मुस्लिम औरतों के हक में एक तारीखी फैसला

मुस्लिम औरतों के हक में एक तारीखी फैसला

सुप्रीम कोर्ट की आईनी बेंच ने मुस्लिम औरतों के हक में एक तारीखी फैसला सुनाते हुए तीन तलाक ;तलाक.ए.बिदअत को गैर कानूनी करार दिया है। बेंच का इस बारे में साफ कहना था कि तीन तलाक का यह रिवाज कुरआन की अस्ल रूह के खिलाफ तो है हीए आईन की दफा.14 और 21 के भी खिलाफ है। यह तलाक मुस्लिम ख्वातीन के बुनियादी हुकूक की खिलाफवर्जी करता है और साथ ही उन्हें इस मनमाने नाकाबिले तब्दील तलाक के तहत करता है। लिहाजा यह नाकाबिले कुबूल है। चीफ जस्टिस जेएस खेहर की सदारत वाली आईनी बंेच जिसमें जस्टिस कुरियन जोसेफए जस्टिस रोहिंटन फली नरीमनए जस्टिस उदय यू ललित और जस्टिस एस अब्दुल नजीर शामिल थेए का कहना था जब कई इस्लामी मुल्कों में भी तीन तलाक पर पाबंदी हैए तो भारत में यह रिवाज क्यों अमल में है घ् अदालत शिक.142 के तहत अपने अख्तियारात का इस्तेमाल करते हुए मरकजी सरकार को हुक्म देती है कि वह छः महीनें में तीन तलाक पर कानून बनाए। इस दौरान तीन तलाक पर पाबंदी रहेगी। अदालत का यह फैसलाए मुस्लिम ख्वातीन के लिए राहत बनकर आया हैए जो हर दम एक डर के साये में रहती है कि कब उनका शौहर एक छोटी सी वजह से तीन तलाक देकर शादी शुदा जिंदगी खत्म कर ले। फैसलाए यकीनन  मुस्लिम ख्वातीन के हुकूक की लड़ाई में एक मील का पत्थर साबित होगा। शरीअत के नाम पर अभी तक जो शौहरए अपनी.अपनी बीवियों के साथ नाइंसाफी और भेदभाव करते रहेए उस पर लगाम लगेगी। तलाक जैसे मामले में औरतों के साथ अब जिन्सी भेदभाव नहीं होगा।

गौरतलब है कि कुछ मुस्लिम ख्वातीन समेत सत्रह तंजीमों ने सुप्रीम कोर्ट में अलग.अलग पटीशन दाखिल कर तलाक.ए.बिदअत ;तीन तलाकद्ध और निकाह हलाला को गैर इस्लामी और कुरआन के खिलाफ बताते हुए इन पर पाबंदी लगाने की मांग की थी। इन ख्वातीन ने अपनी पटीशनों में दावा किया था कि तीन तलाक का रिवाज शरीअत के उसूलों की नाफरमानी है। तीन तलाक और निकाह हलाला जैसे रिवाजों की आड़ में औरतों के साथ नाइंसाफी हो रही है। यह तलाक गैर कानूनी और गैर आईनी है। किसी मखसूस मजहब के मजहबी रिवायत और अकीदे से जुड़े इस मामले की संगीनी को देखते हुए अदालत ने इसे पांच रूक्नी आईनी बंेच को सौंप दिया। आईनी बंेच ने मामले की सुनवाई करते हुए तीन अहम नुक्तोें पर गौर किया। पहलाए तीन तलाक इस्लाम का अटूट हिस्सा है या नहीं घ् दूसराए तीन तलाक मुसलमानों के लिए बुनियादी हक है या नहीं घ् तीसराए क्या यह मुद्दे औरत के बुनियादी हुकूक हैं घ् अदालत इस पर हुक्म दे सकती है घ् बहरहाल इस मामले में छः दिन सुनवाई चली। जिसमें अदालत ने पटीशनरों समेत मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और मरकजी सरकार की दलीलें सुनी। इन दलीलों को सुनने के बाद आईनी बंेच अपने आखिरी नतीजे पर पहुंची। अदालत ने अपना फैसला सुुनाते हुए कहा सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी शमीम आरा मामले में तीन तलाक को कानूनन गलत करार दिया था। तब अदालत ने तफसील से वजह नहीं बताई थी। लेकिन अब इसे तफसील से बताने की जरूरत है। इस्लामी कानून के चार जराए हैं. कुरआनए हदीसए इज्मा और कियास। कुरान बुनियाद है। जो बात कुरआन में नहीं उसे बुनियादी नहीं माना जा सकता। बाकी जराए में कोई भी बात कुरआन में लिखी बात के खिलाफ नहीं हो सकती। 1937 के शरीअत एप्लिकेशन एक्ट का मकसद मुस्लिम समाज में कुरआन से बाहर की बातों को हटाना था। लिहाजा हमारा मानना है कि तीन तलाक को आईन में मिले मजहबी आजादी के हक के तहत तहफ्फुज हासिल नहीं है।

मुस्लिम ख्वातीन की जिंदगी पर बुरा असर डालने वाले तीन तलाक रिवाज के खिलाफ मुल्क में बरसों से लड़ाई चल रही है। इस तलाक का मुस्लिम मर्द काफी गलत इस्तेमाल करते रहते हैं। कुरआन की आयतों की गलत तशरीह करके कुछ शिद्दतपसंद मौलाना इस तलाक को जायज ठहराते हैं। उन मौलानाओं का कहना है कि शरीअत कानून में तीन तलाक को मंजूरी दी गई है। एक ही बार में कोई शौहर अपनी बीवी को लगातार तीन बार तलाक कहकर उससे अलग हो सकता है। जबकि शरीअत और कुरआन में ऐसा कुछ भी नहीं है। कुरआन मर्द.औरत दोनों को ही बराबर के हक देता है। कुरआन में कई ऐसी आयतें हैंए जहां साफ.साफ लिखा हुआ है कि छोटी.छोटी बात पर तलाक न करें। सूरा अन निसा की सूरत नंबर.4ए आयत.35 और आयत.130 की अस्ल रूह यह है कि शौहर.बीवी में अगर कोई अनबन हैए तो पहले बातचीत से उस मसले को सुलझाने की कोशिश करें। यह बातचीतए यह कोशिश कम से कम चार महीने तक होनी चाहिए। अगर यह कोशिशें नाकाम होती हैंए तो दोनों के घरों से एक.एक मेंबर सालिस के तौर पर आएं और मामले को सुलझाने की कोशिश करें। अगर यह अमल नाकाम रहता हैए लगता है कि निबाह नहीं हो पाएगाए तो अलग हो जाएं। तलाक के बाद बीवी के जो भी हुकूक मसलन जरुरी तौर पर शौहरए बीबी के गुजर बसर की जिम्मेदारी ले।

तीन तलाक जैसे रिवाज से मुस्लिम समाज में औरतों की हैसियत दोयम दर्जे की होकर रह गई है। इस सिस्टम ने समाज और परिवार दोनों में मुस्लिम ख्वातीनं की हालत बहुत कमजोर बना दी है। समाज का एक छोटा हिस्सा इस दलील के साथ इस रिवाज को रोकने की कोशिशों की मुखालिफत करता है कि मजहब के अंदरूनी मामले में दखल नहीं देना चाहिए। उनके लिए शरीई कानून ही अव्वल है। मजहब के यह खुदमुख्तार ठेकेदार कुरआन की आयतों की अपनी सहूलयत के हिसाब से तशरीफ कर समाज को अपने हिसाब से कंट्रोल करने की कोशिश करते हैं। मर्द भी यह नहीं चाहते कि उनके इस मनमाने अख्तियार पर किसी भी तरह की कोई पाबंदी हो। अगर उनके इस अख्तियार पर पाबंदी लग गईए तो वह कैसे औरतोें को अपने बस में रख पाएंगे घ् औरतों का इस्तेहसाल किस तरह से कर पाएंगे घ् लिहाजा जब भी तीन तलाक रिवाज में सुधार की बात आती हैए तो यह चंद मुट्ठी भर लोग शरीअत और मजहब का हवाला देकर सुधारों की मुखालिफत करने लगते हैं। यह मुखालिफत देखकर सरकार भी अपने बढ़ते कदमों को पीछे खींच लेती है। अच्छी बात यह है कि इस बार मरकज की मोदी सरकार औरतोें के साथ मजबूती से खड़ी रही। अदालत को सौंपे अपने हलफनामे में मोदी सरकार ने यह बात मानी कि तीन तलाकए औरतों को आईन में मिले बराबरी और इज्जत की जिंदगी जीने के हक को चोट पहुचाता है।

तीन तलाक से मुतास्सिर ख्वातीन न सिर्फ मुस्लिम समाज का अटूट हिस्सा हैंए बल्कि सबसे पहले वह हिन्दुस्तानी शहरी हैं। उनके अपने आईनी हुकूक हैंए जिनसे उन्हें महरुम नहीं किया जा सकता। आईन की दफा.14 ;बराबरी का कहद्धए शिक.15 ;मजहबए जातए जिन्स की बुनियाद पर किसी शहरी से कोई भेदभाव न किया जाएद्धए शिक.21 ;जिंदगी और राजदारी के तहफ्फुज का हकद्ध के मुताबिक हिन्दुस्तानी शहरी होने के नाते मुस्लिम ख्वातीन को भी वह हुकूक मिले हुए हैंए जो कि मर्दाें को मिले हैं। बावजूद इसके लगातार उनके जम्हूरी हुकूक को रौंदा जा  रहा है। मुस्लिम ख्वातीन अपने समाज में जिन्सी गैर बराबरी का सामना कर रही हैं। तकरीबन सारी दुनिया में जिसमें पाकिस्तानए बांग्लादेशए इंडोनेशियाए तुर्कीए मिस्रए जॉर्डनए इराकए ईरानए ट्यूनीशियाए मलेशिया और अल्जीरिया जैसे मुस्लिम अक्सरियती आबादी वाले मुल्क हैंए वहां तीन तलाक का मौजूदा ढांचा खत्म हो गया है। इन मुल्कों में डायरेक्ट या इनडायरेक्ट तौर से जबानी तलाक पर पूरी तरह से पाबंदी है। इन मुल्कों में सेक्युलर फैमली कानून हैंए जो सभी पर अमल में आते हैं। लेकिन भारत में आज भी मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने साल 1937 में निकाहए तलाक और विरासत पर जो फैमली कानून बनाए थेए वही ज्यों के त्यों अमल में आ रहे हैं। जबकि इन कानूनों को बने अस्सी साल हो गए हैं। इस दौरान पूरी दुनिया में ख्वातीन की हालत में काफी कुछ बदलाव आया है। अगर मुस्लिम पर्सनल लॉ में कुछ कमी हैए तो उसमें सुधार क्यों नहीं हो सकता घ् फिर तीन तलाक रिवायत की तो कुरआन भी इजाजत नहीं देता। तीन तलाक का कुरआन में कहीं कोई जिक्र नहीं है। तीन तलाकए इस्लाम की तालीम और कुरआन की हिदायतों के बरखिलाफ है। इस्लाम के पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब ने खुद तीन तलाक रिवाज पर अपनी नाराजगी जताते हुए इसे अल्लाह की मर्जी के खिलाफ बतलाया था। कुरान में इस बात का जिक्र है कि अल्लाह इससे नाखुश होता है। तीन तलाक का रिवाजए आईन के हिसाब से तो गलत है हीए कुरआन ने भी इसे गलत बतलाया है। कुरआन में तलाक की जो तशरीह की गई हैए वह तीन तलाक से बिल्कुल मेल नहीं खाती। तीन तलाक की वजह से मुस्लिम ख्वातीन को समाज में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। जो औरत इस दर्दनाक हादसे से गुजरती हैए वही इसका असली गम और दर्द बयान कर सकती है। तीन तलाक का मामलाए अदालत में जाने से पहले अच्छा यह होता कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के औरत और मर्द दोनों मेंबर एक साथ बैठते और तीन तलाक पर गहराई से गौर व फिक्र करते। इस गौर व फिक्र से जो नतीजा निकलता वह बेशक सभी के हक में होता। इस्लामी फिकह के दो अहमतरीन उसूल हैंए पहला तकलीद और दूसराए इज्तिहाद। इज्तिहाद के मायने हैए कुरआन और हदीस में तजाद होने पर अपने शऊर से फैसला करना। इसी इज्तिहाद उसूल के तहत इस्लामी मुलकों में समाजी सुधारों को जायज ठहराया गया और कई अहम सुधार हुए। हमारे मुल्क में भी कई नामी.गिरामी हस्तियां और इस्लाम के जानकार इज्तिहाद के तरफदार हैं और वह चाहते हैं कि मुस्लिम पर्सनल लॉ में इज्तिहाद उसूल के तहत ही जरूरी सुधार हो ताकि ख्वातीन की जिंदगी और भी बेहतर हो। अभी भी वक्त नहीं गुजरा हैए ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और मुस्लिम समाज की बेहतरी से जुड़ी तमाम तंजीमें अगर आगे आकर इस मसले पर मुसबत नजरिए से गौर करेंए तो मसले का मुस्तकिल हल निकल सकता है। कोई भी समाजी सुधार अदालत के डंडे से नहींए बल्कि समाज के अंदर से ही शुरू हो तो ज्यादा बेहतर !