मुसलमानों की लिंचिंग पर लोक सभा में जबरदस्त बहस आरएसएस परिवार पर इल्जाम – हिन्दुस्तान की तस्वीर खराब करके इसे लिंचिंस्तान मत बनाइए

मुसलमानों की लिंचिंग पर लोक सभा में जबरदस्त बहस आरएसएस परिवार पर इल्जाम – हिन्दुस्तान की तस्वीर खराब करके इसे लिंचिंस्तान मत बनाइए

नई दिल्ली! मुल्क के मुख्तलिफ प्रदेशों खुसूसन भारतीय जनता पार्टी की सरकारों वाले प्रदेशों में मुसलमानों की लिंचिंग यानी उन्हें पीट-पीट कर मार डालने के वाक्यात अक्सर होते रहते हैं। कहीं गौरक्षा के नाम पर तो कहीं हिन्दू मजहब की हिफाजत के नाम पर तो कहीं बच्चा चोरी के शक में। लोक सभा में 31 जुलाई को इस मसले पर लम्बी बहस हुई बेश्तर (अद्दिकांश) मेम्बरान ने लिंचिंग के लिए आरएसएस कुन्बे की तंजीमों को ही जिम्मेदार करार दिया और इल्जाम लगाया कि इस किस्म की हिंसा करने वालों की पर्दे के पीछे से हौसला अफजाई की जा रही है। कांग्रेस लीडर मल्लिकार्जुन खड़गे ने तो यहां तक कह दिया कि यह हिन्दुस्तान है इसे हिन्दुस्तान ही रहने दीजिए इसे ‘लिंचिंस्तान’ में तब्दील मत कीजिए। इस मसले पर बोलने वाले कुछ मेम्बरान की बातों के कुछ हिस्से हम यहां अपने कारईन (पाठकों) के लिए पेश कर रहे हैं।

कांगे्रस लीडर मल्लिकार्जुन खड़गे ने बहस की शुरूआत करते हुए कहा कि मैडम स्पीकर शुक्रिया अदा करता हूं कि आपने मुझे रूल 193 के तहत अपनी बात रखने और खासकर माब लिंचिंग इश्यू पर अपने ख्यालात जाहिर करने के लिए वक्त दिया। इस देश में किसी का भी कत्ल या किसी का खून हो या माब लिंंिचग हो वह काबिले मजम्मत है, चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान हो, चाहे वह सिख हो, चाहे ईसाई हो, या किसी कम्युनिटी का हो चाहे वह दलित हो, चाहे महिला हो, किसी भी शख्स का माब लिंचिंग करना और कानून अपने हाथ में लेना और उसको मारना काबिले मजम्मत है। इसीलिए मैं मजम्मत करता हूं।

आज पूरे देश में खौफ और दहशत का माहौल है। उसमे पूरी दुनिया में हिन्दुस्तान की तस्वीर (छवि) खराब हो रही है। कई शहरों में भीड़ की हिंसा और कत्ल का सिलसिला थम नहीं रहा है। कानून का बंदोबस्त हर जगह बिगड़ता जा रहा है। यह इसीलिए बिगड़ता जा रहा है कि जो शख्स मारा जा रहा है क्या इन लोगांें को मजहब के नाम पर गौकुशी के नाम पर हर जगह एक ही मजहब के लोगों का कत्ल हो रहा है। इस देश में जम्हूरियत है या नहीं है आखिर इस देश में सरकार है या नहीं यह सवाल आज लोगों के सामने है। मैं आपसे कहूंगा कि गौकुशी के लिए कानून है संविद्दान के ‘डायरेक्टिव प्रिंसिपल’ में जो आर्टिकल है उसके लिए सभी को फख्र है क्योंकि उस आर्टिकल के मुताबिक ही सभी प्रदेशों में कानून बनते हैं और कुछ प्रदेशों में यह कानून बन चुके हैं लेकिन चंद प्रदेशों मे ऐसे कानून नहीं है। फिर ऐसे वाक्यात क्यों हो रहे हैं? इसके पीछे कौन है इसका खुलासा होना चाहिए। चंद तंजीमें (संगठन) इसे बढावा दे रही हैं और हौसला अफजाई कर रही हैं। मैं यह नहीं कहूंगा कि वह डायरेक्टली कर रहे हैं लेकिन पर्देे के पीछे से चाहे वह वीएचपी हो या बजरगदल हो या गौरक्षक हों यह सारी तंजीमंे (संस्थाएं) बीजेपी से जुड़ी हुई हैं। खासकर बीजेपी के मेम्बरान असम्बली और मेम्बरान पार्लियामंेट भी सपोर्ट कर रहे है। मैं उनके बयान भी आपके साथ पढकर बताऊंगा कि ऐसी चीजें मोदी जी के नए भारत मंे कट्टरपंथी ख्यालात के लोग बेगुनाह लोगों को मौत के घाट उतार रहे हैं।

उन्होने कहा कि इन वाक्यात से देशप्रेमी और इसंानियत पसंद अवाम को बड़ा द्दक्का लगा है। संविद्दान का आर्टिकल 21 इस देश के हर शहरी को जीने का हक यानी राइट टू लाइफ देता है। जबसे देश मंे एनडीए सरकार के कदम पड़े हैं तबसे ऐसे कम्युनल और क्रिमिनल वाक्यात हो रहे हैं जिसकी सीद्दे या पर्दे के पीछे से हुकूमत की जानिब से हौसला अफजाई की जा रही है। यह मैं जरूर कहूंगा.. जब ऐसे वाक्यात होते हैं इसके लिए वजीर-ए-आजम अपनी बात नहीं कहते हैं अपने मन की बात कहते है।

स्पीकर साहिबा, हमें आजादी मिले 70 साल हो गए हैं लेकिन 70 सालों में ऐसे वाक्यात कभी नहीं हुए। बहुत से वाक्यात होते हैं भीड़ के हाथों लोग मारे जाते हैं ऐसा कभी सियासी वजह से तो कभी दूसरे इश्यूज पर होता है। द्दर्म के नाम पर, गाय के नाम पर, गौरक्षा के नाम पर ऐसा वाक्या कभी भी इस देश में नहीं हुआ। वजीर-ए-आजम कहते हैं यह गौतम बुद्ध, महावीर, गुरू नानक, गांद्दी जी और सूफी संतों का देश है। यहां अम्न और खुशहाली से रहना है हमेशा पैगाम देते है। हमारा देश सदा से भाईचारे के लिए मशहूर रहा है। भाई चारे के लिए आज तक बाबा-ए-कौम (राष्ट्रपिता) गांद्दी का संदेश लेकर दुनिया मे हम जाते रहते है। हमारी इज्जत भी होती है और जब गांद्दी का नाम लेते हैं तो सभी उनसे सीखने की बात कहते है। आज हम गौतम बुद्ध को भूल गए, महावीर को भूल गए, गुरू नानक को भूल गए, बश्वेश्वर को भूल गए, नारायण गुरू को भूल गए। इन सबको भूल कर           कानून अपने हाथ में लेकर माइनारिटी (मुसलमानों) दलितों और ख्वातीन को कत्ल कर रहे है। इन कत्ल वाक्यात के पीछे मैं खासकर कहूंगा और जोर से कहूंगा।

मल्लिाकार्जुन खड़गे ने कहा कि जात और द्दर्म के नाम पर हमें यह नहीं करना चाहिए। आज हमारे देश में यह हो रहा है हिन्दू हिन्दू को मार रहा है हिन्दू मुसलमान को मार रहा है। मुसलमान मुसलमान को मार रहा है जम्मू-कश्मीर में ऐसे वाक्यात हुए। यह वाक्यात क्यों हो रहे हैं? इसके पीछे क्या बात है? आपकी आइडियोलाजी, फिलासफी, आप जिस फिलासफी की बात करना चाहते हैं इम्पलीमेंट करना चाहते है उसे लाने के लिए यह सब चीजें हो रही है। एक तरफ तो आप कहते हैं कि जो भी ऐसा काम करेगा माब लिंचिंग करेगा गौरक्षक कोई भी ऐसा करेगा उसके ऊपर एक्शन लेंगे कडी से कड़ी सजा देंगे। आपने कहा वह गुण्डे लोग हैं हम गुण्डे लोगों को कभी सपोर्ट नहीं करते है वह हमारे से जुडे नहीं है। लेकिन क्या आपने एक्शन लिया? किसी के खिलाफ एफआईआर की? कितने लोग जेल में हैं? मैं पूछना चाहता हूं कि कितने लोगों को आपने इंक्वायरी करके हैग किया, इम्प्रिजनमेंट किया? इसी के साथ माब लिंचिंग के कई वाक्यात उन्होने तफसील से बताए।

उन्होेने कहा कि आपने क्या एक्शन लिया? हम इस एवान के लीडर से, प्राइम मिनिस्टर से पूछते हैं कि आपने क्या एक्शन लिया? आप हमेशा कहते हैं कि एक और करते हैं दूसरा। आप एक्शन नहीं लेते हैं। मैं 2016 की बातें नहीं पढ रहा हूं। झारखण्ड और मध्य प्रदेश माब लिंचिंग  सेटर बन गए हैं। हर जगह ऐसा हो रहा है। झारखण्ड के झाबर गांव में दो कैटल व्यापारियों मोहम्मद मजलूम और इनायतुल खान की लाशे पेड़ से लटके मिली। ट्रक ड्राइवर बल्कार सिंह जो हिन्दू थे। भैंसों को ले जा रहे ट्रक को रूपनगर-पुराली रोड पर रोक लिया गया। ट्रक ड्राइवर बल्कार सिंह जो हिन्दू थे को जमकर पीटा गया।

उन्होने कहा कि दुनिया में हिन्दुस्तान की एक अहमियत है और तस्वीर है आप इसे खत्म मत कीजिए। हिन्दुस्तान को लिंचिंस्तान मत बनाइए। यह सरकार अकलियत मुखालिफ है दलित मुखालिफ है और ख्वातीन के खिलाफ है। यूपी के सहारनपुर में एक एमपी ने खुद अपने सीनियर पुलिस कप्तान के घर जा कर उनके परिवार पर हमला किया। उस वक्त एसएसपी  का परिवार अकेला था। उसके परिवार के लोग भाग कर गौशाला में छिपे। जब एसएसपी ने इसकी रिपोर्ट की माननीय सांसद के खिलाफ एक्शन लेने के बजाए एसएसपी को वहां से हटा दिया गया। जो एसएसपी कानूनन काम करता है उसको वहां से हटा दिया गया। लेकिन जो लोग कानून अपने हाथ में लेकर उनके घर पर जाकर अटैक करके जिस जगह वह गाय बांद्दते हैं उस जगह जाकर वह अपनी रक्षा किए। उस एसपी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई।

सीपीएम के मोहम्मद सलीम ने कहा कि आज मुद्दा है कि मुल्क मंे लोगों को पीट-पीट कर मार डालने (लिंचिंग) और गरोहों के हाथों बेगुनाह लोगों पर मजालिम और हिंसा हो रही है। मैं मुद्दे की ही बात को रखना चाहूंगा। मिनिस्टर साहब ने भी इस सिलसिले में अपनी बात कही। जब आप नहीं थीं तब वजीर साहब ने एक कांक्रीट सुझाव दिया था कि जिस तरह से माब लिंचिंग हो रही है इसके लिए मजम्मत की तजवीज (निन्दा प्रस्ताव) हो। दूसरी बात आईपीसी मे तरमीम (संशोाद्दन) करके माब लिंचिंग को शामिल करके एक कानून बनाया जाए और रियासती सरकारों को हिदायत दी जाए कि ऐसे जरायम होने के 24 घंटे के अंदर मुल्जिमान को पकड़ा जाए और जल्दी से जल्दी सजा देने का बंदोबस्त किया जाए। अगर सरकार यही कहे कि उनके वजीर जो कहंे उसी को ही मान लेते हैं तो उसे आफिशियल रेजोल्यूशन की तरह मान लेते हैं। हमेें कोई दिक्कत नहीं है। मैं आंकड़ों में नहीं जाऊंगा क्योंकि इसे लेकर झड़प भी हो गई है। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो कहता है कि माब लिंचिंग चूंकि आईपीसी में नहीं है इसलिए उसे अलग केटेगरी में डालते नहीं हैं और सभी वाक्यात रिपोर्टेड भी नहीं होते हैं इसलिए उनके पास कोई आंकडा नहीं है। अभी हमारे शिव सेना के साथी ने कहा व्हाट्स एप का मामला है जो सोशल मीडिया में हो रहा है। वह सच गढते हैं और सप्लाई करते हैं और घूमते रहते हैं तो इससे भी ज्यादा परेशानी बढ जाती है इसके लिए भी हमें होशियार रहना चाहिए। लेकिन ज्यादा अफसोसनाक यह है कि हिंसा हमारे मुल्क के अंदर हो रही है। देश, विदेश, सरहद वगैरह तो है लेकिन देश के अंदर हम क्या चाह रहे हैं क्या हम मिलिशिया चाहते हैं, आम्र्ड फोर्स, प्राइवेट आम्र्ड ग्रुप्स चाहते हैं और वह कत्ल करें। आखिरकार हकीकत क्या है। शहरियों के खून से साथ रहने वालों के हाथ रंगे जा रहे हैं। हम पूरे देश की बात कर रहे हैं। मोहम्मद सलीम ने कहा कि आप इद्दर-उद्दर की बात मत कीजिए। हमें हकीकत का सामना करना पडेगा। मैं शायरी नहीं करूंगा। क्योंकि यहां मुशायरे का माहौल नहीं है। जब हम खून की बात कर रहे हैं कत्ल की बात कर रहे हैं माब लिंचिंग की बात कर रहे हैं भीड़ के जरिए बेगुनाह और निहत्थे लोगों के कत्ल की बात कर रहे हैं मैं नहीं समझता कि यहां वाहवाही का माहौल बने। यहां हंसी-मजाक की बात भी हो गई है। पूरा देश देख रहा है कि जो लोग मारे जा रहे हैं जिनपर हमले हो रहे हैं उनके लिए हम कितने हस्सास (संवेदनशील) हैं। जिनके ऊपर जुल्म हो रहा है उनके लिए कुछ संजीदगी भी होनी चाहिए।

इस मसले पर आज बहुत अफवाहें हैं। चाइल्ड लिफ्टर्स की बात में भी अफवाहें होती हैं। पहले हमारे देश मे किसी को डायन कह देते थे। इन अफवाहों के जरिए जो भीड़ इकट्ठा होती है मैं सिर्फ उस भीड़ को ही मुल्जिम नहीं मानता हूं। यह एक माइंडसेट की बात है। इसका अपना मआशी (आर्थिक) पहलू, समाजी पहलू, सियासी पहलू और साइकोलाजिकल पहलू है। इसके कोई तो इंस्टीगेटर यानी उकसाने वाले होगे? कोई तो  इसके मोटिवेटर होंगें? यहां कई मेम्बरान कहते हैं कि इसके लिए कुछ लोगों के जरिए पैसा भी दिया जाता है। शिव सेना के ‘सामना’ की मिसाल देकर हमारे सत्पथी जी ने कहा कि बिला वजह कोई वाक्या पेश नहीं आता ऐसे किसी वाक्ए के होने पर उसे ‘माब’ का नाम देकर कुछ लोग कहते हैं कि लोगों के गुस्से में आ जाने की वजह से भीड़ का वक्ती रिएक्शन हो गया। ऐसा नहीं है। इसके पीछे एक लम्बी कतार है। उन्होने कहा कि समाज के हर तबके को इस बारे में सोचना होगा। मैं समझता हूं कि यह हमारे देश में नया नहीं है। इसके बारे में न्यूयार्क टाइम्स ने जो कहा मैं उसे यहां कोट नहीं कर रहा हूं। आप जिन विदेशी मैगजीन्स को तस्लीम करते हैं वह भी इस बारे में कहती हैं।

अमरीका में भी पिछली सदी में सैकड़ों की तादाद में माब लिंचिंग के केस हुए हैं। ऐसा ही एक केस पिछले साल लातेहार मे हुआ था जिसमें दो बच्चे मारे गए थे। उन बच्चों के नाम ‘मजलूम’ और ‘आजाद’ थे। आजाद भी अब मजलूम हो रहा है। हो सकता है कि अगर उस वक्त इस वाक्ए ने हमारी सेंस्टिेविटी को झकझोरा होता तो बात इतनी आगे तक न बढी होती। लेकिन हम खामोश रहे। 1911 में टेक्सिस में भी कुछ इसी तरह का वाक्या पेश आया था अगर आप उस वक्त के फोटो देखेगे तो उनमें वाइट सुप्रीमेसी दिखाने के लिए दो ब्लैक बच्चों को पेड़ से मारकर लटका दिया गया था। झारखण्ड के लातेहार में भी उसी तरह से दो बच्चों को मारकर लटका दिया गया था।

दस दिनों से इंतजार करते हुए आज चर्चा करने का मौका मिला है। यह चर्चा तो 2014 मे ही होनी चाहिए थी जब मोहसिन शेख को पुणे में कत्ल कर दिया गया था। उस वक्त पूरा मुल्क खामोश रहा। अखलाक के मामले में क्या हुआ?  पहलू खान के मामले में क्या हुआ? मैं यकतरफा बात नहीं कर रहा हूं। कश्मीर के डीएसपी अय्यूब पंडित को भी इसी तरह कत्ल किया गया यानी लिंचिंग करके। अय्यूब पंडित डीएसपी का आज तक क्या नतीजा निकला? अभी सीआरपीएफ के ट्वीटर में एक वीडियो वायरल हुआ है जिसे हमने देखा है। उसमें एक सीआरपीएफ जवान नमाज पढ रहा है और उसका दूसरा साथी हथियार के साथ खड़े होकर उसके लिए पहरा दे रहा है। यह है हिन्दुस्तान लेकिन हम कौन सा देश बनाना चाह रहे हैं? ऐसा करके हम कहां जाएंगे? वह अपने द्दर्म का पालन कर रहे हैं। सीआरपीएफ में कई मुस्लिम जवान भी होंगे। मैं यह नही कह रहा हूं कि जम्मू-कश्मीर मे किस की सरकार है या किस की नहीं। अस्ल सवाल यह है कि आखिर हम इससब से क्या सीख ले रहे हैं? कई बातों के ‘वाट-अबाउट्स’ भी होते हैं कि यह बात पांच साल या दस साल पहले भी हुई थी। मिनिस्टर साहब ने 1984 की बात कही है। हम 2002 के गुजरात की बात कर सकते हैं। लेकिन हमे ऐसा नहीं करना है।

मोहम्मद सलीम ने कहा कि मैडम, जफर खान को जिस तरह कत्ल किया गया आप खातून हैं आप तो इस बात को समझेगी। स्वच्छता अभियान चल रहा है। लोग ओपन मंे शौच क्यों जाते हैं? एक खातून जब खुले में शौच के लिए जाती है तो उसे गैरत होती है। जब म्युनिसिपल वर्कर्स उसका फोटो निकाल रहे थे तो सोशल एक्टिविस्ट ने एतराज किया था जिसकी वजह से उसे कत्ल कर दिया गया था। इसी तरह से दिल्ली में रवीन्द्र कुमार ई-रिक्शा ड्राइवर ने पेशाब करने पर एतराज किया तो उसको कत्ल कर दिया गया। मैं यह कह रहा हूं कि जब कत्ल होता है या माब लिंचिंग होती है और उसको कोई जस्टिफाई करता है तो वह सिर्फ एक नजरिए से नहीं होता है एक तरफ से नहीं होता है। इसको आप ला एंड आर्डर का मसला मत समझिए। हम अपने दिमाग को कहां ले जा रहे हैं? हमें दिमाग को सही रखने की जरूरत है।

अभी-अभी ‘नाट इन माई नेम’ कहा गया। अगर कोई कत्ल कर रहा है तो हमारे नाम से क्यों करे? अगर कश्मीर का कोई दहशतगर्द कत्ल करता है तो वह मुसलमान के नाम से क्यों करे? वह सिर्फ कातिल हैं। अगर कोई जुनेद को कत्ल कर रहा है तो वह हिन्दू द्दर्म की हिफाजत के नाम पर क्यों करे? वह सिर्फ कातिल है। हमारे देश की सरकार हो अपोजीशन के लोग हो या सहाफी हों सभी को यह कहना चाहिए कि कातिल, कातिल हैं। वह जो कवर लगाया जाता है वह गलत है। वह नजरिया गलत है। जो इसको प्रमोट करता है। मैं समझता हूं कि खतरा वहीं से पैदा हो रहा है। मैं विदेश के लिए नहीं बोल रहा हूं मैं देश के लिए बोल रहा हूं। वजीर-ए-आजम ने खुद ही कहा है कि ‘यह देखकर मुझे बहुत गुस्सा आता है कि लोग गौरक्षा के नाम पर दुकानें चला रहे हैं। कुछ लोग रात के वक्त गैरकानूनी कामांे में मुलव्विस रहते हैं और दिन में वह गौरक्षकों का लबादा ओढ लेते हैं।’

कोई भी फिरकावाराना मामालात में मजहब के नाम पर चादर ओढ लेता है। अफगानिस्तान में अगर इस्लाम ज्यादा है तो वहंा इस्लाम की चादर ओढ लेंगे पाकिस्तान में भी ओढ लेंगे बांग्लादेश में ओढ लेंगे लेकिन हम तो भारत के शहरी हैं। हमारा देश सोशल रिपब्लिक जम्हूरी देश है। हमारे यहां जम्हूरियत है फिर हम इस बात को क्यों कहते हैं कि वहां यह हो रहा है वहां वह हो रहा है। यह सब जरायम एक दिन में नहीं हुए हैं। 2010 से सबसे बड़ी बात समझ की होती है। केरल के वजीर-ए-आला ने सभी को साथ लेकर अम्न कायम करने के लिए बात करने के लिए कहा है। क्या यह काम वजीर-ए-आजम नहीं कर सकते हैं? क्या यह काम उत्तर प्रदेश के वजीर-ए-आला नहीं कर सकते हैं? क्या यह काम दूसरे प्रदेश के लोग नहीं कर सकते हैं? सिर्फ मजम्मत करने से यह नहीं होगा। अम्न के लिए कोशिशें करना होगीं। सियासी कत्ल की बात अलग है। आज पच्छिम बंगाल के दार्जिंिलंग में तीन लोगों का कत्ल गाय की चोरी के नाम पर किया गया। दार्जिलिंग में आपके एमपी जाते हैं। मैं उन तीनों के घर गया था। मैं नसीरूद्दीन, समीरूद्दीन के घर गया था।

मोहम्मद सलीम ने कहा कि वजीर-ए-आजम दुनिया भर में कहीं भी कुछ होता है तो ट्वीट करते हैं अगर 2014 में ही वह कह देते कि मोहसिन शेख का कत्ल द्दर्म के नाम पर गलत है तो उसका असर दूसरा होता। लेकिन वजीर-ए-आजम जिस दिन बयान दे रहे थे उसी दिन झारखण्ड में कत्ल किया जा रहा था। जुनेद के घर मैं गया था। उसकी वालिदा सायरा से मैं वादा करके आया था कि यह मामला मेैं पार्लियामेट में रखूंगा कि किस तरह उसको कत्ल किया गया।

मरकजी वजीर राम विलास पासवान ने तकरीबन आरएसएस की ही जुबान बोली और अस्ल मसले को डायवर्ट करते हुए कहा कि हमारे देश मंे बेईमानी एक अहम मुद्दा था लेकिन आज बेईमानी पर बोलने के लिए इनके (अपोजीशन के) पास कोई मुद्दा नहीं है। आप बेईमान लोगों से समझौता कर रहे हैं। हमारे खिलाफ बेईमानी का आपके पास कोई मुद्दा नहीं है। तरक्की के नाम पर भी आपके पास कोई मुद्दा नहीं है। खड़गे साहब का जो मौजूअ है कि दलितों पर जुल्म, इसपर भी इन्होेने ज्यादा कुछ नहीं कहा। क्योंकि वजीर-ए-आजम ने एक दलित को राष्ट्रपति बना दिया है। वह मामला फ्यूज हो गया। पिछडी जात से उपराष्ट्रपति बनने जा रहा है। सोशल मुद्दा खत्म हो गया है और एक ही मुद्दा सिर्फ गौरक्षकों का बचा है। कम्युनिटी की आड़ में हथियार चलाने का आप काम कर रहे हैं। आपने कहा कि संविद्दान की दफा 48 के मुताबिक इस देश में 29 प्रदेश जिनमें पांच यूनियन टेªटरीज हैं यहां गौकुशी कानून लागू है। आपने कहा कि गौरक्षक के नाम पर क्या कार्रवाई हो रही है। मैं कहना चाहता हूं कि दोनों चीजें एक साथ नहीं चल सकती हैं। आप एक तरफ फेडरल स्ट्रक्चर की बात करें और दूसरी तरफ प्रदेश के मामलात को मरकज पर डालने का काम करें। हमें इस बात की खुशी होती कि एक लफ्ज यह कहा जाता कि रियासती सरकारों को क्या करना चाहिए। मैं अंगे्रजी समझने वालों के लिए बोलना चाहता हूं कि वजीर-ए-आजम ने एक बार नहीं दो-दो बार कहा कि कुछ समाज दुश्मन अनासिर गाय के नाम पर हिंसा कर रहे हैं। कोई वजीर-ए-आजम इससे ज्यादा क्या कर सकता है? पासवान ने मुसलमानों की लिंिचग को ज्यादा तवज्जो नहीं दी। और 1984 में हुए सिखांे के कत्लेआम पर तफसीली तकरीर करने लगे।

मोहम्मद असरार उल हक ने कहा कि मोहतरमा स्पीकर साहिबा, आपने मुझे माब लिंचिंग जैसे अहम टापिक पर बोलने का मौका दिया मैं आपका बहुत-बहुत शुक्रिया अदा करता हूं। इज्जत मआब, मैं आपके जरिए वजीर-ए-आजम मोदी जी की खिदमत मंे शुरू मंे यह अर्ज करना चाहता हूं कि हमारे चैथे खलीफा हजरत-ए-अली ने एक बात कही थी कि इस कायनात को पैदा करने वाले की नाफरमानी करने वाली हुकूमत चल सकती है लेकिन जुल्म व सितम पर आंख बदं करने वाली हुकूमत नहीं चल सकती है।

इज्जत मआब, हमारे वजीर-ए-आजम बार-बार यह दावा करते रहे हैं कि वह 125 करोड़ हिन्दुस्तानियो ंके वजीर-ए-आजम हैं उनके सीने में 125 करोड़ हिन्दुस्तानियों का दर्द है मगर उनके कौल व फेअल (कथनी और करनी) में तजाद नजर आता है उनकी कथनी और करनी में फर्क महसूस होता है। आज पूरे मुल्क में दलितों, मुसलमानों और आदिवासियों और कमजोर तबकों को तशद्दुद व कत्ल व गारत का निशाना बनाया जा रहा है। हर तरफ समाज दुश्मन अनासिर और तखरीबकारों के हौसले बुलंद है। वह यह मानकर चल रहे हैं कि वह जिसे चाहे मारेंपीटें, जिसे चाहंे मार डाले उनका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता। वह खुलेआम मुल्क के आईन और आईनी कद्रों की द्दज्जियां उडा रहे हैं यहीं की जम्हूरी कद्रों को तबाह व बर्बाद कर रहे हैं। मुश्तइल हुजूम कानून को अपने हाथ में लिए हुए कत्ल ओ गारत पर उतारू है। अखलाक से लेकर जुनैद तक दर्जनों बेकसूरों को खूनी हुजूम के जरिए पीट-पीट कर कत्ल किया जा चुका है और यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। मुल्क अदम तहम्मुल और सख्तगीरी की तरफ तेजी से बढता जा रहा है। तास्सुब गहराता जा रहा है और हिन्दुस्तानी आईन की कसम खाने वाली मोदी सरकार मंजरे आम से गायब है। वह न सिर्फ खामोश तमाशाई बनी हुई है बल्कि वह बेबस नजर आ रही है। इज्जत मआब, मुल्क में जारी बेगुनाहों की मारपीट और खूंरेजी पर अपनी साख की खातिर हमारे वजीर-ए-आजम कभी कुछ मुबहम और गैर वाजेह बयान देकर अपनी आईनी जिम्मेदारी रस्मी तौर पर निभा देते हैं। जिसमें नेक नीयती का शदीद फुकदान नजर आता है। खुद उनके काबीना के वजीर कभी-कभी अपने आईनी हलफबरदारी का भी पास न रखते हुए ऐसे इश्तेआल अंगेज और गैरजिम्मेदाराना बयानात देते हैं जिनसे शरपसंद अनासिर के हौसले मजीद बुलंद हो जाते हैं। वजीर-ए-आजम की जिम्मेदारी सिर्फ बयान देने की नहीं बल्कि उनकी अस्ल जिम्मेदारी समाज दुश्मन अनासिर के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की है। वजीर-ए-आजम की हैसियत से एक तरफ अगर वह रियासत की सरकारों को हिदायत देते कि गाय के नाम पर बेगुनाह इंसानों को मारपीट करने वालों को सख्त सजा दी जाए और दूसरी तरफ  बीजेपी के असरदार लीडर होने की हैसियत से शरपसंद अफराद और झूटे गौरक्षकों को वार्निग देते और उन्हें अपनी सरगर्मियां रोकने का हुक्म देते तो शायद इतनी गारतगरी नहीं होती। गौरक्षा के नाम से खूनी हुजूम के जरिए मारपीट और कत्ल के वाक्यात पर मोदी सरकार के अब तक के तर्जे अमल से जाहिर होता है कि वह उन्हें नजर अंदाज कर रही है। उसे बस ला एड आर्डर के मसले के तौरपर देख रही है। जबकि हकीकत यह है कि  यह वाक्यात उस इंतेहा पसंदाना जेहनियत का नतीजा है जो न सिर्फ मुल्क की हंगामी बल्कि आनी बरतरी के लिए भी सख्त नुक्सानदेह साबित है। इज्जत मआब, मुल्क के मौजूदा हालात में ऐसे लोग जिनके सर पर टोपी और जिनके चेहरे पर दाढी है कहीं निकलते हुए घबराते हैं आज बुर्का वाली मां बहने बाहर निकलते हुए डर जाती हैं टेªनों और बसों मंेे शरपसंद चढते हैं और टोपी दाढी और बुर्के पर जुमले कसते हैं। अगर कोई जवाब दे दे तो उसपर टूट पडते हैं। अपने ही मुल्क के अंदर और अपने ही शहरियों के साथ यह कैसा सुलूक हो रहा है। ऐसा महसूस होता है कि मुल्क में कानूनी इंतजाम और इंसाफ की रवादारी (सहिष्णुता) और अम्न व एहतराम जैसी कोई चीज नहीं बाकी रह गई है। मैं आपके जरिए वजीर-ए-आजम से मतालबा कर रहा हूं कि आप इस खौफनाक सूरतेहाल को तब्दील करने के लिए मजबूत और असरदार कदम उठाइए। इस अजीम मुल्क को दुनिया में बदनाम नहीं होने दीजिए इस मुल्क की गंगा जमुनी तहजीब को तबाही से बचा लीजिए। यहां की रवादारी और भाईचारा की कदीम रिवायत को तबाह करने वाले अनासिर को कानून के शिंकजे में लाइए और 2014 से 2017 तक खूनी हुजूम के जरिए कत्ल व गारत के जितने भी वाक्यात हुए हैं उनमें मुजरिम के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई है हाउस के फलोर पर बताइए। इज्जत मआब, मैं मुल्क के तमाम शहरी सेक्युलरिज्म और जम्हूरियत पर यकीन रखते हैं जो हिन्दुस्तान की आईन से गहरी अकीदत रखते है, आजादी इंसाफ और बाराबरी के अलमबरदार है। वह मुल्क में अम्न और इंतजाम की मौजूदा बिगड़ी हुई सूरतेहाल से सख्त बेचैन और रंजीदा है। उनको यह दुख सता रहा है कि गांद्दी का हिन्दुस्तान आखिर किस रास्ते पर जा रहा है। क्या इसी हिन्दुस्तान का ख्वाब आजादी के मतवालों ने देखा था हिन्दुस्तान की आजादी की जद्दोजेहद मंे मुल्क के सभी तबकांे के लोगों ने बढ चढकर हिस्सा लिया था। लेकिन मुसलमानों ने जिस जोश औेर जज्बे के साथ आजादी की लड़ाई लडी उसकी मिसाल नहीं मिलती। आज आजाद हिन्दुस्तान में दलितों, आदिवासियों, मुसलमानों और कमजोर लोगोे का जीना दूभर किया जा रहा है। इस अफसोसनाक सूरतेहाल से मुल्क के सभी इंसाफ पसंद अवाम बेहद दुखी हैं और बिला शुब्हा मुल्क का जमीर अभी जिंदा है मोहब्बत को नफरत पर आज भी गलबा हासिल है और यह बात डंके की चोट पर कही जा सकती है कि घनी रात हो नफरतों मोहब्बत के जुगनू चमकते रहेंगे। बहुत-बहुत शुक्रिया।

भगवंत मान ने कहा कि यहां जो बहस दोनों फरीकैन की तरफ से चल रही है मैं सुन रहा था। जिस प्रदेश में बीजेपी की सरकार है उन सूबों में कत्ल हुए हैं या माब लिंचिंग हुई है उसकी फेहरिस्त जारी कर दी गई उद्दर से कर्नाटक, केरल, बंगाल जहां अपोजीशन की सरकारें हैं फेहरिस्त जारी कर दी गई। असलियत में केरल, कर्नाटक दार्जिलिंग कहीं भी हो इंसान का कत्ल हुआ है। गुरू ग्रंथ साहब की वाणी में लिखा है-‘अव्वल अल्लाह नूर उपाया/कुदरत के सब बंदे। एक नूर ते सब जग उपजया/ कौन भले कौन मंदे।’

जब भी भीड़ हिंसक होती है तो अकलियतंे ही ज्यादा शिकार क्यों होती हैं? दलित, कमजोर तबके ही शिकार क्यों होता है? इसका मतलब है कि भीड़ का मास्टर माइड कहीं और बैठा होता है। उस भीड़ का  ‘राजनीतिकरण’ हो चुका होता है।

पुलिस का राजनीतिकरण इस मामले में बहुत बड़ा रोल अदा करता है। आज छोटी छोटी बातों के लिए द्दरना देना पड़ता है। सरकारी दफ्तरों का घेराव करना पड़ता है। अभी भी जंतर-मंतर पर चले जाइए हजारों लोग बैठे हैं। यहंा तक कि अपने घर वालों की लाशों को सड़कों पर रख देते हैं कि आखिरी रसूमात तब तक नहीं करेगे जब तक केस दर्ज नहीं होगा। केस क्यों दर्ज नहीं होता क्योंकि पुलिस अपने सियासी आकाओं की हां या ना की इजाजत का इंतजार करती है फिर कहीं जाकर एडमिनिस्टेªटिव या पुलिस अफसर आता है और केस दर्ज होता है। अगर पहले कानून अपना रास्ता अख्तियार करता तो उस भीड़ को इकट्ठा होने की जरूरत ही नहीं पड़ती। जब भी कोई भीड़ अम्न के साथ द्दरना देती है जैसे पंजाब में श्रीगुरू ग्रंथ साहब की बेअदबी के वक्त बहवलकलां में हुआ था कीर्तन करती हुई भीड़ पर गोलियां चला दी गई और एफआईआर मंे लिखा कि नामालूम पुलिस मैन। पुलिस को हर गोली का हिसाब देना पड़ता है। सब पता होता है कि कौन थे। इस तरह की बातें होती हैं।

मैं कहूंगा कि लीडरान के उकसाने वाले बयान भीड़ को उकसाते हैं। बड़े लीडरान के छोटे बयान आते हैं बहुत बडे कत्ल हुए हैं दंगे हुए हैं। ‘अल्लाह वालो, राम वालो, अपने मजहब को सियासत से बचा लो। एक ही रहने दो शहीदों का तिरंगा झंडा, हर रोज नए झंडे में डंडा फंसाने वालो।’

बदरूद्दीन अजमल ने कहा कि इस्लाम में सिखाया गया है कि अल्लाह तआला कहता है सारी दुनिया, एक कीड़ा-मकोड़ा और एक इंसान मेरी फैमली के लोग हैं सारे मेरे बच्चे है इनके साथ जो भी अच्छाई करेगा वह मेरे लिए सबसे ज्यादा अच्छा होगा। यह इतना जबरदस्त इश्यू है  मुझे पूरा यकीन है कि हमारे इन भाइयों में से कोई भी इस माब लिंचिंग में शरीक नहीं है और न ही यह दिल से चाहते है कि माब लिंचिंग हो। आज हम देख रहे हैं अफसोस की बात है कि डिबेट ने ऐसा बना दिया कि जैसे माब लिंचिंग यही करा रहे हैं। हमारा दिल नहीं मानता। आज का माहौल पेश कर रहा है कि ये करा रहे हैं और यह पार्लियामेंट में सपोर्ट भी कर रहे हैं मेरे ख्याल से ऐसा नहीं होना चाहिए। अल्लाह कहता है अल्लाह के घर को तोड़कर टुकड़े-टुकड़े कर दो, यह अल्लाह को पंसद है लेकिन किसी इंसान का दिल न दुखाओ। कोई हिन्दू-मुस्लिम नहीं कहता है सारे उसके बंदे हैं। जहां भी इस किस्म के वाक्यात हो रहे हैं बार-बार नाम दोहराने से कोई फायदा नहीं है मैं अपने भाइयों से कहूंगा इंसाफ और न्याय का दारोमदार आपके ऊपर है।

प्राइम मिनिस्टर साहब कह चुके हैं और वह बार-बार कह रहे है कि इन हमलों को देखने का काम स्टेट का है। उन्होने स्टेट के लिए जितने सख्त अल्फाज कहने थे वह कह दिए। लेकिन उन स्टेट्स में आप लोग बैठे हैं और सब मिनिस्ट्रीज आपकी है। इसलिए आप जोर दें ताकि लोगों मंे इंसाफ का नाम फैले। मोदी जी जो करना चाहते हैं जो मुह से कह रहे हैं वह इसंाफ की बात दुनिया तक पहुचे। यह आपकी  जिम्मेदारी है।

मैं कहना चाहता हूं कि इस किस्म के हस्सास मामलात पर दोनों तरफ से खींचातानी अच्छी नहीं लगती। इससे मुल्क में अच्छा मैसेज नहीं जा रहा है हमें मुल्क में एक अच्छा मैसेज देना चाहिए। क्योंकि हम अवामी नुमाइंदे हैं। आप अल्लाह, ईश्वर, भगवान वगैरह जो भी नाम लीजिए लेकिन ऊपर एक है जो सबको देख रहा है।

असदउद्दीन ओवैसी ने कहा कि स्पीकर साहिबा, पिछले तीन सालों में माब लिंंिचग के जो वाक्यात हमारे मुल्क में पेश आए है उनसे हमारी आंखे खून के आंसू रोती हैं रूह तडपती है जिस्म कांपता है और दिल लहूलुहान होता है। मैं आपसे वाजेह तौरपर कहना चाहता हूं कि यह वाक्यात खत्म नहीं होगे इसलिए खत्म नहीं होंगे क्योंकि यह सरकार रिलीजन को आइडियोलाजी के तौरपर प्रमोट कर रही है जो हमारे संविद्दान के खिलाफ है। जिस दिन यह सरकार रिलीजन को या फेथ को मानेगी आइडियोलाजी तौर पर यह वाक्यात खत्म नहीं होगे।

दूसरी बात मैं यह कह रहा हूं कि यह क्यों खत्म नहीं होेगे क्योंकि जब तक बीजेपी कल्चरल, नेशनलिज्म को मानेगी इस मुल्क मे माब लिंंिचंग होती रहेगी दलित और मुसलमान मारे जाते रहेगे। जिस दिन बीजेपी कास्टीट्यूशनल नेशनलिज्म को अपनाएगी माब लिंचिंग खत्म हो जाएगी। तीसरी बात मैं यह कहना चाहता हूं कि यह सरकार अपनी कांस्टीट्यूशनल ड्यूटी में सरासर नाकाम साबित हुई है। यह सरकार किसी की भी जान बचाने में नाकाम साबित हुई है। इन्हीं के कर्नाटक में लोग मारे गए हैं केरल में मारे जा रहे हैं और पूरे मुल्क में इन्ही की रियासतों में जहां यह एक्तेदार में हैं मुसलमानों और दलितों की टार्गेटेड किलिंग हो रही है। अभी अलीगढ रेलवे स्टेशन पर नजबुल हसन नाम के शख्स जोकि इंजीनियर है उसे रेलवे पुलिस ने पकडा क्यों कि वह शख्स बुर्का पहनकर टेªन में जा रहा था। रेलवे पुलिस ने उससे पूछा कि तुमने बुर्का क्यों पहना है तब उसने कहा कि तीन दिन पहले मुझे लोगों ने मारा था। इसलिए मैंने अपने आपको माब लिंंिचग से बचाने के लिए बुर्का पहना है। यह वाक्या अखबार में आया है। आप इसके लिए जिम्मेदार हैं या नहीं यह आप बता दीजिए। क्या गौरक्षा हिन्दू रिलीजन का एसेंशियल प्रैक्टिस है जिस तरह सिखों मंे पांच क-कार हैं मुसलमानों में रोजा, रमजान, दाढी है। यह फैसला लिया जाए कि गौरक्षा हिन्दू रिलीजन का एसिंशियल पार्ट है अगर इसे आप नहीं कर सकते है तो सुप्रीम कोर्ट को दीजिए। मैं आपको सुझाव दे रहा हूं।

मोहतरमा, मैं आखिरी बात कहने जा रहा हूं। हमारे वजीर-ए-आजम इस्राईल गए। मुझे बहुत खुशी हुई कि वजीर-ए-आजम ने एक यतीम बच्चे को अपने करीब बुलाया। उसपर रहम किया उसपर दस्ते शफकत रखा। मैं आपके जरिए वजीर-ए-आजम से पूछना चाहता हूं कि जिस तरह वजीर-ए-आजम ने मोशे नाम के बच्चे को जिसके वाल्दैन को पाकिस्तान के दहशतगर्दाें ने जान से मार दिया था क्या हमारे वजीर-ए-आजम अपने घर में अखलाक के बेटे को बुलाएंगे जुनेद के भाई को बुलाएंगे अय्यूब खान के खानदान वालों को बुलाएंगे और कर्नाटक मंेे आपके लोगों को मारने वालों को बुलाएंगे। उन्हें बुलाकर वजीर-ए-आजम अपने गले से लगाएं। अगर मोशे को गले से लगा सकते हैं तो यहां पर जिन लोगों ने उन्हें मारा वह भी टेररिस्ट से कम नहीं है। मैं अर्ज करना चाहता हूं कि जुनेद के वाक्ए में एफआईआर में लिखा गया कि उसे क्यों चाकू मारा गया। उसमें लिखा गया कि तू गाय का मांस खाने वाला है इसलिए चाकू मारा गया। क्या किसी को तीस दिन में बेल मिल सकती है। क्यां वहां आपकी सरकार नहीं है? मैडम, किसी मर्डर केस में जमानत मिलने के लिए नब्बे दिन लगते हैं। आपकी सरकार सो रही है। आप कास्टीट्यूशन ड्यूटी में नाकाम साबित हुए हैं। अगर वजीर-ए-आजम वाकई सच्चाई को मानते हैं जबानी खर्च के कायल नहीं है तो मैं वजीर-ए-आजम को कहूंगा कि आपकी शेडो आर्मी को रोकिए। मैं आपके जरिए से कहना चाहता हूं कि हिन्दुस्तान की पांच हजार साल की तारीख है। मैं अपने हिन्दू भाइयों को कहना चाहता हूं कि बचा लो अपने आपको हिन्दुत्व से बचा लो। हमारी लड़ाई हिन्दूइज्म के खिलाफ नहीं है हमारी लडाई हिन्दुत्व के खिलाफ है। इस मुल्क को इससे बचाना है। यह हुकूमत हिन्दुत्व को प्रमोट कर रही है और मुसलमानों और दलितों की टार्गेेटेड किलिंग कर रही है। यह सरकार नाकाम साबित हुई है। जब तक मोदी सरकार रहेगी तब तक माब लिंचिंग चलती रहेगी।

सौगत राय-तृणमूल कांग्रेस के प्रोफेसर सौगत राय ने कहा कि मैं यहंा आम नौइयत के भीड़ के तशद्दुद पर बात नहीं करूंगा बल्कि गौरक्षा के नाम पर जो अहमकाना हरकतें हो रही हैं उनपर बात करूंगा। मैं इस डिबेट को बीजेपी और अपोजीशन नहीं बनाना चाहता और न ही इसे हिन्दू मुस्लिम डिबेट बनाना चाहता हंू।

असल सवाल पर अपनी बात रखते हुए सौगत राय ने कहा कि एक मैगजीन ने 2010 से 2017 के दरम्यान होने वाली भीड़ की कार्रवाई के आंकड़े पेश किए हैं इसके मुताबिक 2010 से 2017 के दरम्यान इस तरह के 63 वाक्यात हुए और इनमें 97 फीसद वाक्यात नरेन्द्र मोदी सरकार के 2014 में एक्तेदार में आने के बाद हुए। इन वाक्यात मंे 28 लोगों की जानंे गई  जिनमें 86 फीसद मुसलमान थे। इसके अलावा भीड़ के तशद्दुद के 53 फीसद वाक्यात उन रियासतों में हुए जहां बीजेपी की सरकारें हैं। प्रोफेसर सौगत राय की तकरीर के दौरान हुक्मरां बंेचों की जानिब से जमकर शोर व गुल हुए। किरन रिजूजू , अनन्त कुमार, एसएस अहलूवालिया (सभी मरकजी सरकार में वजीर) समेत कई लोगों ने प्रोफेसर राय के साथ टोका-टाकी की। बीजेपी के लोगों का मतालबा था कि प्रोफेसर राय ने जिस मैगजीन के आंकड़े के हवाले दिए हैं पहले उन्हें इसकी तस्दीक करनी चाहिए फिर उसे पार्लियामेट मंे रखना चाहिए। उन लोगों ने प्राफेसर राय के कई जुमलों को भी रिकार्ड से बाहर करने का मतालबा किया। बीजेपी के लोगों को सबसे बड़ा एतराज बीजेपी का नाम लिए जाने पर था। बहस में मदाखलत करते हुए कांगे्रस के मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि सियासी पार्टी का नाम ले लेने पर बार-बार जाब्ते का सवाल उठाया जा रहा है जबकि इससे पहले हुक्मदेव नारायण यादव ने अपनी तकरीर में कम से कम दस बार कांगे्रस का नाम लिया तब कोई नहीं बोला और वह कांगे्रस कांगे्रस का भजन मुसलसल करते रहे। शोरगुल और टोकाटाकी के दौरान प्रोफेसर सौगत राय ने जुनेद खान, पहलू खान और अखलाक को गाय के नाम पर पीट-पीट कर मार डालने का तजकिरा किया और कहा कि हरियाणा के वजीर-ए-आला को जुनेद के कत्ल की मजम्मत करने में पूरे तीन दिन लग गए और मरकजी वजीर रविशंकर ने चार दिन बाद इसकी मजम्मत की। राजस्थान की वजीर-ए-आला ने मुंह खोलने में पूरा एक हफ्ता लगाया और खुद वजीर-ए-आजम अभी तक दोबार बयान दे चुके हें जिसमें उन्होेने गौरक्षकों की मजम्मत की थी। लेकिन जिस दिन वजीर-ए-आजम ने बयान दिया ठीक उसी दिन झारखण्ड मंे अलीमउद्दीन उर्फ असगर अली को मार डाला गया। अब हुक्मरां पार्टी के सदर साहब कहते हैं कि लिंचिंग के ज्यादातर वाक्यात यूपीए सरकार के दौरान हुए। मेरा सवाल सिर्फ इतना है कि आखिर सरकारें अपना काम क्यों नहीं कर रही हैं। उन्होने मतालबा किया कि निर्भया वाक्ए से मुताल्लिक कानून की तरह मानव सुरक्षा कानून का बिल भी सरकार को पास कराना चाहिए ताकि भीड़ के तशद्दुद को रोका जा सके।

तथागत सतपथि- बीजू जनता दल के तथागत सतपथी ने कहा कि मैंने बहुत ही ताकतवर सियासत दानों के उरूज और जवाल को देखा है। गुजिश्ता लोक सभा में जो लोग अपोजीशन की तरफ बैठे थे वह हुक्मरां बेंचांे पर थे। आज जो हुक्मरां बंेचों पर हैं कल वह दूसरी तरफ जा सकते हैं। इसलिए असल मसले को इंसानी नुक्ता-ए-नजर से देखा जाना चाहिए। कोई एक हिन्दुस्तानी भी जब बेकसूर कत्ल किया जाता है तो मेरा दिल रोता है। मेैं इस तरह का पत्थर दिल इंसान नहीं हूं जो कहे कि अगर बैंक और एटीएम की लाइनों में डेढ सौ लोग मर जाते हैं तो यह मुल्क के लिए मामूली कीमत है। हर हिन्दुस्तानी कीमती है और अगर हम इसको कीमती नहीं मानते तो हम क्रिमिनल है। तथागत सतपथि ने कहा कि गाय और बैल गरीब हिन्दू किसान ही बेचते हैं और  वह अपनी खुशी से नहीं बेचते है। वह कर्ज में डूबे हुए होते हैं जब गाय या बैल बूढे हो जाते हैं तो उनके पास इतने पैसे नहीं होते कि वह घर बैैठा कर खिला सकें और उनका इलाज कर सकें। उन्हंे मजबूरन बेचना पड़ता है। लेकिन मौजूदा सूरते हाल यह हो गई है कि उनके खरीददार खौफ की वजह से उन्हंे खरीदने नहीं आते और गरीब किसान जो कर्ज मंे डूबे हुए उन्हे बेच नहीं पा रहे हैं। इन नए हालात ने देही मईशत को तबाह कर दिया है। इस तरह गाय के नाम पर तहरीक चला कर आप दरअस्ल किसान को मार रहे हैं और वह भी गरीब हिन्दू किसान को। इसलिए अपने चुनावी हलके में भी लोगों से कहता हूं कि वह मकामी बीजेपी के लोगों को गाय और बैल देकर उनसे उनकी देखभाल करने को कहें। गाय से हमारी मोहब्बत ने दहशत का माहौल पैदा कर दिया है। यह मुल्क के अस्ल मसलों से ध्यान हटाने की मुनज्जम कोशिश है। अब आप लोग युनिवर्सिटी मंे टैक रखवाने की बात कर रहे हैं तो फिर जैसा कि एक खातून ने कहा कि क्यों नहीं आप गांद्दी की मूर्ति के सामने टैªक्टर रखवाते और कुछ बैलों को यहां पार्लियामेंट मंे बांद्द देते ताकि हर मेम्बर पार्लियामंेंट दो जोड़ी बूढे बैलांे की देखभाल करे। उन्होने कहा कि सौगत बाबू की तकरीर के दौरान जो हंगामा किया गया जो एक तरह से एवान के अंदर गौरक्षा का वाक्या है और मुल्क टीवी पर हमें देख रहा है। उन्होने कहा कि मैं यहां गुजरात के कत्लेआम की सुनवाई करने वाली सीबीआई जज के बहीमाना कत्ल की बात नहीं करूंगा और न ही मैं राज्य सभा का एलक्शन लड़ने वाले कुछ बड़े लोगोे की आमदनी मंे तीन सौ फीसद इजाफे के मुताल्लिक कुछ कहूंगा। क्योंकि यह बहस का मौजूअ नहीं है लेकिन मैं यहां अपनी बात खत्म करते हुए नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो की सालाना रिपोर्ट क्राइम इन इंडिया का तजकिरा जरूर करूंगा। जिसमें कहा गया कि 2015 में जरई फसादात में बहुत इजाफा हुआ है आपके किसान नंगे भूके मर रहे हैं। कोई उन्हंे पानी तक नहीं देता और जरई फसादात में 327 फीसद इजाफा हो गया। उन्होने कहा कि राज्य सभा में सरकार के एक वजीर ने भीड़ के तशद्दुद के कुछ आंकड़े दिए हैं जिसके मुताबिक 2012 में सोलह वाक्यात हुए जिनमें 26 लोग मरे और 2013 में 14  वाक्यात हुए 18 लोग मारे गए। सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस दिन उन्होेेने यह तादाद बताई उसके सिर्फ एक दिन पहले 19 जुलाई को उनकी अपनी सरकार के एक दूसरे वजीर ने राज्य सभा में ही सवाल नम्बर 376 के जवाब में मुत्तला किया कि नेशनल क्राइम रिकाडर््स ब्यूरो इस तरह के वाक्यात का कोई रिकार्ड नहीं रखता। अब या तो आंकडे पेश करने वाले वजीर अपनी हांक रहे या फिर दूसरे वजीर ने राज्य सभा को गुमराह किया।

सुप्रिया सुले-एनसीपी की मैडम सुप्रिया सुले ने कहा कि लिंचिंग के मुल्क में जो भी वाक्यात हुए हैं पूरे हाउस को एक आवाज मंेे उसकी मजम्मत करनी चाहिए। मुझे हुक्मदेव नारायण यादव की तकरीर से बहुत मायूसी हुई जब उन्होने कहा कि उसका बेटा मर गया। ऐसे वाक्यात तो होते रहते हैं। मैं एक औरत हूं और 15 साल के जुनेद की मां के गम में बराबर की शरीक हूं। मुल्क मंे दीगर जगहों की तरह भीड़ के तशद्दुद का वाक्या नागपुर में भी हुआ। सभी वुजरा-ए-आला ने देर से ही सही लेकिन इन वाक्यात की  मजम्मत की है लेकिन महाराष्ट्र वाहिद रियासत है जहां के वजीर-ए-आला जो आम तौरपर बहुत सरगर्म रहते हैं नागपुर के वाक्ए पर एक लफ्ज नहीं बोले। शिवसेना ने भी इस वाक्ए की मजम्मत नहीं की।

पीके कन्हा कुट्टी- पीके कन्हा कुट्टी ने कहा कि ऐसे वक्त में जब हम मुल्क की तरक्की और डिजिटल इंडिया पर बात कर रहे हों हम माब लिंचिंग पर बात करनी पड़ रही है। बडे दुख की बात है कि आजादी के 70 साल बाद इस तरह के वाक्यात हो रहे है। हुक्मरां पार्टी से जुडी मुख्तलिफ तंजीमंे अपनी इश्तेआल अंगेज तकरीरों से उन्हेें बढावा दे रही हैं।

जय प्रकाश यादव (आरजेडी) ने कहा कि स्पीकर साहिबा, देश की सबसे बड़ी पंचायत मंे, इस मंदिर में एक इंतेहाई अहम मौजूअ पर चर्चा हो रही है। इसे पार्लियामंेट ने सजींदगी से लिया है। आपने मुझे इस मौजूअ पर बोलने का हुक्म दिया है। हम सभी को सुनते रहे हैं और दीगर लोगों की बात को भी सुनेगे। इस बारे में सरकार के जवाब को भी सुनेगे लेकिन यह मुल्क किसका है?

यह देश हम सबका है यानी हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई आपस मंे भाई-भाई। यह देश किसका है? राम-रहीम के बंदों का है। ईश्वर, अल्लाह तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान। इसका यह देश है लेकिन इस देश में माहौल को बिगाड़ा जा रहा है। हम बडी इज्जत करते हैं हुक्मदेव बाबू की। हम लोग रांइती मंे उनका झंडा लेकर भी चलते थे। आज जो हुक्मदेव बाबू की तकरीर हुई यह लोहियावादी की तकरीर नहीं थी। डाक्टर राम मनोहर लोहिया की आत्मा रोती होगी। यह तकरीर मनुवादी ताकतों की थी और नागपुर वाली ताकतों की तकरीर थी यह बदकिस्मती है कि आज देश की साख गिरी है मुल्क शर्मसार हुआ है। आज गांद्दी कहां है? आज गांद्दी चाहिए, आज लोक नायक जय प्रकाश नारायण चाहिए, आज जवाहर लाल नेहरू चाहिए, आज डाक्टर राम मनोहर लोहिया चाहिए। आज उनको आना चाहिए। वह आत्माएं आज कहां हैं?

उन्होने कहा कि कितने अंद्दड़ आए कितने तूफान आए, आपका रथ किसने रोका था? देश का एक बेटा नाम है लालू यादव ने रोक कर देश मेें सेक्यूलरों के झंडे को ऊंचा किया था। मत भूलिए। सीतामढी का दंगा हो रहा था। एक सीएम लालू थेे जिन्होेने हेलीकाप्टर से उतर कर दंगे कोेेे रोका था। मोहतरमा, जो इंसान और जानवर में फर्क नहीं करता है उसमंें इंसानियत नहीं होती उसमें कहीं न कहीं जल्लाद की रूह (आत्मा) दाखिल हो जाती है। यह हमें समझना है। हम तो कृष्णवंशी हैं। हम तो यादव कुल में पैदा हुए हैं। हमेें कोई गाय पालन सिखाएगा। नहीं नहीं गौपालन नहीं सिखा पाएगे। हम तो गोवद्र्दन पर्वत को भी उठाए थे। उन्होने कहा कि हम लड़ते रहे। मां और गाय को आप कहते हैं लेकिन जानना चाहते हैं कि शादी  के वक्त में श्राद्ध के वक्त अगर कोई मनुवादी को बूढी गाय दे दे तो वह गाय लेने का काम नहीं करेंगे। नहीं वही अश्विनी चैबे हैं क्या बूढी गाय को श्राद्ध में रखेंगे नहीं रखने का काम करेंगे। यह मनुवादी है। इसीलिए आज अखलाक का सवाल है आज मजलूम अंसारी का सवाल है। आज पहलू खान का सवाल है जुनेद का सवाल है। न हिन्दू न मुस्लिम। हमे डाक्टर लोहिया जी ने सिखाया कि सबसे पहले जुल्म और नाइंसाफी अपने परिवार से खत्म कीजिए जब परिवार से खत्म करोगे फिर मोहल्ले से फिर गांव से फिर शहर से करोगे अगर आप हलके के एमपी होगे या एमएलए होगे तो वहंा बंद कराएंगे। सबसे पहले परिवार से जुल्म और दबाव खत्म करने का काम शुरू कीजिए। मैं संजीदगी से बात कर रहा हूं।

अभी हुक्मदेव नारायण ने लोहिया जी का नाम लिया था लोहिया जी का नाम खूब लेते हैं लेकिन लोहिया जी के तौर तरीके पर नहीं चलते हैं? लोहिया जी ने कोई भी इलाका चाहे गांव का हो या शहर को हो चाहे हिन्दू हो या मुसलमान हो सबके साथ बराबरी और इसंाफ का सुलूक करने के लिए कहा था।

अरविंद सावंत (शिवसेना) ने कहा कि आज देश मेें एक संगीन मौजूअ चल रहा है। मुझे फख्र है कि मैं हिन्दू हृदय सम्राट शिवसेना चीफ बाला साहब ठाकरे जी का शागिर्द हूं सैनिक हूं जिन्होने हमें देश की एकता के संस्कार दिए। मैं यहंा भाषण सुनते हुए देख रहा था कि वह सब एक दूसरे को ताने दे रहे है। देश की आजादी से लेकर आज तक हम जिस ढंग से चल रहे हैं वह सबको मालूम है। जब हमारी सरकार आई तब पहली बार इस देश मे हिन्दुत्व की सरकार आई अगर आज बाला साहब ठाकरे जी होते तो उन्हें यह देखकर बहुत गर्व होता। आज जो हो रहा है यह देश के लिए अच्छा नहीं है। इम्पीचमेट आफ दी माइनोरिटी का सब्जेक्ट था और हम बार-बार वोटों की पालीसी की बुनियाद पर आगे चल रहे थे। कभी इस जात, कभी उस जात, कभी इस द्दर्म और कभी उस द्दर्म की बात होती है। किसी पर अत्याचार होने पर किसी भी सियासी पार्टी के चीफ का दौडकर जाना अच्छी बात है लेकिन जब हम उसमें भी भेदभाव करते हैं कि जिन पर नाइंसाफी हुई तो दौड कर जांऊंगा और अगर दलितों पर हुआ तो दौड़कर नहीं जाऊंगा। तो इससे इंसानियत मरती है। किसी ने सही कहा है कि -‘न हिन्दू रहेगा न मुसलमान रहेगा, इंसान की औलाद हैं, इंसान रहेगा।’ भगवान ने हर इंसान को इंसान बनाया, लेकिन हमने उसे हिन्दू या मुसलमान बनाया। हम यह सारी चीजें भूल जाते हैं।

मोहतरमा, आप यकीन नहीं करेगी जब मैं ऐसे माहौल में जाता हूं जहां मेरे मुसलमान भाई खड़े होते हैं तो मैं कहता हूं कि मेैं हिन्दू मां की कोख मंे पैदा हुआ हूं इसलिए हिन्दू हूं। मैं ऊंची जात मंे पैदा हुआ हूं इसलिए ऊंची जात का हूं। अगर मैं दलित मां की कोख में पैदा होता तो मैं दलित होता। अगर मैं मुसलमान मां की कोख में पैदा होता तो मुसलमान होता। लेकिन मैं सबसे पहले इंसान की शक्ल में पैदा हुआ हूं।

उन्होने कहा कि आज हम इसे भूल रहे हैं और बदकिस्मती इस देश की जो पालीसी चल रही है हम उससे एखतलाफ रखते हैं हम नुक्ताचीनी करते हैं लेकिन देख रहे हैं कि यह हिन्दुत्व की सरकार आई है इसलिए कुछ लोग अलग-अलग ढंग से बातें करते हैं। जों लिंिचंग का मामला है मैं उसकी सख्त मजम्मत करता हूं। जब मैं एक अंग्रेजी चैनल पर बात कर रहा था मुझसे पूछा गया कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है तो मैंने कहा कि इसके लिए हम चारों  जिम्मेदार हैं। हम भी जिम्मेदार हैं एक्जीक्यूटिव भी जिम्मेदार है जुडिशियरी भी जिम्मेदार है और मीडिया भी जिम्मेदार है। आज अगर हम संजीदगी से चर्चा करते हैं तो हमें उसपर भी जाना चाहिए।

मोेहतरमा, एक साथी मेम्बर ने कहा कि जो सिखों का कत्लेआम हुआ याद है। मुंबई में सिख बहुत ज्यादा हैं। बहुत बडी तादाद में है। उस वक्त बाला साहब ठाकरे जी ने कहा था कि सिखों के बाल को द्दक्का नहीं लगना चाहिए। यहां कत्ल होते रहे वहां अगर सिखों को बचाया तो शिव सेना ने बचाया। क्योंकि यह हमारा द्दर्म है इस देश का द्दर्म है। हमने जात नहीं देखी हमने द्दर्म नहीं देखा हालांकि हमें भी इंदिरा गंाद्दी जी के लिए बहुत फख्र था। बाला साहब ठाकरे जी इंदिरा गांद्दी के लिए कहते थे कि वह इस देश में एक मर्द है। उनके जाने पर उन्होने जो कार्टून निकाला था वह देखने लायक था। पूरी तस्वीर काली दिखाकर ज्योति बुझ गई है। उसमें इंदिरा गांद्दी की तस्वीर उन्होने निकाला था। उनके बारे में ऐसी इज्जत व एहतराम का जज्बा था लेकिन जो सियासी गलतियां थीं उनके ऊपर वह नुक्ताचीनी करने से छोडते नहीं थे।

उन्होने कहा कि मैं भी पिछले तीस-चालीस सालों से सियासत और समाजी  जिंदगी में हूं। हमने कभी नहीं देखा कि कौन क्या खाता है कौन क्या नहीं खाता है। मैं सोचता हूं कि यह कुदरत की देन है। कुदरत में शेर है वह हिंसा करता है और कुदरत मंे  हाथी भी है जो घास खाता है। कौन क्या खाए उसके लिए उसपर हम जुल्म करें यह हक हमें किसी ने नहीं दिया। फिर इसी बात को लेकर आगे चलते हुए शख्स ऐसा खाता है इसलिए उसे मारना और भी बडा जुल्म है। हमें इतना दर्द हुआ था। गाय एक जानवर है  उस गाय को मारने वाले को हम भी मार रहे हैं  तो हम दोबारा कत्ल कर रहे है। यह कौन सी बात हैं। इस बारे में मैं दो मिसालें दूंगा कि हाल ही में मुंबई में महानगर पालिका के चुनाव हुए कोई छः-सात महीने हुए होगे। चुनाव में जो कुछ हुआ वह आपको पता है मैं उसके सियासी पहलू में नहीं जाना चाहता हूं। उसके पहले एक मजहब के लोगों ने प्रोपगण्डा शुरू कर दिया कि यह नावेजिटेरियन की हिमायत करते हैं और यह कहा गया कि यह सभी नानवेजिटेरियन हैं इसलिए उनको वोट नहीं देना है। हम क्या खाएं क्या नहीं खाएं क्या आप इसके लिए हम पर सख्ती करेंगे? बदकिस्मती से उससे ज्यादा बुरा मुझे इस बात का लगा कि इसको लेकर बिखराव हुआ। उसको लेकर जात का बिखराव हुआ और मजहब का बिखराव हुआ। हम अगर द्दार्मिक संस्कार करते हैं तो एक इसंान को दूसरे इसांन से प्यार करने का संस्कार करना चाहिए।

‘मैं नफरत करने वाले के सीने मंेे प्यार भर दंू/ मैं वह परवाना हूं, पत्थर को मोम कर दूं।’

यह बात होनी चाहिए लेकिन आज उल्टा हो रहा है। उसने नफरत की तो मैं डबल नफरत करूगां। जहां पाकिस्तान के साथ नफरत करनी है वहां नहीं करते है। चाइना के साथ करनी है उस पर भी आता हूं। अब यह बात रही इसको लेकर सोशल मीडिया ने पूरा जहर फैला दिया। चार दिन पहले लोग कहते थे कि हम तुम्हारे साथ हैं दो दिन मंे सिर्फ मजहब की बात आई वेजिटेरियन और नान वेजिटेरियन की बात आई तो लोग घूम गए। यह हम क्या फैला रहे हैं कैसे बीज बो रहे हैं।