक्त बनी थी वह मोदी की तारीफ में कम लेकिन गैर बीजेपी पार्टियों, आजादी की लड़ाई के सूरमाओं और मुल्क की सत्ता में रह कर दुनिया भर में अपना कद बनाने वाले लीडरान की तस्वीर गंदी करने औैर उनकी किरदारकुशी (चरित्र हनन) करने की मुहिम ज्यादा जोरदार तरीके से चलाने लगी थी। वह सिलसिला आज तक जारी है।

ताजा मामला साबिक मरकजी वजीर यशवंत सिन्हा का सामने आया है। यशवंत सिन्हा आईएएस अफसर की मुलाजमत छोड़ कर 1984 में लालकृष्ण अडवानी, अटल बिहारी वाजपेयी और चन्द्रशेखर जैसे कद्दावर लीडरान से मुतास्सिर होकर जनता पार्टी के जरिए सियासत में दाखिल हुए थे। उस जमाने मंे मुल्क में कांगे्रस की तूती बोल रही थी। जनता पार्टी का कोई खास मुस्तकबिल न होने के बावजूद उन्होने जनता पार्टी के जरिए सियासत करने का फैसला किया। वह चाहते तो उस वक्त कांगे्रस में भी शामिल हो सकते थे। 1990 में चन्द्रशेखर की सरकार बनी तो उन्हें कैबिनेट मिनिस्टर बनाया गया। वह कई बार लोक सभा मेम्बर भी रह चुके हैं। नोटबंदी और उसके बाद बगैर सोचे समझे जीएसटी नाफिज करने से मुल्क की मईशत (अर्थव्यवस्था) तबाह हो गई। मुसलसल सात बार मुल्क का बजट पेश करने वाले यशवंत सिन्हा से मुल्क की मआशी बदहाली देखी नहीं गई तो उन्होंने अंग्रेजी रोजनामा मइंडियन एक्सप्रेसफ में मोदी और अरूण जेटली की मआशी पालीसी को नाकाम करार देते हुए एक मजमून लिख दिया। मजमून शाया होते ही मोदी की गाली गलौज ब्रिगेड उनपर टूट पड़ी इंतेहा यह कि इस गाली गलौज फौज की कयादत खुद फाइनेंस मिनिस्टर अरूण जेटली ने संभाली और यहां तक कह दिया कि अब अस्सी बरस की उम्र में यशवंत सिन्हा अपने लिए काम तलाश रहे हैं। उन्होने यह भी बोल दिया कि सिन्हा खुद फाइनेंस मिनिस्टर की हैसियत से नाकाम हो गए थे तो उस वक्त के वजीर-ए-आजम अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें बर्खास्त कर दिया था। हालांकि वाजपेयी ने उन्हें फाइनेंस मिनिस्ट्री से हटाकर उससे ज्यादा अहम फारेन मिनिस्ट्री दी थी। अरूण जेटली खुद को पढा लिखा बताते हैं, सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील रहे हैं इसके बावजूद उन्होने यशवंत सिन्हा की बातों का अपनी दलील के साथ जवाब देने के बजाए इस किस्म की गैर मुहज्जब जुबान (अभद्र भाषा) का इस्तेमाल करना ज्यादा मुनासिब समझा। इसकी वजह यही है कि अब नरेन्द्र मोदी का दौर है इसमंे गाली गलौज का कल्चर कायम किया गया है। इन लोगों की जुबान और बर्ताव दोनों गाली गलौज जैसा ही हो चुका है। इनसे तमीज की उम्मीद नहीं की जा सकती। जेटली की जुबान उस वक्त बंद हुई जब आरएसएस में इंतेहाई काबिल समझे जाने वाले एस गुरूमूर्ति, सुब्रामण्यम स्वामी और डीएच चनदीकर जैसे मआशी मामलात के माहिरीन ने भी यशवंत सिन्हा की बातों को तस्लीम किया। पी चिदम्बरम और साबिक वजीर-ए-आजम मनमोहन सिंह भी बोले लेकिन वह कांगे्रसी हैं तो जेटली ने उनकी बातों को कोई तवज्जो नहीं दी।

मोदी के बीजेपी में गाली गलौज का माहौल खत्म भी नहीं हो सकता क्योंकि खुद वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी इस ब्रिगेड की कमान संभाले हुए हैं। याद रहे कि नोटबंदी पर जब राज्य सभा में डाक्टर मनमोहन सिंह ने कहा था कि नोटबंदी सरकार की मुनज्जम (आर्गनाइज्ड) लूट है इससे मुल्क की मईशत (अर्थ व्यवस्था) पर बहुत बुरा असर पड़ेगा और जल्द ही मुल्क की जीडीपी कम से कम दो फीसद नीचे चली जाएगी तो नरेन्द्र मोदी ने नोटबंदी पर दुनिया के जाने माने एकनामिस्ट को तकरीबन बेवकूफ करार देते हुए कह दिया था कि मरेनकोट पहन कर बाथरूम में नहाने का फन डाक्टर मनमोहन सिंह बखूबी जानते हैं।फ मनमोहन सिंह के लिए वजीर-ए-आजम की सतह से इस किस्म की सतह से गिरे हुए जवाब की उम्मीद किसी को नहीं थी। उस वक्त भी मोदी ने मनमोहन सिंह की दलीलों के जवाब में दलीलें पेश करने के बजाए इस किस्म की सतह से गिरी (स्तरहीन) बात करके मुल्क ही नहीं दुनिया भर के पढे लिखे संजीदा लोगों को हैरत में डाल दिया था। नोटबंदी को मनमोहन सिंह के अलावा नोबुल अवार्ड पाने वाले बुजुर्ग एकनामिस्ट अमत्र्य सेन समेत दुनिया भरके नामवर एकनामिस्ट ने मुल्क की मईशत (अर्थ व्यवस्था) के लिए इंतेहाई नुक्सानदेह करार दिया था। जवाब में नरेन्द्र मोदी ने हावर्ड युनिवर्सिटी और उसकी तालीम तक का मजाक उड़ाते हुए कहा था एक तरफ हावर्ड युनिवर्सिटी में पढे लोग हैं दूसरी तरफ मैं नरेन्द्र मोदी हार्ड वर्कर (सख्त काम करने वाला) हूं। मैने अपने हार्ड वर्क से हावर्ड को भी सबक सिखा दिया। वजीर-ए-आजम के मुंह से इस किस्म के सस्ते जुमले गाली के ही जुमरे (श्रेणी) में आते हैं। अब खुद सरकारी आंकड़े बता रहे हैं कि मुल्क की जीडीपी में दो फीसद की गिरावट नोट बंदी के सिर्फ नौ महीने बाद ही आ गई। मनमोहन सिंह की बात सौ फीसद सच साबित हुई है। अगर नरेन्द्र मोदी को यह एहसास होता कि वह एक सौ तीस करोड़ लोगों के अजीम मुल्क के वजीर-ए-आजम हैं उनमें अपने ओहदे के मुताबिक बड़ापन और संजीदगी होती तो अब उन्हें खुद ही कहना चाहिए था कि डाक्टर मनमोहन सिंह दुनिया के जाने माने एकनामिस्ट हैं उनकी बात सच साबित  हुई है। हमारी कोशिश है कि हम जल्द से जल्द मुल्क के मआशी हालात ठीक करके दुबारा पटरी पर ले आएं।

नोटबंदी और बगैर सोचे समझे जीएसटी नाफिज करने की अपनी गलतियां नरेन्द्र मोदी किसी भी कीमत पर तस्लीम नहीं करेेंगे। वजह यह है कि उनके दिमाग में यह गलतफहमी भरी है कि आज तक मुल्क में उनसे ज्यादा काबिल और सूझबूझ वाला वजीर-ए-आजम कोई दूसरा पैदा ही नहीं हुआ। उनकी इसी गलत फहमी का नतीजा है कि पंडित अटल बिहारी वाजपेयी ने वजीर-ए-आजम की हैसियत से लोक सभा में कहा था कि एलक्शन के दौरान एक दूसरे पर छींटाकशी करना अलग बात है लेकिन मैं तस्लीम करता हूं कि पचास-पचपन सालों में भारत ने बहुत तरक्की की है यह कहना कि देश ने तरक्की नहीं की देश के मपुरूषार्थफ को बदनाम करना होगा। उसी लोक सभा में और उसके बाहर देश-विदेश हर जगह मोदी कहते फिर रहे हैं कि सत्तर सालों में देश में कुछ हुआ ही नहीं। दुनिया में बड़ी तादाद में ऐसे हुक्मरान आए हैं जो नरेन्द्र मोदी की तरह गरीब घरों के थे, लेकिन अपने-अपने मुल्क की सत्ता संभालने के बाद तकरीबन सभी ने अपने आपको अपने मुल्क के सबसे बड़े ओहदे प्राइम मिनिस्टर या सदर के वकार (सम्मान) के मुताबिक खुद को ढाला और दुनिया को बताया कि मुल्क का हुक्मरां बनने की सलाहियत उनके अंदर थी। नरेन्द्र मोदी शायद अकेले ऐसे वजीर-ए-आजम हैं जिन्होने सत्ता संभालने के बाद वजीर-ए-आजम के ओहदे के वकार (सम्मान) और डिगनिटी को नीचे खींच कर अपनी सतह तक लाने का काम किया है। जहां तक गाली गलौज का माहौल पैदा करने का सवाल है इसमेें भी उनके बैकग्राउण्ड का दखल है। वह खुद कहते हैं कि बचपन में थोड़ी समझ आते ही उन्होने घर छोड़ दिया था और आरएसएस के काम में अपने को वक्फ कर दिया था। मतलब साफ है कि उन्हें वाल्दैन की परवरिश हासिल नहीं हुई और आरएसएस में फिरकापरस्ती व हिन्दू-मुस्लिम जैसी बातें ही सिखाई जाती हैं। वही उन्होने सीखी है। वाल्दैन की परवरिश मिली होती तो यकीनन ऐसे न होते जैसे वह अब हैं।