हज के चंद मुशाहिदात और एहसासात

हज के चंद मुशाहिदात और एहसासात

यह वह तकरीर है जो मौलाना सैयद अबुल हसन अली नदवी ने सफर हज से वापसी पर उन्नीस जिल हिज्जा चैदह सौ एक हिजरी मुताबिक अट्ठारह अक्टूबर उन्नीस सौ इक्यासी को दारूल उलूम नदवतुल उलेमा की मस्जिद में असातजा व तलबा व दास्ल उलूम और तब्लीगी जमाअत के बाज अहम व मुमताज हजरात की मौजूदगी में की। तकरीर टेप कर ली गई थी, कलम बंद होने और मौलाना की नजरसानी और किसी कदर तरमीम व इजाफे के बाद नाजरीन के सामने पेश जा रही है।

आलमे इस्लाम का अगर हकीकतपंसदाना उमूमी और आलमगीर जायजा लेना हो तो हज से बेहतर मौका नहीं। अगर किसी को इन तब्दीलियों को मालूम करना हो जो आलमे इस्लाम की इल्मी, फिक्री और एतकादी सहत पर रूनुमा हुई और उन कमजोरियों से वाकिफ होना हो जिनके बहुत से इस्लामी मुमालिक और मुस्लिम मआशरे शिकार हुए तो हज के मौके पर चला जाना चाहिए। बशर्ते कि जाने वालों की आंखें भी खुली हों, कान भी खुल हुए और दिमाग के दरवाजे भी बंद न हों। एक जगह वह सब कुछ पढ सकता है और यह देख सकता है कि आलमे इस्लाम किन चीजों में तरक्की कर रहा है और किस चीज में तनज्जुल हो रहा है। किस तनासुब से तरक्की हो रही है और किस तनासुब से कमजोरी या बीमारी बढ रही है। आलमे इस्लाम इस वक्त किस तरह की कमोरियां नफूज कर चुका है। हर तरह की बेतरतीबी का अक्स वहां पर नजर आएगा। बेशऊरी, बदसलीगी, बात का न मानना, निजाम पर न चलना, वहदत की कमी, इज्तेमाइयत की कमी, दीन की बुनियादी बातों से नावाकफियत, दीन से दूरी, यह सारी चीजें आपको वहां मिलेगीं। इसकी एक मामूली मिसाल है कि मैं ने मगरिब की नमाज से इशा की नमाज तक (जिसमें आम तौर पर लोग हरम शरीफ, मस्जिदे नबवी में हाजिर रहना पसंद करते हैं) हरम शरीफ में खाना काबा के बिल्कुल नजदीक, मताफ से करीब, लोगों को मुसलसल दुयिावी बातें इस तरह करते सुना जैसे कोई टेप रिकार्ड हो। ऐसा मालूम होता था कि किसी गांव की चैपाल में बैठे हुए हुक्का पीते हुए चंद अहबाब बातेें कर रहे हैं। जैसे उनका शऊर ही नहीं कि हम कहां आए हैं? किन अरमानों और दुआओं से आए हैं? कहां बैठे हैं? और यह हाजिरी दोबारा नसीब होगी या नहीं? ख्याल आता था कि अब हज वही शख्स करेगा जिसको अल्लाह तआला ने जज्बे के साथ जौक भी दिया है। लेकिन तजुर्बा और मुशाहिदा इसके खिलाफ हुआ। कई बार जबान पर आते आते रह गया कि हाजी साहब! कुछ तो शर्म कीजिए, अल्लाह का फजल है कि आप बैतुल्लाह शरीफ से करीब हैं, चंद गज ही का फासला है कभी-कभी तो तवाफ का दायरा वसीअ होते होते हम लोगों के ऐसा करीब आ जाता था कि हम को पीछे हटकर बैठना पड़ता था। मैने देखा कि सांस लिए बगैर दुनिया की बातें हो रही हैं। हम किस जहजा से आए? तुम किस जहाज से जाओगे? तुम्हारे गंाव में फलां साहब…। तुम ने क्या खरीदा? हमने क्या खरीदा? तुम्हरा मुअल्लिम कैसा है? हमारा मुअल्लिम कैसा है? मकान कैसा मिला है? वगैरह-वगैरह ंिफर कहते-कहते रूक जाता कि मालूम नहीं क्या जवाब मिलेगा लेकिन जबान से कोई ऐसा कलमा न कह दे कि और गुनहगार हों, सरकार  ने अपनी तरफ से इंतजामात में कोई कमी नहीं की एक रास्त आने का एक रास्ता जाने का मुकर्रर है। और वह वसीअ और कुशादा है लेकिन बेनज्मी, बेजाब्तगी, मुसलमानों की बेहुरमती, खुद गरजी और नफ्सानियत का क्या इलाज है? जमरात में कितने आदमी कितनी औरतें और बूढे कुचल कर जान बहक हुए, निजाफत कभी इस्लाम का तरीका था दुनिया जानती थी कि मुुसलमान साफ सुथरा रहता है नजास्त से दूर होता है और इससे उसको कराहत होती है इस सब चीजों में बराबर तनज्जुल का मुशाहिदा हो रहा है और मालूम नहीं बात किस हद तक पहुच गई है?

यह मामला तो हरम शरीफ के अदब व एहतराम और वहां की हाजिरी की सूरत में अल्लाह तआला का जो फजल व इनाम हुआ है उसकी कद्र और उससे फायदा उठाने का है। और इसमें कोताही और गफलत बेशक अफसोसनाक और ताज्जुब खेज बात है। मगर इससे ज्यादा अफसोसनाक और हैरतअंगेज मामला फरायज व अरकान का है तकरीबन हर हज के मौके पर नौवी जिल हिज्जा को मिना से अरफात रवानगी के मौके पर (जो सुबह सवेरे होेती है)  सुबह सादिक होने का इंतजार किए बगैर फज्र की नमाज का वक्त होने से एक घंटा और बाज अवकात इससे भी कब्ल फज्र की नमाज वह जमाअत के साथ पढकर मुख्तलिफ मुमालिक के हुज्जाज अरफात को रवाना हो गए ताकि सहूलत के साथ पहुच सकें, कितना ही समझाया गया कि अभी फज्र का वक्त नहीं हुआ नमाज नहीं होगी मगर कौन मानता है सरकार की तरफ से इंतजाम है कि तुलूअ सुबह सादिक का एलान तोप के जरिए होता है मगर किसी को परवा नहीं एक बार खुसूसी मेहमानों के लिए सरकार की तरफ से मिना में एक डेरा लगाया गया था मैं भी अपने दोस्तों के साथ वहां था सुबह सादिक अभी नहीं  हुई थी और उसमें खासा वक्फा था कि हुज्जाज ने अपनी-अपनी जमाअतों के साथ नमाज पढनी शुरू कर दी, एक अरब आलिम को इसपर बड़ा गुस्सा आया मुझसे कहा कि मैं अरबी में एलान करता हूं कि अभी सुबह नहीं हुई नमाजे फज्र अदा नहीं हुई तुम उर्दू अंगे्रजी वगैरह में एलान करो एलान किया गया मगर किसी ने समाअत नहीं की और नमाज पढ कर रवाना हो गए। यही हाल मुजदुल्फ से मिना की रवानगी के मौके पर होता है। इस बार फिर यह मंजर देखने में आया कि सुबह सादिक से घंटे-घंटे भर पेशतर मुख्तलिफ मुल्कों के लोग नमाजे फज्र वह भी जमाअत के साथ पढ कर मिना की तरफ चल पड़े, कितने ताज्जुब की बात है कि एक रूक्न अदा करने आए जिसमें सुनन और मुस्तहबात तक की रियायत करनी चाहिए और इस्लाम के रूक्ने आजम नमाज को इस तरह जाया किया कि नेकी बर्बाद, गुनाह लाजिम।

दूसरा पहलू जो हज के सिलसिले में शिद्दत के साथ मोहताजे तवज्जो है और इस सिलसिलेे में एक आलमगीर कोशिश और जद्दोजेहद करने और एक मुस्तकिल मुहिम चलाने की जरूरत है वह नफिली हज ही नहीं मुख्तलिफ अगराज व मकासिद से हज करने वालों की कसरत है जिस ने फर्ज हज करने वालों और सरकार दोनों के लिए सख्त दुश्वारियां और नाकाबिले उबूर मुश्किलात पैदा कर दी हैं और हज क तकद्दुस और हुरमत को ही नहीं इसकी नेकनामी और शोहरत को भी सख्त नुक्सान पहुचाया बल्कि इस्लाम की शोहरत व इज्जत को दाग लगाया और इसको ख्वीश और अगयार की निगाह में सख्त बेवकअत और मशकूक बना दिया है। इन बुनियादी अगराज के अलावा (जिन के मुताल्लिक कुछ ज्यादा कहने की जरूरत नहीं) नफिली हज का मामला भी काबिल नजरसानी और उलेमा और अहले शऊर के लिए काबिले गौर और काबिले तवज्जो बन गया है वसायले सफर की कसरत, दौलत की बहुतात, सऊदी अरब में मईशत व हुसूले दौलत के जराए व मौके की फरावानी ने मसले को और पेचीदा बना दिया है।

इमाम गजाली ने अपनी जिंदा जावेद और शहरा आफाक किताब ‘अहयाए उलूमुद्दीन’ मंे इस नफिली और दुनियावी मकासिद से बार-बार हज करने के रूझान पर (जो मालूम होता है कि उनके जमाने में पैदा हो गया था) बड़ी हकीकत पसंदाना और फकीहाना तंकीद की है। और इस सिलसिले में फकीह उम्मत, सहाबी जलील, हजरत अब्दुल्लाह बिन मसूद (रजि0) का एक हकीमाना कौल नकल किया है जिसको पढ कर यह महसूस होता है कि हमारे इस जमाने को देख कर फरमा रहे हैं। इमाम गजाली लिखते हैं-‘इन दौलतमंदों में बहुत से लोगों को हज पर रूपया खर्च करने का बड़ा शौक होता है वह बार-बार हज करते हैं और कभी ऐसा होता है अपने पड़ोसियों को भूका छोड़ देते हैं और हज करने चले जाते हैं। हजरत अब्दुल्लाह बिन मसूद (रजि0) ने सही फरमाया है कि आखिर जमाने में बिला जरूरत हज करने वालों की कसरत होगी सफर उनको बहुत आसान मालूम होगा रूपए की उनके पास कमी न होगी, वह हज से महरूम व तहीदस्त वापस आएंगे वह खुद रेगिस्तानों और चटियल मैदानों के बीच सफर करते होंगे और उनका पड़ोसी उनके पहलू में गिरफ्तार पला होगा उसके साथ कोई सुलूक और गमख्वारी नहीं करेंगे।’

यह एक पूरी दास्तान है बाज लोगों ने बतया कि एक गैर अरब मुस्लिम मुल्क के अखबारों मे छपा है कि आज सोने का रेट यह है और हाजियों के पहले जहाज के आने के बाद यह रेट हो जाएगा किसी कहने वाले ने सच कहा है कि हज पर डाका डाला जा रहा है और हज की मिट्टी पलीद की जा रही है इससे भी गिर कर बाज गैर अखलाकी मकासिद व मुनाफे के लिए (जिनका नाम भी जबान पर लाना अच्छा नहीं मालूम होता) मुस्तकिल एजेंसियां कायम हैं यह एक खास मौजूअ है और इसपर एक खास निजाम के साथ तवज्जो देने की जरूरत है।

इससे अंदाजा होता है कि अभी अवाम में दीन का काम करने उनकी दीनी व जेहनी तर्बियत की किस कद्र जरूरत है यह भी याद रहे कि अवाम मंे दीन का रहना इस्लाम की बका व हिफाजत के लिए फौलादी दीवार का काम देता है। अगर अवाम में दीनी शऊर, दीनी हमीयत और दीन से मोहब्बत खत्म हो गई तो ख्वास को (जिनके बड़े तबके ने अपनी किस्मत व कीमते एक्तेदार और हुकूमत की कुर्सी से वाबस्ता समझ रखी है) किसी चीज का खतरा बाकी नहीं नहीं रहेगा। और वह खुल खेलेंगे ‘सुल्तानी जम्हूर’ के इस दौर में उनको खौफे खुदा नहीं, खौफे अवाम (जो खुदा के फजल से अभी इस्लाम से वाबस्ता हैं) इस्लाम के खिलाफ खुली महाजआराई और एतकादी इर्तिदाद की दावत देने से रोके हुए है जिस दिन यह घेरा टूटा उस दिन यह सैलाब सबको बहा ले जाएगा।

जहां तक ख्वास और तालीमयाफ्ता तबके बल्कि अहले कलम का ताल्लुक है इसका सबसे बड़ा इब्तला जिसकी तरफ बहुत कम लोगों की नजर जाती है (और अफसोस है कि अहले नजर की नजर भी) वह दीन को माद्दी तरीके से समझने और समझाने का अंदाज इसके माद्दी मकासिद और फायदे पर जोर और दीन को जदीद सियासी निजामों की इस्तलाहात में पेश करने का रूझान है यह एक ऐसी नाजुक चीज है कि बहुत कम लोगों को इसका नुक्सान महसूस होता हैं आम तौर से कहा जाता है कि अगर किसी के दिल में दीन की अजमत इसी रास्ते से बिठा दी जाए तो इसमे क्या खराबी है? लेकिन याद रखना चाहिए कि अम्बिया (अलै0) से बढकर कोई हकीम, उनसे बढ कर अपने जमाने की नफ्सयात का समझने वाला फिर उसी के साथ इशाअते दीन का कोई हरीस नहीं हो सकता, कुरआने मजीद की कितनी आयतें है ंजिनमें उनकी इस फिक्रमंदी, लोगों की हिदायत की हिर्स और उनकी मौजूदा हालत पर उनकी दर्दमंदी और दिलसोजी का मजमून बयान किया गया है। सूरा शोअरा में फरमाया गया-‘ऐ पैगम्बर, शायद तुम इस (रंज) से कि यह लोग ईमान नहीं लाते अपने तयीं हलाक कर दोगे।’ सूरा फातिर में आता है-‘आप उन पर अफसोस खा-खाकर हलाक न हो जाएं, अल्लाह खूब जानता है जो वह कर रहे हैं।’ सूरा तौबा में फरमाता है-‘(लोगो) तुम्हारे पास तुम्हीं में से एक पैगम्बर आए हैं तुम्हारी तकलीफ उनको गरां मालूम होती है और तुम्हारी भलाई के ख्वाहिशमंद हैं और मोमिनों पर निहायत शफकत करने वाले और मेहरबान हैं।’

एक तरफ तो उनको यह फिक्र और हिर्स होती है कि ज्यादा से ज्यादा लोग उनकी दावत कुबूल करके जहन्नुम से निजात पाएं और जन्नत के मुस्तहक बनंे। दूसरी तरफ उनकी वह हिकमत व बलागत होती है जिसकी नजीर किसी तबके में नहीं मिल सकती इसके बावजूद उन्होने अपने मुखातिबीन को कभी कोई जेहनी रिश्वत नहीं दी अम्बिया (अलै0) न अपनी दावत को बदलते हैं न दावत की जबान और दावत की तफहीम के तरीके को बदलते हैं यहां तक कि नबी करीम (सल0) ने अल्फाज तक का ख्याल किया है जुमा का नाम जाहिलियत में ‘अरविया’ था नबी करीम (सल0) ने इसके इस्तेमाल से मना फरमाया कि इसमें जाहिलियत की बू आती है।

इस्लाम को एक निजाम और तहरीक के तौर पर पेश करने, इसके सियासी, तंजीमी, तमद्दुनी फायदे बयान करने मंे लगे और इसी पहलू पर जोर देने के असबाब में इन सियासी हालात, नाम निहाद मुस्लिम हुकूमतों के रवैए और उनकी हर ऐसी चीज से वहशत और खौफ को भी दखल है जिसमें सियासत की बू भी आती है और जिससे किसी मुतवाजी तंजीम या कयादत के उभरने का वहम पैदा होता है इसका दूसरा बाइस उन मुसलमान अहले कलम की तहरीरों और उनकी इस्लाम की तर्जुमानी भी है जो मगरिबी फलसफों, सियासियात, निजामों के मुताला, और वहां के तद्दुन व मआशे की नाकामी के मुशाहिदे और तजुर्बे की राह से इस्लाम के मुताले और ईमान और एतकाद की मंजिल तक पहुचने और इसकी हकीकत ने उनको इस्लाम की सदाकत और अजमत का कायल और गिरवीदा बनाया आलमे अरबी में खास तौर पर यह बात कमजोरी की हद तक पहुची हुई है। इन मुल्कोें की सूरते हाल ने ख्वास और दीनी जमाअतों के कायदीन में दीन की सियासी तफहीम का उमूमी रूझान पैदा कर दिया है। वह समझने लगे हैं कि इसके बगैर हम नौजवान तालीमयाफ्ता तबके को  दीन की तरफ मुतवज्जो नहीं कर सकते, इसकी अमली कद्र व कीमत का एहसास नहीं करा सकते और इनमें नया जज्बा और हरकत नहीं पैदा कर सकते। इस वक्त वहंा एक ऐसी गैर अख्तियारी सूरत पैदा हो गई है जो दीन की असल रूह के लिए एक इब्तला है। ‘फितना’ की खासियत यह है कि वह फितना न मालूम हो इस वक्त का फितना यह है कि बड़े से बडे़ आलिम बड़े से बडे़ मुसलमान दानिशवर और बड़े से बडे़ मुखलिस दीन को इस अंदाज में पेश कर रहे हैं जिस अंदाज में अम्बिया (अलै0) ने पेश नहीं किया।

इसकी एक मिसाल और नमूना हज है। बहुत से मुसलमान अहले कलम और दीन के दाई और तर्जुमान कहने लगे हैं कि हज एक आलमी बैनुल अकवामी मोतमर इस्लामी (इंटरनेशनल इस्लामी कांफ्रेंस) है जिसका मकसद मिल्लत के मसायल पर तबादला ख्याल और गौर व फिक्र और उनके हल के वसायल तलाश करना है। मैं सालों साल से देख रहा हूं कि इस तरह बेमहाबा हज को पेश किया जाता है जब मैंने चार-पांच साल पहलेे मस्जिदे निमरा में अरफात के खुतबा में मोहतरम खतीब साहब को यह कहते हुए सुना कि हज एक ‘मोतमर इस्लामी’ है तो मुझे अंदाजा हुआ कि बात कहां से कहां तक पहुच चुकी है और अब मुसलमान दानिशवरों और हज पर लिखने वालों का यह आम जेहन बन चुका है। मेरा इस साल मिना मंे राब्ता आलमे इस्लामी की इमारत में कयाम था जहां राब्ता के अरकान और मुख्तलिफ मुमालिक के मुमताज तरीन उलेमा और हुकूमत के बहुत से मोअज्जिज मेहमान ठहरे हुए थे मुख्तलिफ मुमालिक के हज के वफूद और अमरीका के नव मुस्लिम बिलाली मुसलमान भी खासी तादाद में थे वहंा हज के फायदे और मनासिक पर कई तकरीरें हुई मगर किसी ने कोई तकरीर इस मौजूअ पर नहीं की कि हज की रूह क्या है और इसके असरार व मकासिद असली क्या हैं? आखिर में मुझसे फरमाइश की गई कि मैं इन बिलाली मुसलमानोें के सामने हज के मौजूअ पर तकरीर करूं वह सब मुश्ताक हैं। मैने कहा कि मैं अरबी में तकरीर करूगा इस मौके पर राब्ता के अरकान और आलमे इस्लाम के चीदा उलेमा और मोअज्जिज मेहमान सब तशरीफ रखते हों तो बेहतर है। इसी पर अमल हुआ राब्ता के सेक्रेटरी जनरल  शेख मोहम्मद अली अल हरकान भी जो खुद भी जलीलुल कद्र आलिम और मुहद्दिस हैं, और अपने इस ओहदे से पहले ममलिकते सऊदिया के वजीर अल अदल (वजीर कानून) रह चुके हैं और मेेरे पुराने दोस्त हैं तशरीफ रखते थे यूएन (न्यूयार्क) मंे राब्ता के आफिस के शोबा दावत के इंचार्ज अजीजी मौलवी मुजम्मिल हुसैन सिद्दीकी नदवी ने इसका तर्जुमा अंग्रेजी में किया जो अमरीका में भी मेरी तकरीर का तर्जुमा कर चुके हैं मैने इरादा कर लिया कि इस बार दिल खोलकर हज की हकीकत और रूह पर तकरीर करूगां।

मैंने कहा कि हजरात! इस्लाम के चार अमली रूक्न हैं नमाज, रोजा, जकात, हज इनमें से हर एक का एक मेहवर है। जिसके गिर्द वह घूमता है नमाज का मेहवर क्या है? अल्लाह तआला फरमाता है-‘और मेरी याद के लिए नमाज पढा करो’ दूसरी आयत-‘और खुदा के आगे अदब से खडे़ रहा करो।’ और इरशाद है-‘बेशक ईमान वाले कामयाब हो गए जो अपनी नमाज में अजज व नियाज करते हैं।’

यह है नमाज का मेहवर, नमाज की असल रूह अल्लाह की याद अदब, खुशूअ व खुजूअ और कयाम व सकूत है। जकात के मुताल्लिक इशाद है-‘उनके माल में से जकात कुबूल कर लो कि उससे तुम उनको (जाहिर में) पाक, और (बातिन में) पाकीजा करते हो और उनके हक में दुआए खैर करो कि तुम्हारी दुआ उनके लिए मूजिबे तसकीन है और खुदा सुनने वाला और जानने वाला है।

दूसरी जगह जकात के मसारिफ बयान किए गए है फरमाया गया है-‘ सदकात (यानी जकात व खैरात) तो मुफलिसों मोहताजों और कारकुनान सदकात का हक है और उन लोगों का जिन की तालीफे कुलूब मंजूर है और गुलामों के आजाद कराने में और कर्जदारों (कर्ज अदा करने) में और खुदा की राह में और मुसाफिरों (की मदद) में (भी यह माल खर्च करना चाहिए)यह हुकूक खुदा की तरफ से मुकर्रर कर दिए गए हैं और खुदा जानने वाला और हिकमत वाला है।’ (जारी)