महंगाई पर बीजेपी खामोश क्यों?

महंगाई पर बीजेपी खामोश क्यों?

पेट्रोल 80 रूपए लीटर से ऊपर, सीमंेट की बोरी तीन सौ की, गैस सिलेण्डर 785 में,दीगर चीजों के दामों में भी इजाफा

”इण्टरनेशनल मार्केट में क्रूड की कीमत 45 से 47 डालर फी बैरल हिन्दुस्तान में पेट्रोल की कीमत 78 से 82 रूपए लीटर अवाम की जेबों पर दिन दहाड़े पड़ने वाली इस डकैती पर पूरे आरएसएस कुन्बे की मुजरिमाना खामोशी क्यों क्या यह अंबानी और अडानी जैसे कारपोरेट घरानों के साथ पब्लिक सेक्टर की पेट्रोलियम कम्पनियों को लूट की छूट देने की साजिश नहीं है?“

 

”सितम्बर के दूसरे हफ्ते तक खुदरा बाजार में शरह महंगाई (दर) ने तमाम पुराने रिकार्ड तोड़ दिए। सब्जियांे और फलों की कीमतें आसमान छूने लगीं। उस पर गैस सिलेण्डर 784 से 825 रूपए में। गरीब  और मिडिल क्लास दीवालिया हो रहा। वजीर-ए-आजम मोदी जापानी वजीर-ए-आजम के साथ सैकड़ों करोड़ का रोड शो करके बुलेट टे©ंन के जरिए मुल्क में खुशहाली लाने में मसरूफ रहे महंगाई पर उनका ट्वीट भी खामोश।“

 

”नरेन्द्र मोदी की सरकार में शामिल नौकर शाह से वजीर बना एक शख्स कह रहा है कि कारों और मोटर साइकिलों में पेट्रोल भरवाने वाले भूके तो नहीं मर रहे हैं। पूरी जिंदगी सरकारी खर्च पर जिंदगी गुजारने और मरने तक लाखों की पंेशन का इंतजाम कर चुके इस वजीर को यह एहसास भी नहीं कि पेट्रोल की कीमतों का सबसे ज्यादा असर काश्तकारों, प्राइवेट और पब्लिक ट्रांसपोर्ट के सहारे रहने वाले गरीबों पर ही पड़ता है।“

 

नई दिल्ली! पेट्रोल की कीमत 58 रूपए लीटर, आंटा 15 रूपए किलो, दाल 50 रूपए किलो और सीमेंट के दाम 130 रूपए बोरी होने पर पूरे मुल्क में आसमान सर पर उठाने वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार में अब 78 से 82 रूपए लीटर पेट्रोल, 170-180 रूपए किलो दाल और 300 रूपए बोरी सीमेंट बिक रही है तो वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी समेत पूरी बीजेपी पूरी तरह बेहिस (संवेदनहीन) होकर खामोश पड़ी है  न किसी को शर्म आ रही है न यह फिक्र कि आखिर देश के गरीब अवाम किस तरह जिंदगी गुजार रहे हैं। मनमोहन सिंह सरकार के दौर में इतनी बेरोजगारी भी नहीं थी। अब तो गुजिश्ता 9-10 महीनों में ही बेरोजगारों की एक पूरी फौज भी तैयार हो गई है। इस पर फिक्र जाहिर करने के बजाए जिंदगी भरसे सरकारी पैसों पर पलने वाले मोदी के एक वजीर कह रहे हैं कि पेट्रोल खरीदने वाले भूकों तो नहीं मर रहे हैं याद रहे कि मनमोहन सिंह की यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलाइन्स के दूसरे दौर की सरकार ने पेट्रोल की कीमतों में इजाफा करके 58 रूपए लीटर कर दिया था, आटा दस रूपए किलो, दाल की कीमत 50 रूपए किलो हो गई थी तो भारतीय जनता पार्टी ने आसमान सर पर उठा लिया था। उन्होंने भारत बंद का नारा दिया था, उस वक्त पार्टी के सदर नितिन गडकरी और अडवानी से नीचे दफ्तर के चपरासी तक सड़कों पर उतर आए थे। आज के वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी उस वक्त गुजरात के चीफ मिनिस्टर थे उन्होने कहा था मदेश में पेट्रोल के दामों मंें इजाफा किया गया है यह दिल्ली में बैठी भारत सरकार की नाकामी की जीती जागती मिसाल है, लोगों में बहुत गुस्सा है इससे आम लोगों और सरकार दोनों पर बहुत बड़ा बोझ पड़ने वाला है।फ इसी तरह जीएसटी के लिए मोदी ने कहा था मभारतीय जनता पार्टी और गुजरात की राय साफ है कि जीएसटी कभी कामयाब नहीं हो सकती।फ उस वक्त नरेन्द्र मोदी की बड़बोली राज्य सभा मेम्बर और आज मोदी सरकार में कैबिनेट मिनिस्टर स्मृति ईरानी ने कहा था मआज देश की जनता पूछ रही है कि उन्होने (मनमोहन सिंह ने) 100 दिनों में महंगाई कम करने का वादा किया था फिर पेट्रोल के दाम क्यों बढा दिए। इससे पहले जब पाकिस्तानी फौजियों ने दो हिन्दुस्तानी फौजियों को मार कर उनके सर काट लिए थे तब स्मृति ईरानी ने कहा था ममेरा दिल चाहता है कि मैं अपनी चूड़ियां उतार कर दिल्ली में बैठी कांग्रेस सरकार को भेज दूं।फ आज महंगाई तमाम रिकार्ड तोड़ कर अपने उरूज पर पहुच रही है। पेट्रोल 80 रूपए लीटर से ऊपर तक पहुच गया है सीमेट की बोरी तीन सौ रूपए में मिल रही है दाल 170 रूपए किलो से नीचे आने का नाम नहीं ले रही है लेकिन अब बीजेपी लीडरान को न तो इसकी फिक्र है और न ही शर्मिंदगी। उल्टे मोदी के बनाए हुए एक नए वजीर के जे अल्फांस ने बडी बेशर्मी से कह दिया कि जो लोग कारों और मोटर साइकिलों में पेट्रोल डलवा रहे हैं वह इतने गरीब नहीं हैं कि भूके मर रहे हों। मनमोहन सिंह सरकार के दौर में भारतीय जनता पार्टी की नजर अगले लोक सभा एलक्शन पर थी तो पूरी बीजेपी ने सड़कों पर उतर कर खूब ड्रामे किए थे। वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी का रवैय्या बिल्कुल नीरो जैसा दिख रहा है कि रोम जल रहा था तो यूरोप का बादशाह नीरो आराम से बांसुरी बजा रहा था। छोटी और मझोली सनअतों (उद्योगों) के बंद होने की वजह से बेरोजगारी में रोजाना इजाफा होता जा रहा है। उसपर महंगाई की मार ने आम आदमी तो क्या मिडिल क्लास की भी कमर तोड़ दी है। आल इण्डिया पेट्रोल पम्प एसोसिएशन के मुताबिक पिछले महीने ही पेट्रोल की बिक्री में चार फीसद तो डीजल की बिक्री मंे दस फीसद की कमी आई है। नोटबंदी ने लोगों को जितना मारा था जीएसटी ने तो मरे हुओं को भी कुचलने का काम कर दिया है।

सिर्फ मौजूदा सितम्बर महीने में ही धीरे-धीरे पेट्रोल की कीमतों में तकरीबन सात रूपए लीटर का इजाफा हो चुका है। मोदी सरकार ने बड़ी चालाकी से पेट्रोल की कीमतें रोजाना तय करने का सिस्टम नाफिज कर दिया इसलिए आम लोगांे को पता ही नहीं चल पाता है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतों के बहाने सरकार किस हद तक अवाम की जेब पर डाका डालती जा रही है। पहली जुलाई को पेट्रोल की कीमत 63 रूपए लीटर थी। सरकार ने रोजाना कीमतें तय करने की छूट पेट्रोलियम कम्पनियों को दे दी। कीमतों में रोज इजाफा होने लगा तो 27 अगस्त तक एक लीटर पेट्रोल की कीमत 72 रूपए 40 पैसे हो गई जो बीस सितम्बर को 79 रूपए से 83 रूपए लीटर हो गई। पेट्रोल की कीमतों की सबसे ज्यादा मार महाराष्ट्र के बडे़ शहरों और देही इलाकोें के लोगों पर पड़ी है। यह सूरतेहाल तब है जब इण्टरनेशनल बाजार मे क्रूड की कीमत 43 से 47 डालर फी बैरल ही रही है।

नरेन्द्र मोदी सरकार ने पेट्रोलियम अशया (पदार्थों) के बहाने मुल्क के अवाम को लूटने की साजिश सरकारी पेट्रोलियम कम्पनियों से कहीं ज्यादा अंबानी और अडानी जैसे कारपोरेट घरानों को फायदा पहुचाने के लिए रची है। 2014 में इण्टरनेशनल मार्केट में क्रूड की कीमत 145 से 150 डालर फी बैरल थी उस वक्त मनमोहन सिंह सरकार ने मुल्क में पेट्रोल की कीमत 61 रूपए लीटर और डीजल 53 रूपए लीटर से ज्यादा नहीं होने दी थी। आज क्रूड की कीमत 45 से 47 डालर फी बैरल है तो पेट्रोल 78 से 82 रूपए लीटर और डीजल 61 से 66 रूपए लीटर हो गया है। पेट्रोल और डीजल ही नहीं खाना पकाने की गैस मोदी सरकार आने के वक्त 398 रूपए सिलेण्डर थी आज वही सिलेण्डर 784 रूपए से 800 रूपए फी सिलेण्डर तक पहुच चुकी है। लेकिन इस लूट पर मोदी उनकी सरकार और पार्टी मुंह खोलने के लिए तैयार नहीं है। पड़ोसी मुल्क नेपाल और भूटान हिन्दुस्तान से पेट्रोल खरीद कर अपने अवाम को फराहम करते हैं तो नेपाल में भी पेट्रोल की कीमतें हिन्दुस्तान से कम 61 रूपए 35 पैसे लीटर है और भूटान में 62 रूपए बीस पैसे लीटर है। अमरीकी हिंसा और बमबारी से हर तरह से तबाह हो चुके अफगानिस्तान में पेट्रोल की कीमत 41 रूपए 50 पैसे तो नंगा भूका कहे जाने वाले पाकिस्तान में 42 रूपए 54 पैसे लीटर है। एक और पड़ोसी मुल्क श्रीलंका में 53 रूपए 72 पैसे लीटर पेट्रोल बिकता है। उधर चीन में 64 रूपए 42 पैसे और बांग्लादेश में 69 रूपए 46 पैसे लीटर है। भारत शायद अकेला ऐसा मुल्क है जहां पेट्रोलियम को जीएसटी से बाहर रखा गया है फिर भी मुल्क में पेट्रोलियम अशया पर पचास फीसद से ज्यादा टैक्स वसूला जाता है।

पेट्रोल, डीजल और कुकिंग गैस की कीमतों में बेतहाशा इजाफे पर अफसोस जाहिर करके अवाम से माफी मांगने के बजाए मोदी के एक वजीर के जे अल्फांस ने बड़ी बेशर्मी से कह दिया कि कारों और मोटर साइकिलों में पेट्रोल डलवाने वाले भूके तो नहीं मर रहे हैं। जिंदगी भर सरकारी नौकरी में रहने वाले इस रिटायर्ड नौकरशाह को यह एहसास भी नहीं है कि पेट्रोल और डीजल सिर्फ प्राइवेट कारों और मोटर साइकिलों में ही इस्तेमाल नही ं होता। काश्तकारी में डीजल का बहुत बडे़ पैमाने पर इस्तेमाल है उसके अलावा पूरे मुल्क का प्राइवेट व पब्लिक ट्रांसपोर्ट भी डीजल और पेट्रोल के भरोेसे ही चलता है। खुद अल्फांस तो कभी लाइन लगाकर ट्रांसपोर्ट की बसों या शेयर टैक्यिों और टैम्पो या आटो रिक्शा में बैठे नहीं होंगे। उनकी जिंदगी के 35 से 38 साल तो सरकारी खर्चे पर गुजरे हैं। मोटी तंख्वाह के साथ मकान, कार, टेलीफोन और घरेलू मुलाजिम तक सरकारी और बीवी बच्चोें की ऐश के लिए रिश्वत। रिटायर हुए तो मरने तक पेंशन की शक्ल में हर महीने 80 हजार से सवा डेढ लाख तक पंेशन पहले मर गए तो बीवी को ताउम्र पेंशन मेडिकल का खर्च सरकार पर फिर ऐसा शख्स मुल्क के गरीब अवाम की परेशानियांे को कैसे महसूस कर सकता हैै? जिस मुल्क में इतने बेहिस और बेशर्म वजीर होंगे उस मुल्क के गरीब ही हमेशा पिसते रहेंगे।

सीएसओ के जरिए जारी किए गए आदाद व शुमार (आंकड़ों) के मुताबिक गुजिश्ता जुलाई के मुकाबले मुल्क में शरह महंगाई अगस्त के महीने में एक फीसद से ज्यादा बढ गई थी सितम्बर का दूसरा हफ्ता खत्म होते-होते शरह महंगाई (महंगाई दर) आसमान छूने लगी। इस महंगाई का सबसे ज्यादा असर सब्जियों और फलों पर दिखाई पड़ा है। सब्जियों के महंगी होने की एक बड़ी वजह बीजेपी की मवेशी मोहब्बत भी है। गौकुशी रोकने की आड़ में बीजेपी सरकारों वाले प्रदेशों में भैंसे और दूसरे जानवरों का जबीहा भी तकरीबन बंद हो गया नतीजा यह कि तमाम गोश्तखोर तबका सब्जियां और दालें खाने लगा। जाहिर है  महंगाई तो बढनी ही थी। लखनऊ समेत मुल्क के बेश्तर (अधिकांश) शहरों में बकरे का गोश्त पांच-साढे पांच सौ रूपए फी किलो और ब्वायलर यानी आज के दौर में मुर्गे का गोश्त 200 से ढाई सौ रूपए फी किलो बिक रहा है। भैंस के गोश्त की कीमत सौ रूपए से तीन सौ रूपए किलो तक पहुच चुकी है। यहां यह वाजेह भी जरूरी है कि बकरे और मुर्गे को गोश्त मुल्क के मुसलमान जितना खाते हैं उनके मुकाबले कई सौ गुना गैर मुस्लिम खाते हैं। जब तक बीजेपी सरकारों के दिलों में मवेशी मोहब्बत का समन्दर ठाठंे नहीं मार रहा था मुसलमानों, दलितों और आदिवासी कुन्बों में आधा किलो गोश्त में शोरबा बढा कर आठ-दस मेम्बरान का पेट भर जाता था अब आधा किलो या एक किलो आलू में तो आठ-दस मेम्बरान का परिवार तो  किसी भी तरह अपना पेट नहीं भर सकता। जाहिर है पूरे समाज का बोझ सब्जियों पर ही आ पड़ा है। ऐसी सूरत में महंगाई में इजाफा होने के सिवाए और कौन सा रास्ता बचा है। एक बात यह भी कि सब्जियों की आसमान छूती कीमतों का फायदा सब्जी पैदा करने वाले काश्तकारों को नहीं मिल रहा है। इन इजाफी कीमतों का सारा फायदा बिचैलिए ही उठा रहे हैं। वही बिचैलिए जो भारतीय जनता पार्टी और नरेन्द्र मोदी के पक्के सपोर्टर हैं। अब नितिन गडकरी, सुषमा स्वराज, राजनाथ सिंह और स्मृति ईरानी वगैरह गर्दन में सब्जियां टंाग कर और गैस सिलेण्डर सामने रखकर सड़कों पर क्यों नहीं बैठ रहे हैं? अवाम को महंगाई की मार खाते छोड़ कर वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी सैकड़ों करोड़ फूंक कर जापानी वजीर-ए-आजम के साथ रोड शो करके बुलेट टे©ंन लाने का जश्न मना रहे हैं। अब उनका दावा सही होता दिख रहा है कि सत्तर सालों में मुल्क को ऐसा वजीर-ए-आजम नहीं मिला।